{
  "type": "article",
  "title": "मेवाड़ की ग्रामीण सियासत में तीन दशकों का खेल, कभी अविश्वास प्रस्ताव तो कभी पर्ची से तय हुआ उदयपुर जिला प्रमुख",
  "summary": "उदयपुर जिला परिषद के 30 साल के सियासी सफर में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने तीन-तीन बार बाजी मारी है, जहां बगावत से लेकर लॉटरी तक ने सत्ता का रुख मोड़ा। 2026 में 47 वार्डों के परिसीमन और सामान्य वर्ग के आरक्षण के साथ एक बार फिर ग्रामीण बिसात बिछ चुकी है।",
  "content": "राजस्थान की राजनीति में यह बात लंबे समय से कही जाती रही है कि जयपुर की सत्ता का रास्ता मेवाड़ की सरजमीं से होकर ही गुजरता है। विधानसभा स्तर पर भले ही उदयपुर को भारतीय जनता पार्टी का मजबूत दुर्ग आंका जाता रहा हो, लेकिन जब बात त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की आती है तो सारा दारोमदार पूरी तरह ग्रामीण मतदाताओं के हाथ में सिमट जाता है। पंचायत चुनावों की आहट के साथ ही उदयपुर जिला परिषद और उसकी अधीनस्थ पंचायत समितियों का सियासी तापमान चढ़ने लगा है। परिसीमन की नई प्रक्रिया पूरी होने के बाद बदले हुए चुनावी भूगोल में यह सवाल सबसे अहम हो गया है कि इस बार ग्रामीण सत्ता की बागडोर किस खेमे के हाथ लगेगी। पिछले तीन दशकों का रिकॉर्ड साफ बताता है कि यहां किसी एक दल का एकतरफा आधिपत्य कभी स्थाई नहीं रहा है।\n\nतीन दशकों में दोनों मुख्य दलों का संतुलित गणित\nवर्ष 1995 से लेकर अब तक के करीब तीस वर्षों के इतिहास पर नजर डालें तो सत्ता की यह कुर्सी किसी एक राजनीतिक दल की जागीर नहीं रही। इस पूरे दौर में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही बारी-बारी से तीन-तीन बार अपने प्रत्याशियों को जिला प्रमुख के सर्वोच्च पद तक पहुंचाने में सफल रही हैं। यद्यपि पिछले एक दशक से लगातार इस कुर्सी पर भाजपा का कब्जा बरकरार है, जहां 2015 के चुनाव में शांतिलाल मेघवाल जिला प्रमुख चुने गए और उसके बाद ममता कुंवर पंवार ने इस पद की जिम्मेदारी संभाली। इसके बावजूद यदि 1995 से 2015 के बीच के दो दशकों का लेखा-जोखा देखा जाए तो हर पांच साल में सत्ता का संतुलन बदलता रहा है। कभी सदन में अविश्वास प्रस्ताव लाकर सत्ता पलट दी गई, तो कभी ऐन मौके पर अपनी ही पार्टी से बगावत करने वाले चेहरों ने समीकरण पूरी तरह ध्वस्त कर दिए।\n\n1995 का अविश्वास प्रस्ताव और कांग्रेस की वापसी\nपंचायती राज के 1995 वाले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर वंदना मीणा ने शानदार जीत दर्ज की और वे उदयपुर की जिला प्रमुख बनीं। उस दौर में ऐसा माना जा रहा था कि भाजपा ग्रामीण इलाके में भी अपनी मजबूत पकड़ बना चुकी है, किंतु वंदना मीणा अपना पांच वर्ष का निर्धारित कार्यकाल पूरा नहीं कर सकीं। कार्यकाल के लगभग चार साल बीतते-बीतते उनके खिलाफ असंतोष पनपा और विपक्षी खेमे ने अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया। सदन के भीतर संख्याबल की परीक्षा हुई और यह अविश्वास प्रस्ताव बहुमत से पारित हो गया। वंदना मीणा को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी और इसके बाद कांग्रेस की सज्जन कटारा ने जिला प्रमुख का कार्यभार संभाला। सज्जन कटारा ने करीब एक साल तक इस दायित्व का निर्वहन किया। इस आकस्मिक फेरबदल ने यह साबित कर दिया कि जिला परिषद के सदस्यों का आंतरिक भरोसा कितना नाजुक होता है। अगले आम चुनाव हुए तो कांग्रेस ने अपनी बढ़त बनाए रखी और पार्टी के वरिष्ठ नेता छगनलाल जैन जिला प्रमुख निर्वाचित हुए, जिन्होंने सफलतापूर्वक अपना पांच साल का पूरा कार्यकाल पूरा किया।\n\nजब टाई हुआ मुकाबला और पर्ची से चमकी लबाना की किस्मत\nछगनलाल जैन का पांच साल का कार्यकाल समाप्त होने के बाद जब अगला चुनाव आया, तो उदयपुर जिला परिषद का मुकाबला राजस्थान के सबसे नाटकीय और चर्चित घटनाक्रमों में शुमार हो गया। कांग्रेस पार्टी के भीतर टिकट वितरण को लेकर भारी असंतोष भड़क उठा और पार्टी के कद्दावर नेता केवल चंद लबाना ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया। केवल चंद लबाना ने बागी होकर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जिला प्रमुख पद का नामांकन पत्र दाखिल कर दिया। इस सियासी संकट को भांपते हुए भारतीय जनता पार्टी ने अपना अलग प्रत्याशी उतारने के बजाय निर्दलीय लबाना को खुला समर्थन देने का दांव खेल दिया। दूसरी तरफ कांग्रेस ने कचरूलाल चौधरी को अपना अधिकृत उम्मीदवार बनाया था। मतदान के दिन जब सदस्यों के वोटों की गिनती हुई तो दोनों ही उम्मीदवारों को बिल्कुल बराबर मत मिले। मुकाबला टाई होने के बाद चुनाव नियमों के तहत भाग्य का फैसला करने के लिए लॉटरी यानी गोटी निकालने की नौबत आ गई। प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में जब गोटी निकाली गई, तो उसमें केवल चंद लबाना का नाम निकला। इस अप्रत्याशित तरीके से बगावत करने वाले लबाना जिला प्रमुख की कुर्सी तक जा पहुंचे। इस बेहद चर्चित कार्यकाल के पूरा होने के बाद हुए अगले चुनाव में कांग्रेस की मधु मेहता जिला प्रमुख बनीं, जिसके बाद 2015 से भाजपा ने शांतिलाल मेघवाल और फिर ममता कुंवर पंवार के जरिए अपनी मजबूत वापसी दर्ज कराई।\n\nममता कुंवर के चुनाव में भाजपा का अंदरूनी घमासान\nममता कुंवर पंवार के जिला प्रमुख निर्वाचित होने के दौरान उदयपुर के राजनीतिक गलियारों में भारतीय जनता पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी खुलकर सामने आ गई थी। उस चुनाव में पार्टी के भीतर स्पष्ट रूप से दो अलग-अलग खेमे बन गए थे। राजनीतिक हलकों में उस समय यह चर्चा जोरों पर थी कि पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेता और वर्तमान राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया की प्राथमिक मंशा के विपरीत जाकर समीकरण साधे गए। कटारिया के बेहद करीबी माने जाने वाले प्रमोद सामर ने अपने नजदीकी भंवर सिंह पंवार की बेटी ममता कुंवर की दावेदारी को आगे बढ़ाया और उन्हें कुर्सी तक पहुंचाने में बेहद निर्णायक भूमिका अदा की। इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम के कारण कटारिया और सामर के बीच गहरी नाराजगी और खींचतान की खबरें राजनीतिक हल्कों में लंबे समय तक चर्चा का विषय बनी रहीं। इसने दिखाया कि जिला प्रमुख के चुनाव में पार्टी का आधिकारिक रुख कई बार स्थानीय क्षत्रपों की निजी प्राथमिकताओं के आगे बेअसर साबित हो जाता है।\n\n2026 में 47 वार्ड और सामान्य श्रेणी का खुला मैदान\nअब 2026 के पंचायत चुनाव सामने हैं और इस बार उदयपुर जिला परिषद का स्वरूप नए सिरे से गढ़ा गया है। जिले में हाल ही में संपन्न हुए परिसीमन के बाद जिला परिषद के कुल 47 वार्ड तय किए गए हैं। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि इस बार जिला प्रमुख का पद किसी आरक्षित वर्ग के लिए न होकर सामान्य यानी ओपन श्रेणी के लिए रखा गया है। सामान्य सीट घोषित होते ही दोनों प्रमुख दलों, भाजपा और कांग्रेस के भीतर कई वरिष्ठ नेताओं और नए चेहरों ने अपनी दावेदारी के लिए बिसात बिछाना शुरू कर दिया है। जिला प्रमुख के सीधे चुनाव की व्यवस्था न होने के कारण यह पूरी तरह वार्ड सदस्यों की संख्या पर निर्भर करेगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि किसी दल के लिए केवल ज्यादा वार्ड जीतना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि नतीजों के बाद 47 सदस्यों के बीच आवश्यक बहुमत जुटाना और संभावित बगावत को रोकना ही असली परीक्षा होगी।\n\nआदिवासी और ग्रामीण मतदाताओं का निर्णायक गणित\nउदयपुर जिले के 47 वार्डों के सामाजिक वर्गीकरण पर नजर डालें तो इसमें अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जनजाति महिला के लिए सीटों का बड़ा हिस्सा आरक्षित किया गया है। इसके साथ ही सामान्य, सामान्य महिला, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अनुसूचित जाति (एससी) के लिए भी वार्ड निर्धारित किए गए हैं। उदयपुर के समग्र भूभाग में आदिवासी और ग्रामीण आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा बसता है, जिसके चलते जिला परिषद की राजनीति में ग्रामीण जनमत ही सबसे बड़ा निर्णायक कारक बनता है। विधानसभा और लोकसभा के स्तर पर शहरी वोटरों के दम पर भले ही कोई पार्टी अपना परचम लहरा दे, मगर पंचायत चुनावों में ग्रामीण क्षेत्रों की अपनी अलग जमीनी प्राथमिकताएं होती हैं। तीन दशकों का इतिहास यही सबक देता है कि उदयपुर में कभी भी जीत को पहले से तय मानकर नहीं चला जा सकता। कभी अविश्वास प्रस्ताव, कभी आंतरिक बगावत और कभी गोटी के फैसले ने इस कुर्सी का भाग्य तय किया है, और अब 2026 के नए परिसीमन में 47 वार्डों के सदस्य इस नई इबारत को लिखने जा रहे हैं।\n\nइसका आप पर असर\nउदयपुर जिला परिषद चुनाव की घोषणा और सामान्य वर्ग के आरक्षण ने स्थानीय ग्रामीण शासन के समीकरणों को सीधे तौर पर प्रभावित किया है।\n\n• भारत में: पंचायती राज संस्थाओं में निष्पक्ष चुनाव और परिसीमन जमीनी लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को मजबूती प्रदान करते हैं। यह प्रक्रिया दर्शाती है कि स्थानीय निकायों में विभिन्न सामाजिक वर्गों का प्रतिनिधित्व किस प्रकार तय किया जाता है।\n• उदयपुर में: जिले के 47 नवगठित वार्डों के ग्रामीण मतदाता अपने क्षेत्र के विकास और पंचायती योजनाओं के लिए नए जनप्रतिनिधि चुनेंगे। जिला प्रमुख पद सामान्य श्रेणी का होने से स्थानीय ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं और विकास बजट का आवंटन नए राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर करेगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nउदयपुर जिला परिषद के तीन दशकों के राजनीतिक घटनाक्रम और मौजूदा हलचल के पीछे स्थानीय गुटबाजी, संख्याबल का गणित और चुनावी नियमों की बाध्यता मुख्य कारण रहे हैं।\n\n• संख्याबल और अविश्वास प्रस्ताव: जिला प्रमुख का चुनाव सीधे जनता से न होकर निर्वाचित सदस्यों द्वारा होने के कारण असंतुष्ट गुटों ने 1995 में वंदना मीणा के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित कराकर सत्ता पलट दी थी। यह व्यवस्था सदस्यों के आंतरिक असंतोष को भुनाने का सीधा अवसर देती रही है।\n• टिकट वितरण पर बगावत और टाई का नियम: पार्टी के भीतर आम सहमति न बनने पर केवल चंद लबाना ने बगावत की और दोनों उम्मीदवारों को बराबर मत मिलने की असामान्य स्थिति बनी। निर्वाचन नियमों के तहत बराबरी पर लॉटरी (गोटी) निकालने का प्रावधान होने के कारण उनका नाम पर्ची में निकला।\n• 2026 का नया परिसीमन और आरक्षण: वर्तमान में प्रशासनिक पुनर्गठन के तहत वार्डों की संख्या 47 की गई है और लॉटरी प्रक्रिया के तहत शीर्ष पद सामान्य वर्ग के लिए तय हुआ है। इसी संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रिया ने दोनों प्रमुख दलों के कई दावेदारों को मैदान में सक्रिय कर दिया है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. उदयपुर जिला परिषद में 1995 के बाद भाजपा और कांग्रेस कितनी बार जिला प्रमुख बना चुकी हैं?\nवर्ष 1995 से अब तक दोनों ही प्रमुख दलों ने तीन-तीन बार जिला प्रमुख के पद पर जीत दर्ज की है।\n\n2. उदयपुर में किस जिला प्रमुख का फैसला पर्ची यानी गोटी के जरिए हुआ था?\nकांग्रेस से बगावत कर निर्दलीय लड़े केवल चंद लबाना और कचरूलाल चौधरी के बीच वोट बराबर होने पर गोटी निकाली गई थी, जिसमें लबाना की जीत हुई।\n\n3. ममता कुंवर पंवार के निर्वाचन के समय भाजपा में क्या विवाद हुआ था?\nममता कुंवर को आगे बढ़ाने में प्रमोद सामर की भूमिका रही, जिसे लेकर वरिष्ठ नेता गुलाबचंद कटारिया की नाराजगी और गुटबाजी की चर्चा सामने आई थी।\n\n4. 2026 के चुनाव के लिए उदयपुर जिला परिषद में कितने वार्ड हैं और प्रमुख का पद किस वर्ग के लिए है?\nपरिसीमन के बाद जिला परिषद में 47 वार्ड निर्धारित किए गए हैं और जिला प्रमुख का पद सामान्य श्रेणी के लिए रखा गया है।",
  "url": "https://trendkia.com/rajasthan/mewar-ki-gramina-siyasata-men-tina-dashakon-ka-khela-kabhi-avishvasa-prastava-to-kabhi-parchi-se-taya-hua-udaipur-zila-pramukh-44820",
  "category": "राजस्थान",
  "publishedAt": "2026-10-08",
  "tags": [
    "उदयपुर जिला परिषद",
    "राजस्थान पंचायत चुनाव",
    "मेवाड़ राजनीति",
    "जिला प्रमुख चुनाव",
    "गुलाबचंद कटारिया",
    "केवल चंद लबाना"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}