माउंट आबू में अधर देवी शक्तिपीठ: 365 सीढ़ियां चढ़कर गुफा में होती है मां कात्यायनी की पूजा सिरोही के प्रसिद्ध हिल स्टेशन माउंट आबू स्थित अर्बुदा देवी मंदिर में नवरात्रि के दौरान श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। प्राकृतिक गुफा में स्थित इस शक्तिपीठ को राजस्थान का वैष्णो देवी भी कहा जाता है। सिरोही जिले के खूबसूरत हिल स्टेशन माउंट आबू में स्थित अर्बुदा देवी शक्तिपीठ में नवरात्रि के पावन पर्व पर आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। इस पावन स्थल को स्थानीय परंपरा में अधर देवी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। ऊंची पहाड़ी पर प्राकृतिक गुफा के भीतर स्थित होने और कठिन चढ़ाई के कारण श्रद्धालु इस पावन धाम को राजस्थान का वैष्णो देवी भी कहकर पुकारते हैं। गुफा के आंतरिक गर्भगृह में मां भगवती नवदुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी के रूप में विराजमान हैं, जिनके दर्शन के लिए नवरात्रि के पूरे नौ दिनों तक यहां मेले जैसा जीवंत वातावरण बना रहता है। पौराणिक कथा और शक्तिपीठ का पावन इतिहास इस पवित्र तीर्थ स्थल से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब इसी स्थान पर माता सती के अधर यानी होंठ गिरे थे। होंठ गिरने के कारण ही इस धाम का नाम अधर देवी पड़ा। एक अन्य धार्मिक मान्यता के मुताबिक, इसी पहाड़ी के निचले हिस्से में मां अर्बुदा देवी ने वास्कली नामक अत्याचारी राक्षस का संहार किया था और देवताओं तथा ऋषि-मुनियों को उसके भय से मुक्ति दिलाई थी। पहाड़ी पर माता के पावन चरण पादुका के निशान आज भी मौजूद हैं, जिनकी श्रद्धालु अत्यंत श्रद्धा भाव से पूजा-अर्चना करते हैं। 5500 वर्ष प्राचीन इतिहास और परमार शासकों की कुलदेवी धार्मिक ग्रंथों में इस पावन स्थल का विशेष स्थान है, और स्कंद पुराण के अर्बुद खंड में इस तीर्थ का विस्तृत उल्लेख मिलता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर का इतिहास लगभग 5500 वर्ष पुराना माना जाता है। इतिहास के पन्नों में अधर देवी को आबू क्षेत्र के परमार वंश के शासकों की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता रहा है। नवरात्रि के शुभ अवसर पर यहां केवल सिरोही जिले से ही नहीं, बल्कि समूचे राजस्थान और पड़ोसी राज्य गुजरात से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पैदल पदयात्रा करते हुए माता के दरबार में शीश नवाने पहुंचते हैं। स्थानीय श्रद्धालु राहुल कुमार बताते हैं कि यहां माता की पूजा नवदुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी के रूप में विधि-विधान से संपन्न होती है। नक्की झील से दूरी और 365 सीढ़ियों की कठिन चढ़ाई पहाड़ी पर बसे इस शक्तिपीठ तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को माउंट आबू की विख्यात नक्की झील से लगभग 2 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। इसके उपरांत मुख्य मंदिर परिसर तक पहुंचने के लिए पहाड़ी पर बनी करीब 365 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। मंदिर की मर्यादा और सुरक्षा बनाए रखने के उद्देश्य से आंतरिक परिसर में कैमरा ले जाने अथवा किसी भी प्रकार की फोटोग्राफी करने की सख्त मनाही है, इसलिए सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बाहर ही जमा करवा लिए जाते हैं। प्राकृतिक संकरी गुफा, अमृत कुंड और दूध बावड़ी मुख्य मंदिर के भीतर प्रवेश करने का मार्ग अत्यंत अनूठा और चुनौतीपूर्ण है। श्रद्धालुओं को पहाड़ी पर बने एक बेहद संकरे रास्ते से झुककर प्राकृतिक गुफा के भीतर दाखिल होना पड़ता है। मंदिर में माता के पावन पद चिह्नों की आराधना की जाती है, जबकि मुख्य गर्भगृह में सिंह पर आरूढ़ मां भगवती की भव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित है। मंदिर परिसर में एक दिव्य अमृत कुंड मौजूद है, जिसके बारे में मान्यता है कि भीषण सूखे के दौर में भी इसका जल कभी सूखा नहीं। वहीं पहाड़ी की तलहटी में स्थित दूध बावड़ी भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का बड़ा केंद्र है, जहां का जल देखने में बिल्कुल सफेद दूध जैसा प्रतीत होता है। इसका आप पर असर माउंट आबू जाने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए मंदिर दर्शन से जुड़ी व्यावहारिक जानकारी बेहद उपयोगी है। • शारीरिक तैयारी: मुख्य मंदिर तक पहुंचने के लिए 365 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं और गुफा में झुककर प्रवेश करना पड़ता है। बुजुर्गों और चलने में असमर्थ लोगों को दर्शन की योजना बनाते समय इस चढ़ाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए। • सिरोही और राजस्थान में: नक्की झील से मंदिर की दूरी केवल 2 किलोमीटर है, जिससे स्थानीय आवागमन काफी आसान रहता है। दर्शनार्थी बिना किसी परेशानी के स्थानीय टैक्सी या पैदल चलकर तलहटी तक पहुंच सकते हैं। • फोटोग्राफी के नियम: मंदिर के अंदर किसी भी तरह के कैमरे अथवा मोबाइल से फोटो खींचने पर पूर्ण प्रतिबंध है। श्रद्धालुओं को अपने गैजेट्स और कैमरे बाहर ही सुरक्षित स्थान पर जमा करवाने होंगे। • पवित्र जल स्रोत: तलहटी में मौजूद दूध बावड़ी और परिसर में स्थित अमृत कुंड के दर्शन भी यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यहां जाने वाले भक्त इन दोनों ऐतिहासिक और धार्मिक कुंडों की महत्ता को समझकर उनका अवलोकन कर सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ माउंट आबू के इस शक्तिपीठ को पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व के कारण विशेष मान्यता प्राप्त है। • शक्तिपीठ की उत्पत्ति: पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव जब सती के पार्थिव शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब माता के होंठ इसी पहाड़ी पर गिरे थे। इसी कारण इस स्थान को अधर देवी नाम मिला और यह पूजनीय शक्तिपीठ बना। • राक्षस वध की गाथा: धार्मिक मान्यता है कि माता अर्बुदा देवी ने इसी पहाड़ी के निचले भाग में वास्कली नामक राक्षस का संहार किया था। ऋषियों और देवताओं की रक्षा करने के उपलक्ष्य में यह पहाड़ी पूजनीय स्थल बन गई। • परमार शासकों की विरासत: इतिहास में लगभग 5500 वर्ष पुराने माने जाने वाले इस मंदिर को आबू के परमार शासकों ने अपनी कुलदेवी माना था। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही इसी परंपरा के चलते राजस्थान और गुजरात के श्रद्धालु आज भी यहां पदयात्रा करते हैं। सवाल-जवाब 1. माउंट आबू के अर्बुदा देवी मंदिर को अधर देवी क्यों कहा जाता है? मान्यता है कि भगवान शिव के तांडव के दौरान माता सती के अधर यानी होंठ इसी स्थान पर गिरे थे, इसलिए इसे अधर देवी कहा जाता है। 2. मंदिर तक पहुंचने के लिए कितनी सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं? श्रद्धालुओं को नक्की झील से करीब 2 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद मुख्य मंदिर तक पहुंचने के लिए 365 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। 3. इस शक्तिपीठ में माता के किस स्वरूप की पूजा की जाती है? गुफा के अंदर माता के चरण पादुका पूजे जाते हैं और नवदुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा होती है, जिनका विग्रह सिंह पर सवार है। 4. मंदिर परिसर के पवित्र कुंडों की क्या विशेषता है? मंदिर परिसर में अमृत कुंड है जो सूखे में भी नहीं सूखा था, जबकि तलहटी में स्थित दूध बावड़ी का पानी सफेद दूध जैसा दिखाई देता है। 5. क्या मंदिर के अंदर फोटोग्राफी की अनुमति है? नहीं, मंदिर के अंदर कैमरा ले जाने अथवा किसी भी प्रकार की फोटोग्राफी करने की सख्त मनाही है। https://trendkia.com/rajasthan/mount-abu-men-adhar-devi-shaktipitha-365-sirhiyan-charhakara-gupha-men-hoti-hai-man-katyayani-ki-puja-46613 TrendKia — Har trend, sabse pehle.