नागौर के ब्रह्मपुरी में 400 साल पुराना श्री महालक्ष्मी मंदिर, कमल पुष्प पर विराजी चार भुजाओं वाली माता देती हैं समृद्धि का आशीष नागौर के ब्रह्मपुरी क्षेत्र में स्थित 400 वर्ष से अधिक प्राचीन श्री महालक्ष्मी मंदिर में चार भुजाओं वाली माता की अलौकिक प्रतिमा स्थापित है, जहां सालभर भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं। राजस्थान के नागौर शहर स्थित ब्रह्मपुरी मोहल्ले में माता महालक्ष्मी का एक ऐसा पावन धाम मौजूद है, जो अपनी चार सदी से अधिक पुरानी ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत को संजोए हुए है। यह पावन स्थल श्रीमाली समाज की कुलदेवी के रूप में विख्यात है और समूचे क्षेत्र में अटूट श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, जिस समय नागौर के ऐतिहासिक ब्रह्मपुरी क्षेत्र को बसाया गया था, ठीक उसी दौर में इस मंदिर का निर्माण भी संपन्न हुआ था। चार सौ वर्षों से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी गर्भगृह में स्थापित प्राचीन विग्रह की महिमा और दिव्यता जस की तस बनी हुई है, जहां अपनी मनोकामनाएं लेकर पूरे साल श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। कमल पुष्प पर विराजित चार भुजाओं वाली अनूठी प्रतिमा का स्वरूप मंदिर के मुख्य गर्भगृह में स्थापित माता महालक्ष्मी की प्रतिमा शिल्पकला और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है। माता कमल के खिले हुए पुष्प पर ध्यानस्थ मुद्रा में आसीन हैं और उनकी चार भुजाएं दर्शनीय हैं। प्रतिमा के ऊपरी दो हाथों में पवित्र कलश सुशोभित हैं। निचले हाथों में से एक हाथ धन वर्षा की मुद्रा में दिखाई देता है, जबकि दूसरा हाथ अपने सेवकों और श्रद्धालुओं को अभय व कल्याणकारी आशीर्वाद प्रदान करता प्रतीत होता है। इस विग्रह के दोनों पा‌र्श्व में भव्य हाथियों की आकृतियां खूबसूरती से उकेरी गई हैं। इन आकृतियों को देखकर ऐसा आभास होता है मानो गजराज स्वयं निरंतर कलशों से माता का पावन अभिषेक संपन्न कर रहे हों। परिसर में भगवान गणेश, बजरंगबली और गरुड़ देव की मौजूदगी इस पावन धाम का एक अन्य प्रमुख आकर्षण परिसर में एक साथ कई प्रमुख देव विग्रहों की उपस्थिति है। गर्भगृह और आसपास के भाग में प्रथम पूज्य भगवान गणेश और संकटमोचन भगवान बजरंगबली की मनोहारी प्रतिमाएं प्रतिष्ठित की गई हैं। इनके साथ ही, भगवान श्रीहरि विष्णु के वाहन माने जाने वाले गरुड़ देव की पत्थर पर तराशी गई लगभग दो फीट ऊंची प्रतिमा भी यहां स्थापित है। सनातन मान्यता के अनुसार माता लक्ष्मी श्रीहरि विष्णु की अर्धांगिनी हैं, इसलिए उनके वाहन गरुड़ देव की उपस्थिति इस धाम के आध्यात्मिक महत्व को कई गुना बढ़ा देती है। श्रीमाली समाज की कुलदेवी और पीढ़ियों से जारी पूजा परंपरा ब्रह्मपुरी मोहल्ले में बड़ी संख्या में निवास करने वाले श्रीमाली ब्राह्मण परिवार माता महालक्ष्मी को अपनी कुलदेवी मानकर श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं। मंदिर के पुजारी अरविंद दवे के अनुसार, उनका परिवार कई पीढ़ियों से अनवरत रूप से माता रानी की सेवा, नित्य पूजा और अर्चना की जिम्मेदारी संभालता आ रहा है। मंदिर में प्रतिदिन नियमित रूप से प्रात:काल और संध्या वेला में वैदिक रीति से पूजा और भव्य आरती संपन्न होती है। भक्तों का ऐसा दृढ़ विश्वास है कि सच्चे मन से माता के चरणों में हाजिरी लगाने वाले साधकों पर देवी की असीम कृपा बरसती है और उनके जीवन में धन, सुख तथा पारिवारिक समृद्धि का वास होता है। श्राद्ध पक्ष की अष्टमी और दीपावली पर विशेष धार्मिक अनुष्ठान यूं तो मंदिर में वर्ष भर विविध धार्मिक गतिविधियां और कीर्तन आयोजित होते रहते हैं, परंतु श्राद्ध पक्ष के दौरान आने वाली अश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी का दिन यहां अत्यंत पावन माना जाता है। इसी पावन तिथि पर मंदिर में माता महालक्ष्मी का प्राकट्योत्सव अपार उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। धार्मिक इतिहास के मुताबिक, इसी विशेष दिन गर्भगृह में माता की प्रतिमा की विधिवत प्राण प्रतिष्ठा की गई थी। इस अवसर पर पंडितों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के मध्य माता का भव्य अभिषेक और महापूजा संपन्न कराई जाती है। इसके अतिरिक्त, प्रकाश पर्व दीपावली के पावन अवसर पर भी मंदिर प्रांगण में विशेष सजावट और उत्सव का आयोजन किया जाता है। इसका आप पर असर नागौर के प्राचीन महालक्ष्मी मंदिर की यह विरासत क्षेत्र के श्रद्धालुओं, पर्यटकों और सांस्कृतिक शोधकर्ताओं के लिए विशेष महत्व रखती है। • राजस्थान में: नागौर और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले श्रद्धालु 400 साल पुरानी इस धरोहर के दर्शन कर प्राचीन स्थापत्य कला और धार्मिक परंपराओं को प्रत्यक्ष देख सकते हैं। विशेष रूप से अश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी और दीपावली पर यहां होने वाले अनुष्ठानों में भाग लेकर विशेष पूजा का लाभ उठाया जा सकता है। • श्रीमाली समाज के लिए: ब्रह्मपुरी और देश-विदेश में बसे श्रीमाली परिवार अपनी कुलदेवी के मूल स्थान पर जाकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही पूजा पद्धति से जुड़ सकते हैं। यह स्थल समाज की सांस्कृतिक जड़ों को सहेजने और नई पीढ़ी को परंपराओं से जोड़ने का मुख्य केंद्र बना हुआ है। • धार्मिक पर्यटकों के लिए: गरुड़, गणेश, बजरंगबली और महालक्ष्मी की एक साथ स्थापना वाले इस अनूठे स्थल पर आकर यात्री प्राचीन मूर्तिकला का अध्ययन कर सकते हैं। मंदिर में नियमित सुबह और शाम की आरती में शामिल होकर श्रद्धालु शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव कर सकते हैं। • स्थानीय धरोहर संरक्षण: चार सदियों पुराने इस ऐतिहासिक परिसर की जानकारी मिलने से स्थानीय स्तर पर प्राचीन मोहल्लों के संरक्षण को बढ़ावा मिलता है। इससे शहर की ऐतिहासिक पहचान और सांस्कृतिक पर्यटन को भी नई मजबूती मिलती है। ऐसा क्यों हुआ नागौर के ब्रह्मपुरी मोहल्ले में इस मंदिर की स्थापना चार सदी पूर्व वहां बसे परिवारों की आध्यात्मिक और कुल परंपरा को स्थायित्व देने के उद्देश्य से की गई थी। • बस्ती स्थापना के साथ निर्माण: नागौर में जब ब्रह्मपुरी मोहल्ला आबाद हुआ, तब वहां बसने वाले श्रीमाली ब्राह्मण परिवारों ने अपनी कुलदेवी की नित्य उपासना के लिए इस मंदिर की नींव रखी थी। बस्ती के विकास के साथ ही धार्मिक केंद्र की स्थापना उस दौर की एक स्थापित परंपरा थी। • विष्णु परंपरा से जुड़ाव: माता लक्ष्मी को श्रीहरि विष्णु की अर्धांगिनी माना जाता है, जिसके कारण गर्भगृह के निकट दो फीट ऊंची गरुड़ प्रतिमा स्थापित करने की अनूठी परंपरा शुरू हुई। इसी आध्यात्मिक विचार के तहत भगवान गणेश और बजरंगबली की प्रतिमाओं को भी परिसर में जोड़ा गया। • पीढ़ी-दर-पीढ़ी सेवा परंपरा: पुजारी अरविंद दवे के पूर्वजों द्वारा प्राण प्रतिष्ठा के समय से ही सेवा का संकल्प लिया गया था, जिससे चार सौ वर्षों तक बिना किसी रुकावट के पूजा का क्रम बना रहा। परिवार की निरंतर निष्ठा ने इस प्राचीन विरासत को आज तक जीवंत रखा है। सवाल-जवाब 1. नागौर का यह महालक्ष्मी मंदिर कितना पुराना है? यह मंदिर 400 साल से भी अधिक पुराना है और इसकी स्थापना ब्रह्मपुरी मोहल्ले के बसने के साथ ही हुई थी। 2. मंदिर के गर्भगृह में स्थापित माता महालक्ष्मी की प्रतिमा की क्या विशेषताएं हैं? माता की प्रतिमा कमल पर विराजमान है, उनकी चार भुजाएं हैं जिनमें दो हाथों में कलश, एक हाथ से धन वर्षा और दूसरे हाथ से आशीर्वाद की मुद्रा दिखाई देती है। 3. माता महालक्ष्मी के अलावा परिसर में किन देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित हैं? परिसर में भगवान गणेश, भगवान बजरंगबली और पत्थर पर उकेरी गई करीब दो फीट ऊंची भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ की प्रतिमा भी स्थापित है। 4. यह मंदिर किस समाज की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है? यह मंदिर ब्रह्मपुरी में रहने वाले श्रीमाली समाज की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है, जहां पुजारी अरविंद दवे का परिवार कई पीढ़ियों से सेवा कर रहा है। 5. मंदिर में मुख्य प्राकट्योत्सव कब मनाया जाता है? श्राद्ध पक्ष में अश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन वैदिक मंत्रोच्चार और विशेष अभिषेक के साथ माता का प्राकट्योत्सव मनाया जाता है। https://trendkia.com/rajasthan/nagaur-ke-brahmapuri-men-400-sala-purana-shri-mahalakshmi-mndira-kamala-pushpa-para-viraji-chara-bhujaon-vali-mata-deti-hain-samri-42978 TrendKia — Har trend, sabse pehle.