नागौर के चर्चित डांगावास जमीन विवाद हिंसा मामले में मेड़ता अदालत ने साक्ष्य के अभाव में सभी 40 आरोपियों को बरी किया राजस्थान के नागौर जिले में 2015 के बहुचर्चित डांगावास कांड में मेड़ता की विशेष एससी/एसटी अदालत ने सबूतों की कमी के चलते सभी 40 आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया है। इस फैसले के बाद पीड़ित पक्ष ने उच्च न्यायालय का रुख करने का ऐलान किया है। नागौर जिले के बहुचर्चित डांगावास कांड में लगभग ग्यारह वर्षों के लंबे कानूनी इंतजार के बाद एक बड़ा न्यायिक मोड़ आया है। मेड़ता शहर में स्थित अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) मामलों की विशेष अदालत ने वर्ष 2015 के इस चर्चित हिंसा मामले में नामजद सभी चालीस आरोपियों को बरी करने का फैसला सुनाया है। विशेष न्यायाधीश आशीष बिजारणिया की अदालत ने पत्रावली पर मौजूद साक्ष्यों का गहन अध्ययन करने के उपरांत अपना निर्णय दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस, विश्वसनीय अथवा निर्णायक साक्ष्य प्रस्तुत करने में पूरी तरह असफल रहा है, जिसके कारण किसी भी आरोपी पर आपराधिक दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता। ज़मीन के मालिकाना हक को लेकर भड़की थी भीषण हिंसा यह पूरा मामला मई 2015 का है, जब नागौर जिले के डांगावास गांव में 23 बीघा कृषि भूमि के कब्जे और स्वामित्व को लेकर दो पक्षों के बीच खूनी संघर्ष हो गया था। 14 मई 2015 को भड़की इस भीषण हिंसा में कुल छह लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। घटनाक्रम के दौरान एक पक्ष के पांच दलित व्यक्तियों—रतनराम मेघवाल, पोखरराम मेघवाल, पांचाराम मेघवाल, खेमाराम मेघवाल और गणपतराम मेघवाल—की जान चली गई थी। मामले में लगे गंभीर आरोपों के मुताबिक, इनमें से तीन लोगों को ट्रैक्टर से बेरहमी से रौंद दिया गया था। वहीं दूसरी तरफ से रामपाल गोसाईं नामक व्यक्ति की गोली लगने की वजह से मौत हुई थी। इस लोमहर्षक घटना के बाद पूरे राजस्थान में व्यापक राजनीतिक एवं सामाजिक उथल-पुथल मच गई थी, जिसे देखते हुए राज्य सरकार ने मामले की निष्पक्ष जांच का जिम्मा केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपा था। जांच की कमियों और गवाहों के मुकरने पर टिका अदालत का फैसला अदालत में चली लंबी सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से कुल 82 गवाहों के बयान दर्ज कराए गए थे, जबकि शिकायतकर्ता पक्ष ने अपनी पैरवी को मजबूती देने के लिए 8 अतिरिक्त गवाहों की गवाही कराई थी। हालांकि, 90 गवाहों की लंबी सूची के बावजूद अधिकांश प्रत्यक्षदर्शी और मुख्य गवाह अदालत के समक्ष आरोपियों की स्पष्ट पहचान करने में असफल रहे। अदालत ने पाया कि सीबीआई द्वारा तैयार की गई जांच रिपोर्ट और पेश किए गए साक्ष्य आरोपियों को घटना से सीधे तौर पर जोड़ने में नाकाफी थे। बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने कहा, "अदालत ने पाया कि सीबीआई जांच सही ढंग से नहीं कर सकी और अभियोजन पक्ष किसी भी आरोपी पर दोष साबित करने में नाकाम रहा।" फैसला आने के उपरांत बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं कमल आचार्य, महिपाल लटियाल, महेंद्र चौधरी तथा बाबूलाल गोरा ने मीडिया के समक्ष अदालत के आदेश का ब्योरा साझा किया और इसे न्याय की बड़ी जीत बताया। अधिवक्ता महेंद्र चौधरी ने विवाद के मूल कारण पर प्रकाश डालते हुए बताया कि 23 बीघा जमीन के एक सौदे के बाद खरीदार द्वारा राजस्व रिकॉर्ड में दाखिल खारिज (नामांतरण) न कराए जाने की वजह से कब्जे को लेकर तनातनी पैदा हुई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि जांच एजेंसी ने कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को नजरअंदाज किया, जिससे निर्दोष लोगों को आरोपी बनाया गया था। गांव में जश्न का माहौल, पीड़ित परिवार जाएगा उच्च न्यायालय मेड़ता अदालत का निर्णय सामने आते ही डांगावास गांव में खुशी की लहर दौड़ गई। पिछले 11 सालों से अदालती कार्यवाही और अनिश्चितता का सामना कर रहे ग्रामीणों ने एक-दूसरे का मुंह मीठा करवाकर अपनी खुशी जाहिर की। पूरे नागौर क्षेत्र में दिनभर इस फैसले को लेकर गहमागहमी और चर्चा बनी रही। दूसरी ओर, इस फैसले से पीड़ित परिवार में गहरा आक्रोश और निराशा व्याप्त है। पीड़ित पक्ष की ओर से पैरवी कर रहे गोविंद मेघवाल ने अदालत के इस फैसले पर कड़े सवाल उठाए हैं। गोविंद मेघवाल ने कहा, "अगर सभी बरी हो गए तो हमारे पांच लोगों की जान किसने ली, हम इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट जाएंगे।" पीड़ित पक्ष ने स्पष्ट किया है कि वे इस फैसले को चुनौती देने के लिए शीघ्र ही राजस्थान उच्च न्यायालय में अपील याचिका दायर करेंगे। इसका आप पर असर • भारत में: यह निर्णय जघन्य आपराधिक मामलों में केंद्रीय जांच एजेंसियों द्वारा बिना ठोस सबूत के चार्जशीट पेश करने की कमियों और अभियोजन पक्ष के गवाहों के मुकरने पर केस के प्रभाव को रेखांकित करता है। • राजस्थान एवं नागौर में: 11 साल पुराने डांगावास हिंसा मामले में सभी आरोपियों के बरी होने से गांव में राहत का माहौल है, जबकि पीड़ित पक्ष द्वारा उच्च न्यायालय में अपील की घोषणा से कानूनी लड़ाई का अगला दौर शुरू होगा। सवाल-जवाब 1. डांगावास मामला क्या है और यह कब हुआ था? डांगावास मामला 14 मई 2015 का है, जब राजस्थान के नागौर जिले के डांगावास गांव में 23 बीघा जमीन के विवाद को लेकर खूनी हिंसा हुई थी, जिसमें 6 लोगों की मौत हो गई थी। 2. मेड़ता की एससी/एसटी अदालत ने क्या फैसला दिया है? मेड़ता की विशेष एससी/एसटी अदालत ने 11 साल तक चली सुनवाई के बाद साक्ष्य के अभाव में मामले के सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया है। 3. अदालत ने आरोपियों को बरी क्यों किया? अदालत ने पाया कि अभियोजन और शिकायतकर्ता पक्ष द्वारा पेश किए गए 90 गवाहों में से अधिकांश आरोपियों की पहचान नहीं कर सके और सीबीआई ठोस सबूत पेश करने में नाकाम रही। 4. इस फैसले पर पीड़ित पक्ष की क्या प्रतिक्रिया है? पीड़ित पक्ष के गोविंद मेघवाल ने फैसले पर निराशा जताते हुए सवाल किया कि यदि सभी बरी हो गए तो 5 दलितों की हत्या किसने की, और उन्होंने इस फैसले को राजस्थान उच्च न्यायालय में चुनौती देने का ऐलान किया है। https://trendkia.com/rajasthan/nagaur-ke-charchita-dangawas-jamina-vivada-hinsa-mamale-men-merta-adalata-ne-sakshya-ke-abhava-men-sabhi-40-aropiyon-ko-bari-kiya-14250 TrendKia — Har trend, sabse pehle.