# नागौर में कम बारिश के बीच ग्वार की फसल बनी सहारा, मंडियों में 6500 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंचे भाव

> नागौर इलाके में कमजोर मानसून के बावजूद ग्वार की फसल से किसानों को राहत मिली है, जहां 2 से 3 क्विंटल प्रति बीघा उत्पादन और 6500 रुपये प्रति क्विंटल तक के मंडी भाव मिल रहे हैं।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-10-06 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/nagaur-men-kama-barisha-ke-bicha-guar-ki-phasala-bani-sahara-mndiyon-men-6500-rupaye-prati-kvintala-taka-pahunche-bhava-43641 · **Language:** Hindi
**Tags:** ग्वार की खेती, नागौर कृषि, ग्वार भाव, खरीफ फसल, किसान उपज, मंडी भाव

खरीफ के मौजूदा दौर में कमजोर मानसूनी बारिश और बादलों के लंबे सूखे अंतराल ने काश्तकारों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी थीं, मगर ग्वार की खेती ने विपरीत परिस्थितियों के बीच किसानों को बड़ी राहत पहुंचाई है। नागौर के ग्रामीण अंचल में इस मर्तबा लगभग 50 से 55 प्रतिशत रकबे पर ग्वार की बुवाई दर्ज की गई थी। अब खेतों में पकी खड़ी फसल की कटाई और थ्रेसिंग का काम जोरों पर शुरू हो चुका है। ग्रामीण इलाकों में छोटे किसान अपने पूरे कुनबे के साथ हाथ से फसल समेटने में जुटे हैं, जबकि बड़े जोत वाले रकबे में आधुनिक कृषि यंत्रों और थ्रेशर मशीनों का सहारा लिया जा रहा है।

## मानसून की बेरुखी और छिटपुट बारिश से बची नमी
बुवाई के शुरुआती दिनों में जब बारिश की भारी किल्लत महसूस हुई, तब काश्तकार ग्वार के भविष्य को लेकर गहरे संशय में थे। पूरे मानसूनी दौर में न तो मूसलाधार बारिश देखने को मिली और न ही बादलों का नियमित सिलसिला रहा, बल्कि दो बरसाती दौरों के बीच लंबा सूखा खिंचता चला गया। इस प्रतिकूलता के बावजूद अलग-अलग मौकों पर गिरी छिटपुट फुहारों ने जमीन के भीतर जरूरी नमी को लंबे समय तक बरकरार रखा। इसी प्राकृतिक नमी के बूते कई इलाकों में ग्वार के पौधे सूखे से जूझते हुए पकने की स्थिति तक पहुंच गए और अब खेतों से होने वाली पैदावार किसानों की अपेक्षाओं पर खरी उतरती दिख रही है।

## प्रति बीघा दो से तीन क्विंटल उपज मिलने की उम्मीद
कमजोर मानसूनी दौर के बावजूद खेतों से 2 से 3 क्विंटल प्रति बीघा की दर से उपज मिलना किसानों के लिए सबसे बड़ा संबल साबित हो रहा है। स्थानीय काश्तकारों का अनुभव बताता है कि जिन जमीनों में सही वक्त पर हल्की बारिश की बूंदें गिरीं और जहां की मिट्टी नमी संजोने में कामयाब रही, वहां ग्वार की बालियां और फलियां काफी पुख्ता निकली हैं। हालांकि प्रति बीघा उत्पादन का यह आंकड़ा सीधे तौर पर मिट्टी की प्रकृति, बुवाई के सटीक समय, बरसाती पानी की मात्रा और स्थानीय मौसमी उतार-चढ़ाव पर टिका होता है। जिन इलाकों में यह संतुलन बना रहा, वहां 2 से 3 क्विंटल प्रति बीघा की कटाई से किसानों के चेहरे खिल उठे हैं।

## मंडियों में 6400 से 6500 रुपये प्रति क्विंटल का भाव
इस बार ग्वार केवल खेत की पैदावार तक ही तसल्ली नहीं दे रही, बल्कि कृषि उपज मंडियों में मिल रहे व्यापारिक दाम भी किसानों को सुकून दे रहे हैं। स्थानीय मंडियों में ग्वार की ताजा आवक के सौदे लगभग 6400 से 6500 रुपये प्रति क्विंटल के दायरे में बोले जा रहे हैं। एक फसल को तैयार करने के सफर में बीज की खरीद, खेत की जुताई, बुवाई, निराई-गुड़ाई, कटाई और अंत में दाना निकालने तक भारी पूंजी खर्च होती है। ऐसे में 6500 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास का बाजार भाव मिलने से न केवल खेती की पूरी लागत चुकता होने की उम्मीद बंधी है, बल्कि किसानों के हाथ में शुद्ध बचत भी बचने के आसार बने हैं।

## कम पानी वाले इलाकों के लिए जोखिम घटाने वाली खेती
रेतीले और कम वर्षा वाले भूभाग में किसान ग्वार को हमेशा एक सुरक्षा कवच अथवा जोखिम घटाने वाली फसल के रूप में आंकते हैं। ग्वार की स्वाभाविक जैविक बनावट ऐसी है कि यह बेहद सीमित जल स्तर में भी दाना पैदा करने की कूवत रखती है, यद्यपि भीषण अकाल या लंबे सूखे के हालात में इसकी पैदावार पर भी असर पड़ना तय होता है। नागौर जिले में इस बार बरसाती संकट के बावजूद ग्वार की फसल बर्बाद नहीं हुई। यही वजह रही कि जिन किसानों की अन्य पारंपरिक फसलें मौसम की मार से मुरझा गईं, उनके लिए ग्वार एक मजबूत वित्तीय ढाल बनकर उभरी है।

## खेतों में कटाई और गहाई का अंतिम दौर
फसल के पूरी तरह पक जाने के बाद देहाती इलाकों में सुबह की पहली किरण के साथ ही कटाई का सिलसिला शुरू हो जाता है। कहीं काश्तकार और दिहाड़ी मजदूर दरांती से पौधों को काटकर खेत में छोटी-बड़ी ढेरियां तैयार कर रहे हैं, तो कहीं ट्रैक्टर चालित थ्रेशर से सूखी फलियों से दाना अलग किया जा रहा है। गहाई के फौरन बाद दानों को साफ कर बोरियों में भरकर नजदीकी कृषि मंडियों की ओर रवाना किया जा रहा है। खेतों के बीच सजी ग्वार की ये सुनहरी ढेरियां खरीफ सत्र के समापन की जीवंत तस्वीर पेश कर रही हैं।

## दाने के साथ पशुओं के लिए पौष्टिक चारे का सहारा
ग्वार केवल अनाज की बिक्री तक ही सीमित लाभ नहीं देती, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले पशुपालन के लिए भी वरदान साबित होती है। थ्रेशर से दाना अलग होने के बाद पीछे बचने वाला सूखा अवशेष उत्तम किस्म के पशु चारे के रूप में काम आता है। नागौर के ग्रामीण अंचल में खेती करने वाला लगभग हर परिवार दुधारू पशु भी पालता है, इसलिए ग्वार से घर पर ही पौष्टिक चारे का बड़ा भंडार जमा हो जाता है। कुल मिलाकर 50 से 55 प्रतिशत बुवाई का बड़ा दायरा, 2 से 3 क्विंटल प्रति बीघा की पैदावार और 6400 से 6500 रुपये प्रति क्विंटल का मजबूत मंडी भाव इस खरीफ सत्र में किसानों की तकदीर संवार रहा है।

## इसका आप पर असर
कमजोर मानसून के बीच ग्वार की बेहतर उपज और 6500 रुपये प्रति क्विंटल का बाजार भाव किसानों के लिए सीधा आर्थिक सहारा बन रहा है।

- **भारत में:** देश भर की अनाज मंडियों में ग्वार की स्थिर आवक से खाद्य और औद्योगिक प्रसंस्करण इकाइयों को कच्चा माल मिलने में आसानी होगी। इससे ग्वार आधारित उत्पादों के व्यापारिक सौदों में स्थिरता बनी रहेगी।
- **नागौर में:** स्थानीय काश्तकारों को 2 से 3 क्विंटल प्रति बीघा उत्पादन और 6400 से 6500 रुपये प्रति क्विंटल भाव मिलने से खेती की कुल लागत निकल जाएगी। इसके अतिरिक्त फसल से प्राप्त सूखा अवशेष पशुओं के चारे की कमी को घर पर ही पूरा कर देगा।
- **लागत और आमदनी:** बुवाई, निराई और कटाई पर खर्च करने वाले किसानों के हाथ में शुद्ध मुनाफा बचने की उम्मीद है। वे मंडियों में अपनी फसल बेचकर आगामी रबी सीजन की तैयारी के लिए समय पर पूंजी जुटा सकेंगे।
- **पशुपालकों के लिए:** ग्वार निकालने के बाद बचा अवशेष स्थानीय स्तर पर उत्तम चारा उपलब्ध कराता है। इससे पशुपालकों को बाजार से महंगा चारा खरीदने के भारी खर्च से सीधी मुक्ति मिलेगी।

## ऐसा क्यों हुआ
कमजोर बारिश और सूखे के लंबे अंतराल के बावजूद ग्वार की खेती सीमित पानी में जीवित रहने की अपनी प्राकृतिक क्षमता और समय पर मिली छिटपुट नमी के कारण सफल रही है।

- **सीमित जल आवश्यकता:** ग्वार की फसल कम पानी और रेतीली जमीन में भी पैदावार देने के लिए अनुकूलित होती है। अधिक पानी की मांग करने वाली अन्य खरीफ फसलों की तुलना में यह सूखे के हालात को अधिक मजबूती से झेल लेती है।
- **छिटपुट बारिश का असर:** मानसून के दौरान बारिश का दायरा भले ही कम रहा, लेकिन अलग-अलग अंतरालों पर हुई हल्की बारिश ने मिट्टी की भीतरी नमी को खत्म नहीं होने दिया। इसी संरक्षित नमी ने पौधों को सूखने से बचाए रखा और फलियों को पकने में मदद की।
- **रकबे में बड़ा विस्तार:** काश्तकारों ने मौसम के मिजाज को भांपते हुए लगभग 50 से 55 प्रतिशत जमीन पर जोखिम घटाने के मकसद से ग्वार की ही बुवाई की थी। व्यापक क्षेत्रफल के कारण समग्र उत्पादन का स्तर सुरक्षित बना रहा।
- **मंडी में मजबूत मांग:** औद्योगिक और व्यापारिक खपत के चलते मंडियों में भाव 6400 से 6500 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर पर बने रहे। इस मूल्य समर्थन ने फसल की कटाई और त्वरित बिक्री के चक्र को गति दी।

## सवाल-जवाब

### 1. नागौर में इस सीजन में ग्वार की बुवाई कितने रकबे पर हुई?
नागौर क्षेत्र में इस खरीफ सीजन के दौरान करीब 50 से 55 प्रतिशत रकबे में ग्वार की बुवाई की गई।

### 2. किसानों को प्रति बीघा ग्वार की कितनी पैदावार मिल रही है?
खेतों में मिट्टी की नमी और समय पर हुई बारिश के आधार पर किसानों को 2 से 3 क्विंटल प्रति बीघा तक उत्पादन मिल रहा है।

### 3. कृषि मंडियों में ग्वार के वर्तमान भाव क्या चल रहे हैं?
मंडियों में ग्वार के भाव लगभग 6400 से 6500 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास दर्ज किए जा रहे हैं।

### 4. ग्वार की फसल किसानों के पशुपालन में किस प्रकार उपयोगी है?
फसल से दाना निकालने के बाद जो अवशेष बचता है, वह दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक सूखे चारे के रूप में काम आता है।

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