नागौर में मानसून खत्म होने से पहले ही सूखे तालाब, 24 साल बाद अकाल जैसे जल संकट की आहट राजस्थान के नागौर में 81 फीसदी बारिश के बावजूद सितंबर में ही तालाब सूख गए हैं। नहरी पानी की किल्लत और जल निकायों के खाली होने से ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट गहराने का खतरा पैदा हो गया है। मानसून के अंतिम चरण में राजस्थान के नागौर जिले से एक चिंताजनक तस्वीर सामने आ रही है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक भले ही जिले में इस सीजन औसतन करीब 81 फीसदी बारिश दर्ज की गई हो, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। सितंबर का महीना पूरा होने से पहले ही जिले के छोटे और बड़े तालाब तथा पोखर पूरी तरह सूखने की कगार पर पहुंच गए हैं। पिछले वर्ष जहाँ नागौर में 673 मिलीमीटर बारिश हुई थी, वहीं इस बार केवल 324 मिलीमीटर बारिश ही रिकॉर्ड की गई है। इस स्थिति ने ग्रामीणों और पशुपालकों के सामने पीने के पानी का गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। 24 साल पुराने अकाल की यादें हुईं ताजा जलस्रोतों का सितंबर में ही खाली हो जाना स्थानीय निवासियों के लिए एक बड़े खतरे की घंटी है। मौसम और जल मामलों के जानकारों का कहना है कि नागौर में ऐसे हालात लगभग 24 साल पहले देखे गए थे। वर्ष 2002-03 के भीषण अकाल के दौरान भी जिले के तालाब नवंबर आने से पहले ही सूख गए थे। यद्यपि इस साल बारिश के कुल आंकड़े कागज पर अकाल जैसे नहीं दिखते, लेकिन बारिश के असामान्य ढर्रे ने जल निकायों को भरने का मौका नहीं दिया। तेज और मूसलाधार बारिश के अभाव में कैचमेंट क्षेत्रों (जल ग्रहण क्षेत्रों) से पानी का पर्याप्त बहाव तालाबों तक पहुँच ही नहीं सका। बिखरी हुई बारिश और वाष्पीकरण की दोहरी मार इस मानसून सत्र के दौरान नागौर जिले में लगातार बारिश होने के बजाय रुक-रुक कर और बिखरी हुई बौछारें ही पड़ीं। कई बार आसमान में घने बादल छाए जरूर, लेकिन थोड़ी देर हल्की बारिश होने के बाद मौसम फिर से साफ हो गया। इसके अलावा, पूरे जिले में बारिश का वितरण बेहद असमान रहा; कुछ हिस्सों में ठीक-ठाक बारिश हुई तो कई इलाके लंबे समय तक सूखे रहे। बारिश के बीच लंबे अंतरालों और तेज धूप के कारण मिट्टी में नमी बनी नहीं रह सकी। जिन पोखरों में थोड़ा-बहुत पानी जमा भी हुआ था, वह तेज गर्मी के कारण वाष्पीकरण की वजह से तेजी से घटता चला गया। नहरी पानी का भी भारी संकट: मांग 125 एमएलडी, आपूर्ति सिर्फ 74 एमएलडी तालाबों के सूखने से जिले की पेयजल आपूर्ति व्यवस्था पर भी भारी दबाव आ गया है। वर्तमान में नागौर जिले को नहरी परियोजना से प्रतिदिन करीब 74 एमएलडी पानी ही मिल पा रहा है, जबकि जिले में दैनिक आवश्यकता लगभग 125 एमएलडी पानी की है। यानी नहरी आपूर्ति जरूरत के मुकाबले काफी कम है। यदि स्थानीय तालाबों और कुओं का जलस्तर नहीं सुधरा, तो आने वाले महीनों में ग्रामीण और शहरी इलाकों में पेयजल का संकट और गहरा सकता है। तालाब न केवल मवेशियों के पीने के पानी का जरिया होते हैं, बल्कि वे आसपास के भूजल स्तर को बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। मानसून की वापसी और आगे का पूर्वानुमान मौसम वैज्ञानिक राधेश्याम शर्मा के अनुसार, हवा के पैटर्न में आ रहे बदलावों और वायुमंडल में नमी के कम होने के संकेतों को देखते हुए 20 सितंबर के बाद से मानसून की विदाई प्रक्रिया शुरू होने की उम्मीद है। हालांकि विदाई से पूर्व स्थानीय स्तर पर हल्की बूंदाबांदी की संभावना बनी रहती है। पिछले एक दशक के रिकॉर्ड को देखें तो दो बार मानसून की विदाई अपने सामान्य समय से करीब 13 दिन देरी से हुई है। देश के बाकी हिस्सों से मानसून की पूर्ण वापसी का सामान्य समय 15 अक्टूबर माना जाता है। अब मानसून की विदाई के साथ ही बारिश की गुंजाइश खत्म होने जा रही है, जिससे जल प्रबंधन की चुनौतियां और कठिन होंगी। इसका आप पर असर नागौर में समय से पहले तालाबों का सूखना आने वाले महीनों में भीषण जल संकट का संकेत दे रहा है। • भारत में: अनिश्चित मानसून और कैचमेंट क्षेत्र में बहाव की कमी देश के कई शुष्क कृषि क्षेत्रों में जल सुरक्षा के लिए खतरा बढ़ा रही है। यह वर्षा जल संचयन प्रणाली को बेहतर बनाने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है। • नागौर और राजस्थान में: ग्रामीण इलाकों में पशुधन के लिए पीने के पानी की भारी किल्लत होने वाली है। पशुपालकों को अपने मवेशियों को बचाने के लिए महंगे दामों पर निजी वाटर टैंकर खरीदने पड़ेंगे। • पेयजल आपूर्ति पर प्रभाव: नहरी पानी की आपूर्ति 125 एमएलडी की मांग के मुकाबले केवल 74 एमएलडी होने से स्थानीय प्रशासन को जल राशनिंग लागू करनी पड़ सकती है। नागौर के नागरिकों को पानी की कटौती झेलनी पड़ेगी। • भूजल स्तर में गिरावट: तालाबों के खाली रहने से प्राकृतिक भूजल रीचार्ज नहीं हो सकेगा। इससे ट्यूबवेल और कुओं का जलस्तर नीचे चला जाएगा जिससे अगली फसलों की सिंचाई प्रभावित होगी। ऐसा क्यों हुआ नागौर में 81 प्रतिशत औसत बारिश दर्ज होने के बावजूद तालाबों के सूखने के पीछे बारिश का असामान्य तरीका और उच्च वाष्पीकरण जिम्मेदार है। • कैचमेंट में बहाव की कमी: मानसून के दौरान मूसलाधार बारिश होने के बजाय केवल हल्की बौछारें पड़ीं। तेज बारिश न होने के कारण कैचमेंट क्षेत्रों से पानी बहकर तालाबों तक नहीं पहुँच सका। • तेज धूप और वाष्पीकरण: बारिश के दो दौर के बीच लंबे अंतरालों और तेज धूप के कारण जमा हुआ पानी तेजी से वाष्पीकृत हो गया। मिट्टी में भी लगातार नमी नहीं बनी रह सकी। • असमान क्षेत्रीय वितरण: जिले में कुल 324 एमएम बारिश समान रूप से नहीं हुई, जिससे कई प्रमुख कैचमेंट इलाके सूखे रह गए। यह पिछले साल की 673 एमएम बारिश के मुकाबले काफी कम रही। सवाल-जवाब 1. नागौर में इस मानसून सत्र में कुल कितनी बारिश दर्ज हुई है? नागौर जिले में इस सीजन 1 जून से 30 सितंबर तक 324 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई है, जो औसत का लगभग 81 प्रतिशत है। 2. जिले में पिछले साल कितनी बारिश हुई थी? पिछले साल नागौर जिले में मानसून के दौरान कुल 673 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई थी। 3. नागौर में नहरी पानी की दैनिक आपूर्ति और मांग में कितना अंतर है? नागौर में नहरी पानी की दैनिक मांग लगभग 125 एमएलडी है, जबकि वर्तमान में केवल 74 एमएलडी पानी ही उपलब्ध हो पा रहा है। 4. मौसम विभाग के अनुसार नागौर से मानसून की वापसी कब शुरू हो सकती है? मौसम वैज्ञानिक राधेश्याम शर्मा के अनुसार 20 सितंबर के बाद हवा के पैटर्न में बदलाव के साथ मानसून की विदाई प्रक्रिया शुरू होने की उम्मीद है। 5. इससे पहले नागौर में तालाब कब नवंबर से पहले सूख गए थे? नागौर में 24 साल पहले वर्ष 2002-03 के भीषण अकाल के दौरान तालाब नवंबर महीने से पहले ही पूरी तरह सूख गए थे। https://trendkia.com/rajasthan/nagaur-men-manasuna-khatma-hone-se-pahale-hi-sukhe-talaba-24-sala-bada-akala-jaise-jala-snkata-ki-ahata-39050 TrendKia — Har trend, sabse pehle.