# नागौर पॉलिटेक्निक और आईआईटी रुड़की का बड़ा कारनामा, स्वदेशी रेडोम के लिए मिली 30 लाख की ग्रांट

> राजकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज नागौर और आईआईटी रुड़की के प्रोफेसरों को स्वदेशी रेडोम विकसित करने के लिए अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद से 30 लाख रुपये की रिसर्च ग्रांट मिली है।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-09-26 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/nagaura-politeknika-aura-iit-ruraki-ka-bara-karanama-svadeshi-redoma-ke-lie-mili-30-lakha-ki-granta-39023 · **Language:** Hindi
**Tags:** नागौर पॉलिटेक्निक, आईआईटी रुड़की, एआईसीटीई ग्रांट, रेडोड तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक्स शोध

राजकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज, नागौर के इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग विभाग के प्राध्यापक कमल गुर्जर और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग विभाग के प्राध्यापक डॉ. उत्पल डे को एक संयुक्त शोध परियोजना के लिए 30 लाख रुपये का बजट स्वीकृत किया गया है। यह महत्वपूर्ण वित्तीय स्वीकृति अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद की रिसर्च प्रमोशन स्कीम लैब टू मार्केट-2025 के अंतर्गत प्रदान की गई है। इस शोध परियोजना का मुख्य उद्देश्य आधुनिक तकनीकी उपकरणों की सहायता से उन्नत और पूरी तरह स्वदेशी रेडोम विकसित करना है।

## रेडोम का अर्थ और इसका सामरिक महत्व
इस शोध के दायरे को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि रेडोम असल में क्या होता है और इसका उपयोग कहां किया जाता है। रेडोम मूल रूप से किसी रडार या संचार एंटीना के ऊपर लगाया जाने वाला एक विशेष प्रकार का सुरक्षात्मक आवरण होता है। यह आवरण एंटीना को बारिश, धूल, तेज हवाओं और अन्य प्रतिकूल मौसम संबंधी परिस्थितियों से सुरक्षित रखने का कार्य करता है। इसके साथ ही इसकी संरचना इस प्रकार से तैयार की जाती है कि इससे रेडियो तरंगों के निर्बाध आवागमन पर कम से कम नकारात्मक प्रभाव पड़े। आधुनिक युग के रडार, विभिन्न संचार माध्यमों और निगरानी प्रणालियों में इसका उपयोग बहुत व्यापक स्तर पर किया जाता है।

## विनिर्माण तकनीकों का अनूठा मेल
प्रस्तावित परियोजना के तहत एडिटिव और सब्ट्रैक्टिव मैन्युफैक्चरिंग जैसी आधुनिक तकनीकों पर विशेष रूप से काम किया जाएगा। एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग में थ्रीडी प्रिंटिंग जैसी उन्नत तकनीकों के माध्यम से सामग्री को परत-दर-परत जोड़कर एक मजबूत संरचना तैयार की जाती है। वहीं दूसरी ओर सब्ट्रैक्टिव मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रिया में आवश्यक सामग्री को काटकर या छांटकर उसे सटीक आकार दिया जाता है। इन दोनों आधुनिक तकनीकों के संयुक्त इस्तेमाल से अलग-अलग डिजाइनों और संरचनाओं का गहन परीक्षण किया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया का मूल उद्देश्य जरूरत के अनुसार हल्के, बेहद मजबूत और उच्च प्रदर्शन करने वाले रेडोम तैयार करना है।

## शोध की कार्ययोजना और अवधि
इस पूरी परियोजना की प्रारंभिक अवधि तीन साल तय की गई है जिसके दौरान प्रारंभिक डिजाइन तैयार करने से लेकर अंतिम प्रोटोटाइप विकसित करने तक का काम पूरा किया जाएगा। शोध के इस सफर में रेडोम के डिजाइन, उसके निर्माण में प्रयुक्त होने वाली सामग्री, तकनीकी क्षमता और कार्यप्रदर्शन से जुड़े तमाम पहलुओं का बारीकी से अध्ययन किया जाएगा। तैयार किए गए विभिन्न मॉडलों का कठोर परीक्षण करके उनकी उपयोगिता और कार्यक्षमता का सटीक आकलन किया जाएगा। इस शोध से प्राप्त होने वाले परिणामों के आधार पर ऐसे प्रोटोटाइप विकसित करने का प्रयास किया जाएगा जिन्हें भविष्य में व्यावहारिक और औद्योगिक आवश्यकताओं के अनुरूप ढाला जा सके।

## रक्षा और नागरिक क्षेत्रों में व्यापक उपयोग
इस शोध के माध्यम से तैयार होने वाले उत्पादों के रक्षा क्षेत्र में उपयोग को बेहद अहम माना जा रहा है। आने वाले समय में इस तकनीक के जरिए विकसित किए जाने वाले रेडोम का इस्तेमाल अत्याधुनिक रडार, निगरानी प्रणालियों और विभिन्न सैन्य संचार प्रणालियों में किया जा सकेगा। इसके अलावा नागरिक क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले आधुनिक संचार और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स में भी इसकी भारी उपयोगिता हो सकती है। इस परियोजना का मुख्य फोकस केवल प्रयोगशाला की चार दीवारों के भीतर शोध तक सीमित रहना नहीं है, बल्कि विकसित की गई तकनीक को वास्तविक उपयोग और संभावित औद्योगिक जरूरतों तक सफलतापूर्वक पहुंचाना है।

## शैक्षणिक संस्थानों के लिए ऐतिहासिक अवसर
नागौर पॉलिटेक्निक कॉलेज के लिए राष्ट्रीय स्तर की यह शोध परियोजना एक बहुत बड़ी उपलब्धि के रूप में देखी जा रही है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की जैसे देश के प्रतिष्ठित संस्थान के साथ मिलकर संयुक्त रूप से शोध कार्य करने का अवसर कॉलेज के प्राध्यापकों और विद्यार्थियों के लिए तकनीकी अनुभव को समृद्ध करने वाला साबित होगा। इससे विद्यार्थियों को आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, रडार और संचार तकनीक से जुड़े जटिल शोध कार्यों को गहराई से समझने का सुनहरा अवसर मिलेगा। इस परियोजना के माध्यम से कॉलेज परिसर में नवाचार और शोध की गतिविधियों को भी एक नया प्रोत्साहन मिलने की पूरी उम्मीद है।

## इसका आप पर असर
यह शोध परियोजना तकनीकी शिक्षा और रक्षा अनुसंधान के क्षेत्र में दीर्घकालिक प्रभाव डालेगी।

- **तकनीकी शिक्षा:** **पॉलिटेक्निक और इंजीनियरिंग के विद्यार्थियों को अत्याधुनिक शोध से जुड़ने का प्रत्यक्ष अवसर मिलेगा। इससे उनका तकनीकी कौशल और व्यावहारिक ज्ञान विकसित होगा।**
- **औद्योगिक विकास:** **स्वदेशी तकनीक के विकसित होने से देश में रक्षा और संचार उपकरणों के निर्माण को बढ़ावा मिलेगा। इससे आयात पर निर्भरता कम होगी और लागत में कमी आएगी।**

## ऐसा क्यों हुआ
यह शोध परियोजना शैक्षणिक संस्थानों और तकनीकी परिषदों के बीच सहयोगात्मक अनुसंधान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई है।

- **सरकारी योजना:** **अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद की लैब टू मार्केट-2025 योजना का उद्देश्य प्रयोगशाला के आविष्कारों को व्यावहारिक और औद्योगिक उत्पादों में बदलना है।**
- **तकनीकी आवश्यकता:** **देश में मौसम प्रतिरोधी और हल्के रेडोम की घरेलू मांग को पूरा करने के लिए स्वदेशी विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत करना आवश्यक था।**

## सवाल-जवाब

### 1. यह शोध परियोजना किसके द्वारा संयुक्त रूप से शुरू की गई है?
यह परियोजना राजकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज नागौर के प्राध्यापक कमल गुर्जर और आईआईटी रुड़की के डॉ. उत्पल डे द्वारा संयुक्त रूप से शुरू की गई है।

### 2. इस शोध के लिए कुल कितना बजट स्वीकृत हुआ है?
इस संयुक्त शोध परियोजना के लिए 30 लाख रुपये का बजट स्वीकृत किया गया है।

### 3. यह वित्तीय स्वीकृति किस संस्थान द्वारा दी गई है?
यह स्वीकृति अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद की रिसर्च प्रमोशन स्कीम लैब टू मार्केट-2025 के तहत मिली है।

### 4. रेडोम का मुख्य कार्य क्या होता है?
रेडोम रडार या संचार एंटीना के ऊपर लगाया जाने वाला सुरक्षात्मक आवरण होता है जो इसे बारिश, धूल और हवा से बचाता है।

### 5. इस परियोजना में किन विनिर्माण तकनीकों का उपयोग होगा?
इस परियोजना में एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग यानी थ्रीडी प्रिंटिंग और सब्ट्रैक्टिव मैन्युफैक्चरिंग तकनीकों पर काम किया जाएगा।

### 6. इस शोध परियोजना की प्रारंभिक अवधि कितने समय की है?
इस शोध परियोजना की प्रारंभिक अवधि तीन साल तय की गई है।

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