पाली के कानाराम मेवाड़ा ने प्लास्टिक कचरे से तैयार किए जवाई लेपर्ड के पंजों वाले मैग्नेट पाली के बिसलपुर गांव निवासी कानजी ने फेंके गए सिंगल यूज प्लास्टिक को रिसाइकिल कर तेंदुए के पंजों के निशान वाले आकर्षक मैग्नेट बनाए हैं, जिनकी मांग अब देश भर में बढ़ रही है. राजस्थान के पाली जिले में पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय पर्यटन को एक साथ जोड़ने की बेहद शानदार मिसाल सामने आई है. बिसलपुर गांव के रहने वाले कानाराम मेवाड़ा, जिन्हें स्थानीय लोग कानजी चाय वाले के नाम से पुकारते हैं, ने सिंगल यूज प्लास्टिक कचरे को एक नया और मूल्यवान रूप दे दिया है. उन्होंने सड़कों और पर्यटक स्थलों पर फेंकी गई प्लास्टिक की बोतलों और थैलियों को जुटाकर रिसाइकिल किया और उनसे जवाई के मशहूर तेंदुओं के पैरों के निशानों की आकृति वाले सुंदर मैग्नेटिक शो पीस तैयार किए हैं. यह पहल न केवल इलाके को प्लास्टिक मुक्त बनाने में मदद कर रही है, बल्कि जंगल सफारी के लिए आने वाले सैलानियों को एक खास स्मृति चिह्न भी सौंप रही है. चाय विक्रेता से पर्यावरण प्रेमी बनने का सफर कानाराम मेवाड़ा सिर्फ एक चाय विक्रेता या छोटे उद्यमी नहीं हैं, बल्कि वे लंबे समय से पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्पित रहे हैं. इससे पहले वे अनुपयोगी प्लास्टिक कचरे से मजबूत और टिकाऊ फर्नीचर बनाने का एक अनूठा प्रोजेक्ट चला चुके हैं. उनके इस अभिनव काम की चर्चा पूरे देश में हुई थी और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक भी उनके फर्नीचर वाले नवाचार की खुलकर सराहना कर चुके हैं. उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए अब कानाराम ने जवाई कंजर्वेशन रिजर्व के प्राकृतिक परिवेश और वहां आने वाले पर्यटकों को ध्यान में रखते हुए यह नया कदम उठाया है. जवाई की लेपर्ड पहचान और प्लास्टिक कचरे का तालमेल जवाई का पूरा इलाका अपनी चट्टानों, प्राकृतिक छटा और लेपर्ड सफारी के लिए देश और दुनिया के पर्यटकों के बीच खास पहचान रखता है. सफारी के दौरान बड़ी संख्या में लोग आते हैं और कई बार सिंगल यूज प्लास्टिक का कचरा यहां वहां छोड़ जाते हैं. कानाराम ने इसी समस्या को समाधान में बदलने का फैसला किया. उन्होंने पर्यटन स्थलों और रास्तों से फेंका गया प्लास्टिक कचरा एकत्र किया. इसके बाद उन्होंने रिसाइक्लिंग प्रक्रिया की मदद से तेंदुओं के पंजों के निशान के आकार में आकर्षक मैग्नेट तैयार किए, जो जवाई की असली पहचान को दर्शाते हैं. यादगार निशानी और देश भर से मिलने वाले ऑर्डर तेंदुए के पंजों की बनावट वाले इन मैग्नेट्स को जवाई आने वाले मेहमानों को एक यादगार निशानी यानी सॉवेनियर के तौर पर भेंट किया जा रहा है. इन कलाकृतियों को फ्रिज, धातु की अलमारियों या पंखों जैसी सतहों पर आसानी से चिपकाया जा सकता है. इसका मुख्य उद्देश्य पर्यटकों के मन में वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण के प्रति सम्मान का संदेश जगाना है, ताकि वे इस यात्रा की सुखद यादों को अपने घरों तक संजोकर ले जा सकें. शुरुआत में स्थानीय पर्यटकों के बीच पसंद किए जाने के बाद अब इस नवाचार की लोकप्रियता राजस्थान की सीमाओं से बाहर निकल चुकी है. बैंगलोर और मुंबई जैसे बड़े शहरों सहित देश के विभिन्न राज्यों से कानाराम के पास इन रिसाइकिल्ड मैग्नेट्स के बड़े ऑर्डर आने लगे हैं. वेस्ट टू वेल्थ के इस मॉडल ने साबित कर दिया है कि एक छोटी सी चाय की दुकान से शुरू हुई सोच भी प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ एक बड़ा हथियार बन सकती है और स्थानीय पर्यटन को पर्यावरण अनुकूल पहचान दिला सकती है. इसका आप पर असर यह नवाचार पर्यटकों और पर्यावरण संरक्षण प्रेमियों को प्लास्टिक कचरे के प्रभावी निस्तारण और टिकाऊ जीवनशैली का एक वास्तविक उदाहरण देता है. • राजस्थान में: जवाई कंजर्वेशन रिजर्व और पाली आने वाले सैलानियों को अब एक स्थानीय और पर्यावरण-अनुकूल स्मृति चिह्न मिल रहा है. इससे पर्यटन स्थलों पर सिंगल यूज प्लास्टिक के जमावड़े को कम करने में सीधी मदद मिल रही है. • देश भर में: बैंगलोर और मुंबई जैसे शहरों में बैठे लोग इन रिसाइकिल्ड मैग्नेट्स को मंगवाकर स्थानीय कारीगरी और कचरा प्रबंधन को बढ़ावा दे सकते हैं. यह पहल दिखाती है कि कैसे घरेलू सजावट के उत्पादों को पर्यावरण सुरक्षा से जोड़ा जा सकता है. • पर्यटन उद्योग के लिए: अन्य सफारी और वन्यजीव क्षेत्रों को भी इस मॉडल से प्रेरणा लेकर अपने इलाके के खास प्रतीकों वाले रिसाइकिल्ड उत्पाद बनाने की राह मिलती है. इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और रीसाइक्लिंग दोनों को मजबूती मिलती है. • उपभोक्ताओं के लिए: लोग धातु की सतहों और फ्रिज पर लगाने के लिए इन आकर्षक मैग्नेट्स को खरीदकर प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ अपनी भागीदारी दर्ज करा सकते हैं. यह रोजमर्रा की जिंदगी में वेस्ट टू वेल्थ सोच को अपनाने की प्रेरणा देता है. ऐसा क्यों हुआ जवाई सफारी क्षेत्र में पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने से सिंगल यूज प्लास्टिक कचरे की समस्या बढ़ रही थी, जिसे हल करने के लिए कानाराम ने यह कदम उठाया. • कचरे की समस्या: पर्यटन स्थलों और रास्तों पर प्लास्टिक की बोतलें और थैलियां लगातार फेंकी जा रही थीं, जिससे स्थानीय वन्यजीव क्षेत्र को खतरा था. कानाराम मेवाड़ा ने इसी प्लास्टिक को साफ-सुथरा कर दोबारा उपयोगी बनाने की ठानी. • पूर्व अनुभव की सफलता: कानाराम पहले भी बेकार प्लास्टिक से मजबूत फर्नीचर तैयार कर चुके थे, जिससे उन्हें रीसाइक्लिंग की तकनीक और संभावनाओं का पूरा अनुभव था. इसी अनुभव ने उन्हें छोटे शो पीस और मैग्नेट बनाने की नई दिशा दी. • जवाई की विशेष पहचान: जवाई पूरी दुनिया में तेंदुओं की उपस्थिति के लिए प्रसिद्ध है, इसलिए पर्यटकों को जोड़ने के लिए तेंदुए के पंजों की आकृति को थीम के रूप में चुना गया. यह विचार सैलानियों को इलाके की अनूठी पहचान से भावनात्मक रूप से जोड़ता है. सवाल-जवाब 1. कानाराम मेवाड़ा कौन हैं और वे किस नाम से जाने जाते हैं? वे राजस्थान के पाली जिले में बिसलपुर गांव के निवासी हैं और स्थानीय लोग उन्हें कानजी चाय वाले के नाम से जानते हैं. 2. कानाराम ने इन पंजों के निशान वाले मैग्नेट को किससे बनाया है? उन्होंने सड़कों और पर्यटन स्थलों से इकट्ठे किए गए सिंगल यूज प्लास्टिक के कचरे को रिसाइकिल करके ये मैग्नेट तैयार किए हैं. 3. इन शो पीस के लिए तेंदुए के पंजों की थीम क्यों चुनी गई? जवाई क्षेत्र अपनी लेपर्ड सफारी के लिए प्रसिद्ध है, इसलिए पर्यटकों को वहां की वन्यजीव पहचान से जोड़ने के लिए यह थीम चुनी गई. 4. इन रिसाइकिल्ड मैग्नेट्स के ऑर्डर किन प्रमुख शहरों से आ रहे हैं? राजस्थान के अलावा बैंगलोर और मुंबई जैसे बड़े शहरों सहित देश के विभिन्न राज्यों से इनके बड़े ऑर्डर मिल रहे हैं. 5. कानाराम के किस पुराने काम की तारीफ सोनम वांगचुक ने की थी? उन्होंने वेस्ट प्लास्टिक का उपयोग करके मजबूत फर्नीचर बनाने का प्रोजेक्ट किया था, जिसकी सराहना सोनम वांगचुक ने की थी. प्रेरणा और सबक एक सामान्य चाय की दुकान चलाने वाले व्यक्ति का यह प्रयास साबित करता है कि सीमित संसाधनों में भी बड़ा सामाजिक बदलाव लाया जा सकता है. • समस्या में अवसर तलाशें: रास्तों पर बिखरे प्लास्टिक कचरे को केवल गंदगी मानने के बजाय कानाराम ने उसे उपयोगी उत्पाद के कच्चे माल में तब्दील कर दिया. • छोटे स्तर से शुरुआत: बड़े बजट या कारखाने के बिना भी एक छोटी सी दुकान से शुरू की गई पर्यावरण-अनुकूल सोच को पूरे देश में पहचान मिल सकती है. • स्थानीय पहचान का उपयोग: अपने क्षेत्र की खासियत जैसे जवाई के तेंदुओं को अपने उत्पाद की थीम बनाकर उन्होंने स्थानीय कला और पर्यटन को एक साथ मजबूत किया. • लगातार नवाचार: फर्नीचर बनाने में सफलता मिलने के बाद भी वे रुके नहीं और पर्यटकों की पसंद को ध्यान में रखकर नए उत्पाद विकसित करते रहे. https://trendkia.com/rajasthan/pali-ke-kanaram-mewada-ne-plastika-kachare-se-taiyara-kie-jawai-leopard-ke-pnjon-vale-maigneta-44712 TrendKia — Har trend, sabse pehle.