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  "type": "article",
  "title": "पाली के फुटपाथ पर सात दशकों से पारंपरिक कला सहेज रहीं बुजुर्ग हसकी देवी",
  "summary": "राजस्थान के पाली में 85 वर्षीय हसकी देवी पिछले सत्तर वर्षों से मिट्टी के पारंपरिक खिलौने बेचकर अपनी प्राचीन संस्कृति को जिंदा रखने के संघर्ष में जुटी हैं.",
  "content": "राजस्थान के पाली शहर में आधुनिकता की चकाचौंध के बीच एक ऐसा कोना भी है, जहां गुजरे जमाने की यादें आज भी सजीव नजर आती हैं. प्रतापनगर स्थित लेबर कोर्ट के बाहर पगडंडी पर बैठी पचासी साल की हसकी देवी की दास्तान वक्त के थपेड़ों और अपनी मिट्टी से गहरे जुड़ाव का जीवंत उदाहरण है. चेहरे पर उम्र की लकीरें और हाथों में कपकपाहट होने के बावजूद वह रोज सुबह पूरी लगन के साथ मिट्टी की छोटी-छोटी कृतियां सजाकर बैठती हैं. जब इस इलाके के रास्ते कच्चे हुआ करते थे और शहरीकरण इतना हावी नहीं था, तब से वे इसी जगह पर अपनी छोटी सी दुकान लगाती आ रही हैं.\n\nबदलते दौर में प्लास्टिक और स्क्रीन का दबदबा\nएक वक्त था जब बच्चे मिट्टी की बनी गुल्लक, छोटे बर्तन, हाथी और घोड़ों को देखकर खुशी से मचल जाते थे और उन्हें खरीदने के लिए अपने माता-पिता के सामने मचलते थे. समय बीतने के साथ ही खेल और मनोरंजन के मायने पूरी तरह बदल चुके हैं. बाजार अब प्लास्टिक से बने उत्पादों से भर गया है और नई पीढ़ी का अधिकतर वक्त मोबाइल स्क्रीन या वीडियो गेम में बीतने लगा है. इसके चलते मिट्टी से बने खिलौनों की चमक लगभग खो चुकी है, मगर हसकी देवी अपनी इस प्राचीन धरोहर को बचाने के लिए अडिग खड़ी हैं.\n\nपारंपरिक शिल्प से अटूट लगाव\nसत्तर साल के लंबे सफर में इस बुजुर्ग महिला ने वक्त को तेजी से बदलते देखा है. उनके मुताबिक अब इन पारंपरिक चीजों के कद्रदान बेहद कम रह गए हैं. हसकी देवी बताती हैं कि वे मिट्टी से गहरा प्यार करती हैं और अंतिम सांस तक अपनी विरासत की रक्षा करती रहेंगी. जिस उम्र में इंसान को पूरी तरह दूसरों के सहारे और आराम की जरूरत होती है, उस पड़ाव पर भी वे किसी से मदद की गुहार लगाने के बजाय अपने हुनर के दम पर डटी हुई हैं. उनके चेहरे पर लाचारी से ज्यादा इस बात की फिक्र दिखती है कि यह कला धीरे-धीरे हमेशा के लिए खत्म न हो जाए.\n\nलुप्त होती विधा और नई पीढ़ी का रुख\nहसकी देवी बताती हैं कि उनके पूर्वज पीढ़ियों से इसी माटी को गढ़कर खिलौने तैयार करते थे और वे खुद भी उसी सिलसिले को आगे बढ़ाती रहीं. उनका मानना है कि आने वाली पीढ़ी शायद इस कठिन और कम आमदनी वाले काम को बिल्कुल नहीं अपनाएगी. आजकल चारों तरफ प्लास्टिक की चीजें ही बिकती हैं और मिट्टी की बनी चीजें ढूंढने से भी मुश्किल से मिलती हैं. वे इस उम्मीद के साथ रोज अपनी दुकान खोलती हैं कि शायद कोई खरीदार इन पारंपरिक खिलौनों की कद्र समझेगा और इस शिल्प की लौ जलती रहेगी.\n\nइसका आप पर असर\nयह समाचार पारंपरिक दस्तकारी के संकट और स्थानीय कारीगरों को संरक्षण देने की तात्कालिक आवश्यकता को रेखांकित करता है.\n\n• पाली में: स्थानीय निवासियों के पास प्रतापनगर लेबर कोर्ट के बाहर मौजूद इस बुजुर्ग कारीगर से सीधे मिट्टी के उत्पाद खरीदकर पारंपरिक कला को सहारा देने का अवसर है. ऐसे देसी खिलौने और गुल्लक पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ हमारी सांस्कृतिक जड़ों से बच्चों को जोड़ते हैं.\n• भारत में: पूरे देश में हस्तशिल्प और मिट्टी के पारंपरिक खिलौनों की जगह प्लास्टिक उत्पादों ने ले ली है. अगर उपभोक्ता स्थानीय और प्राकृतिक शिल्पों का रुख नहीं करेंगे, तो हमारी समृद्ध पैतृक विधाएं हमेशा के लिए लुप्त हो जाएंगी.\n• बच्चों की परवरिश पर: परिवारों में वीडियो गेम और प्लास्टिक के खिलौनों के बजाय प्राकृतिक मिट्टी की कलाकृतियों को शामिल करने से बच्चों में रचनात्मकता बढ़ती है. इससे नई पीढ़ी प्लास्टिक के कचरे और डिजिटल निर्भरता से बच सकती है.\n• शिल्प संरक्षण के संदर्भ में: यह स्थिति दर्शाती है कि बुजुर्ग कारीगरों के जीवित कौशल को सहेजने के लिए संस्थागत और सामाजिक स्तर पर समर्थन जरूरी है. बिना आर्थिक प्रोत्साहन के कोई भी नई पीढ़ी ऐसे पारंपरिक शिल्पों को आगे बढ़ाने के लिए तैयार नहीं होगी.\n\nऐसा क्यों हुआ\nपारंपरिक मिट्टी के खिलौनों का चलन आधुनिक जीवनशैली, डिजिटल मनोरंजन और सस्ते प्लास्टिक उत्पादों के व्यापक प्रसार के कारण बंद होने की कगार पर पहुंच गया है.\n\n• बाजार में प्लास्टिक का प्रसार: हल्के, टिकाऊ और चमकीले प्लास्टिक के खिलौनों के बड़े पैमाने पर उत्पादन ने पारंपरिक मिट्टी के बर्तनों और मूर्तियों की मांग को समाप्त कर दिया. आसानी से उपलब्ध होने के कारण उपभोक्ताओं ने मिट्टी के नाजुक खिलौनों से मुंह मोड़ लिया.\n• स्क्रीन और डिजिटल आकर्षण: बच्चों का रुझान अब आउटडोर और पारंपरिक खिलौनों के बजाय स्मार्टफोन, वीडियो गेम और डिजिटल स्क्रीन्स की तरफ तेजी से बढ़ा है. खेल के इस बदलाव ने मिट्टी के गुल्लक और खिलौनों को घरों से लगभग बाहर कर दिया.\n• आर्थिक रूप से अलाभकारी पेशा: मिट्टी को तैयार करने, तराशने और रंगने में अत्यधिक शारीरिक श्रम लगता है, जबकि उसके बदले मिलने वाली कीमत नगण्य होती है. इसी कारण कारीगरों की नई पीढ़ी इस काम को आजीविका के साधन के रूप में नहीं अपना रही है.\n\nसवाल-जवाब\n\n1. हसकी देवी कौन हैं और वे कहां बैठती हैं?\nहसकी देवी 85 वर्षीय बुजुर्ग महिला हैं, जो राजस्थान के पाली में प्रतापनगर लेबर कोर्ट के बाहर फुटपाथ पर दुकान लगाती हैं.\n\n2. हसकी देवी कितने समय से मिट्टी के खिलौने बेच रही हैं?\nवे पिछले 70 सालों यानी सात दशकों से उसी स्थान पर मिट्टी के पारंपरिक खिलौने बेच रही हैं.\n\n3. उनकी दुकान पर किस तरह के खिलौने मिलते हैं?\nउनकी दुकान पर मिट्टी की नन्हीं गुल्लक, छोटे बर्तन तथा मिट्टी के बने हाथी और घोड़े मिलते हैं.\n\n4. मिट्टी के खिलौनों की मांग कम क्यों हो गई है?\nप्लास्टिक के सस्ते खिलौनों और बच्चों के वीडियो गेम व डिजिटल स्क्रीन की तरफ आकर्षित होने से इनकी मांग घट गई है.\n\n5. क्या नई पीढ़ी इस शिल्प को आगे बढ़ा रही है?\nहसकी देवी के अनुसार आने वाली पीढ़ियां इस पारंपरिक काम को आगे नहीं बढ़ाना चाहती हैं क्योंकि इसमें आमदनी नहीं बची है.\n\nप्रेरणा और सबक\nहसकी देवी का जीवन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपनी कला और स्वाभिमान के प्रति दृढ़ रहने की असाधारण मिसाल पेश करता है.\n\n• स्वावलंबन और आत्मसम्मान: पचासी वर्ष की उम्र में भी किसी पर आश्रित होने के बजाय अपनी मेहनत से रोटी कमाना हर किसी के लिए प्रेरणादायक है. उम्र या शारीरिक सीमाएं कभी आत्मसम्मान से जीने के संकल्प को रोक नहीं सकतीं.\n• सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव: मुनाफा न होने और समय बदलने के बावजूद अपनी मिट्टी की कला को सहेजे रखना यह सिखाता है कि हर कार्य का मूल्य सिर्फ धन से नहीं आंका जाता. अपनी विरासत और संस्कृति के प्रति निष्ठा रखना सबसे बड़ी जिम्मेदारी है.\n• उम्मीद और निरंतरता: विपरीत हालात और ग्राहकों की कमी के बावजूद प्रतिदिन सुबह उठकर दुकान सजाना निरंतर प्रयास और सकारात्मक दृष्टिकोण का परिचायक है. सच्ची लगन परिस्थितियों से नहीं, बल्कि आंतरिक संतोष से तय होती है.",
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  "category": "राजस्थान",
  "publishedAt": "2026-09-25",
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    "पाली",
    "हसकी देवी",
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    "पारंपरिक कला",
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