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  "title": "पाली में शारीरिक दिव्यांगता को मात देकर झालाराम देवासी बने सैकड़ों निशक्तजनों की उम्मीद, खुद रोजगार देकर किया स्वावलंबी",
  "summary": "पाली के चिमनपुरा में स्थित दिव्यांग सेवा संस्थान के संस्थापक झालाराम देवासी जोयला खुद निशक्त होने के बावजूद सैकड़ों बेसहारा लोगों को मुफ्त आवास, भोजन और रोजगार देकर आत्मनिर्भर बना रहे हैं।",
  "content": "पाली के चिमनपुरा में संचालित 'दिव्यांग सेवा संस्थान' आज शारीरिक चुनौतियों से जूझ रहे सैकड़ों लोगों के लिए एक नई उम्मीद और स्वाभिमान का प्रतीक बन चुका है। अपनी निजी शारीरिक असुविधाओं और समाज में सहने वाले संघर्षों से घबराने के बजाय, झालाराम देवासी जोयला ने अपनी पीड़ा को दूसरों की भलाई के सशक्त माध्यम में बदल दिया। उन्होंने किसी दूसरे पर निर्भर रहने की जगह खुद आगे बढ़कर ऐसी व्यवस्था खड़ी की, जिसने अब तक अनगिनत निशक्त और असहाय लोगों के जीवन को पूरी तरह बदलकर रख दिया है।\n\nचिमनपुरा में सेवा और आश्रय का मजबूत केंद्र\nचिमनपुरा स्थित इस संस्थान की नींव रखते समय झालाराम जी का स्पष्ट मानना था कि केवल मौखिक सांत्वना या सहानुभूति किसी भी बेसहारा व्यक्ति की जिंदगी नहीं संवार सकती। अगर समाज के शोषित और शारीरिक रूप से असहाय वर्गों को असल मायने में मुख्यधारा से जोड़ना है, तो उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना बेहद अनिवार्य है। इसी दूरदर्शी सोच के साथ स्थापित 'दिव्यांग सेवा संस्थान' में आज सैकड़ों जरूरतमंद लोगों के लिए नि:शुल्क आवास, गुणवत्तापूर्ण भोजन और समय पर आवश्यक चिकित्सीय देखभाल उपलब्ध कराई जाती है। इसके अलावा, संस्थान में प्रत्येक व्यक्ति की रुचि और शारीरिक क्षमता के अनुसार उन्हें विभिन्न व्यावसायिक कौशलों का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।\n\n'सक्षम केबिन' और व्यावसायिक मॉडल से मिला स्थायी रोजगार\nदिव्यांगजनों को स्थायी आजीविका प्रदान करने के लिए संस्थान ने 'सक्षम केबिन' नामक एक बेहद नवीन और व्यावहारिक योजना शुरू की है। इस पहल के अंतर्गत विशेष योग्यजनों को अपने छोटे-मोटे व्यापार या स्वरोजगार शुरू करने के लिए सभी आवश्यक उपकरण और वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं। इसी कड़ी में संस्थान द्वारा 'जय भवानी किराणा एंड सब्जी भंडार' जैसी रिटेल दुकानें स्थापित की गई हैं। इन दुकानों की पूरी जिम्मेदारी और संचालन खुद दिव्यांगजन ही संभालते हैं। इस प्रकार के व्यापारिक मॉडल ने न केवल उनके सामने खड़ी दैनिक आजीविका की चिंता समाप्त कर दी है, बल्कि उनके भीतर एक नया आत्मविश्वास भी भरा है कि वे अपने परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी खुद उठा सकते हैं।\n\nआत्मसम्मान और स्वावलंबन का भावुक गवाह\nसंस्थान से जुड़कर नया जीवन पाने वाले एक दिव्यांग लाभार्थी ने अपनी खुशी साझा करते हुए अत्यंत भावुक मन से कहा कि आज उन्हें स्वयं पर गर्व महसूस होता है कि वे अपने पैरों पर खड़े हैं और किसी अन्य व्यक्ति पर बोझ नहीं हैं। उन्होंने बताया कि इस संस्थान से रोजगार मिलना उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ और खुशी का क्षण रहा है। लाभार्थी के अनुसार, झालाराम जी खुद कठिन परिस्थितियों से गुजरने के बाद भी अपने से ज्यादा निर्धन और बेसहारा लोगों को संभाल रहे हैं, जो भटकते हुए लोगों को सही दिशा में लाने वाले किसी मार्गदर्शक की तरह काम कर रहे हैं।\n\nसरकारी मदद और ढांचागत सहयोग की बढ़ती आवश्यकता\nज़मीन से जुड़कर अनगिनत जिंदगियों को एक नया जीवन देने वाले 'दिव्यांग सेवा संस्थान' का कार्यक्षेत्र और जिम्मेदारियां समय के साथ तेजी से बढ़ रही हैं। संस्थान से जुड़े लाभार्थियों और पाली के प्रबुद्ध नागरिकों ने राजस्थान राज्य सरकार तथा स्थानीय ज़िला प्रशासन से पुरजोर आग्रह किया है कि संस्थान को विभिन्न शासकीय योजनाओं के तहत अधिक से अधिक वित्तीय मदद और ढांचागत ढांचा उपलब्ध कराया जाए। स्थानीय निवासियों का मानना है कि यदि शासन स्तर से समुचित सहयोग प्राप्त होता है, तो झालाराम देवासी की यह मानवीय पहल आने वाले समय में हजारों अन्य बेसहारा और निशक्तजनों का जीवन पूरी तरह संवार सकती है।\n\nइसका आप पर असर\nयह पहल दर्शाती है कि स्थानीय स्तर पर स्थापित आजीविका मॉडल किस तरह समाज के सबसे वंचित वर्गों को मुख्यधारा से जोड़ सकते हैं।\n\n• पाली और राजस्थान में: पाली जिले के स्थानीय दिव्यांगजनों और बेसहारा परिवारों को चिमनपुरा स्थित संस्थान में मुफ्त रहने, खाने और चिकित्सीय देखभाल के साथ-साथ व्यावसायिक प्रशिक्षण की सुविधा मिलती है। इससे क्षेत्र के विशेष योग्यजन भीख मांगने या दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय सक्षम केबिन जैसी दुकानों के जरिए खुद आजीविका कमा सकते हैं।\n• पूरे भारत में: देश भर के सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवी संस्थाओं के लिए यह मॉडल एक प्रेरणादायक उदाहरण है कि बिना भारी-भरकम संसाधनों के भी दिव्यांगजनों को टिकाऊ आजीविका से कैसे जोड़ा जा सकता है। इससे सरकारी और निजी एजेंसियों को समावेशी रोजगार योजनाएं तैयार करने का स्पष्ट रोडमैप मिलता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह सेवा संस्थान सामाजिक उपेक्षा और व्यक्तिगत शारीरिक संघर्षों से उपजी गहरी सहानुभूति के कारण अस्तित्व में आया।\n\n• व्यक्तिगत संघर्ष से प्रेरणा: झालाराम देवासी जोयला ने खुद शारीरिक दिव्यांगता और सामाजिक उपेक्षा के कठिन दौर का सामना किया। इस अनुभव से उन्हें यह अहसास हुआ कि केवल सहानुभूति देने के बजाय दिव्यांगजनों को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाना ही स्थायी समाधान है।\n• संस्थागत प्रयास की शुरुआत: अपनी इसी सोच को धरातल पर उतारने के लिए उन्होंने चिमनपुरा में दिव्यांग सेवा संस्थान की नींव रखी, ताकि असहाय लोगों को एक ही छत के नीचे आश्रय, भोजन और काम सीखने का माहौल मिल सके।\n• भविष्य की जरूरत: जैसे-जैसे संस्थान में आश्रित लोगों की संख्या बढ़ रही है, इसे सुचारू रूप से चलाने के लिए सरकारी योजनाओं के तहत वित्तीय और बुनियादी मदद की आवश्यकता महसूस की जा रही है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. दिव्यांग सेवा संस्थान कहाँ स्थित है और इसके संस्थापक कौन हैं?\nयह संस्थान राजस्थान के पाली जिले के चिमनपुरा में स्थित है, और इसके संस्थापक झालाराम देवासी जोयला हैं।\n\n2. संस्थान में दिव्यांगों और जरूरतमंदों को कौन-कौन सी सुविधाएं दी जाती हैं?\nयहाँ निशक्तजनों को नि:शुल्क रहने का स्थान, भोजन, चिकित्सीय सहायता और आजीविका कमाने के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाता है।\n\n3. सक्षम केबिन पहल क्या है?\nयह दिव्यांगजनों को आत्मनिर्भर बनाने की एक योजना है, जिसके तहत उन्हें किराना या सब्जी की दुकान जैसे छोटे स्वरोजगार स्थापित करने के लिए आवश्यक संसाधन दिए जाते हैं।\n\n4. संस्थान के लोग सरकार और प्रशासन से क्या मांग कर रहे हैं?\nसंस्थान से जुड़े दिव्यांगों और पाली के नागरिकों ने राज्य सरकार से आग्रह किया है कि वे इसे सरकारी योजनाओं के तहत वित्तीय और ढांचागत मदद प्रदान करें।\n\nप्रेरणा और सबक\nझालाराम देवासी का जीवन संघर्ष इस बात की मिसाल है कि इच्छाशक्ति के बल पर किसी भी शारीरिक बाधा को समाज सेवा के बड़े अवसर में बदला जा सकता है।\n\n• कमजोरी को ताकत बनाना: अपनी शारीरिक लाचारी को ढाल बनाने के बजाय झालाराम जी ने उसे दूसरों की सेवा और सशक्तीकरण का माध्यम बनाया।\n• सांत्वना से आगे आजीविका पर जोर: केवल सहानुभूति जताने के बजाय लोगों को अपने पैरों पर खड़ा करना ही सच्ची मदद और स्थायी समाधान है।\n• व्यावहारिक रोजगार मॉडल: सक्षम केबिन जैसे छोटे और आसान व्यापारिक मॉडल तैयार करके दिव्यांगजनों को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।\n• सामुदायिक उत्तरदायित्व: समाज के सक्षम वर्गों और सरकार को ऐसे जमीनी प्रयासों को वित्तीय और ढांचागत सहयोग देना चाहिए ताकि अधिक लोगों का जीवन संवर सके।",
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  "category": "राजस्थान",
  "publishedAt": "2026-09-27",
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