# पाली में सोमनाथ मंदिर के पास मुस्लिम कारीगर गढ़ रहे आस्था के प्रतीक त्रिशूल और कुपेड़ा

> पाली के ऐतिहासिक सोमनाथ मंदिर के निकट मुस्लिम परिवार की एक सदी पुरानी लोहार की दुकान गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल पेश कर रही है, जहां पूजा और आरती के औजार पूरी श्रद्धा से तैयार किए जाते हैं।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-09-20 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/pali-men-somnath-temple-ke-pasa-muslima-karigara-garha-rahe-astha-ke-pratika-trishula-aura-kupera-35356 · **Language:** Hindi
**Tags:** पाली, सोमनाथ मंदिर, त्रिशूल, गंगा जमुनी तहजीब, लोहार, अय्यूब कारीगर, राजस्थान

राजस्थान के पाली में स्थित ऐतिहासिक सोमनाथ मंदिर के निकट एक छोटी सी दुकान सामाजिक सौहार्द और साझी संस्कृति की मिसाल पेश कर रही है। देश की आजादी से पहले शुरू हुई लोहे के औजार बनाने की यह कार्यशाला लगभग 100 वर्षों से अनवरत चल रही है। यहां चलने वाली पारंपरिक भट्टी को कभी परिवार के दादा और पिता ने सुलगाया था, और आज उसी पुश्तैनी हुनर को उस्मान, इब्राहिम तथा 60 वर्षीय अय्यूब पूरी शिद्दत के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। इस दुकान की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि घरेलू उपयोग के बर्तनों के साथ-साथ यहां हिंदू आस्था और शिव भक्ति का प्रमुख प्रतीक त्रिशूल भी लोहे को तपाकर विशेष बारीकी से बनाया जाता है।

## एक सदी पुरानी विरासत और आजादी के दौर का आशियाना
यह दुकान महज आजीविका का जरिया नहीं, बल्कि एक सदी पुराना पुश्तैनी सफर है। आजादी से पूर्व अस्तित्व में आई इस भट्टी में लोहे को लाल कर औजारों में ढालने की कला पीढ़ियों से एक से दूसरे हाथों में सौंपी जा रही है। दुकान के समीप ही इस परिवार का 80 साल पुराना पुश्तैनी मकान मौजूद है। इस ऐतिहासिक मकान की दीवारों पर आज भी '1947' अंकित है, जो देश के विभाजन और स्वतंत्रता के दौर का मूक गवाह बना हुआ है। वक्त बदला और कई दशक गुजर गए, लेकिन इस परिवार का अपने काम के प्रति समर्पण और आसपास के समुदाय के साथ अटूट भाईचारा जस का तस कायम रहा।

## भगवान शिव के त्रिशूल और आरती के कुपेड़ा का निर्माण
दुकान में कड़ाही, तवा, चूल्हा और खुरपी जैसे रोजमर्रा के घरेलू व कृषि औजार तो बनते ही हैं, लेकिन प्रमुख आकर्षण देव स्थानों के लिए तैयार किए जाने वाले धार्मिक उपकरण हैं। परिवार के कारीगर 60 वर्षीय अय्यूब का कहना है कि उनके पूर्वज भी यही काम करते थे और वे स्वयं भगवान भोलेनाथ की भक्ति का प्रतीक त्रिशूल बड़ी बारीकी से तैयार करते हैं। इसके अतिरिक्त मंदिरों में प्रतिदिन होने वाली पूजा-आरती में प्रयुक्त होने वाला विशेष पात्र 'कुपेड़ा' भी इन्हीं मुस्लिम कारीगरों के हाथों भट्टी में तपकर आकार लेता है। सोमनाथ मंदिर के बिल्कुल समीप गूंजती हथौड़ों की थाप दोनों समुदायों की साझा आस्था का प्रतीक प्रतीत होती है।

## स्थानीय लोगों का विश्वास और अटूट सामाजिक सौहार्द
क्षेत्र के स्थानीय निवासी इस परिवार के हुनर और सद्भाव के कायल हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार वे बचपन से इस परिवार की पीढ़ियों को मंदिर के उपयोगी उपकरण तैयार करते देखते आ रहे हैं और पूजा का कुपेड़ा विशेष रूप से इसी दुकान से लिया जाता रहा है। कई पीढ़ियां बीत जाने के बाद भी इस परिवार के हाथों की कारीगरी और स्थानीय समाज के साथ उनका आपसी प्रेम कभी कम नहीं हुआ। जब मुस्लिम लोहारों द्वारा गढ़े गए त्रिशूल और पूजा सामग्री हिंदू देवालयों में पहुंचते हैं, तो यह साझा जीवन मूल्यों और इंसानियत का सशक्त संदेश प्रस्तुत करता है।

## इसका आप पर असर
यह खबर समाज में सदियों पुराने सद्भाव, पारंपरिक दस्तकारी के महत्व और स्थानीय सांस्कृतिक ताने-बाने को उजागर करती है।

- **भारत में:** यह कहानी दर्शाती है कि देश के भीतरी इलाकों में साझी संस्कृति और पारंपरिक कारीगरी आज भी सामाजिक विभाजन से परे मजबूती से खड़ी है। इससे उन कारीगर परिवारों को सम्मान मिलता है जो पीढ़ियों से धार्मिक प्रतीकों को बिना किसी पूर्वाग्रह के तैयार कर रहे हैं।
- **पाली में:** स्थानीय मंदिरों और श्रद्धालुओं को पूजा-अर्चना के लिए पारंपरिक रूप से हस्तनिर्मित त्रिशूल और कुपेड़ा जैसे उपकरण सीधे उपलब्ध होते हैं। इससे शहर की स्थानीय ऐतिहासिक पहचान और सांप्रदायिक सौहार्द की परंपरा को नई पीढ़ी के बीच भी मजबूती मिलती है।
- **पारंपरिक दस्तकारों के लिए:** हाथ से लोहे के औजार बनाने वाले परिवारों के हुनर को सामाजिक पहचान मिलती है। आधुनिक मशीनी दौर में भी आस्था से जुड़े औजारों की हस्तनिर्मित मांग इन कारीगरों की आजीविका को सुरक्षित रखती है।
- **मंदिर समितियों और श्रद्धालुओं के लिए:** पूजा और आरती में काम आने वाली प्रामाणिक सामग्री स्थानीय स्तर पर भरोसेमंद कारीगरों से आसानी से मिल जाती है। इससे स्थानीय व्यापार और धार्मिक गतिविधियों के बीच का पुराना तालमेल निरंतर बना रहता है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह पुश्तैनी कार्यशाला पाली के सोमनाथ मंदिर के समीप लगभग एक सदी से निरंतर सक्रिय है, जहां एक मुस्लिम परिवार पीढ़ियों से धातु शिल्प का काम कर रहा है।

- **पुश्तैनी विरासत और कौशल का हस्तांतरण:** परिवार के दादा और पिता ने आजादी से पहले लोहार का काम शुरू किया था, जिसे बाद में उस्मान, इब्राहिम और अय्यूब ने आगे बढ़ाया। बचपन से भट्टी और हथौड़े के काम को देखकर सीखने के कारण यह पारंपरिक हुनर पीढ़ियों तक सहजता से सुरक्षित रहा।
- **मंदिर के निकट स्थान और स्थानीय मांग:** दुकान ऐतिहासिक सोमनाथ मंदिर के ठीक पास स्थित होने के कारण वहां आने वाले श्रद्धालुओं और पुजारियों को पूजा सामग्री की नियमित जरूरत रहती थी। घरेलू बर्तनों के साथ-साथ त्रिशूल और आरती के कुपेड़ा की निरंतर मांग ने इस कार्य को दशकों तक बनाए रखा।
- **आपसी सौहार्द और अटूट विश्वास:** स्थानीय हिंदू आबादी और इस मुस्लिम परिवार के बीच दशकों से गहरा सामाजिक जुड़ाव रहा है। इसी विश्वास के चलते स्थानीय लोग अपनी आस्था के पवित्र प्रतीकों को गढ़ने का दायित्व पूरी श्रद्धा के साथ इस परिवार को सौंपते आए हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. पाली में यह लोहार की दुकान कितने साल पुरानी है?
यह दुकान लगभग 100 साल यानी एक सदी पुरानी है और भारत की आजादी से पहले से चल रही है।

### 2. वर्तमान में इस पुश्तैनी काम को कौन संभाल रहा है?
इस विरासत को परिवार के उस्मान, इब्राहिम और 60 वर्षीय अय्यूब मिलकर आगे बढ़ा रहे हैं।

### 3. दुकान में कौन-कौन से धार्मिक और घरेलू औजार बनाए जाते हैं?
यहां भगवान शिव का त्रिशूल और आरती का कुपेड़ा बनाने के अलावा कड़ाही, तवे, चूल्हे और खुरपी जैसे घरेलू औजार बनते हैं।

### 4. यह दुकान किस प्रमुख धार्मिक स्थल के निकट स्थित है?
यह दुकान राजस्थान के पाली में स्थित ऐतिहासिक सोमनाथ मंदिर के बिल्कुल पास स्थित है।

### 5. कारीगरों के पुश्तैनी मकान की क्या खासियत है?
इनका 80 साल पुराना मकान पास ही स्थित है, जिसकी दीवार पर आज भी '1947' उकेरा हुआ है।

## प्रेरणा और सबक
अय्यूब और उनके परिवार का सफर सिखाता है कि ईमानदारी से किया गया काम और सामाजिक सद्भाव पीढ़ियों तक सम्मान दिलाता है।

- **हुनर धर्म से परे होता है:** अय्यूब और उनके भाइयों का काम साबित करता है कि सच्ची कारीगरी किसी मजहबी दायरे में नहीं बंधती, बल्कि सेवा और समर्पण ही कारीगर की असली पहचान है।
- **विरासत का संरक्षण:** आधुनिकता के दौर में भी पूर्वजों के पारंपरिक पेशे को 100 साल तक जीवित रखना सिखाता है कि मेहनत और लगन से पुश्तैनी पहचान को संजोया जा सकता है।
- **सामाजिक एकता की शक्ति:** मतभेदों और बदलते समय के बावजूद आपसी भाईचारे और सौहार्द पर टिके रहना समाज को जोड़ने का सबसे मजबूत आधार है।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._