# पारे की सतह पर सोना बनाने का दावा, राजस्थान के वैज्ञानिक लाल बहादुर के प्रयोग की शुरू हुई वैज्ञानिक जांच

> राजस्थान के वैज्ञानिक लाल बहादुर ने प्राचीन रसशास्त्र विद्या की मदद से पारे की सतह पर 23.77 कैरेट शुद्धता वाला सोना प्राप्त करने का दावा किया है, जिसकी निष्पक्ष जांच अब एमएनआईटी जयपुर में की जा रही है।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-10-28 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/pare-ki-sataha-para-sona-banane-ka-dava-rajasthan-ke-vaijnanika-lal-bahadur-ke-prayoga-ki-shuru-hui-vaijnanika-jancha-52689 · **Language:** Hindi
**Tags:** विज्ञान, लाल बहादुर, सोना, पारा, एमएनआईटी जयपुर, रसशास्त्र, राजस्थान

कम कीमत की साधारण धातुओं को मूल्यवान सोने में परिवर्तित करने की चाहत सदियों पुरानी है। प्राचीन काल के कीमियागरों की कहानियों से लेकर आधुनिक प्रयोगशालाओं के जटिल प्रयोगों तक, इस विचार ने हर दौर में उत्सुकता पैदा की है। इसी कड़ी में राजस्थान के वैज्ञानिक लाल बहादुर ने दावा किया है कि उन्होंने प्राचीन भारतीय ग्रंथों में दर्ज पारंपरिक विधियों का उपयोग करके पारे की ऊपरी सतह पर 99.04 प्रतिशत शुद्ध सोना प्राप्त किया है। लाल बहादुर और उनकी शोध टीम द्वारा प्रस्तुत किए गए इस दावे ने वैज्ञानिक समुदाय में व्यापक चर्चा छेड़ दी है। हालांकि, विज्ञान जगत में इस खोज को तब तक प्रमाणिक स्वीकृति नहीं दी जा सकती जब तक कि निष्पक्ष संस्थानों द्वारा इसका गहन परीक्षण न हो जाए। वर्तमान में यह निष्कर्ष किसी भी समीक्षाकृत वैज्ञानिक शोध पत्रिका में प्रकाशित नहीं हुए हैं, और किसी स्वतंत्र प्रयोगशाला द्वारा इसका दोबारा परीक्षण किया जाना बाकी है।

## रसशास्त्र की परंपरा और पोखरण-II से जुड़ाव
शोधकर्ता लाल बहादुर का कहना है कि उनकी यह प्रक्रिया भारतीय आयुर्वेद की विशेष शाखा रसशास्त्र से प्रेरित है। रसशास्त्र में विभिन्न धातुओं, विशेषकर पारे के शोधन, प्रसंस्करण और रूपांतरण की अनेक तकनीकों का विस्तृत वर्णन मिलता है। लाल बहादुर ने बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस, पिलानी से अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी की है। इसके अतिरिक्त, वह भारत के ऐतिहासिक पोखरण-II परमाणु परीक्षणों से भी जुड़े रहे हैं। उन्होंने बताया कि वह कई वर्षों से आचार्य नागार्जुन की परंपरा से जुड़े प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन कर रहे थे, जिनमें पारद संस्कार और धातु रूपांतरण की विधियां विस्तार से समझाई गई हैं। प्रयोग के दौरान उन्होंने यह सुनिश्चित करने के लिए विकिरण स्तर की जांच भी की थी कि प्रक्रिया में कोई खतरनाक रेडिएशन तो उत्पन्न नहीं हो रहा, और जांच के दौरान कोई विकिरण दर्ज नहीं किया गया।

## कनोडिया कॉलेज की प्रयोगशाला रिपोर्ट और शुद्धता का गणित
प्रयोग के लिए केवल 0.240 ग्राम पारे का छोटा नमूना इस्तेमाल किया गया था। इस नमूनों का विश्लेषण जयपुर स्थिति कनोडिया कॉलेज की भौतिकी प्रयोगशाला में संपन्न हुआ। लैब से जारी विश्लेषणात्मक रिपोर्ट में नमूने की ऊपरी सतह पर 99.04 प्रतिशत सोना मौजूद होने की बात दर्ज की गई। इसके अतिरिक्त, उसी सतह पर 0.48 प्रतिशत चांदी और 0.48 प्रतिशत तांबा भी पाया गया। शुद्धता के पैमाने पर 99.04 प्रतिशत सोने का अर्थ लगभग 23.77 कैरेट शुद्धता से होता है, जो बाजार में मिलने वाले उच्चतम गुणवत्ता वाले सोने के बेहद करीब है। हालांकि, शोध विशेषज्ञों का ध्यान इस बात पर है कि यह रिपोर्ट केवल नमूने की बाहरी सतह के परीक्षण पर आधारित है। यह इस बात का निर्णायक साक्ष्य नहीं है कि पारे का पूरा 0.240 ग्राम द्रव्यमान भीतर तक सोने में तब्दील हो चुका है।

## वैज्ञानिक संशय: क्या यह वास्तविक रूपांतरण है?
इस अनूठे दावे के सामने आते ही शोधकर्ताओं के समक्ष कई मौलिक प्रश्न खड़े हो गए हैं। सबसे प्रमुख सवाल यह है कि क्या पारे का परमाणु संरचनात्मक स्तर पर परिवर्तित होकर सोना बना है, या फिर इसमें कोई अन्य बाहरी कारक शामिल है। वैज्ञानिक मुख्यतः तीन संभावनाओं पर विचार कर रहे हैं। पहली यह कि प्रयोग में इस्तेमाल किए गए पारे के नमूने में पहले से ही सूक्ष्म मात्रा में सोने की अशुद्धियां मौजूद रही हों। दूसरी संभावना यह है कि प्रयोग के दौरान इस्तेमाल की गई अन्य सामग्रियों या बर्तनों के माध्यम से सोने के कण सतह पर जमा हो गए हों। तीसरी और सबसे असाधारण संभावना पारे के नाभिकीय रूपांतरण की है। जब तक शुरुआती पारे के नमूने के प्रत्येक अंश का पूर्व-परीक्षण दर्ज न हो, तब तक केवल सतह के परीक्षण से अंतिम परिणाम पर पहुंचना वैज्ञानिक सिद्धांतों के प्रतिकूल माना जाता है।

## एमएनआईटी जयपुर और ईसीएच सेंटर में आगामी परीक्षण
दावे की प्रामाणिकता की निष्पक्ष जांच करने के लिए जयपुर स्थित मालवीय राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान के विशेषज्ञों को जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। एमएनआईटी जयपुर की टीम इस प्रयोग की वैज्ञानिक सटीकता और इसके रासायनिक घटकों का पूर्ण मूल्यांकन करेगी। इसके साथ ही राजस्थान विश्वविद्यालय के ईसीएच सेंटर में भी इस प्रक्रिया को दोबारा दोहराने की तैयारी है। आगामी जांच में सबसे पहले प्रयोग की शुरुआती सामग्रियों की मौलिक आणविक संरचना का विश्लेषण किया जाएगा। इसके बाद एक्स-रे फ्लोरेसेंस तकनीक के माध्यम से नमूने में मौजूद प्रत्येक तत्व की सटीक मात्रा की मैपिंग की जाएगी। इसके अलावा, आइसोटोप विश्लेषण विधि का प्रयोग करके यह पता लगाया जाएगा कि सतह पर पाए गए सोने के परमाणुओं का आइसोटोपिक अनुपात प्राकृतिक सोने जैसा है या यह किसी परमाणु प्रतिक्रिया का परिणाम है।

## 80 प्रोटॉन से 79 प्रोटॉन: भौतिकी और रसायन विज्ञान की सीमाएं
रसायन विज्ञान के बुनियादी सिद्धांतों के अनुसार, साधारण रासायनिक अभिक्रियाओं या ताप उपचार के जरिए पारे को सोने में बदलना पूरी तरह असंभव है। इसका कारण पारे और सोने की परमाणु संरचना का अंतर है। आवर्त सारणी में पारे का परमाणु क्रमांक 80 होता है, जिसका अर्थ है कि इसके नाभिक में 80 प्रोटॉन मौजूद होते हैं। वहीं, सोने का परमाणु क्रमांक 79 है और इसके नाभिक में 79 प्रोटॉन होते हैं। पारे को सोने में बदलने के लिए पारे के नाभिक में से एक प्रोटॉन को बाहर निकालना होगा, जो कि केवल नाभिकीय भौतिकी और कण त्वरक प्रक्रियाओं द्वारा ही संभव है। साधारण रासायनिक या आयुर्वेदिक प्रणालियों में इतनी ऊर्जा उत्पन्न नहीं होती जो परमाणु के नाभिक को बदल सके। इसी कारण से वैज्ञानिक समुदाय इस बात पर बल दे रहा है कि जब तक नाभिकीय स्तर पर इस बदलाव के ठोस प्रमाण नहीं मिलते, तब तक इसे पूर्ण सिद्ध खोज नहीं माना जा सकता।

## इसका आप पर असर
यह समाचार प्राचीन ज्ञान पर आधारित वैज्ञानिक दावों और उनके कड़े सत्यापन मानकों से सीधे जुड़ा हुआ है।

- **भारत में:** आम लोगों और निवेशकों को सलाह दी जाती है कि वे पारे से सोना बनाने जैसे असत्यापित दावों के आधार पर वित्तीय या व्यापारिक फैसले न लें।
- **राजस्थान में:** जयपुर के प्रतिष्ठित संस्थानों जैसे एमएनआईटी और कनोडिया कॉलेज के शोध मंच वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक प्रामाणिकता की जांच के केंद्र में आ गए हैं।
- **वैज्ञानिक प्रामाणिकता:** किसी भी नए आविष्कार को तब तक मान्यता नहीं मिलती जब तक कि उसे पीयर-रिव्यू शोध पत्र और स्वतंत्र लैब दोहराव न मिल जाए।
- **जागरूकता:** रसायन शास्त्र के बुनियादी सिद्धांतों के अनुसार पारे के परमाणु को सामान्य प्रतिक्रिया से सोने में नहीं बदला जा सकता।

## ऐसा क्यों हुआ
यह मामला राजस्थान के वैज्ञानिक लाल बहादुर द्वारा किए गए उस प्रयोग के बाद सामने आया, जिसमें पारे के नमूने की सतह पर 99.04% सोना मिलने की रिपोर्ट कनोडिया कॉलेज लैब द्वारा दी गई थी।

- **प्राचीन ग्रंथों से प्रेरणा:** वैज्ञानिक ने आयुर्वेद के रसशास्त्र और पारद संस्कार विधियों का अध्ययन करके यह प्रयोग किया था।
- **लैब परीक्षण के नतीजे:** 0.240 ग्राम पारे के नमूने की सतह पर 99.04% सोना, 0.48% चांदी और 0.48% तांबा दर्ज किया गया।
- **वैज्ञानिक संशय का कारण:** केवल सतह के परीक्षण से यह साबित नहीं होता कि पूरा पारा सोने में बदला या उसमें पहले से अशुद्धि मौजूद थी।
- **आगे की कार्रवाई:** दावे की निष्पक्षता जांचने के लिए एमएनआईटी जयपुर और ईसीएच सेंटर में एक्सआरएफ तकनीक से विस्तृत परीक्षण किए जाने हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. राजस्थान के वैज्ञानिक ने क्या दावा किया है?
वैज्ञानिक लाल बहादुर ने दावा किया है कि प्राचीन रसशास्त्र विधि का उपयोग करके पारे की सतह पर 99.04% शुद्धता वाला सोना प्राप्त किया गया है।

### 2. प्रयोग में पारे की कितनी मात्रा का इस्तेमाल हुआ था?
इस प्रयोग में केवल 0.240 ग्राम पारे के नमूने का इस्तेमाल किया गया था।

### 3. कनोडिया कॉलेज की लैब रिपोर्ट में क्या निकला?
रिपोर्ट के अनुसार नमूने की सतह पर 99.04% सोना (लगभग 23.77 कैरेट), 0.48% चांदी और 0.48% तांबा पाया गया।

### 4. क्या इस दावे को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित मान लिया गया है?
नहीं, यह दावा अभी प्रमाणित नहीं है क्योंकि यह किसी पीयर-रिव्यू जर्नल में प्रकाशित नहीं हुआ है और स्वतंत्र निष्पक्ष जांच बाकी है।

### 5. वैज्ञानिक इस दावे पर संशय क्यों व्यक्त कर रहे हैं?
क्योंकि केवल सतह पर सोना मिलने से यह सिद्ध नहीं होता कि पूरा पारा सोने में बदला है; यह अशुद्धि या बाहरी कणों का परिणाम भी हो सकता है।

### 6. पारे को सोने में बदलना भौतिक रूप से कठिन क्यों है?
पारे में 80 प्रोटॉन और सोने में 79 प्रोटॉन होते हैं। इन्हें बदलने के लिए परमाणु नाभिक में परिवर्तन की जरूरत होती है जो साधारण रासायनिक क्रिया से संभव नहीं है।

### 7. दावे की निष्पक्ष जांच कहां की जाएगी?
इस दावे की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच मालवीय राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एमएनआईटी) जयपुर में की जाएगी।

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