पार्थेनियम का बढ़ता दायरा बना गंभीर संकट, एक पौधे से पनपते हैं 25 हजार बीज और फसलों को भारी नुकसान सड़क किनारे और खाली भूखंडों पर तेजी से पैर पसार रही गाजर घास न केवल चर्म रोग व सांस की बीमारियां बढ़ा रही है, बल्कि फसलों की पैदावार में भी 40 फीसदी तक गिरावट ला सकती है। खुले मैदानों, आवासीय बस्तियों के खाली भूखंडों और सड़कों की पटरियों पर इन दिनों एक खरपतवार का साम्राज्य तेजी से फैलता हुआ दिख रहा है। पहली नजर में साधारण हरी झाड़ी जैसा प्रतीत होने वाला गाजर घास का यह पौधा असल में पारिस्थितिकी तंत्र, मवेशियों, मानव सेहत और खेती-बाड़ी के लिए बड़ा संकट साबित हो रहा है। मॉनसून के दौरान ग्रामीण और अर्ध-शहरी अंचलों में यह बेतहाशा तादाद में सिर उठा लेता है। अगर शुरुआती दौर में ही इसे नष्ट करने के ठोस कदम न उठाए जाएं, तो इसके बारीक बीज तेजी से बिखरकर नए इलाकों को अपनी चपेट में ले लेते हैं। स्वास्थ्य पर पड़ता है गहरा दुष्प्रभाव पर्यावरण प्रेमी डॉ. अभिलाषा रणवा के मुताबिक, इस खरपतवार के लगातार संपर्क में बने रहने से इंसानी त्वचा पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसके संपर्क में आते ही त्वचा पर खुजली मचने लगती है, लाल चकत्ते उभर आते हैं और कई तरह के चर्म रोग घेर लेते हैं। यदि कोई व्यक्ति इसके बीच लंबे अरसे तक काम करता है या इसके साये में रहता है, तो उसे एक्जीमा और दमा जैसी गंभीर सांस की बीमारियों का शिकार होना पड़ सकता है। इसी वजह से खेतों, झाड़ियों वाले खुले हिस्सों और वीरान प्लॉटों में कामकाज करने वाले मजदूरों और ग्रामीणों को इसके नजदीक जाते समय विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए। भारत में दस्तक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वैज्ञानिक जगत में इस पौधे को पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस (Parthenium hysterophorus) के नाम से पहचाना जाता है। आम बोलचाल में लोग इसे गाजर घास के अलावा चटक चांदनी और कैरट ग्रास भी कहते हैं। कृषि के जानकारों का कहना है कि यह खरपतवार मूल रूप से भारत का नहीं है। वर्ष 1955 में जब संयुक्त राज्य अमेरिका से भारत में गेहूं का आयात किया गया था, तब उसी खेप के साथ इसके बारीक बीज पहली बार देश की धरती पर आए थे। देश के भीतर सबसे पहले महाराष्ट्र के पुणे शहर में इसकी मौजूदगी दर्ज की गई थी। उस शुरुआती पड़ाव के बाद यह खरपतवार धीरे-धीरे देश के हर कोने में अपनी जड़ें मजबूत करता चला गया। बीज उत्पादन की अचूक क्षमता और फैलाव गाजर घास का पौधा विकसित होकर लगभग एक मीटर तक की ऊंचाई हासिल कर लेता है और इसकी डालियों पर छोटे-छोटे सफेद रंग के फूल खिलते हैं। इसकी सबसे घातक खूबी इसकी बेमिसाल प्रजनन क्षमता है। महज एक पौधा सालभर के भीतर 5 हजार से लेकर 25 हजार तक बीज तैयार कर सकता है। ये बीज इतने हल्के होते हैं कि तेज हवा, बारिश के बहते पानी और मवेशियों के जरिए बहुत दूर-दूर तक पहुंच जाते हैं। यही वजह है कि किसी एक खाली जमीन के टुकड़े से शुरू हुआ इसका फैलाव देखते ही देखते पूरे इलाके को घेर लेता है। फसलों और जैव विविधता के लिए भारी चुनौती यह खरपतवार केवल बंजर जमीन पर उगने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह अपने आसपास उगने वाली दूसरी प्राकृतिक वनस्पतियों का पोषण छीनकर उनका अस्तित्व संकट में डाल देता है। इससे उस इलाके की स्थानीय जैव विविधता को भारी क्षति पहुंचती है। एग्रीकल्चर एक्सपर्ट दिनेश जाखड़ का कहना है कि खेतों के आसपास या अंदर इसकी मौजूदगी फसलों के पनपने की रफ्तार और पैदावार को बुरी तरह कुंद कर देती है। कुछ विकट परिस्थितियों में गाजर घास के प्रकोप की वजह से कुल कृषि उत्पादन में 40 प्रतिशत तक की जबर्दस्त गिरावट दर्ज की जा सकती है। रोकथाम के उपाय और प्रशासनिक स्थिति गाजर घास से छुटकारा पाने का सबसे असरदार तरीका यह है कि पौधे में फूल और बीज आने से पहले ही उसे जड़ से उखाड़ दिया जाए। उखाड़ते वक्त हाथों में मजबूत दस्ताने पहनना बेहद जरूरी है, ताकि त्वचा के सीधे संपर्क से बचा जा सके। इसके खात्मे के लिए यांत्रिक तरीके अपनाने के साथ-साथ रासायनिक दवाओं और जैविक विधियों का भी सहारा लिया जा सकता है। इसके अलावा खाली पड़ी सार्वजनिक जगहों पर समाज के सहयोग से सामूहिक सफाई अभियान चलाए जाने की जरूरत है। कृषि विभाग के सहायक निदेशक रामचंद्र बाजिया ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि गाजर घास आमतौर पर जुताई वाले खेतों के मुकाबले खाली और बंजर स्थानों पर ज्यादा पनपती है। जब किसान अपने खेतों में जुताई और बुवाई करते हैं, तो उस प्रक्रिया में इसके तमाम बीज अपने आप नष्ट हो जाते हैं, जिससे फसलों के बीच इसका प्रकोप तुलनात्मक रूप से कुछ धीमा रहता है। उन्होंने यह भी साफ किया कि कृषि विभाग के स्तर पर इस खरपतवार के पूर्ण उन्मूलन के लिए कोई अलग से स्वतंत्र बजट या प्रावधान मौजूद नहीं है। ऐसी स्थिति में ग्राम पंचायतें, स्थानीय प्रशासनिक महकमे और गांव के नागरिक मिलकर साझा अभियान चलाएं, तभी इस खरपतवार के फैलाव पर पूरी तरह लगाम लगाई जा सकती है। इसका आप पर असर गाजर घास के तेजी से फैलने से आम लोगों की सेहत और किसानों की खेती पर सीधा प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। • स्वास्थ्य सुरक्षा: खुले भूखंडों और खेतों के आसपास काम करते समय दस्ताने और पूरी आस्तीन के कपड़े पहनें। इसके सीधे संपर्क में आने से त्वचा पर दाने, खुजली और सांस की गंभीर बीमारियां पैदा हो सकती हैं। • फसलों की पैदावार: किसान अपने खेतों की मेड़ों और आसपास की खाली जमीन से इस पौधे को तुरंत नष्ट करें। खेत में इसकी मौजूदगी से पैदावार में 40 फीसदी तक की भारी गिरावट आ सकती है। • रोकथाम का समय: इस पौधे को फूल और बीज निकलने से पहले ही उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए। एक बार बीज बनने के बाद यह हवा और पानी के सहारे पूरे मोहल्ले और खेतों में फैल जाता है। • सामूहिक भागीदारी: सरकारी स्तर पर अलग बजट न होने के कारण ग्रामीणों और स्थानीय प्रशासन को मिलकर सफाई अभियान चलाना होगा। ग्राम पंचायतें अपने इलाकों में सार्वजनिक स्थलों से इसे हटाने के लिए श्रमदान आयोजित कर सकती हैं। ऐसा क्यों हुआ गाजर घास की तेज वृद्धि और इसके अनियंत्रित फैलाव के पीछे कई ऐतिहासिक, प्राकृतिक और प्रशासनिक कारक जिम्मेदार हैं। • विदेशी आयात की पृष्ठभूमि: यह पौधा भारत का मूल निवासी नहीं है, बल्कि वर्ष 1955 में अमेरिका से मंगाए गए गेहूं के साथ इसके बीज देश में आए थे। महाराष्ट्र के पुणे से शुरू होकर यह धीरे-धीरे पूरे देश के वातावरण में अनुकूलित होकर फैल गया। • अत्यधिक बीज उत्पादन: इसका एक ही पौधा एक वर्ष में 5 हजार से 25 हजार तक बीज पैदा करने की क्षमता रखता है। हवा और बारिश के पानी के साथ ये हल्के बीज बिना किसी रुकावट के कई किलोमीटर दूर तक बिखर जाते हैं। • खाली जमीनों की उपेक्षा: खेतों में नियमित जुताई होने से इसके बीज नष्ट हो जाते हैं, लेकिन खाली प्लॉटों और सड़कों के किनारे कोई देखरेख न होने से यह बेरोकटोक बढ़ता रहता है। • समर्पित बजट का अभाव: कृषि विभाग में इसके उन्मूलन के लिए कोई अलग से वित्तीय प्रावधान या विशेष योजना नहीं है, जिससे इसके खिलाफ संगठित सरकारी कार्रवाई सीमित रह जाती है। सवाल-जवाब 1. गाजर घास का वैज्ञानिक नाम क्या है और इसे किन अन्य नामों से जाना जाता है? इसका वैज्ञानिक नाम पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस (Parthenium hysterophorus) है। आम बोलचाल में इसे चटक चांदनी और कैरट ग्रास के नाम से भी जाना जाता है। 2. भारत में गाजर घास की शुरुआत कब और कहां से हुई थी? यह खरपतवार वर्ष 1955 में अमेरिका से आयात किए गए गेहूं के साथ भारत आया था और सबसे पहले महाराष्ट्र के पुणे में देखा गया था। 3. गाजर घास के संपर्क में आने से इंसानों को कौन सी बीमारियां हो सकती हैं? इसके संपर्क में आने से त्वचा में खुजली, लाल चकत्ते और चर्म रोग होते हैं, जबकि लंबे समय तक संपर्क रहने पर एक्जीमा और दमा की समस्या हो सकती है। 4. एक गाजर घास का पौधा सालभर में कितने बीज पैदा कर सकता है? गाजर घास का एक पौधा पूरे साल के दौरान करीब 5 हजार से 25 हजार तक बीज पैदा करने की क्षमता रखता है। 5. फसलों के उत्पादन पर गाजर घास का कितना असर पड़ सकता है? इस खरपतवार की मौजूदगी के कारण फसलों की बढ़वार रुक सकती है और कुछ परिस्थितियों में कुल कृषि पैदावार में 40 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। 6. गाजर घास को नष्ट करने का सही समय और तरीका क्या है? इसे फूल और बीज बनने से पहले ही उखाड़ देना चाहिए, और उखाड़ते समय हाथों में दस्ताने पहनना जरूरी है ताकि त्वचा की सुरक्षा हो सके। 7. क्या कृषि विभाग के पास गाजर घास खत्म करने के लिए कोई अलग योजना है? कृषि विभाग के पास इसके उन्मूलन के लिए कोई अलग से विशेष प्रावधान नहीं है, इसलिए स्थानीय प्रशासन और ग्रामीणों के सामूहिक प्रयास से ही इसे नियंत्रित किया जा सकता है। https://trendkia.com/rajasthan/parthenium-ka-barhata-dayara-bana-gnbhira-snkata-eka-paudhe-se-panapate-hain-25-hajara-bija-aura-phasalon-ko-bhari-nukasana-42560 TrendKia — Har trend, sabse pehle.