पश्चिमी राजस्थान में सूखे से निपटने का नया रास्ता, काजरी की नई मोठ किस्में किसानों को देंगी भरपूर पैदावार कम बारिश और लंबे शुष्क दौर के बीच काजरी की मोठ-6 और मोठ-7 किस्में पश्चिमी राजस्थान के किसानों के लिए राहत बनकर उभरी हैं। वैज्ञानिकों ने कम पानी और सीमित नमी में बेहतर उत्पादन हासिल करने के उपाय साझा किए हैं। कम मानसूनी बारिश और फसलों के बीच लंबे सूखे अंतराल से जूझ रहे किसानों के लिए खरीफ सत्र में उन्नत बीज बड़ी राहत लेकर आए हैं। पश्चिमी राजस्थान के शुष्क इलाकों में जब सामान्य फसलें पानी की कमी से सूखने लगती हैं, तब केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान यानी काजरी द्वारा तैयार की गई मोठ की नई किस्में उम्मीद की ठोस वजह बन रही हैं। पारंपरिक या देसी मोठ के मुकाबले इन आधुनिक किस्मों में काफी पहले फूल आ जाते हैं और पूरी फसल बहुत कम समय में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। समय की यही बचत किसानों को मौसमी आपदा और अनिश्चित मॉनसून के भारी आर्थिक नुकसान से बचाने में मददगार साबित हो रही है। खेत में सीधी कटाई कर किसानों को दिखाई गई पैदावार जोधपुर स्थित संस्थान परिसर में आयोजित फील्ड हार्वेस्ट डे और किसान-वैज्ञानिक संवाद कार्यक्रम के दौरान किसानों को इन बीजों की वास्तविक क्षमता से रूबरू कराया गया। वैज्ञानिकों ने खेतों में मोठ-6 और मोठ-7 किस्मों की सीधी कटाई करके उपस्थित किसानों के सामने फसल की कुल उपज का प्रत्यक्ष प्रदर्शन किया। इस संवाद का मुख्य मकसद यह था कि बदलते पर्यावरण चक्र और कम वर्षा के दौर में किसानों तक ऐसी कृषि तकनीक पहुंचे, जिससे जमीन में मौजूद सीमित नमी का एक-एक कतरा फसल को मजबूत बनाने में काम आ सके। वैज्ञानिकों ने पारंपरिक तौर-तरीकों की जगह मौसम आधारित फसल प्रबंधन और वैज्ञानिक खेती की पद्धतियों को दैनिक दिनचर्या में शामिल करने का सुझाव दिया। पांच वर्षों के औसत से आधी रह गई बारिश का आंकड़ा काजरी के निदेशक डॉ. एचएस जाट ने क्षेत्रीय मौसम के आंकड़ों को साझा करते हुए बताया कि इस साल इलाके में केवल करीब 220 मिलीमीटर बारिश ही दर्ज की गई है। इसके विपरीत, बीते पांच वर्षों के दौरान इसी क्षेत्र में वर्षा का सामान्य औसत लगभग 500 मिलीमीटर के आसपास रहा करता था। केवल बारिश में भारी कमी ही संकट की वजह नहीं बनी, बल्कि इस दौरान करीब 30 से 35 दिनों का एक बेहद लंबा शुष्क अंतराल भी देखा गया, जिसमें खेतों को पानी की एक बूंद भी नहीं मिली। ऐसे चुनौतीपूर्ण हालात में बुवाई के शुरुआती दिन से लेकर फसल के पूरे विकास और पकने की अवस्था तक मिट्टी में मौजूद नमी का सही प्रबंधन सबसे अहम भूमिका निभाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसानों को हमेशा मौसम के पूर्वानुमान और खेत की नमी जांचकर ही फसलों का चयन करना चाहिए ताकि सूखे के साल में भी पैदावार पूरी तरह खत्म न हो। फसल चक्र में बाजरा, मोठ और ग्वार का संतुलित तालमेल वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी कि वे अपने खेतों में वर्षा के बदलते ढर्रे को देखते हुए बाजरा, मोठ और ग्वार जैसी मजबूत फसलों को शामिल कर एक टिकाऊ फसल प्रणाली तैयार करें। लगातार एक ही तरह की खेती करने के बजाय उचित फसल चक्र अपनाने से न केवल जमीन की प्राकृतिक उर्वरता बची रहती है, बल्कि प्राकृतिक आपदाओं और सूखे के जोखिम को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है। काजरी की मोठ-6 और मोठ-7 जैसी किस्में उन शुष्क इलाकों के लिए सबसे उपयुक्त पाई गई हैं, जहां बादल कम बरसते हैं और बीच में सूखा हफ्तों तक खिंच जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में कम पानी की मांग वाली फसलों, उन्नत बीजों और वैज्ञानिक खेती के तालमेल से ही किसानों की आय और वार्षिक उत्पादन को सुरक्षित रखा जा सकता है। इसका आप पर असर कम बारिश और लंबे सूखे के संकट के बीच नई उन्नत मोठ किस्में किसानों को आर्थिक बर्बादी से बचा सकती हैं। • भारत में: जलवायु परिवर्तन और कम वर्षा के दौर में दलहनी फसलों का उत्पादन सुरक्षित रहेगा। इससे देश में दालों की कीमतों पर असामान्य दबाव कम होगा और आपूर्ति स्थिर बनी रहेगी। • पश्चिमी राजस्थान में: करीब 220 मिमी बारिश और 30 से 35 दिन के सूखे के बावजूद मोठ-6 और मोठ-7 जैसी किस्में समय पर पककर कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं। इससे इलाके के किसानों की मेहनत बर्बाद नहीं होगी और उनकी लागत सुरक्षित रहेगी। • फसल विविधीकरण: बाजरा, मोठ और ग्वार को फसल चक्र में अपनाने से मिट्टी की उर्वरता बरकरार रहती है। किसान एक ही फसल पर निर्भर रहने के बजाय जोखिम को बांट सकेंगे। • लागत व समय की बचत: तेजी से फूल आने और कम अवधि में पकने के कारण सिंचाई और रख-रखाव का खर्च घटेगा। किसान सीमित नमी में भी संतोषजनक उत्पादन पा सकेंगे। ऐसा क्यों हुआ पश्चिमी राजस्थान में इस सीजन में सामान्य से आधे से भी कम पानी बरसने और 30 से 35 दिनों के लंबे शुष्क अंतराल के कारण किसानों के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया। ऐसी मौसमी विभीषिका में पारंपरिक फसलें टिक नहीं पातीं, जिसके चलते वैज्ञानिकों को कम अवधि वाली किस्में सामने लानी पड़ीं। • बारिश में भारी गिरावट: पिछले पांच वर्षों में क्षेत्र का वर्षा औसत लगभग 500 मिलीमीटर रहा था, लेकिन इस साल यह घटकर महज 220 मिलीमीटर रह गया। • लंबा शुष्क अंतराल: मॉनसून के दौरान लगातार 30 से 35 दिनों तक बारिश पूरी तरह नदारद रही, जिससे खेतों की ऊपरी नमी तेजी से खत्म हो गई। • देसी किस्मों की विफलता: पारंपरिक मोठ को तैयार होने में अधिक समय लगता है और वे लंबे सूखे में सूख जाती हैं, जबकि नई किस्में जल्दी फूल देकर कम समय में पक जाती हैं। • उपलब्ध नमी का प्रबंधन: सीमित पानी के दौर में उत्पादन बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने किसानों के सामने खेत में ही मोठ-6 और मोठ-7 का सीधा प्रदर्शन किया ताकि वे समय पर सही किस्म चुन सकें। सवाल-जवाब 1. काजरी ने किसानों के सामने किन उन्नत मोठ किस्मों का प्रदर्शन किया? काजरी ने फील्ड हार्वेस्ट डे के दौरान मोठ-6 और मोठ-7 किस्मों की कटाई कर किसानों को उनकी पैदावार दिखाई। 2. देसी मोठ की तुलना में इन नई किस्मों में क्या विशेषता है? इन नई किस्मों में देसी मोठ के मुकाबले जल्दी फूल आते हैं और पूरी फसल बहुत कम समय में पककर तैयार हो जाती है। 3. इस साल क्षेत्र में कितनी बारिश दर्ज की गई है? काजरी निदेशक के अनुसार इस वर्ष क्षेत्र में करीब 220 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई, जबकि 5 साल का औसत करीब 500 मिलीमीटर था। 4. इस बार फसलों को कितने दिनों के शुष्क अंतराल का सामना करना पड़ा? इस सीजन में फसलों को करीब 30 से 35 दिन के लंबे शुष्क अंतराल का सामना करना पड़ा। 5. वैज्ञानिकों ने किन फसलों को मिलाकर फसल प्रणाली बनाने की सलाह दी है? वैज्ञानिकों ने बारिश की स्थिति के अनुसार बाजरा, मोठ और ग्वार को फसल प्रणाली व फसल चक्र में शामिल करने की सलाह दी है। https://trendkia.com/rajasthan/pashchimi-rajasthan-men-sukhe-se-nipatane-ka-naya-rasta-cazri-ki-nai-motha-kismen-kisanon-ko-dengi-bharapura-paidavara-44809 TrendKia — Har trend, sabse pehle.