पितृपक्ष में बीकानेर के सूर्य मंदिर में अमर शहीदों को अर्पित किया गया विशेष तर्पण बीकानेर के ऐतिहासिक सूर्य मंदिर में पितृपक्ष के दौरान देश की रक्षा में प्राण न्योछावर करने वाले अमर जवानों और असमय दिवंगत हुए नागरिकों की आत्मशांति के लिए सामूहिक तर्पण अनुष्ठान संपन्न हुआ। धार्मिक परंपराओं के अनुसार पितृपक्ष के समय आमतौर पर लोग केवल अपने कुल के दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति हेतु पिंडदान, तर्पण और विशेष अनुष्ठान करते हैं। राजस्थान के बीकानेर शहर में इस पावन अवधि के दौरान एक बेहद प्रेरक और अनूठी परंपरा का निर्वहन किया गया। बीकानेर स्थित सूर्य मंदिर परिसर में एकत्र होकर पुजारियों और पंडितों ने सीमाओं की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर सैनिकों तथा असमय काल का ग्रास बने लोगों के निमित्त विधि-विधान से सामूहिक तर्पण कर्म संपन्न कराया। सूर्य मंदिर में सामूहिक अनुष्ठान और शहीदों को नमन सूर्य मंदिर के प्रांगण में मम्मू महाराज के मार्गदर्शन में आयोजित इस विशेष आध्यात्मिक कार्यक्रम में शहर के कई विप्रजनों ने सहभागिता की। अनुष्ठान के दौरान सभी उपस्थित पुरोहितों ने मिलकर देश की संप्रभुता के लिए जान गंवाने वाले अमर जवानों के अदम्य साहस को स्मरण किया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच तिल और जल अर्पित करते हुए इन बलिदानियों की आत्मा की सद्गति एवं चिरशांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की गई। चतुर्दशी तिथि पर अकाल मृत्यु व सर्वसमावेशी तर्पण इस अनुष्ठान के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए ज्योतिष राजेंद्र कुमार व्यास ने जानकारी दी कि पितृपक्ष की चतुर्दशी तिथि विशेष रूप से अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए दिवंगतों के श्राद्ध कर्म के लिए निर्धारित मानी जाती है। इसी शास्त्रीय विधान के आधार पर देशहित में वीरगति पाने वाले सैनिकों के निमित्त यह तर्पण किया जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस पूजा में जाति, संप्रदाय या पंथ का कोई भेदभाव नहीं रखा जाता। मातृभूमि की रक्षा में शहीद हुआ जवान चाहे किसी भी धर्म अथवा वर्ग से संबंध रखता हो, सभी को एक समान आदर के साथ जलांजलि दी जाती है। सैनिकों के साथ-साथ इस अवसर पर संन्यासियों, मनीषी साहित्यकारों, कवियों, ज्योतिषियों और समाज के अन्य दिवंगत विभूतियों के लिए भी तर्पण अनुष्ठान किया गया। राजेंद्र कुमार व्यास ने बताया कि सूर्य मंदिर के इस पावन स्थल पर यह सामूहिक तर्पण का सिलसिला पिछले करीब सात वर्षों से निरंतर चल रहा है। प्रत्येक वर्ष पितृपक्ष आते ही पुरोहित समाज एकजुट होकर राष्ट्र रक्षकों और समाजसेवकों की दिवंगत आत्माओं के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करता है। सनातन परंपरा में राष्ट्रीय कृतज्ञता का समावेश सनातन धर्म में तर्पण एक अत्यंत अनिवार्य और पवित्र कर्मकांड है, जिसमें काले तिल, कुश और जल के अर्घ्य के माध्यम से पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है। मान्यता है कि इस विधि से पितृ तृप्त होते हैं और परिजनों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। बीकानेर में आयोजित इस धार्मिक प्रयास ने पारिवारिक सीमाओं से परे उठकर राष्ट्रीय भावना का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत किया है। यह आयोजन यह गहरा संदेश देता है कि जिन वीरों ने देशवासियों की सुरक्षा के लिए अपने जीवन का उत्सर्ग कर दिया, पितृपक्ष में उन्हें स्मरण करना और उनके प्रति कृतज्ञता जताना प्रत्येक नागरिक का परम कर्तव्य है। इसका आप पर असर यह आयोजन धार्मिक परंपराओं को सामाजिक और राष्ट्रीय कृतज्ञता से जोड़ने का एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करता है। • भारत में: यह पहल देश भर के लोगों को प्रेरित करती है कि वे पारिवारिक कर्मकांडों से ऊपर उठकर देश के रक्षकों को धार्मिक अवसरों पर स्मरण करें। इससे नागरिकों के भीतर सीमाओं पर तैनात सैनिकों के प्रति कृतज्ञता और राष्ट्रीय एकता की भावना मजबूत होती है। • बीकानेर में: स्थानीय स्तर पर बीकानेर के निवासियों और आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह एक सात वर्षों से चली आ रही प्रेरणादायक परंपरा का हिस्सा बन चुका है। शहर के लोग और युवा पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ देशभक्ति के मूल्यों को प्रत्यक्ष रूप से आत्मसात कर सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ यह आयोजन धार्मिक नियमों और राष्ट्रीय सम्मान के संगम के रूप में हर वर्ष आयोजित किया जाता है। • चतुर्दशी तिथि का विधान: हिंदू पंचांग के अनुसार पितृपक्ष की चतुर्दशी तिथि उन सभी आत्माओं के तर्पण के लिए समर्पित होती है जिनकी मृत्यु अचानक या अकाल परिस्थितियों में हुई हो। युद्धक्षेत्र में वीरगति पाने वाले सैनिकों को इसी श्रेणी में स्मरण कर तर्पण अर्पित किया जाता है। • सात वर्षों की परंपरा: बीकानेर के सूर्य मंदिर में पुरोहित समाज पिछले सात वर्षों से लगातार इस परंपरा का निर्वहन कर रहा है। मम्मू महाराज और स्थानीय पंडितों ने मिलकर यह निर्णय लिया था कि देश के लिए बलिदान देने वालों को कभी विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए। • सर्वधर्म सद्भाव की भावना: आयोजकों के अनुसार सैनिक किसी एक जाति या धर्म का नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र का होता है, इसलिए सभी धर्मों के शहीदों को सामूहिक रूप से जल अर्पित कर सद्गति की कामना की जाती है। सवाल-जवाब 1. बीकानेर में अमर शहीदों के लिए तर्पण का आयोजन किस स्थान पर किया गया? यह विशेष तर्पण अनुष्ठान बीकानेर स्थित सूर्य मंदिर में संपन्न हुआ। 2. सूर्य मंदिर में यह विशेष अनुष्ठान किसके नेतृत्व में हुआ? यह आयोजन मम्मू महाराज की अगुवाई में स्थानीय पंडितों द्वारा संपन्न कराया गया। 3. पितृपक्ष की किस तिथि पर अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए लोगों का तर्पण किया जाता है? धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृपक्ष की चतुर्दशी तिथि पर अकाल मृत्यु को प्राप्त दिवंगतों का तर्पण किया जाता है। 4. शहीदों के अलावा और किन दिवंगतों के लिए यह तर्पण किया गया? शहीद जवानों के साथ संन्यासियों, साहित्यकारों, कवियों, ज्योतिषियों और असमय काल कवलित हुए लोगों के लिए तर्पण किया गया। 5. बीकानेर के सूर्य मंदिर में यह परंपरा कितने वर्षों से निभाई जा रही है? ज्योतिष राजेंद्र कुमार व्यास के अनुसार यह आयोजन पिछले करीब सात वर्षों से हर साल किया जा रहा है। https://trendkia.com/rajasthan/pitripaksha-men-bikaner-ke-surya-mndira-men-amara-shahidon-ko-arpita-kiya-gaya-vishesha-tarpana-45443 TrendKia — Har trend, sabse pehle.