पितृपक्ष में छूटे श्राद्ध का मिलेगा पूरा फल, सर्वपितृ अमावस्या पर पुष्कर सरोवर तट पर जुटेंगे श्रद्धालु पितृपक्ष की तय तिथि पर श्राद्ध न कर पाने वाले श्रद्धालु सर्वपितृ अमावस्या को पुष्कर में पिंडदान और तर्पण कर सकेंगे। दस अक्टूबर को होने वाले इस अनुष्ठान के लिए प्रशासन भी सरोवर तट पर विशेष व्यवस्थाएं कर रहा है। पितरों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने वाला 15 दिवसीय पितृपक्ष अब अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार इस अवधि का समापन सर्वपितृ अमावस्या के दिन होता है, जिसे पितरों की विदाई का सबसे महत्वपूर्ण अवसर माना गया है। यदि कोई व्यक्ति अपने दिवंगत परिजनों की मृत्यु तिथि पर श्राद्ध या तर्पण करने से चूक गया है, अथवा किसी व्यवधान के चलते पुष्कर नहीं पहुंच सका, तो उसे निराश होने की आवश्यकता नहीं है। इस पावन तिथि पर पवित्र पुष्कर सरोवर के पावन तट पर आकर वे अपने पूर्वजों के निमित्त सभी आवश्यक धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कर सकते हैं। सप्त कुल के पूर्वजों को मिलता है तर्पण और पिंडदान पुष्कर के स्थानीय पुरोहित जयंत राजगुरु के अनुसार, वर्ष भर में पितृपक्ष के 15 दिन विशेष रूप से पितरों की सेवा और स्मरण के लिए निर्धारित होते हैं। सामान्य नियम यही है कि परिवार के दिवंगत सदस्य का श्राद्ध उसी तिथि को किया जाए, जिस तिथि पर उनका देहावसान हुआ था। इस नियम के तहत श्रद्धालु निर्धारित तिथियों पर पुष्कर पहुंचकर धार्मिक रीतियों को पूरा करते हैं। किंतु यदि किसी कारणवश वह तिथि निकल गई हो, तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन सभी पितरों का सामूहिक श्राद्ध करने का विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व है। पुरोहित जयंत राजगुरु ने आगे स्पष्ट किया कि सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्रद्धालु केवल निकट संबंधियों का ही नहीं, बल्कि अपनी सात पीढ़ियों अर्थात सप्त कुल के पूर्वजों का स्मरण करते हैं। इस दिन माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, सास-ससुर तथा भाई-बहन सहित कुल के सभी दिवंगत सदस्यों के निमित्त श्रद्धापूर्वक पिंडदान, पूजा-अर्चना और जलांजलि अर्पित की जाती है। श्रद्धालु पवित्र पुष्कर सरोवर के किनारे विधि-विधान से धार्मिक कर्मकांड संपन्न कराकर अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनकी मोक्ष प्राप्ति की मंगल कामना करते हैं। इस वर्ष सर्वपितृ अमावस्या का यह पावन पर्व 10 अक्टूबर को मनाया जाएगा। तीर्थ स्थल पर श्रद्धालुओं के लिए प्रशासनिक तैयारियां सर्वपितृ अमावस्या के पावन अवसर पर देशभर से भारी संख्या में श्रद्धालुओं के पुष्कर पहुंचने की संभावना रहती है। श्रद्धालुओं के इस विशाल आगमन को ध्यान में रखते हुए प्रशासन की तरफ से भी व्यापक स्तर पर प्रबंध किए जा रहे हैं। तीर्थ यात्रियों की सुविधा और सुगम आवागमन को सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न घाटों और प्रमुख स्थानों पर जूते-चप्पल सुरक्षित रखने के विशेष केंद्र बनाए जा रहे हैं। इसके साथ ही व्यवस्थाओं की सतत निगरानी के लिए संबंधित कर्मचारियों की आवश्यक तैनाती भी की जा रही है, ताकि अनुष्ठान हेतु आने वाले श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। इसका आप पर असर सर्वपितृ अमावस्या पर पुष्कर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह एक महत्वपूर्ण धार्मिक अवसर है, जहां छूटे हुए पारिवारिक संस्कारों को विधिवत पूरा किया जा सकता है। • भारत में: जिन परिवारों से पितृपक्ष के दौरान तय तिथियों पर श्राद्ध अनुष्ठान छूट गया है, वे 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या पर इसे पूरा कर सकते हैं। इसके माध्यम से अपने कुल की सात पीढ़ियों के सभी दिवंगत सदस्यों के निमित्त तर्पण और पिंडदान किया जा सकता है। • पुष्कर और अजमेर में: भारी भीड़ के आगमन को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने सरोवर घाटों पर कर्मियों की तैनाती और जूता-चप्पल स्टैंड की व्यवस्था की है। यात्रा की योजना बना रहे श्रद्धालु समय से पूर्व पहुंचकर निर्धारित घाटों पर सुगमता से पूजा-अर्चना संपन्न कर सकते हैं। • श्रद्धालुओं के लिए: पूजा सामग्री और अनुष्ठान की तैयारी पहले से कर लें ताकि घाटों पर अनावश्यक विलंब से बचा जा सके। सरोवर किनारे भीड़भाड़ को देखते हुए स्थानीय प्रशासनिक निर्देशों का पालन करना आवागमन को आसान बनाएगा। • समय सीमा के संबंध में: यह अवसर इस वर्ष 10 अक्टूबर को पड़ेगा, जो पितृपक्ष का आखिरी दिन है। इसके बाद पितृपक्ष समाप्त हो जाएगा, इसलिए छूटे हुए श्राद्ध कर्म इसी दिन पूर्ण करने होंगे। ऐसा क्यों हुआ पितृपक्ष के समापन पर सर्वपितृ अमावस्या का विशेष धार्मिक महत्व है, जो उन श्रद्धालुओं को अवसर देता है जो किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर पूर्वजों का श्राद्ध नहीं कर सके। इस दिन सात पीढ़ियों के पितरों के सामूहिक तर्पण की स्थापित परंपरा रही है। • मुख्य कारण: हिंदू धार्मिक मान्यताओं में पूर्वजों की मृत्यु तिथि पर श्राद्ध करना प्राथमिक विधान है, परंतु समय या परिस्थिति की बाधा से तिथि छूट जाने पर सर्वपितृ अमावस्या को सार्वभौमिक विकल्प माना गया है। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि कोई भी दिवंगत पूर्वज वार्षिक तर्पण से वंचित न रहे। • सप्त कुल का विधान: परंपराओं के अनुसार इस दिन माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और ससुराल पक्ष सहित सात पीढ़ियों के पितरों का एक साथ स्मरण किया जाता है। सामूहिक तर्पण के जरिए सभी ज्ञात और अज्ञात पूर्वजों की आत्मा की शांति हेतु प्रार्थना की जाती है। • पुष्कर का महत्व: पवित्र पुष्कर सरोवर को पितृ कर्म और मोक्ष दायिनी पूजा के लिए अत्यंत पावन स्थल माना गया है। यही कारण है कि देश के कोने-कोने से श्रद्धालु अमावस्या के दिन सरोवर के तट पर पिंडदान करने एकत्र होते हैं। सवाल-जवाब 1. सर्वपितृ अमावस्या पर किन पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है? इस दिन सात पीढ़ियों यानी सप्त कुल के माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, सास-ससुर और भाई-बहन सहित सभी दिवंगत परिजनों का श्राद्ध किया जा सकता है। 2. यदि पितृपक्ष में निर्धारित तिथि पर श्राद्ध छूट जाए तो क्या करना चाहिए? यदि किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाता, तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन पुष्कर सरोवर तट पर पिंडदान और तर्पण किया जा सकता है। 3. इस वर्ष सर्वपितृ अमावस्या किस तिथि को मनाई जाएगी? इस वर्ष सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को मनाई जाएगी। 4. पुष्कर में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए क्या प्रशासनिक प्रबंध किए जा रहे हैं? प्रशासन द्वारा श्रद्धालुओं के लिए जूते-चप्पल रखने की अलग व्यवस्था और विभिन्न स्थानों पर कर्मचारियों की तैनाती की जा रही है। https://trendkia.com/rajasthan/pitripaksha-men-chhute-shradh-ka-milega-pura-phala-sarva-pitru-amavasya-para-pushkar-sarovara-tata-para-jutenge-shraddhalu-43750 TrendKia — Har trend, sabse pehle.