# पुष्कर के पुरुहूता पर्वत पर स्थापित 15वें सिद्ध पीठ का रहस्य, भक्त के आग्रह पर नीचे आईं माता

> अजमेर से 16 किलोमीटर दूर पुष्कर में स्थित राजराजेश्वरी पुरुहूता मणि वैदिक शक्तिपीठ में नवरात्रि पर विशेष आराधना होती है, जहां माता सती की कलाइयों की पूजा की परंपरा है।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-10-04 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/pushkar-ke-puruhuta-parvata-para-sthapita-15ven-siddha-pitha-ka-rahasya-bhakta-ke-agraha-para-niche-ain-mata-42697 · **Language:** Hindi
**Tags:** पुष्कर, अजमेर, शक्तिपीठ, नवरात्रि, पुरूहूता पर्वत, राजस्थान मंदिर

शारदीय और चैत्र नवरात्रि के नौ पावन दिनों में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की उपासना की विशेष परंपरा रही है। इस दौरान देशभर के देवी मंदिरों में दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है। राजस्थान में अजमेर से करीब 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित तीर्थ नगरी पुष्कर में एक अत्यंत प्राचीन और पावन शक्तिपीठ मौजूद है, जिसका ऐतिहासिक और पौराणिक संबंध सीधे माता सती से माना जाता है। पुरुहूता पर्वत की गोद में स्थित राजराजेश्वरी पुरुहूता मणि वैदिक शक्तिपीठ को कुल 108 सिद्ध पीठों की सूची में 15वें सिद्ध पीठ के रूप में मान्यता प्राप्त है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र स्थान पर माता सती की कलाइयों का स्वरूप गिरा और विराजमान हुआ था। यही कारण है कि नवरात्रि पर्व के दौरान यहां दूर-दराज से श्रद्धालु विशेष अनुष्ठान और दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

## शिखर से पर्वत की तलहटी तक कैसे पहुंचीं माता
इस सिद्ध धाम की स्थापना और स्वरूप को लेकर मंदिर के पुजारी उमेंद्र पुरी एक दिलचस्प पौराणिक प्रसंग साझा करते हैं। उनके अनुसार, आदिकाल में माता इस ऊंचे पर्वत के सबसे ऊपरी शिखर पर एक पिंडी के रूप में स्थापित थीं। उस समय एक अनन्य भक्त रोजाना कठिन चढ़ाई पूरी कर पर्वत की चोटी तक पहुंचता था और नियमपूर्वक माता की सेवा और पूजा-अर्चना करता था। समय बीतने के साथ जब वह भक्त अत्यंत वृद्ध हो गया और उसके लिए रोजाना शिखर पर चढ़ना असंभव सा होने लगा, तब उसने मां से अत्यंत भावुक और निस्वार्थ प्रार्थना की।

भक्त ने निवेदन किया कि माता स्वयं नीचे तलहटी में आकर विराजें, जिससे न केवल वह अपने अंतिम समय तक सेवा कर सके, बल्कि आम श्रद्धालुओं को भी दर्शन करने में सुगमता हो। भक्त की इस सच्ची निष्ठा और निस्वार्थ विनती को देखकर माता ने प्रसन्न होकर पर्वत की तलहटी में आने का फैसला किया, जिसके बाद वर्तमान स्थल पर उनकी स्थापना हुई।

## ब्रह्मा जी के ऐतिहासिक यज्ञ और देवी स्वरूपों की पूजा
पुजारी उमेंद्र पुरी के अनुसार, इस पावन शक्तिपीठ का पौराणिक महत्व जगतपिता ब्रह्मा जी के पुष्कर में आयोजित महायज्ञ से भी गहरा जुड़ाव रखता है। मंदिर परिसर में माता के विभिन्न दिव्य स्वरूपों की अलग-अलग मान्यताओं के साथ विधिवत पूजा की जाती है। यहां आने वाले भक्त मां महाकाली और मां चामुंडा के उग्र व कल्याणकारी रूपों की आराधना करते हैं।

इसके अतिरिक्त, धन की देवी मां लक्ष्मी और विद्या की देवी मां सरस्वती के संयुक्त स्वरूप को यहां श्रद्धापूर्वक अम्बे-अम्बालिका नाम से पूजा जाता है। साथ ही, मां गौरी के साथ भगवान गणेश जी का विग्रह भी श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है। अजमेर और पुष्कर के आसपास के पूरे क्षेत्र में सदियों से कई ऐसे पूजनीय मंदिर स्थापित हैं, जिनकी अपनी स्वतंत्र मान्यताएं और अटूट धार्मिक परंपराएं आज भी जीवित हैं।

## इसका आप पर असर
नवरात्रि के दौरान अजमेर और पुष्कर आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए यह ऐतिहासिक शक्तिपीठ सुगम दर्शन का एक महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र है।

- **भारत में:** देशभर से शक्तिपीठों की तीर्थयात्रा करने वाले श्रद्धालुओं को पुष्कर में 108 सिद्ध पीठों में 15वें सिद्ध पीठ के दर्शन का अवसर मिलता है। यहां माता सती की कलाइयों के स्वरूप और अम्बे-अम्बालिका के दर्शन एक ही यात्रा में किए जा सकते हैं।
- **अजमेर और पुष्कर में:** स्थानीय निवासी और अजमेर से पुष्कर जाने वाले यात्री महज 16 किलोमीटर का सफर तय कर इस प्राचीन स्थल पर पहुंच सकते हैं। पर्वत की तलहटी में मंदिर होने के कारण बुजुर्गों और बच्चों को बिना किसी कठिन चढ़ाई के दर्शन सुलभ हो जाते हैं।
- **दर्शनार्थियों के लिए:** नवरात्रि के नौ दिनों में विशेष पूजा और अर्चना का आयोजन होता है, जिसमें श्रद्धालु व्यक्तिगत संकल्प ले सकते हैं। सुबह और शाम की आरती के समय भीड़ अधिक होने के कारण समय प्रबंधन आवश्यक है।
- **धार्मिक पर्यटन:** ब्रह्मा जी के यज्ञ से जुड़े पुष्कर क्षेत्र में आने वाले श्रद्धालु ब्रह्मा मंदिर के साथ-साथ इस शक्तिपीठ को भी अपनी यात्रा सूची में शामिल कर सकते हैं। इससे एक ही दौरे में ब्रह्मा नगरी के पौराणिक स्थलों के दर्शन पूर्ण होते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
पुरूहूता पर्वत पर इस शक्तिपीठ की स्थापना और इसका शिखर से तलहटी में आना पौराणिक मान्यताओं और एक बुजुर्ग भक्त की श्रद्धा पर आधारित है।

- **पौराणिक आधार:** मान्यताओं के अनुसार माता सती की कलाइयों का स्वरूप यहां स्थापित होने से यह स्थान 108 सिद्ध पीठों में 15वें सिद्ध पीठ के रूप में पूजनीय बना। साथ ही, इसका संबंध जगतपिता ब्रह्मा जी के प्राचीन यज्ञ अनुष्ठान से जुड़ा हुआ है।
- **तलहटी में स्थानांतरण:** आदिकाल में पिंडी रूप पर्वत की चोटी पर स्थित था, लेकिन प्रतिदिन पूजा करने वाले एक भक्त की वृद्धावस्था के कारण माता ने उसकी प्रार्थना स्वीकार की। भक्त की सुविधा और अन्य श्रद्धालुओं के लिए माता पर्वत के शिखर से नीचे तलहटी में आ गईं।
- **बहु-स्वरूपीय आराधना:** मंदिर में महाकाली, चामुंडा, अम्बे-अम्बालिका (लक्ष्मी और सरस्वती का संयुक्त रूप) तथा गौरी-गणेश के स्वरूपों को अलग-अलग मान्यताओं के चलते एक साथ पूजा जाता है।

## सवाल-जवाब

### 1. राजराजेश्वरी पुरुहूता मणि वैदिक शक्तिपीठ कहां स्थित है?
यह शक्तिपीठ राजस्थान के अजमेर से 16 किलोमीटर दूर पुष्कर में पुरुहूता पर्वत पर स्थित है।

### 2. 108 सिद्ध पीठों में इस मंदिर का कौन सा स्थान है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह पावन स्थल 108 सिद्ध पीठों में 15वां सिद्ध पीठ माना जाता है।

### 3. इस शक्तिपीठ का संबंध माता सती के किस अंग से है?
मान्यता के अनुसार इस पवित्र स्थान पर माता सती की कलाइयों का स्वरूप विराजमान हुआ था।

### 4. माता पर्वत के शिखर से तलहटी में क्यों आईं?
एक वृद्ध भक्त की निस्वार्थ प्रार्थना से प्रसन्न होकर माता ने तलहटी में आना स्वीकार किया ताकि आम श्रद्धालु आसानी से दर्शन कर सकें।

### 5. मंदिर में लक्ष्मी और सरस्वती के संयुक्त स्वरूप को किस नाम से जाना जाता है?
यहां मां लक्ष्मी और मां सरस्वती के संयुक्त स्वरूप को अम्बे-अम्बालिका नाम से पूजा जाता है।

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