सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीश के आरोपों पर पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा का कड़ा जवाब, प्रक्रिया के तहत सवाल उठाने की दी नसीहत राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा ने अपने ऊपर लगे प्रशासनिक अनियमितताओं और रोस्टर में फेरबदल के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे व्यावसायिक ईर्ष्या से प्रेरित बताया है। न्यायपालिका के शीर्ष गलियारों में दो वरिष्ठ न्यायविदों के बीच उपजा विवाद अब खुलकर सामने आ गया है। राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश पद से सेवानिवृत्त हुए जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा ने सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीश जस्टिस संदीप मेहता द्वारा अपने ऊपर लगाए गए तमाम आरोपों को निराधार बताते हुए तीखा पलटवार किया है। पिछले सप्ताह अपने पद से विदा हुए जस्टिस शर्मा ने कहा कि यदि उनके कामकाज अथवा प्रशासनिक निर्णयों को लेकर कोई शिकायत या आपत्ति थी, तो उसे सार्वजनिक स्तर पर विवाद बनाने के बजाय निर्धारित औपचारिक न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से आगे बढ़ाया जाना चाहिए था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि शीर्ष अदालत के किसी भी न्यायाधीश को किसी उच्च न्यायालय के आंतरिक प्रशासनिक तौर-तरीकों में दखल देने की शक्ति का इस्तेमाल अपनी तय संवैधानिक मर्यादाओं और सीमाओं के भीतर रहकर ही करना चाहिए। इस पूरे मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए जस्टिस शर्मा ने कहा कि लगाए गए लांछनों के पीछे व्यावसायिक ईर्ष्या की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि उनके ऊपर जो सवाल उठाए गए हैं, उनके संदर्भ में उन्हें जस्टिस संदीप मेहता से जिरह करने का विधिवत अवसर मिलना चाहिए, ताकि सच्चाई निष्पक्ष रूप से सभी के समक्ष आ सके। यह टकराव उस समय सार्वजनिक चर्चा में आया था जब अगस्त के महीने में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने देश के मुख्य न्यायाधीश को कई पत्र प्रेषित कर गंभीर आरोप दर्ज कराए थे। अगस्त में मुख्य न्यायाधीश को भेजे गए पत्रों से उपजा था विवाद विवाद की पृष्ठभूमि उस वक्त तैयार हुई जब अगस्त में जस्टिस संदीप मेहता की तरफ से भारत के मुख्य न्यायाधीश को चार अलग-अलग पत्र भेजे गए। उन पत्रों में आरोप लगाया गया कि उच्च न्यायालय में शक्तियों का दुरुपयोग किया जा रहा है और कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की ईमानदारी पर सवाल खड़े करने वाली शिकायतें प्राप्त हुई हैं। इन पत्रों के माध्यम से आग्रह किया गया था कि संजीव प्रकाश शर्मा को राजस्थान उच्च न्यायालय से हटाकर किसी अन्य स्थान पर स्थानांतरित किया जाए और संस्थान के संचालन हेतु एक नए पूर्णकालिक मुख्य न्यायाधीश की शीघ्र नियुक्ति सुनिश्चित की जाए। इन पत्राचारों के उपरांत अगस्त के महीने में ही सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के जस्टिस संजय के. अग्रवाल को राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी थी। यह समूचा घटनाक्रम उस नाजुक मोड़ पर घटित हुआ था जब अधिवक्ताओं के तीखे विरोध और कार्य बहिष्कार के बीच जस्टिस शर्मा अवकाश पर चले गए थे। प्रशासनिक फैसलों और रोस्टर हेरफेर के आरोपों का बिंदुवार खंडन अपने ऊपर लगे प्रशासनिक और न्यायिक अनियमितताओं के आरोपों को विस्तार से नकारते हुए जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट किया कि उन्होंने कभी किसी प्रभावशाली पक्षकार को अनुचित लाभ नहीं पहुंचाया। उन पर रोस्टर में मनमाना फेरबदल करने, न्यायिक अधिकारियों की आंतरिक जांच में अनुचित दखल देने और चुनिंदा लोगों को लाभ पहुंचाने की नीयत से अधिकारियों के तबादले करने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे। इन सभी बिंदुओं को पूरी तरह खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि हर न्यायाधीश की कार्यशैली और प्रशासनिक प्राथमिकताओं में भिन्नता हो सकती है, लेकिन दृष्टिकोण के इस अंतर का तात्पर्य यह कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि किसी एक का प्रशासनिक तरीका गलत अथवा दूषित है। अपने करीब साढ़े ग्यारह महीने के प्रशासनिक नेतृत्व का ब्योरा देते हुए उन्होंने बताया कि उनके कार्यकाल के दौरान लंबे समय से अटकी पड़ी पदोन्नतियों और तबादलों के मामलों का त्वरित निस्तारण किया गया। इसके अतिरिक्त उच्च न्यायालय और संपूर्ण न्यायिक ढांचे के विकास के लिए उपलब्ध बजट तथा वित्तीय संसाधनों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज कराई गई। उन्होंने पुष्टि की कि उन्होंने देश के मुख्य न्यायाधीश को जस्टिस मेहता के सभी चारों पत्रों का बिंदुवार लिखित जवाब प्रेषित कर दिया है। इसके साथ ही उन्होंने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर यह बुनियादी संवैधानिक प्रश्न भी उठाया कि क्या सर्वोच्च न्यायालय का कोई न्यायाधीश किसी स्वतंत्र उच्च न्यायालय के दैनिक आंतरिक प्रशासन में इस प्रकार का सीधा हस्तक्षेप कर सकता है। वकीलों के कार्य बहिष्कार और 1997 के ऐतिहासिक फैसले की नजीर अपने कार्यकाल के दौरान राजस्थान में हुए वकीलों के विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जस्टिस शर्मा ने कहा कि अधिवक्ताओं के बीच अविश्वास और आंदोलन का वातावरण जस्टिस मेहता द्वारा दिए गए बयानों के बाद ही निर्मित हुआ। उन्होंने तथ्य सामने रखते हुए कहा कि उनके साढ़े ग्यारह महीने के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के कार्यकाल के दौरान इससे पूर्व राज्य भर में वकीलों की एक भी हड़ताल नहीं हुई थी और कामकाज सुचारू रूप से संचालित हो रहा था। न्यायिक गरिमा और संस्थागत अनुशासन पर जोर देते हुए उन्होंने सर्वोच्च अदालत द्वारा 1997 में दिए गए प्रकाश चंद बनाम राजस्थान राज्य फैसले का स्पष्ट उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि न्यायविदों के बीच किसी भी प्रकार के मतभेद अथवा असहमति को सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाने या इंटरनेट के मंचों पर उछालने के बजाय स्थापित न्यायिक और प्रशासनिक ढांचे के तहत ही उठाया जाना चाहिए। आम जनता के भीतर समूची न्यायपालिका के प्रति निष्पक्षता और विश्वास बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। निजी संबंधों के आरोप, उदयपुर विकास प्राधिकरण मामला और लंबा न्यायिक सफर जस्टिस शर्मा ने बूंदी जिले के एक पक्षकार से अपनी कथित मुलाकात के संदर्भ में फैलाई गई बातों पर भी स्थिति साफ की। उन्होंने बताया कि जिस व्यक्ति की चर्चा की जा रही है, वह उनकी धर्मपत्नी के परिवार से पारिवारिक रिश्तेदारी रखता है और अवकाश के दिनों में मंदिर दर्शन के उद्देश्य से उनके साथ गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि उस व्यक्ति से संबंधित मुकदमा वर्ष 1992 से ही अदालत में लंबित चला आ रहा है और जिस विशिष्ट आवेदन के आधार पर उन पर सवाल खड़े किए गए, वह आवेदन तो उनके कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश का दायित्व संभालने से पहले ही खारिज किया जा चुका था। न्यायिक अधिकारियों के तबादलों के संबंध में उन्होंने स्पष्ट किया कि राजस्थान में बड़ी संख्या में स्थानांतरण तय प्रशासनिक नियमों और संस्थागत प्रक्रिया के अनुसार संपन्न होते हैं, इनमें उनका कोई व्यक्तिगत अथवा मनमाना निर्णय शामिल नहीं था। रोस्टर प्रबंधन के अधिकार पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि मुख्य न्यायाधीश के पास रोस्टर का निर्धारण करने का पूर्ण प्रशासनिक विशेषाधिकार होता है। विभिन्न मुकदमों को अलग-अलग पीठों के समक्ष सूचीबद्ध करने के पीछे कई व्यावहारिक कारक होते हैं, जिनमें लंबित मुकदमों का विशाल आंकड़ा, अधिवक्ताओं के समक्ष आने वाली व्यावहारिक समस्याएं और शासन स्तर से प्राप्त इनपुट शामिल होते हैं। इसी क्रम में उन्होंने करोड़ों रुपये के उदयपुर विकास प्राधिकरण प्रकरण की सुनवाई अपने स्तर पर करने के निर्णय का भी पुरजोर बचाव किया। उन्होंने रेखांकित किया कि उस विवाद में पूर्व में तीन अलग-अलग न्यायाधीशों ने स्वयं को सुनवाई से अलग कर लिया था, जिसके बाद राज्य के महाधिवक्ता ने स्वयं उनसे इस महत्वपूर्ण अपील की सुनवाई करने का औपचारिक आग्रह किया था। अपने करीब साढ़े नौ वर्ष के न्यायिक कार्यकाल का संक्षिप्त ब्योरा प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया कि उन्होंने 88 हजार से अधिक मुकदमों का अंतिम निपटारा किया और जब भी उनके निर्णयों की शीर्ष अदालत में न्यायिक समीक्षा हुई, तो उनमें से अधिकांश आदेशों को पूर्णतः बरकरार रखा गया। उन्होंने यह भी साझा किया कि वर्ष 2011 में वह और जस्टिस संदीप मेहता एक ही समय वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित हुए थे और उनके मुख्य न्यायाधीश बनने की राह में अतीत में भी बाधाएं खड़ी की गई थीं। उन्होंने स्वीकार किया कि इस पूरे विवाद और अनर्गल आरोपों से उन्हें व्यक्तिगत रूप से गहरा आघात पहुंचा है। उन्होंने दो टूक कहा कि एक न्यायाधीश का मूल कर्तव्य वकीलों या किसी वर्ग को प्रसन्न करना नहीं, बल्कि निष्पक्ष भाव से कानून और स्थापित न्याय प्रणाली के अनुसार न्याय की रक्षा करना है। इसका आप पर असर शीर्ष न्यायविदों के बीच खुले विवाद से न्यायिक प्रशासन और मुकदमों की सुनवाई की विश्वसनीयता पर सीधा प्रभाव पड़ता है। • भारत में: उच्च न्यायपालिका के आंतरिक कामकाज और कॉलेजियम स्तर पर होने वाली नियुक्तियों में पारदर्शिता को लेकर बहस तेज होगी। इससे देशभर की अदालतों में न्यायाधीशों के प्रशासनिक विशेषाधिकारों और जांच प्रक्रिया को लेकर नए दिशा-निर्देश तय किए जा सकते हैं। • राजस्थान में: उच्च न्यायालय के प्रशासनिक नेतृत्व और लंबित मुकदमों की रोस्टर व्यवस्था में स्थिरता आएगी। वकीलों के कार्य बहिष्कार समाप्त होने से आम मुकदमों की सुनवाई सामान्य रूप से चलने लगेगी। • मुकदमेबाजों पर असर: अदालतों में जजों के प्रशासनिक फेरबदल और वकीलों की हड़ताल से टलने वाली तारीखों में कमी आएगी। पक्षकारों को अपने मामलों में निष्पक्ष रोस्टर व्यवस्था के तहत त्वरित सुनवाई का अवसर मिलेगा। • न्यायिक सुधार: आंतरिक शिकायतों की जांच के लिए स्थापित संस्थागत तंत्र को अधिक मजबूत करने की मांग उठेगी। इससे भविष्य में किसी भी उच्च न्यायालय के आंतरिक संचालन पर होने वाले सार्वजनिक विवादों पर रोक लग सकेगी। ऐसा क्यों हुआ सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीश द्वारा मुख्य न्यायाधीश को भेजे गए पत्रों और पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के सेवानिवृत्त होने के बाद यह टकराव सार्वजनिक पटल पर आ गया। • आरोपों की शुरुआत: अगस्त में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस संदीप मेहता ने देश के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर संजीव प्रकाश शर्मा पर प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग और रोस्टर हेरफेर के आरोप लगाए थे। उन पत्रों में शर्मा को स्थानांतरित करने और नया नियमित मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने का अनुरोध किया गया था। • कॉलेजियम का कदम और विरोध: इन पत्रों के सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के जस्टिस संजय के. अग्रवाल को राजस्थान का नया मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की। इसी दौरान राज्य के अधिवक्ताओं ने विरोध शुरू कर दिया और शर्मा छुट्टी पर चले गए। • सेवानिवृत्ति के बाद प्रतिक्रिया: जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा के सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया। उन्होंने इसे व्यावसायिक ईर्ष्या करार देते हुए प्रक्रियागत मर्यादाओं के उल्लंघन का मुद्दा उठाया। सवाल-जवाब 1. जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा ने किन आरोपों का खंडन किया है? उन्होंने मुकदमों के रोस्टर में हेरफेर करने, प्रभावशाली पक्षकारों को लाभ पहुंचाने, अधिकारियों की जांच में दखल देने और मनमाने तबादले करने के आरोपों को निराधार बताया है। 2. यह विवाद सबसे पहले कब और कैसे शुरू हुआ था? यह विवाद अगस्त में तब शुरू हुआ जब सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस संदीप मेहता ने देश के मुख्य न्यायाधीश को चार पत्र लिखकर शर्मा के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई थीं। 3. जस्टिस शर्मा ने अपने न्यायिक करियर में कितने मामलों का निपटारा किया? उन्होंने अपने लगभग साढ़े नौ साल के कार्यकाल में 88 हजार से अधिक मुकदमों का निपटारा किया। 4. उदयपुर विकास प्राधिकरण मामले की सुनवाई पर शर्मा ने क्या स्पष्टीकरण दिया? उन्होंने बताया कि इस प्रकरण में पूर्व में तीन जजों ने स्वयं को अलग कर लिया था, जिसके बाद महाधिवक्ता के औपचारिक अनुरोध पर उन्होंने स्वयं अपील की सुनवाई की थी। 5. जस्टिस शर्मा ने किस ऐतिहासिक न्यायिक फैसले का हवाला दिया? उन्होंने 1997 के प्रकाश चंद बनाम राजस्थान राज्य फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जजों के आपसी मतभेद स्थापित न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही सुलझाए जाने चाहिए। https://trendkia.com/rajasthan/rajasthan-hc-dispute-sanjeev-prakash-sharma-counters-sandeep-mehta-allegations-over-judicial-process-40967 TrendKia — Har trend, sabse pehle.