# राजस्थान के बेरी मेले में प्रशिक्षित ऊंट बादल और घोड़ी सोनूड़ी के नृत्य ने मोहा दिल

> सीकर जिले के बेरी पशु मेले में पंजाब, हरियाणा और यूपी से पहुंचे पशुपालकों के बीच सधे हुए ऊंटों और घोड़ियों के करतब मुख्य आकर्षण बन गए हैं, जहां 5 अक्टूबर को भव्य समापन समारोह होगा।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-10-02 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/rajasthan-ke-beri-mele-men-prashikshita-unta-badal-aura-ghori-sonudi-ke-nritya-ne-moha-dila-41620 · **Language:** Hindi
**Tags:** बेरी पशु मेला, सीकर मेला, पशुपालन, शेखावाटी संस्कृति, ऊंट नृत्य, राजस्थान मेले

सीकर जिले का ऐतिहासिक बेरी पशु मेला इन दिनों ग्रामीण उत्साह और जीवंत सांस्कृतिक रंगों से सराबोर है। राजस्थान की समृद्ध पशुपालन परंपरा और लोक संस्कृति का प्रतीक माना जाने वाला यह विशाल आयोजन दूर-दराज से आने वाले लोगों और व्यापारियों के लिए एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है। इस मेले में पारंपरिक पशु व्यापार तो चल ही रहा है, लेकिन दर्शकों के बीच सबसे बड़ा आकर्षण प्रशिक्षित पशुओं के हैरतअंगेज करतब और संगीतमय प्रस्तुतियां हैं। 5 अक्टूबर तक चलने वाले इस ग्रामीण समागम में हर रोज स्थानीय कस्बों के साथ-साथ सुदूर इलाकों से भी हजारों दर्शक मेला प्रांगण में पहुंच रहे हैं। स्थानीय प्रतिनिधि मनोज गुर्जर ने स्पष्ट किया कि बेरी पशु मेला पूरे शेखावाटी क्षेत्र के सबसे प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक आयोजनों में शुमार है। मवेशियों की खरीद-फरोख्त के अलावा पारंपरिक हाट-बाजार, स्थानीय खान-पान के ठेले और मनोरंजन के झूले पूरे परिसर की रौनक को कई गुना बढ़ा रहे हैं।

## पड़ोसी राज्यों से पहुंचे उन्नत नस्ल के मवेशी
इस ग्रामीण मेले की प्रतिष्ठा और व्यापारिक अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां केवल सीकर या राजस्थान के अन्य हिस्सों के ही व्यापारी मौजूद नहीं हैं। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे सीमावर्ती राज्यों से भी बड़ी संख्या में पशुपालक अपने सबसे बेहतरीन और उन्नत नस्ल के मवेशियों को लेकर बेरी पहुंचे हैं। मेला मैदान में चुनिंदा नस्लों के ऊंट, ताकतवर घोड़े, फुर्तीली घोड़ियां और दुधारू मवेशियों की व्यापक कतारें सजी हुई हैं। इन सबके बीच मेले में लाया गया एक विशालकाय भैंसा भी भारी कौतुहल का केंद्र बना हुआ है, जिसे देखने के लिए भारी भीड़ जुट रही है। अंतरराज्यीय स्तर से आए पशुपालक अपने जानवरों की बेहतर देखभाल, पोषण और उन्हें सिखाए जाने वाले खास प्रशिक्षण के तौर-तरीकों को स्थानीय पशुपालकों के साथ साझा कर रहे हैं, जिससे पूरे आयोजन का माहौल बेहद संवादात्मक और ज्ञानवर्धक बन गया है।

## बादल और सोनूड़ी के सधे हुए कदमों ने बांधा समां
इस वर्ष मेले में सबसे ज्यादा चर्चा ऊंट 'बादल' और घोड़ी 'सोनूड़ी' के सधे हुए प्रदर्शन की हो रही है। अपने प्रशिक्षकों के मामूली इशारों पर जिस तालमेल और लय के साथ बादल और सोनूड़ी ने कदमताल करते हुए नृत्य की मुद्राएं दिखाईं, उसने उपस्थित जनसमूह को पूरी तरह चकित कर दिया। पशुपालक नेकीराम छावसरी के ऊंट और घोड़ी ने कई साहसिक और अनुशासित करतब दिखाए, जिसकी वजह से दर्शकों ने खड़े होकर जोरदार तालियां बजाईं। ठीक इसी अंदाज में मांगीलाल पचार के प्रशिक्षित ऊंट और घोड़ी ने भी अपने असाधारण कौशल से भारी प्रशंसा बटोरी। उपस्थित पशुपालकों का कहना है कि किसी भी जानवर को इस तरह की सधी हुई लय और अनुशासन सिखाने के लिए महीनों तक कड़ा अभ्यास कराना पड़ता है, जिसके बाद ही वे इतने बड़े जनसमूह के सामने बिना विचलित हुए प्रस्तुतियां दे पाते हैं।

## सांस्कृतिक संध्याएं और समापन समारोह की तैयारियां
दिनभर चलने वाली व्यापारिक सौदेबाजी और पशुओं की गतिविधियों के बाद शाम होते ही मेले का मिजाज पूरी तरह बदल जाता है। शाम ढलते ही पूरे मेला क्षेत्र में सांस्कृतिक मंच सज जाता है, जहां स्थानीय और प्रांतीय कलाकारों की प्रस्तुतियां शुरू होती हैं। पारंपरिक लोक संगीत की धुनें और मनमोहक लोक नृत्य देर रात तक दर्शकों को बांधे रखते हैं। यह पूरा आयोजन 5 अक्टूबर तक निरंतर चलेगा। मेले के आखिरी दिन एक भव्य समापन समारोह का आयोजन तय किया गया है। इस विदाई जलसे में मैदान पर सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले ऊंटों, घोड़ियों और उनके समर्पित पशुपालकों को मेला समिति तथा स्थानीय प्रशासन की ओर से विशेष पुरस्कार और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया जाएगा।

## इसका आप पर असर
पारंपरिक ग्रामीण मेलों के आयोजन से क्षेत्रीय पशुपालकों की आजीविका और सांस्कृतिक पर्यटन को सीधा सहारा मिलता है।

- **भारत में:** अंतरराज्यीय पशु मेलों से बेहतर नस्ल सुधार और पारंपरिक पशुपालन तकनीकों का आदान-प्रदान सुगम बनता है। इसके जरिए पंजाब, हरियाणा और यूपी जैसे राज्यों के पशुपालक नई मंडियों से सीधे जुड़ पाते हैं।
- **राजस्थान में:** सीकर जिले के ग्रामीण व्यापारियों, कारीगरों और खान-पान विक्रेताओं को 5 अक्टूबर तक चलने वाले इस आयोजन से मजबूत स्थानीय रोजगार मिलता है। इसके अतिरिक्त शेखावाटी की लोक कला और पर्यटन गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलता है।
- **पशुपालकों के लिए:** उन्नत नस्लों के मवेशी बेचने और खरीदने के लिए एक खुला मंच उपलब्ध होता है, जिससे बिचौलियों पर निर्भरता घटती है। साथ ही अपने प्रशिक्षित पशुओं के प्रदर्शन के आधार पर पशुपालकों को नकद सम्मान और पहचान हासिल होती है।
- **दर्शकों और परिवारों के लिए:** ग्रामीण परिवारों को एक ही परिसर में पारंपरिक मनोरंजन, लोक संगीत और पशु करतब देखने का निःशुल्क अवसर मिलता है। इसके प्रभाव से नई पीढ़ी को पारंपरिक लोक जीवन और पशु-मानव जुड़ाव को करीब से समझने का मौका मिलता है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह वार्षिक आयोजन शेखावाटी की सदियों पुरानी व्यापारिक परंपरा और मवेशियों की मौसमी खरीद-बिक्री की क्षेत्रीय जरूरत के कारण आयोजित किया गया है।

- **मौसमी पशु व्यापार:** ग्रामीण अंचल में फसल कटाई और मौसमी बदलाव के दौरान मवेशियों की खरीद-बिक्री की जरूरत बढ़ जाती है, जिसे पूरा करने के लिए ऐतिहासिक मेले मंच बनते हैं। इस मेले में दूर-दराज के पशुपालक अपने मवेशियों के लिए उचित खरीदार तलाशने आते हैं।
- **सांस्कृतिक मनोरंजन की परंपरा:** शेखावाटी क्षेत्र में दिन के व्यावसायिक कामकाज के बाद शाम को लोक गायन और नृत्य आयोजित करने की पुरानी सामाजिक परंपरा रही है। स्थानीय और प्रांतीय कलाकारों की प्रस्तुतियां इसी परंपरा को आगे बढ़ाती हैं।
- **पशु प्रशिक्षण का प्रोत्साहन:** पशुपालक अपने ऊंटों और घोड़ों को महीनों तक प्रशिक्षित करते हैं ताकि मेले के मंच पर उनका मूल्य और प्रतिष्ठा दोनों बढ़ सके। प्रशासन और मेला समिति द्वारा दिए जाने वाले सम्मान पशुपालकों को बेहतर लालन-पालन के लिए प्रेरित करते हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. सीकर का बेरी पशु मेला कब तक आयोजित होगा?
बेरी पशु मेला 5 अक्टूबर तक चलेगा, जिसके अंतिम दिन पुरस्कार वितरण और समापन समारोह होगा।

### 2. मेले में दर्शकों के मुख्य आकर्षण कौन से पशु रहे हैं?
मेले में 'बादल' नाम का ऊंट और 'सोनूड़ी' नाम की घोड़ी अपने सधे हुए नृत्य और करतबों के कारण आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।

### 3. बेरी पशु मेले में किन-किन राज्यों से पशुपालक पहुंचे हैं?
राजस्थान के अलावा पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी संख्या में पशुपालक अपने मवेशी लेकर पहुंचे हैं।

### 4. मेले के समापन अवसर पर क्या विशेष कार्यक्रम रखा गया है?
5 अक्टूबर को मेले के अंतिम दिन शानदार प्रदर्शन करने वाले पशुओं और उनके पालकों को प्रशासन और मेला समिति द्वारा सम्मानित किया जाएगा।

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