# राजस्थान के डीग में श्रीनाथ जी मंदिर परिक्रमा मार्ग पर बेजुबान जीवों की अनोखी सेवा, श्रद्धालु बांट रहे हैं भोजन

> डीग के प्रसिद्ध श्रीनाथ जी मंदिर में परिक्रमा मार्ग पर श्रद्धालु पशु-पक्षियों और बंदरों के लिए चने, मूंगफली व हरी सब्जियां लाकर खिलाते हैं, जिससे धार्मिक आस्था और जीव सेवा का अनूठा संगम दिखता है।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-11-03 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/rajasthan-ke-deeg-men-shrinath-ji-mndira-parikrama-marga-para-bejubana-jivon-ki-anokhi-seva-shraddhalu-banta-rahe-hain-bhojana-56028 · **Language:** Hindi
**Tags:** डीग, श्रीनाथ जी मंदिर, जीव सेवा, राजस्थान, परिक्रमा, धार्मिक परंपरा

राजस्थान के डीग जिले में भक्ति और करुणा का एक दुर्लभ रूप देखने को मिल रहा है, जहां प्रसिद्ध श्रीनाथ जी मंदिर में आने वाले श्रद्धालु अपनी धार्मिक यात्रा को केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रखते। मंदिर के चारों ओर परिक्रमा मार्ग पर कदम रखते ही आस्था का एक ऐसा स्वरूप सामने आता है जो सीधे बेजुबान जीवों की सेवा से जुड़ा है। यहां दर्शन करने पहुंचने वाले भक्त अपने साथ बंदरों, पशुओं और पक्षियों के लिए पौष्टिक खाद्य सामग्री लेकर आते हैं और पूरे रास्ते उन्हें बड़े आदर व स्नेह के साथ खिलाते हुए आगे बढ़ते हैं।

## परिक्रमा के साथ भोजन जुटाने की विशेष तैयारी
इस अनूठी परंपरा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि श्रद्धालु अपने घरों से ही पशु-पक्षियों के लिए खास इंतजाम करके निकलते हैं। परिक्रमा पथ पर चलने वाले अधिकतर लोगों के हाथों में चने, मूंगफली और ताजी हरी सब्जियों की थैलियां दिखाई देती हैं। उनका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि मंदिर परिसर और रास्ते के आसपास विचरण करने वाला कोई भी मूक जीव भूखा न रहे। श्रद्धालु इस कार्य को किसी सामान्य औपचारिकता या दिखावे के रूप में नहीं देखते, बल्कि इसे निस्वार्थ भाव से की जाने वाली सच्ची जीव सेवा और अक्षय पुण्य की प्राप्ति का साधन मानते हैं।

## जीव सेवा से जुड़ी गहरी आध्यात्मिक मान्यता
क्षेत्र की स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, धार्मिक अनुष्ठान या परिक्रमा के समय निरीह प्राणियों के लिए दाना-पानी का प्रबंध करने का फल अत्यंत कल्याणकारी होता है। लोगों में यह दृढ़ विश्वास है कि बंदरों, गायों और पक्षियों का पेट भरने से परिक्रमा का फल कई गुना बढ़ जाता है, जिससे उनकी धार्मिक यात्रा सही मायनों में पूर्ण और सफल मानी जाती है। इसी निष्ठा के कारण हर व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार हरी सब्जियां, फल, मूंगफली अथवा भुने हुए चने खरीदकर या घर से लाकर इन जीवों को अर्पित करता है।

## प्रकृति, भक्ति और मानवीय संवेदनशीलता का सुंदर संगम
यह रिवाज इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत करता है कि सनातन परंपरा में धर्म और प्रकृति संरक्षण एक-दूसरे के पूरक हैं। एक ओर जहां भक्तजन मंत्रों के जाप और प्रभु के ध्यान में लीन रहते हैं, वहीं दूसरी ओर भूखे जानवरों को भोजन कराकर पूरे समाज को दयालुता और संवेदनशीलता का मौन संदेश देते हैं। परिक्रमा मार्ग पर बंदरों और पक्षियों का नियमित भरण-पोषण अब यहां की दैनिक संस्कृति का अभिन्न अंग बन चुका है। यह सिलसिला दर्शाता है कि भारतीय संस्कृति में ईश्वर की आराधना के साथ-साथ सृष्टि के समस्त प्राणियों की रक्षा और सेवा को सर्वोपरि स्थान दिया गया है।

## इसका आप पर असर
डीग आने वाले तीर्थयात्रियों और स्थानीय निवासियों के लिए यह परंपरा भक्ति के साथ-साथ सामाजिक उत्तरदायित्व का संदेश देती है।

- **राजस्थान में:** राज्य के विभिन्न धार्मिक स्थलों पर जाने वाले श्रद्धालु इस अनुकरण से प्रेरित होकर बेजुबान जानवरों के लिए भोजन साथ ला सकते हैं। इससे तीर्थ स्थलों के आसपास भूखे भटकने वाले पशु-पक्षियों को नियमित आहार मिलने में मदद मिलती है।
- **डीग में:** स्थानीय दुकानदारों और फेरीवालों के लिए चने, मूंगफली और ताजी सब्जियों की मांग पूरे साल बनी रहती है। साथ ही शहर के मंदिर परिक्रमा क्षेत्र में जानवरों और इंसानों के बीच आक्रामकता के बजाय सौहार्दपूर्ण माहौल तैयार होता है।
- **श्रद्धालुओं के लिए:** दर्शनार्थी अपनी क्षमता के अनुसार थोड़ी सी खाद्य सामग्री साथ रखकर परिक्रमा को अधिक सार्थक बना सकते हैं। इससे पूजा-अर्चना के साथ व्यावहारिक परोपकार की भावना भी मजबूत होती है।
- **जीव संरक्षण के स्तर पर:** बंदरों और पक्षियों को मानव बस्तियों में कचरा खाने की मजबूरी से राहत मिलती है। प्राकृतिक और पौष्टिक आहार मिलने से इन मूक प्राणियों का स्वास्थ्य भी बेहतर बना रहता है।

## ऐसा क्यों हुआ
डीग के श्रीनाथ जी मंदिर में यह प्रथा स्थानीय जनमानस की गहरी धार्मिक आस्था और जीव कल्याण की पारंपरिक सोच के फलस्वरूप विकसित हुई है।

- **आध्यात्मिक धारणा:** स्थानीय लोगों में यह अटूट विश्वास है कि परिक्रमा के दौरान मूक जीवों को तृप्त करने से धार्मिक यात्रा का पुण्य कई गुना बढ़ जाता है। इसी मान्यता के चलते भक्तजन भोजन वितरण को अपनी पूजा का जरूरी हिस्सा मानते हैं।
- **प्रकृति और जीव संरक्षण का संस्कार:** भारतीय संस्कृति में पशु-पक्षियों को ईश्वर की सृष्टि मानकर उनकी सेवा करने की सदियों पुरानी परंपरा रही है। डीग का यह परिक्रमा मार्ग उसी प्राचीन चेतना का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है।
- **परंपरागत निरंतरता:** पीढ़ियों से बड़ों को ऐसा करते देखकर नई पीढ़ी भी परिक्रमा के समय चने और सब्जियां लेकर पहुंचने की आदत को सहज रूप से अपना रही है।

## सवाल-जवाब

### 1. डीग के श्रीनाथ जी मंदिर में श्रद्धालु परिक्रमा के दौरान क्या दान करते हैं?
श्रद्धालु परिक्रमा करते समय बंदरों, पशुओं और पक्षियों के लिए चने, मूंगफली और ताजी हरी सब्जियां दान करते हैं।

### 2. इस अनोखी परंपरा के पीछे क्या धार्मिक मान्यता है?
स्थानीय मान्यता के अनुसार परिक्रमा के दौरान बेजुबान जीवों की सेवा करने से परिक्रमा का पुण्य कई गुना बढ़ जाता है और धार्मिक यात्रा सफल मानी जाती है।

### 3. यह मंदिर किस राज्य और शहर में स्थित है?
यह मंदिर राजस्थान के डीग में स्थित है।

### 4. श्रद्धालु इस दान को किस भाव से करते हैं?
श्रद्धालु इसे मात्र साधारण दान नहीं, बल्कि बेजुबान जीवों की निस्वार्थ सेवा और अक्षय पुण्य कमाने का माध्यम मानते हैं।

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