{
  "type": "article",
  "title": "राजस्थान के गांवों में चुनावी सियासत बनी घरेलू मुकाबला, कई सीटों पर उतरे पति-पत्नी और रिश्तेदार",
  "summary": "राजस्थान में पंचायत चुनाव के दौरान कई जिलों में एक ही परिवार के कई सदस्य अलग-अलग सीटों से मैदान में उतरकर मतदाताओं से समर्थन मांगते दिखे।",
  "content": "राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में जारी पंचायत चुनाव इस बार केवल राजनीतिक दलों की पारंपरिक टक्कर तक सीमित नहीं रहे, बल्कि कई इलाकों में चुनावी मुकाबला सीधे पारिवारिक दायरों में प्रवेश कर गया। कई विधानसभा क्षेत्रों और देहाती इलाकों में ऐसे दृश्य सामने आए जहां एक ही घर के दो या तीन लोग अलग-अलग पदों अथवा विभिन्न वार्डों से अपनी किस्मत आजमा रहे थे। कहीं एक ही घर से पति और पत्नी ने अलग-अलग सीटों पर अपनी ताल ठोकी, तो कहीं देवरानी और जेठानी चुनावी अखाड़े में आमने-सामने या समानांतर प्रचार में व्यस्त दिखाई दीं। कुछ क्षेत्रों में मां और बेटों ने एक साथ अलग-अलग वार्डों में मोर्चा संभाला। इस पूरे घटनाक्रम में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही प्रमुख दलों ने ऐसे रसूखदार राजनीतिक परिवारों के सदस्यों को टिकट देकर मैदान में उतारा, जबकि कुछ रिश्तेदार अपनी स्वतंत्र पहचान दर्ज कराने के लिए निर्दलीय तौर पर भी चुनावी दौड़ में शामिल हुए।\n\nग्रामीण सत्ता के इस संघर्ष में पारिवारिक रिश्तों की यह सक्रियता पूरे प्रदेश में चर्चा का केंद्र बनी रही। प्रत्याशी अपने-अपने आवंटित वार्डों में जाकर वोट मांगते रहे, जहां उनके सामने केवल विपक्षी दलों के उम्मीदवारों को मात देने की चुनौती नहीं थी, बल्कि घर के दूसरे सदस्यों की सक्रियता और जनसमर्थन के बीच संतुलन साधने का दबाव भी था। झुंझुनूं, बीकानेर, नागौर, चूरू, जालोर और बाड़मेर जैसे जिलों में इस तरह की बहु-सदस्यीय उम्मीदवारी के कई रोचक मामले दर्ज किए गए। इन सभी मामलों की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि मैदान में उतरे प्रत्येक रिश्तेदार ने अपनी निजी राजनीतिक पहचान को आगे रखते हुए मतदाताओं के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए पूरा जोर लगाया।\n\nदेवरानी और जेठानी के बीच मुकाबला और समानांतर दावेदारी\nझुंझुनूं जिला परिषद के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने एक ही परिवार की दो बहुओं पर अलग-अलग वार्डों से दांव खेला। संगठन ने वार्ड 5 से जेठानी हर्षनी कुम्हारी को पार्टी प्रत्याशी घोषित किया, वहीं उसी परिवार की देवरानी अनामिका पुनिया को वार्ड 26 से भाजपा का सिंबल थमाया गया। दोनों महिला नेताओं ने अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में मतदाताओं के बीच जाकर सघन जनसंपर्क किया, जिससे यह क्षेत्र चुनावी हलकों में खासी चर्चा का विषय बन गया।\n\nबीकानेर जिले के बज्जू पंचायत समिति क्षेत्र में चुनावी मुकाबला और भी सीधा तथा रोचक मोड़ ले चुका था। यहां एक ही परिवार की दो सगी देवरानी और जेठानी विरोधी राजनीतिक विचारधाराओं के बैनर तले आमने-सामने आ गईं। बज्जू पंचायत समिति के वार्ड 1 में भाजपा ने नथू देवी चंदेल को अपना अधिकृत उम्मीदवार बनाया, जबकि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इसी सीट पर रामप्यारी चंदेल को अपना प्रत्याशी बनाकर मैदान में उतार दिया। इस तरह एक ही घर के भीतर देवरानी और जेठानी के बीच सीधी चुनावी भिड़ंत तय हो गई। इसी तरह का मुकाबला नागौर जिले की बरगांव ग्राम पंचायत में भी देखा गया, जहां सरपंच पद की कुर्सी हासिल करने के लिए राजबाला और मीरादेवी चुनावी समर में उतरीं। आपस में देवरानी और जेठानी का संबंध रखने वाली इन दोनों प्रत्याशियों के आमने-सामने आने से गांव का पंचायत चुनाव पूरी तरह घरेलू सियासत में बदल गया।\n\nचूरू में पति-पत्नी दोनों को मिला प्रमुख दलों का टिकट\nचूरू जिला परिषद के चुनावी परिदृश्य में भी राजनीतिक घरानों का अनोखा असर देखने को मिला, जहां भाजपा और कांग्रेस दोनों ने एक ही परिवार के पति और पत्नी को अलग-अलग वार्डों से टिकट वितरित किए। भारतीय जनता पार्टी ने पराक्रम राठौड़ और उनकी धर्मपत्नी कनिका सिंह दोनों को उम्मीदवार बनाकर चुनावी मुकाबले में उतारा। पराक्रम राठौड़ भाजपा के वरिष्ठ नेता राजेंद्र राठौड़ के सुपुत्र हैं।\n\nदूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी ने भी ठीक इसी तरह का कदम उठाते हुए केशरीचंद शर्मा और उनकी पत्नी अंजूबाला को अलग-अलग वार्डों से चुनावी अखाड़े में उतारा। केशरीचंद शर्मा पूर्व विधायक भंवरलाल शर्मा के सुपुत्र हैं। चूरू में दोनों ही बड़ी पार्टियों ने दिग्गज नेताओं के पुत्र और पुत्रवधू के राजनीतिक रसूख पर भरोसा जताया। पति-पत्नी की इन दोनों जोड़ियों को अपने-अपने संबंधित वार्डों में स्वतंत्र रूप से प्रचार करते हुए मतदाताओं का विश्वास जीतने की दोहरी जिम्मेदारी उठानी पड़ी।\n\nजालोर और बाड़मेर में भी दिखा परिवारों का चुनावी दबदबा\nपश्चिमी राजस्थान के जालोर जिले में कांग्रेस ने जिला परिषद और पंचायत समिति स्तर पर एक ही दंपती को टिकट देकर मैदान में उतारा। पार्टी ने प्रदीप सिंह चौहान को जिला परिषद के वार्ड 30 से प्रत्याशी बनाया, जबकि उनकी पत्नी हेमंत कंवर ने जालोर पंचायत समिति के वार्ड 13 से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में अपनी दावेदारी पेश की। दोनों ने एक साथ अपने-अपने क्षेत्रों में प्रचार अभियान का संचालन किया।\n\nसीमावर्ती बाड़मेर जिले में भी ऐसी ही स्थिति देखने को मिली। जिला परिषद के वार्ड 15 से कांग्रेस ने गफूर अहमद को अपना उम्मीदवार बनाया, वहीं उनकी पत्नी शमा बानो ने धनाऊ पंचायत समिति से चुनावी किस्मत आजमाई। इस प्रकार पति और पत्नी ने दो अलग-अलग स्तरों और क्षेत्रों की चुनावी राजनीति में एक साथ अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।\n\nश्रीमाधोपुर में एक ही घर से तीन उम्मीदवार उतरे\nसीकर जिले की श्रीमाधोपुर पंचायत समिति के तहत आने वाले वार्डों में एक ही परिवार के तीन सदस्यों के चुनाव लड़ने का अनूठा मामला सामने आया। भाजपा ने शांति देवी को वार्ड 17 से अपना उम्मीदवार घोषित किया, जबकि उनके बेटे अजय सिंह खरा को वार्ड 20 से पार्टी का टिकट दिया गया। इसी परिवार के दूसरे बेटे दुर्गा सिंह ने पार्टी से अलग हटकर वार्ड 19 से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में पर्चा दाखिल कर दिया। इस तरह मां और दो बेटों ने एक ही पंचायत समिति के तीन अलग-अलग वार्डों से चुनावी ताल ठोकी। यह परिवार राजनीतिक रूप से इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि नगरीय विकास एवं आवासन (यूडीएच) मंत्री झाबर सिंह खरा इसी परिवार से संबंध रखते हैं। क्षेत्र में मतदान की प्रक्रिया संपन्न हो चुकी है और अब सभी पक्षों को मतगणना और नतीजों की प्रतीक्षा है।\n\nग्रामीण राजनीति में परिवारों की सीधी भागीदारी\nइन तमाम उदाहरणों से स्पष्ट है कि राजस्थान के इन पंचायत चुनावों में कई सियासी परिवारों ने केवल एक सीट पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय एक से अधिक सदस्यों को विभिन्न सीटों पर उतारने की रणनीति अपनाई। कुछ उम्मीदवारों ने सत्ताधारी अथवा विपक्षी दलों के सिंबल पर चुनावी लड़ाई लड़ी, तो कुछ ने निर्दलीय रूप से अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराई। एक ही परिवार के सदस्यों के अलग-अलग वार्डों में उतरने से उनका प्रभाव क्षेत्र व्यापक स्तर पर फैल गया। अब मतदाताओं के वोटों की गिनती ही यह तय करेगी कि इन परिवारों के कितने प्रत्याशियों को सफलता हासिल होती है और किनकी दावेदारी को जनता नकारती है।\n\nइसका आप पर असर\nइस चुनावी परिदृश्य का सीधा असर स्थानीय शासन और मतदाताओं के प्रतिनिधियों के चयन पर पड़ता है।\n\n• भारत में: त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में परिवार आधारित उम्मीदवारी जमीनी राजनीति में स्थानीय प्रभाव और टिकट वितरण की प्राथमिकताओं को रेखांकित करती है। यह प्रवृत्ति राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय राजनीति में परिवारों के सांगठनिक नियंत्रण और जनसमर्थन के विस्तार का अध्ययन करने वाले विश्लेषकों के लिए अहम उदाहरण प्रस्तुत करती है।\n• राजस्थान में: ग्रामीण मतदाताओं को ऐसे प्रत्याशियों के बीच फैसला करना पड़ रहा है जो व्यक्तिगत वादों के साथ-साथ अपने पारिवारिक रसूख को आधार बनाकर वोट मांग रहे हैं। कई वार्डों में एक ही परिवार के निर्वाचित होने से संबंधित पंचायत समितियों और जिला परिषदों में निर्णय लेने की प्रक्रिया पर स्थानीय घरानों का सीधा नियंत्रण स्थापित हो सकता है।\n• स्थानीय मतदाताओं के लिए: गांवों में देवरानी-जेठानी और पति-पत्नी की उम्मीदवारी के कारण मतदाताओं को व्यक्तिगत संबंधों और पार्टी निष्ठा के बीच चुनाव करना पड़ा। इससे कई क्षेत्रों में पारंपरिक राजनीतिक ध्रुवीकरण के बजाय व्यक्तिगत और घरेलू समीकरणों ने जनमत को प्रभावित किया।\n• चुनावी प्रतिस्पर्धा पर: एक ही घर से कई सीटों पर पर्चा भरे जाने से नए और सामान्य कार्यकर्ताओं के लिए टिकट की संभावनाएं सीमित हुईं। इससे निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या में बढ़ोतरी देखी गई और कई वार्डों में त्रिकोणीय या बहुकोणीय मुकाबले बने।\n\nऐसा क्यों हुआ\nराजस्थान के विभिन्न जिलों में एक ही परिवार से कई सदस्यों के चुनावी मैदान में उतरने के पीछे स्थानीय राजनीतिक समीकरण और पारिवारिक प्रभाव को बढ़ाने की रणनीति मुख्य वजह रही है।\n\n• सीटों पर पारिवारिक पकड़ मजबूत करना: ग्रामीण स्तर पर पंचायत समिति और जिला परिषद के वार्डों में अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए प्रमुख परिवारों ने पार्टी के टिकटों पर अधिक से अधिक दावेदारी पेश की। विभिन्न वार्डों से चुनाव लड़कर ये घराने अपने राजनीतिक आधार और क्षेत्र में दखल को अधिक व्यापक बनाना चाहते थे।\n• राजनीतिक दलों की जिताऊ रणनीति: भाजपा और कांग्रेस दोनों ने ही जीत की संभावना को देखते हुए स्थानीय स्तर पर मजबूत पकड़ रखने वाले नेताओं के परिजनों को टिकट देने को प्राथमिकता दी। वरिष्ठ नेताओं और पूर्व जनप्रतिनिधियों के परिवारों की स्थानीय लोकप्रियता को पार्टियों ने जीत का सबसे सुरक्षित माध्यम माना।\n• पारिवारिक महत्वाकांक्षा और स्वतंत्र दावेदारी: कई सीटों पर आपसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते एक ही परिवार के रिश्तेदार अलग-अलग पार्टियों से या निर्दलीय मैदान में उतर गए। नागौर और बीकानेर में देवरानी-जेठानी का आमने-सामने आना और श्रीमाधोपुर में एक बेटे का निर्दलीय पर्चा दाखिल करना इसी आंतरिक खींचतान का नतीजा था।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. झुंझुनूं जिला परिषद में किन रिश्तेदारों ने चुनाव लड़ा?\nझुंझुनूं जिला परिषद में भाजपा के टिकट पर जेठानी हर्षनी कुम्हारी ने वार्ड 5 से और देवरानी अनामिका पुनिया ने वार्ड 26 से चुनाव लड़ा।\n\n2. बीकानेर के बज्जू में देवरानी और जेठानी के बीच क्या मुकाबला हुआ?\nबज्जू पंचायत समिति के वार्ड 1 में भाजपा प्रत्याशी नथू देवी चंदेल और कांग्रेस उम्मीदवार रामप्यारी चंदेल आमने-सामने चुनाव मैदान में उतरीं, जो आपस में सगी देवरानी-जेठानी हैं।\n\n3. चूरू जिला परिषद चुनाव में किन प्रमुख दंपतियों को टिकट मिला?\nचूरू में भाजपा ने पराक्रम राठौड़ और उनकी पत्नी कनिका सिंह को, जबकि कांग्रेस ने केशरीचंद शर्मा और उनकी पत्नी अंजूबाला को अलग-अलग वार्डों से टिकट दिया।\n\n4. जालोर और बाड़मेर में किन दंपतियों ने चुनाव लड़ा?\nजालोर में कांग्रेस से प्रदीप सिंह चौहान और उनकी पत्नी हेमंत कंवर ने, जबकि बाड़मेर में कांग्रेस से गफूर अहमद और उनकी पत्नी शमा बानो ने अलग-अलग सीटों पर चुनाव लड़ा।\n\n5. श्रीमाधोपुर पंचायत समिति में एक ही परिवार के कौन से तीन सदस्य मैदान में थे?\nश्रीमाधोपुर में भाजपा प्रत्याशी शांति देवी वार्ड 17 से, उनके बेटे अजय सिंह खरा वार्ड 20 से और दूसरे बेटे दुर्गा सिंह वार्ड 19 से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे।\n\n6. श्रीमाधोपुर के इस परिवार का किस मंत्री से संबंध है?\nयह परिवार राजस्थान के यूडीएच मंत्री झाबर सिंह खरा से संबंधित है।",
  "url": "https://trendkia.com/rajasthan/rajasthan-ke-ganvon-men-chunavi-siyasata-bani-gharelu-mukabala-kai-siton-para-utare-pati-patni-aura-rishtedara-54850",
  "category": "राजस्थान",
  "publishedAt": "2026-11-02",
  "tags": [
    "राजस्थान पंचायत चुनाव",
    "जिला परिषद चुनाव",
    "पंचायत समिति",
    "भाजपा",
    "कांग्रेस",
    "ग्रामीण राजनीति",
    "चुनावी रिश्तेदारी"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia",
  "whatItMeansForYou": "इस चुनावी परिदृश्य का सीधा असर स्थानीय शासन और मतदाताओं के प्रतिनिधियों के चयन पर पड़ता है।\n\n• भारत में: त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में परिवार आधारित उम्मीदवारी जमीनी राजनीति में स्थानीय प्रभाव और टिकट वितरण की प्राथमिकताओं को रेखांकित करती है। यह प्रवृत्ति राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय राजनीति में परिवारों के सांगठनिक नियंत्रण और जनसमर्थन के विस्तार का अध्ययन करने वाले विश्लेषकों के लिए अहम उदाहरण प्रस्तुत करती है।\n• राजस्थान में: ग्रामीण मतदाताओं को ऐसे प्रत्याशियों के बीच फैसला करना पड़ रहा है जो व्यक्तिगत वादों के साथ-साथ अपने पारिवारिक रसूख को आधार बनाकर वोट मांग रहे हैं। कई वार्डों में एक ही परिवार के निर्वाचित होने से संबंधित पंचायत समितियों और जिला परिषदों में निर्णय लेने की प्रक्रिया पर स्थानीय घरानों का सीधा नियंत्रण स्थापित हो सकता है।\n• स्थानीय मतदाताओं के लिए: गांवों में देवरानी-जेठानी और पति-पत्नी की उम्मीदवारी के कारण मतदाताओं को व्यक्तिगत संबंधों और पार्टी निष्ठा के बीच चुनाव करना पड़ा। इससे कई क्षेत्रों में पारंपरिक राजनीतिक ध्रुवीकरण के बजाय व्यक्तिगत और घरेलू समीकरणों ने जनमत को प्रभावित किया।\n• चुनावी प्रतिस्पर्धा पर: एक ही घर से कई सीटों पर पर्चा भरे जाने से नए और सामान्य कार्यकर्ताओं के लिए टिकट की संभावनाएं सीमित हुईं। इससे निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या में बढ़ोतरी देखी गई और कई वार्डों में त्रिकोणीय या बहुकोणीय मुकाबले बने।",
  "whyItHappened": "राजस्थान के विभिन्न जिलों में एक ही परिवार से कई सदस्यों के चुनावी मैदान में उतरने के पीछे स्थानीय राजनीतिक समीकरण और पारिवारिक प्रभाव को बढ़ाने की रणनीति मुख्य वजह रही है।\n\n• सीटों पर पारिवारिक पकड़ मजबूत करना: ग्रामीण स्तर पर पंचायत समिति और जिला परिषद के वार्डों में अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए प्रमुख परिवारों ने पार्टी के टिकटों पर अधिक से अधिक दावेदारी पेश की। विभिन्न वार्डों से चुनाव लड़कर ये घराने अपने राजनीतिक आधार और क्षेत्र में दखल को अधिक व्यापक बनाना चाहते थे।\n• राजनीतिक दलों की जिताऊ रणनीति: भाजपा और कांग्रेस दोनों ने ही जीत की संभावना को देखते हुए स्थानीय स्तर पर मजबूत पकड़ रखने वाले नेताओं के परिजनों को टिकट देने को प्राथमिकता दी। वरिष्ठ नेताओं और पूर्व जनप्रतिनिधियों के परिवारों की स्थानीय लोकप्रियता को पार्टियों ने जीत का सबसे सुरक्षित माध्यम माना।\n• पारिवारिक महत्वाकांक्षा और स्वतंत्र दावेदारी: कई सीटों पर आपसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते एक ही परिवार के रिश्तेदार अलग-अलग पार्टियों से या निर्दलीय मैदान में उतर गए। नागौर और बीकानेर में देवरानी-जेठानी का आमने-सामने आना और श्रीमाधोपुर में एक बेटे का निर्दलीय पर्चा दाखिल करना इसी आंतरिक खींचतान का नतीजा था।",
  "questionsAndAnswers": [
    {
      "question": "झुंझुनूं जिला परिषद में किन रिश्तेदारों ने चुनाव लड़ा?",
      "answer": "झुंझुनूं जिला परिषद में भाजपा के टिकट पर जेठानी हर्षनी कुम्हारी ने वार्ड 5 से और देवरानी अनामिका पुनिया ने वार्ड 26 से चुनाव लड़ा।"
    },
    {
      "question": "बीकानेर के बज्जू में देवरानी और जेठानी के बीच क्या मुकाबला हुआ?",
      "answer": "बज्जू पंचायत समिति के वार्ड 1 में भाजपा प्रत्याशी नथू देवी चंदेल और कांग्रेस उम्मीदवार रामप्यारी चंदेल आमने-सामने चुनाव मैदान में उतरीं, जो आपस में सगी देवरानी-जेठानी हैं।"
    },
    {
      "question": "चूरू जिला परिषद चुनाव में किन प्रमुख दंपतियों को टिकट मिला?",
      "answer": "चूरू में भाजपा ने पराक्रम राठौड़ और उनकी पत्नी कनिका सिंह को, जबकि कांग्रेस ने केशरीचंद शर्मा और उनकी पत्नी अंजूबाला को अलग-अलग वार्डों से टिकट दिया।"
    },
    {
      "question": "जालोर और बाड़मेर में किन दंपतियों ने चुनाव लड़ा?",
      "answer": "जालोर में कांग्रेस से प्रदीप सिंह चौहान और उनकी पत्नी हेमंत कंवर ने, जबकि बाड़मेर में कांग्रेस से गफूर अहमद और उनकी पत्नी शमा बानो ने अलग-अलग सीटों पर चुनाव लड़ा।"
    },
    {
      "question": "श्रीमाधोपुर पंचायत समिति में एक ही परिवार के कौन से तीन सदस्य मैदान में थे?",
      "answer": "श्रीमाधोपुर में भाजपा प्रत्याशी शांति देवी वार्ड 17 से, उनके बेटे अजय सिंह खरा वार्ड 20 से और दूसरे बेटे दुर्गा सिंह वार्ड 19 से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे।"
    },
    {
      "question": "श्रीमाधोपुर के इस परिवार का किस मंत्री से संबंध है?",
      "answer": "यह परिवार राजस्थान के यूडीएच मंत्री झाबर सिंह खरा से संबंधित है।"
    }
  ]
}