राजस्थान के हाथल में बना 51 फीट का कमल रूपी ब्रह्मा मंदिर, 14 शताब्दियों का समृद्ध इतिहास समेटे हुए है यह पावन धाम सिरोही जिले के हाथल गांव में स्थित भगवान ब्रह्मा का अनूठा कमल रूपी मंदिर अपने 1400 वर्ष पुराने इतिहास और वास्तुशिल्प के लिए विख्यात है। पुष्कर के बाद विशेष पहचान रखने वाले इस धाम का जीर्णोद्धार ग्रामीणों के अथक प्रयासों से संपन्न हुआ। राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित हाथल गांव अपनी अनूठी धार्मिक पहचान और ऐतिहासिक भव्यता के लिए जाना जाता है। रेवदर कस्बे से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर और अनादरा के समीप माउंट आबू की पहाड़ियों की तलहटी में स्थापित यह ब्रह्मा मंदिर वास्तुकला का एक दुर्लभ उदाहरण प्रस्तुत करता है। समूचे देश में पुष्कर के बाद भगवान ब्रह्मा जी के बेहद सीमित मंदिर हैं, जिनमें इस पवित्र स्थल को प्रमुख स्थान प्राप्त है। मंदिर का मुख्य शिखर कमल के फूल के आकार में निर्मित है, जो श्रद्धालुओं के साथ-साथ पर्यटकों को भी सहज रूप से आकर्षित करता है। चौदह सौ वर्ष पुराना गौरवशाली अतीत और ऐतिहासिक साक्ष्य इस पवित्र स्थल का इतिहास लगभग 1400 साल पुराना है। मंदिर परिसर में संरक्षित एक प्राचीन शिलालेख के अनुसार, इसके मूल स्वरूप की प्राण-प्रतिष्ठा विक्रम संवत 798, यानी करीब 741 ईस्वी में की गई थी। ऐतिहासिक अभिलेखों में इस बात का भी स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि वर्ष 1231 में यहां कई धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए गए थे और मंदिर परिसर का विस्तार कराया गया था। मध्यकालीन दौर में विदेशी आक्रांताओं के हमलों की मार इस धार्मिक स्थल को भी झेलनी पड़ी, जिससे मंदिर को काफी नुकसान पहुंचा था। बाद के कालखंड में मंदिर के ऐतिहासिक अवशेषों का गहन अध्ययन करने के लिए जर्मन पुरातत्वविदों समेत दुनिया भर के शोधकर्ताओं ने हाथल गांव का दौरा किया था। सदियों तक समुचित देखरेख न हो पाने के कारण यह प्राचीन ढांचा धीरे-धीरे खंडित अवस्था में पहुंच गया था। ग्रामीणों का संकल्प और पंद्रह वर्षों का जीर्णोद्धार अभियान धरोहर के अस्तित्व को बचाने के लिए स्थानीय स्तर पर एक अनुकरणीय प्रयास शुरू हुआ। स्थानीय भक्त पूरण सिंह के अनुसार, हाथल गांव और आसपास के ग्रामीण अंचलों के युवाओं ने इस प्राचीन विरासत को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया। इसके तहत श्री ब्रह्माजी मंदिर जीर्णोद्धार समिति की स्थापना की गई। जनसहयोग और जनभागीदारी की ताकत से 27 नवंबर 1995 को मंदिर के पुनर्निर्माण की आधारशिला रखी गई। ग्रामीणों, कारीगरों और समिति के निरंतर 15 वर्षों के कड़े परिश्रम के उपरांत 20 मई 2010 को इस मंदिर का नया भव्य स्वरूप पूरी तरह तैयार हुआ और इसे विधिवत दर्शनार्थियों के लिए खोल दिया गया। कमल जैसी 51 फीट ऊंची संरचना और पंचदेव की स्थापना वर्तमान मंदिर की सबसे आकर्षक विशेषता इसकी 51 फीट ऊंची कमल के फूल जैसी बनावट है। इस समूची संरचना का निर्माण पारंपरिक वास्तुशास्त्र के सिद्धांतों के अनुरूप किया गया है। मुख्य गर्भगृह में जगतपिता ब्रह्मा जी की भव्य प्रतिमा विराजमान है, जबकि परिसर के छोटे उप-मंदिरों में भगवान विष्णु, भगवान शिव, माता गायत्री और सूर्य देव की पावन मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं। इस व्यवस्था के कारण यहां आने वाले भक्तजन एक ही प्रांगण में त्रिदेव और पंचदेव की आराधना कर सकते हैं। मंदिर प्रांगण में हरियाली से परिपूर्ण एक आकर्षक बगीचा विकसित किया गया है। इसके अलावा, बाहर से आने वाले तीर्थयात्रियों के ठहरने के लिए सर्वसुविधायुक्त धर्मशाला का प्रबंध भी मौजूद है। मंदिर में दैनिक पूजा-अर्चना और नियमित हवन के साथ-साथ ध्यान शिविर और विभिन्न जनकल्याणकारी सामाजिक गतिविधियां भी आयोजित की जाती हैं। इसका आप पर असर यह प्राचीन धरोहर पश्चिमी राजस्थान में सांस्कृतिक चेतना और क्षेत्रीय धार्मिक पर्यटन को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। • भारत में: देश भर के धार्मिक पर्यटकों और वास्तुकला प्रेमियों के लिए पुष्कर के अतिरिक्त भगवान ब्रह्मा के दुर्लभ मंदिर दर्शन का यह एक उत्कृष्ट केंद्र है। तीर्थयात्री माउंट आबू यात्रा के साथ हाथल गांव को अपने यात्रा कार्यक्रम में सहजता से शामिल कर सकते हैं। • सिरोही में: सिरोही और रेवदर क्षेत्र में श्रद्धालुओं के आगमन से स्थानीय परिवहन, आतिथ्य और ग्रामीण रोजगार को नया संबल मिलता है। गांव में मौजूद धर्मशाला और शांत परिवेश के चलते बाहरी श्रद्धालुओं को ठहरने और ध्यान साधना के लिए बेहतर सुविधाएं प्राप्त हो रही हैं। • सांस्कृतिक जागरूकता: प्राचीन शिलालेखों और 741 ईस्वी की ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण से नई पीढ़ी को स्थानीय इतिहास और वास्तुकला को प्रत्यक्ष समझने का अवसर मिलता है। इतिहास के शोधार्थी और हेरिटेज प्रेमी यहां के प्राचीन साक्ष्यों का अध्ययन कर सकते हैं। • सामुदायिक सहभागिता: जनसहयोग से 15 साल तक चले जीर्णोद्धार का यह मॉडल अन्य जीर्ण-शीर्ण धरोहरों को बचाने के लिए ग्रामीणों और युवाओं को संगठित होने की ठोस प्रेरणा देता है। स्थानीय समितियां अपनी क्षेत्रीय विरासतों के संरक्षण के लिए इस पद्धति को अपना सकती हैं। ऐसा क्यों हुआ हाथल के ब्रह्मा मंदिर का वर्तमान स्वरूप सदियों के संघर्ष, ऐतिहासिक हमलों, विदेशी शोध और अंततः ग्रामीणों के संगठित जनसहयोग की परिणति है। • प्राचीन स्थापना और विस्तार: विक्रम संवत 798 (741 ईस्वी) में मंदिर का मूल निर्माण हुआ था और वर्ष 1231 में इसका विस्तार किया गया, जिससे यह क्षेत्र का एक प्रमुख आराधना केंद्र बन गया था। यह ऐतिहासिक निरंतरता दर्शाती है कि मध्यकाल में भी यह स्थल अत्यधिक पूजनीय था। • विदेशी हमले और उपेक्षा: सदियों पूर्व विदेशी आक्रांताओं के हमलों में इस पावन स्थल को भारी नुकसान पहुंचाया गया था। कालांतर में नियमित रखरखाव और संरक्षण के अभाव में मंदिर धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील होता चला गया। • पुरातत्वविदों की रुचि: मंदिर के ऐतिहासिक अवशेषों के महत्व को देखते हुए जर्मन और अंतरराष्ट्रीय पुरातत्वविदों ने हाथल का दौरा किया था। इन दौरों ने इसके पुरातात्विक महत्व को रेखांकित किया लेकिन पुनर्निर्माण का काम तब भी शुरू नहीं हो सका था। • ग्रामीणों की एकजुटता: धरोहर को विलुप्त होने से बचाने के लिए हाथल और समीपवर्ती गांवों के युवाओं ने श्री ब्रह्माजी मंदिर जीर्णोद्धार समिति बनाई। इसके बाद 27 नवंबर 1995 से 20 मई 2010 तक चले 15 वर्षों के जनसहयोग से मंदिर का वर्तमान भव्य कमल रूपी स्वरूप तैयार हुआ। सवाल-जवाब 1. हाथल का ब्रह्मा मंदिर राजस्थान के किस जिले में स्थित है? यह मंदिर सिरोही जिले में रेवदर कस्बे से करीब 15 किलोमीटर दूर, अनादरा के पास माउंट आबू की पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है। 2. इस मंदिर का इतिहास कितना पुराना है और शिलालेख में क्या दर्ज है? मंदिर का इतिहास करीब 1400 साल पुराना है, जिसके शिलालेख के अनुसार इसकी मूल प्रतिष्ठा विक्रम संवत 798 (741 ईस्वी) में हुई थी। 3. मंदिर की ऊंचाई और इसकी बनावट की मुख्य खासियत क्या है? यह मंदिर 51 फीट ऊंचा है और इसका निर्माण वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार कमल के फूल के सुंदर आकार में किया गया है। 4. मुख्य गर्भगृह के अलावा परिसर में किन अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित हैं? भगवान ब्रह्मा के साथ परिसर में भगवान विष्णु, भगवान शिव, माता गायत्री और सूर्य देव की प्रतिमाएं स्थापित हैं, जहां त्रिदेव और पंचदेव के दर्शन होते हैं। 5. मंदिर का पुनर्निर्माण कब शुरू हुआ और इसे दोबारा कब खोला गया? ग्रामीणों के जनसहयोग से इसका पुनर्निर्माण 27 नवंबर 1995 को शुरू हुआ था और 15 साल की मेहनत के बाद 20 मई 2010 को इसे श्रद्धालुओं के लिए खोला गया। 6. दूर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर परिसर में क्या सुविधाएं हैं? श्रद्धालुओं के लिए मंदिर परिसर में ठहरने हेतु धर्मशाला, एक सुंदर बगीचा और ध्यान शिविर व धार्मिक अनुष्ठानों की सुविधाएं उपलब्ध हैं। https://trendkia.com/rajasthan/rajasthan-ke-hathal-men-bana-51-phita-ka-kamala-rupi-brahma-mndira-14-shatabdiyon-ka-samriddha-itihasa-samete-hue-hai-yaha-pavana--56543 TrendKia — Har trend, sabse pehle.