# राजस्थान के जालोर में मौजूद हैं बजरंगबली के अद्भुत धाम, कहीं पाताल से प्रकटी प्रतिमा तो कहीं आज भी खुला है आसमान

> राजस्थान का जालोर जिला हनुमान जी के कई अनोखे और चमत्कारी मंदिरों का केंद्र है, जहां सदियों पुरानी आस्था, बिना छत के विग्रह और द्रविड़ शैली की वास्तुकला भक्तों को आकर्षित करती है।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-09-20 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/rajasthan-ke-jalore-men-maujuda-hain-bajrangbali-ke-adbhuta-dhama-kahin-patala-se-prakati-pratima-to-kahin-aja-bhi-khula-hai-asama-35250 · **Language:** Hindi
**Tags:** जालोर, हनुमान मंदिर, राजस्थान पर्यटन, पातालेश्वर हनुमान, आलासन मंदिर, द्रविड़ शैली, धार्मिक स्थल

राजस्थान के जालोर जिले में बजरंगबली के कई ऐसे पवित्र धाम मौजूद हैं, जिनकी धार्मिक मान्यताएं और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि श्रद्धालुओं को हैरान कर देती हैं। सैकड़ों साल पुराने इन तीर्थस्थलों में किसी की ख्याति जमीन से अपने आप प्रकट हुई प्रतिमा के कारण है, तो किसी धाम पर आज भी छत का निर्माण नहीं किया गया है। अलग-अलग स्वरूपों में पूजे जाने वाले इन मंदिरों में नियमित रूप से श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है और लोग अपनी मनोकामनाएं लेकर यहां पहुंचते हैं।

## आलासन गांव का 300 साल पुराना मंदिर और 35 फीट ऊंची प्रतिमा
जालोर के आलासन गांव में स्थित हनुमान मंदिर लगभग 300 साल पुरानी अटूट धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। स्थानीय मान्यता के मुताबिक, एक बार जब यह पूरा क्षेत्र भीषण अकाल के संकट से जूझ रहा था, उसी दौरान जाल के पेड़ के नीचे जमीन से अचानक हनुमान जी की मूर्ति प्रकट हुई थी। इस चमत्कारिक घटना के बाद गांव के लोगों ने एकजुट होकर वहां एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया। वर्तमान समय में मंदिर परिसर के भीतर स्थापित 35 फीट ऊंची हनुमान जी की विशाल प्रतिमा यहां का मुख्य आकर्षण है। दूर-दराज के इलाकों से आने वाले भक्तों का विश्वास है कि जो भी श्रद्धालु यहां सच्चे मन से मन्नत मांगता है, उसकी हर मनोकामना निश्चित तौर पर पूरी होती है।

## कानीवाड़ा का पातालेश्वर मंदिर, जहां 800 साल से नहीं बनी छत
जालोर शहर से तकरीबन 10 किलोमीटर की दूरी पर कानीवाड़ा गांव में पातालेश्वर हनुमान जी का ऐतिहासिक मंदिर स्थित है। इस तीर्थ की मान्यता है कि यहां स्थापित प्रतिमा इंसानों द्वारा नहीं रखी गई, बल्कि स्वयं पाताल यानी धरती के भीतर से प्रकट हुई थी। मंदिर के पुजारी के अनुसार, जमीन से स्वयं प्रकट होने के कारण ही इन्हें पातालेश्वर हनुमान जी का नाम दिया गया और यह परंपरा कई पीढ़ियों से लगातार चली आ रही है। इस मंदिर का इतिहास लगभग 800 साल पुराना माना जाता है, मगर सबसे अनूठी बात यह है कि आज तक प्रतिमा के ऊपर किसी तरह की छत नहीं बनाई गई है। हर मंगलवार और शनिवार के दिन यहां विशेष श्रृंगार किया जाता है, जिसमें शामिल होने के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु पैदल चलकर दर्शन करने पहुंचते हैं।

## सायला में द्रविड़ वास्तुकला और दक्षिण भारतीय शैली का संगम
जालोर से लगभग 35 किलोमीटर दूर सायला कस्बे के मुख्य मार्ग पर बना हनुमान मंदिर अपनी भव्य और आकर्षक बनावट के लिए जाना जाता है। इस मंदिर की अनूठी सुंदरता हर राहगीर को अपनी ओर आकर्षित करती है। मंदिर का पूरा निर्माण तमिलनाडु से आए कुशल कारीगरों ने पारंपरिक द्रविड़ शैली में किया है। राजस्थान की धरती पर दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला और नक्काशी की यह झलक इस मंदिर को क्षेत्र के बाकी सभी धार्मिक स्थलों से बिल्कुल अलग और दर्शनीय बनाती है।

## जागृत स्वरूप में बालाजी और सिरोही सीमा पर महाभारत कालीन जुड़ाव
जालोर क्षेत्र में बालाजी का एक अन्य पवित्र धाम भी जनमानस के बीच गहरी आस्था का विषय है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि यहां बालाजी महाराज पूर्णतः जागृत स्वरूप में विराजमान हैं, जहां भक्त अपनी पीड़ा और प्रार्थनाएं लेकर आते हैं। यहां बालाजी को किसी पारंपरिक बंधन के बजाय स्वतंत्र और चैतन्य रूप में पूजे जाने का अनोखा विधान है।

इसके अलावा, जालोर से लगभग 45 किलोमीटर दूर स्थित एक अन्य मंदिर अपनी भौगोलिक स्थिति और पौराणिक मान्यताओं के लिए जाना जाता है। इस मंदिर का एक मुख्य प्रवेश द्वार जालोर जिले की सीमा में खुलता है, जबकि दूसरा द्वार सिरोही जिले की तरफ बना हुआ है। लोकमान्यता के अनुसार, महाभारत काल के दौरान अपने अज्ञातवास के समय पांडवों ने यहां कुछ समय रुककर विश्राम किया था। इस मार्ग से गुजरने वाली निजी गाड़ियां और राज्य परिवहन की रोडवेज बसें भी मंदिर के सम्मान में कुछ पलों के लिए रुकती हैं और यात्री शीश नवाकर आगे बढ़ते हैं।

## इसका आप पर असर
जालोर के इन ऐतिहासिक मंदिरों की अनूठी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत श्रद्धालुओं, शोधकर्ताओं और पर्यटकों के लिए विशेष महत्व रखती है।

- **राजस्थान में:** राज्य की समृद्ध स्थापत्य विरासत और लोक आस्था को समझने के लिए ये स्थल सांस्कृतिक पर्यटन का बड़ा माध्यम हैं। श्रद्धालु यहां मंगलवार और शनिवार को विशेष पूजा के लिए समय निकालकर अपनी यात्रा की योजना बना सकते हैं।
- **जालोर में:** स्थानीय ग्रामीणों और व्यापारियों के लिए यह तीर्थस्थल धार्मिक पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करता है। क्षेत्र के मुख्य मार्गों से गुजरने वाले यात्री और बसें इन पावन स्थलों पर आसानी से दर्शन कर सकते हैं।
- **तीर्थयात्रियों के लिए:** कानीवाड़ा के पातालेश्वर मंदिर में पैदल यात्रा करने वालों के लिए विशेष व्यवस्थाएं और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। श्रद्धालु अकाल निवारण और मनोकामना पूर्ति के विश्वास के साथ इन प्राचीन मंदिरों में शीश नवाते हैं।
- **वास्तुकला प्रेमियों के लिए:** सायला का मंदिर उत्तर भारत में रहकर भी दक्षिण भारतीय द्रविड़ कला को करीब से देखने का दुर्लभ अवसर प्रदान करता है। कला और संस्कृति में रुचि रखने वाले लोग यहां तमिलनाडु के कारीगरों की भव्य नक्काशी का अध्ययन कर सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
जालोर के इन मंदिरों का विकास सदियों पुरानी प्राकृतिक आपदाओं, लोक मान्यताओं और विभिन्न राज्यों के सांस्कृतिक आदान-प्रदान के कारण संभव हुआ।

- **प्राकृतिक अकाल और प्रतिमा प्रकटीकरण:** आलासन गांव में अकाल के कठिन समय में जाल के पेड़ के नीचे से मूर्ति निकलने की घटना ने ग्रामीणों को एकजुट होकर पूजा स्थल स्थापित करने के लिए प्रेरित किया। इसी विश्वास ने समय के साथ इसे 300 साल पुराने एक विशाल मंदिर में बदल दिया।
- **पाताल से उत्पत्ति की भूवैज्ञानिक मान्यता:** कानीवाड़ा में प्रतिमा को मानव निर्मित स्थापना के बजाय स्वयंभू माना गया, जिससे इसे पातालेश्वर का नाम दिया गया। आठ सौ साल से छत न डालने की प्रथा को स्थानीय पुजारियों और श्रद्धालुओं ने ईश्वरीय स्वरूप के सम्मान में आज तक अटूट बनाए रखा है।
- **सांस्कृतिक व शिल्पगत समन्वय:** सायला के मंदिर को विशिष्ट रूप देने के लिए तमिलनाडु के कारीगरों को आमंत्रित किया गया। उत्तर भारत में द्रविड़ शैली का चयन इस मंदिर को आसपास के पारंपरिक स्थापत्य से अलग और दर्शनीय बनाने के उद्देश्य से किया गया था।
- **पौराणिक और अंतर-जिला जुड़ाव:** महाभारत काल में पांडवों के विश्राम करने की मान्यता और जालोर तथा सिरोही की सीमा पर दो अलग-अलग द्वारों का होना इस बात को दर्शाता है कि यह स्थल प्राचीन समय से एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा है।

## सवाल-जवाब

### 1. जालोर के आलासन गांव का हनुमान मंदिर कितना पुराना है?
आलासन गांव का यह हनुमान मंदिर करीब 300 साल पुरानी आस्था से जुड़ा हुआ है।

### 2. आलासन मंदिर में स्थापित हनुमान जी की प्रतिमा की ऊंचाई कितनी है?
इस मंदिर परिसर में 35 फीट ऊंची हनुमान जी की भव्य प्रतिमा स्थापित है।

### 3. कानीवाड़ा के पातालेश्वर हनुमान मंदिर की क्या विशेषता है?
यह मंदिर करीब 800 साल पुराना है और यहां हनुमान जी की मूर्ति बिना छत के खुले आसमान के नीचे विराजमान है।

### 4. सायला कस्बे का हनुमान मंदिर किस स्थापत्य शैली में बनाया गया है?
सायला का हनुमान मंदिर तमिलनाडु के कारीगरों द्वारा पारंपरिक द्रविड़ शैली में तैयार किया गया है।

### 5. जालोर से 45 किलोमीटर दूर स्थित मंदिर का संबंध किस पौराणिक काल से है?
मान्यता है कि महाभारत काल के दौरान पांडवों ने इस स्थान पर रुककर कुछ समय विश्राम किया था।

### 6. सीमा पर स्थित मंदिर के द्वार किन-किन जिलों की ओर खुलते हैं?
इस मंदिर का एक प्रवेश द्वार जालोर जिले की तरफ और दूसरा द्वार सिरोही जिले की तरफ खुलता है।

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