# राजस्थान के कैथून में हथकरघे पर जादू बिखेर रहीं महिला बुनकर, बिना डिग्री के तैयार करती हैं तीन लाख रुपये तक की कोटा डोरिया साड़ी

> कोटा से 15 किलोमीटर दूर कैथून की महिलाएं बिना किसी औपचारिक फैशन डिग्री के विश्व प्रसिद्ध कोटा डोरिया साड़ियां तैयार कर रही हैं, जिनकी बाजार कीमत 1,000 रुपये से लेकर 3 लाख रुपये तक पहुंचती है।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-11-03 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/rajasthan-ke-kaithun-men-hathakaraghe-para-jadu-bikhera-rahin-mahila-bunakara-bina-digri-ke-taiyara-karati-hain-tina-lakha-rupaye--55907 · **Language:** Hindi
**Tags:** कोटा डोरिया, कैथून बुनकर, हथकरघा, पारंपरिक साड़ी, राजस्थान हथकरघा, महिला कारीगर

फैशन की दुनिया में आधुनिक परिधान तैयार करने के लिए प्रायः प्रतिष्ठित डिजाइनिंग संस्थानों की महंगी पढ़ाई और जटिल कंप्यूटर सॉफ्टवेयर का सहारा लिया जाता है। इसके विपरीत, राजस्थान के कोटा शहर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कैथून कस्बे की ग्रामीण महिलाएं बिना किसी औपचारिक डिग्री या संस्थानिक प्रशिक्षण के ऐसी साड़ियां तैयार कर रही हैं, जिनकी चमक देश की सीमाओं को पार कर विदेशों तक पहुंच रही है। यह हुनर किसी आधुनिक क्लासरूम की देन नहीं, बल्कि हथकरघे पर पीढ़ियों से चली आ रही साधना और अनूठे अनुभव का परिणाम है।

## हुनर की मिसाल: बिना स्कूल गए बनीं कुशल शिल्पकार
कैथून की इन कारीगर महिलाओं की दास्तान जितनी प्रेरणादायक है, उनकी जीवनचर्या उतनी ही कठोर परिश्रम से भरी है। इनमें से कई महिलाओं ने कभी औपचारिक विद्यालय का रुख नहीं किया, तो कुछ ने केवल पांचवीं कक्षा तक ही पढ़ाई की है। इसके बावजूद धागों के सटीक संयोजन, रंगों के मेल और बुनाई की सूक्ष्म बनावट पर उनकी पकड़ किसी भी पेशेवर डिजाइनर से कमतर नहीं बैठती।

इस कस्बे में तायरा बानो, अजिजन, नसीम और शबाना जैसी कई महिलाएं अपने हाथों से कोटा डोरिया का ताना-बाना बुन रही हैं। 60 वर्ष की तायरा बानो ने कभी स्कूल में कदम नहीं रखा, किंतु हथकरघे के साथ उनका जुड़ाव बीते 45 वर्षों से अनवरत जारी है। रंगों और जटिल डिजाइनों की उनकी समझ इसी साढ़े चार दशक के व्यावहारिक अभ्यास से निखरी है। इसी प्रकार अजिजन भी कभी स्कूल नहीं गईं, पर पिछले 25 वर्षों से लगातार बुनाई कर रही हैं; उनके लिए उनका हथकरघा ही पाठशाला रहा है और धागे ही उनकी पुस्तकें बनी हैं।

वहीं 40 वर्षीय नसीम केवल पांचवीं कक्षा तक पढ़ी हैं और पिछले 15 वर्षों से साड़ियों की डिजाइनिंग तथा बुनाई के काम में समर्पित हैं। शबाना भी पांचवीं कक्षा तक ही शिक्षा ग्रहण कर सकीं, किंतु उन्हें इस पारंपरिक शिल्प में 25 वर्षों का लंबा अनुभव प्राप्त है। इन महिलाओं ने किसी फैंसी डिजाइनिंग कोर्स के बिना, प्रतिदिन करघे पर बैठकर और अभ्यास के जरिए यह असाधारण कला सीखी है।

## महीने भर की कड़ी मेहनत और आमदनी का अंतर
कैथून की इन महिला बुनकरों की दिनचर्या बेहद कठिन और थकाऊ होती है। बुनकरों को हर दिन लगभग 12 घंटे लगातार हथकरघे पर बैठकर एकाग्रचित्त होकर काम करना पड़ता है, जबकि पूरे सप्ताह में केवल एक दिन ही आराम के लिए मिलता है। एक साधारण साड़ी को पूर्ण रूप से तैयार करने में औसतन 30 दिनों का समय लग जाता है।

इतने लंबे समय और निरंतर श्रम के उपरांत बुनकर महिला को एक साड़ी के बदले लगभग 10 हजार रुपये का पारिश्रमिक मिलता है। यदि पूरे महीने की इस मेहनत का दैनिक विश्लेषण किया जाए, तो उनकी रोज की आय करीब 380 रुपये बैठती है, जो प्रति घंटे के हिसाब से लगभग 32 रुपये की मजदूरी के बराबर है। दूसरी ओर, बाजार में इन उत्कृष्ट कोटा डोरिया साड़ियों की कीमत 1,000 रुपये से प्रारंभ होकर विशिष्ट डिजाइनों में 3 लाख रुपये तक पहुंच जाती है। साड़ी की यह अंतिम कीमत उसके डिजाइन, उपयोग किए गए धागों की गुणवत्ता और उस पर किए गए बारीक शिल्प कार्य के आधार पर तय की जाती है।

## मैसूर से राजस्थान तक का ऐतिहासिक सफर
कैथून में कोटा डोरिया बुनाई का इतिहास अत्यंत समृद्ध है और यह परंपरा 100 वर्ष से भी अधिक पुरानी मानी जाती है। ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, मैसूर से आए कुछ परिवारों ने कैथून में आकर इस विशेष बुनाई कला की नींव रखी थी। कालांतर में इस शिल्प को कोटा के राजपरिवार का खुला संरक्षण प्राप्त हुआ, जिसके चलते इसे पूरे क्षेत्र में व्यापक प्रतिष्ठा और पहचान मिली।

समय के साथ यह शिल्प कैथून की मूल पहचान बन गया और पीढ़ियों के माध्यम से एक परिवार से दूसरे परिवार तक हस्तांतरित होता चला गया। कोटा डोरिया साड़ियों की सबसे प्रमुख विशेषता उनका हल्का वजन और सूक्ष्म चौखानेदार बुनावट है, जिसे पारंपरिक रूप से 'खट' कहा जाता है। इसे बनाने में शुद्ध कपास और प्राकृतिक रेशम के धागों का उपयोग किया जाता है। बिजली से चलने वाले आधुनिक पावरलूम के बजाय कारीगर पारंपरिक लकड़ी के हथकरघों पर अपने हाथों से प्रत्येक धागा पिरोते हैं, जिसके कारण इस प्रक्रिया में भारी श्रम और धैर्य की आवश्यकता होती है।

## चावल और प्याज के लेप से तैयार होते हैं धागे
कोटा डोरिया साड़ी की बुनाई सीधे हथकरघे पर शुरू नहीं की जा सकती; इसके पीछे एक लंबी और पारंपरिक तैयारी जुड़ी होती है। सबसे पहले कच्चे धागों को छांटकर तैयार किया जाता है और उसके बाद उन्हें तान पर चढ़ाया जाता है। धागों को आवश्यक मजबूती प्रदान करने तथा बुनाई के दौरान उनके टूटने के जोखिम को समाप्त करने के लिए चावल और प्याज से तैयार किए गए विशेष पारंपरिक लेप का प्रयोग किया जाता है।

जब धागे पूरी तरह मजबूत हो जाते हैं, तब निर्धारित रंग और डिजाइन के अनुसार उन्हें हथकरघे पर व्यवस्थित रूप से लगाया जाता है। इसके पश्चात सबसे जटिल चरण प्रारंभ होता है, जिसमें बुनकर एक-एक धागे को आपस में जोड़कर चौखानेदार संरचना तैयार करती हैं। साड़ी की श्रेणी और उसमें प्रयुक्त सामग्री के अनुसार उसके निर्माण में लगने वाला समय भी अलग-अलग होता है

- सामान्य कोटा डोरिया साड़ी को पूर्ण रूप से तैयार करने में करीब 15 से 20 दिन का समय लगता है।
- विशिष्ट पैटर्न वाली डिजाइनर साड़ी को तैयार करने में 20 से 25 दिन लग जाते हैं।
- सोने और चांदी के महीन तारों से सजने वाली पारंपरिक जरिया साड़ी के निर्माण में लगभग तीन महीने का लंबा वक्त लगता है।
- जरिया साड़ी के निर्माण में तीन से चार बुनकर महिलाएं एक साथ मिलकर कार्य करती हैं, जिसमें परिवार के अन्य सदस्य भी हाथ बंटाते हैं।

## हजारों परिवारों के जीवनयापन का मजबूत आधार
कैथून और उसके आसपास के ग्रामीण अंचल में कोटा डोरिया का काम केवल एक धरोहर कला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हजारों लोगों की आजीविका की जीवनरेखा बना हुआ है। कैथून तथा नजदीकी 12 गांवों में वर्तमान में लगभग 3,000 हथकरघे संचालित हो रहे हैं, जिनसे सीधे तौर पर करीब 6,000 लोग जुड़े हुए हैं।

इस पूरे क्षेत्र में प्रतिदिन लगभग 400 से 500 साड़ियां बुनकर तैयार की जाती हैं। अनेक परिवारों का संपूर्ण भरण-पोषण पूरी तरह इसी बुनाई कार्य से होने वाली आय पर आश्रित है। इन ग्रामीण घरों में महिलाएं घरेलू जिम्मेदारियों को संभालने के साथ-साथ हथकरघे पर बैठकर परिवार की आर्थिक स्थिति को संबल प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

## स्थानीय बाजारों से लेकर विदेशों तक भारी मांग
कोटा डोरिया साड़ियों की लोकप्रियता केवल राजस्थान अथवा देश के बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। देश के विभिन्न कोनों के अतिरिक्त विदेशों में बसे प्रवासी भारतीय भी अपने रिश्तेदारों और परिचितों के माध्यम से कैथून से सीधे साड़ियां मंगवाते हैं।

इसकी कीमतें गुणवत्ता और कारीगरी के अनुसार भिन्न-भिन्न स्तरों पर उपलब्ध हैं। सामान्य साड़ियां लगभग 1,000 रुपये के बजट में आसानी से मिल जाती हैं, जबकि असली सोने-चांदी के तारों और उच्च गुणवत्ता वाले रेशम से तैयार की गई दुर्लभ जरिया साड़ियों का मूल्य 3 लाख रुपये तक पहुंच जाता है। अपने अनूठे हल्केपन और पारंपरिक आकर्षण के कारण यह परिधान आज भी वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बनाए हुए है।

## इसका आप पर असर
यह समाचार दर्शाता है कि हथकरघा उद्योग में बिचौलियों और बाजार की ऊंची कीमतों के बीच वास्तविक कारीगरों को मिलने वाला पारिश्रमिक कितना कम रहता है।

- **भारत में:** यदि आप प्रामाणिक कोटा डोरिया साड़ी खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो सीधे बुनकर सहकारी समितियों या स्थानीय कारीगरों से संपर्क करने पर आपको वाजिब दाम में असली उत्पाद मिल सकता है। इससे बिचौलियों का भारी मुनाफा कम होकर आपकी खरीदारी का बड़ा हिस्सा सीधे मेहनत करने वाली ग्रामीण महिलाओं तक पहुंचेगा।
- **राजस्थान में:** कोटा और कैथून क्षेत्र के हथकरघा उद्योग पर निर्भर परिवारों के लिए यह आवश्यक है कि कारीगरों को उनकी 12 घंटे की दैनिक मेहनत का उचित मूल्य मिले। सरकारी योजनाओं, प्रत्यक्ष बाजार पहुंच और ई-कॉमर्स पहलों से स्थानीय महिला कारीगरों की 380 रुपये की दैनिक कमाई में सम्मानजनक सुधार संभव हो सकता है।
- **हथकरघा प्रेमियों के लिए:** सामान्य कोटा डोरिया 1,000 रुपये से शुरू होती है जबकि सोने-चांदी के तारों वाली जरिया साड़ियों की कीमत 3 लाख रुपये तक जाती है। खरीदार प्रामाणिक चौखानेदार बुनावट (खट) और प्राकृतिक धागों की जांच करके ही अपनी पसंद की मूल हथकरघा साड़ी चुनें।
- **महिला सशक्तिकरण के लिहाज से:** कैथून की महिलाओं ने साबित किया है कि औपचारिक डिग्री के बिना भी दीर्घकालिक अभ्यास से अंतरराष्ट्रीय स्तर का हुनर विकसित किया जा सकता है। यह उदाहरण अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक शिल्पों को पुनर्जीवित करने और स्वरोजगार स्थापित करने के लिए व्यावहारिक प्रेरणा देता है।

## ऐसा क्यों हुआ
कैथून में कोटा डोरिया बुनाई का यह व्यापक स्वरूप सदियों पुरानी ऐतिहासिक विरासत, अनुकूल सामाजिक परिवेश और पीढ़ियों से चले आ रहे पारिवारिक संरक्षण का परिणाम है।

- **ऐतिहासिक संरक्षण:** सौ से अधिक वर्ष पूर्व मैसूर से आए बुनकर परिवारों ने कैथून में इस शिल्प की शुरुआत की थी। बाद में कोटा के तत्कालीन राजपरिवार ने इस कला को विशेष संरक्षण दिया, जिसके कारण यह शिल्प इस भौगोलिक क्षेत्र की प्रमुख पहचान बन गया।
- **पारंपरिक तकनीकी ज्ञान:** धागों को मजबूत करने के लिए चावल और प्याज के लेप जैसी देसी तकनीकों और हाथों से चौखानेदार 'खट' बुनाई के अभ्यास को पीढ़ियों ने सहेज कर रखा है। परिवारों में बिना औपचारिक संस्थानों के करघे पर ही हुनर सिखाने की व्यवस्था ने इस परंपरा को आज भी जीवंत बनाए रखा है।
- **पारिश्रमिक में विषमता का कारण:** बाजार में एक साड़ी का मूल्य 3 लाख रुपये तक होने के बावजूद बुनकर को केवल 10 हजार रुपये मिलने का मुख्य कारण आपूर्ति श्रृंखला में बिचौलियों का वर्चस्व और तैयार कपड़ों के विपणन का भारी अंतर है। बुनकर केवल कच्चा श्रम उपलब्ध कराते हैं, जबकि अंतिम ब्रांडिंग और खुदरा मुनाफा व्यापारी वर्ग के पास जाता है।

## सवाल-जवाब

### 1. कैथून कहां स्थित है और यह किस काम के लिए प्रसिद्ध है?
कैथून राजस्थान के कोटा शहर से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित है और यह विश्व प्रसिद्ध कोटा डोरिया साड़ियों की पारंपरिक हथकरघा बुनाई के लिए जाना जाता है।

### 2. बाजार में कोटा डोरिया साड़ियों की कीमत कितनी होती है?
बाजार में साधारण कोटा डोरिया साड़ी की कीमत 1,000 रुपये से शुरू होती है, जबकि सोने-चांदी के तारों वाली विशेष जरिया साड़ियां 3 लाख रुपये तक बिकती हैं।

### 3. एक साड़ी तैयार करने में बुनकर को कितना समय लगता है और उन्हें क्या मिलता है?
एक साड़ी को पूरा तैयार करने में करीब 30 दिन का समय लगता है और इसके बदले में महिला बुनकर को लगभग 10 हजार रुपये का पारिश्रमिक मिलता है।

### 4. बुनकर महिलाओं की दैनिक और प्रति घंटे की अनुमानित कमाई क्या है?
30 दिन की मेहनत पर मिलने वाले 10 हजार रुपये के हिसाब से बुनकर की दैनिक कमाई करीब 380 रुपये और प्रति घंटे की कमाई लगभग 32 रुपये बैठती है।

### 5. कोटा डोरिया बुनाई की ऐतिहासिक शुरुआत कैसे हुई थी?
यह कला 100 साल से भी अधिक पुरानी है, जिसकी शुरुआत मैसूर से आए परिवारों ने की थी और बाद में कोटा राजपरिवार के संरक्षण से इसे विशेष पहचान मिली।

### 6. बुनाई से पहले धागों को मजबूत करने के लिए किस पारंपरिक सामग्री का उपयोग होता है?
धागों को मजबूती देने और बुनाई में आसानी के लिए कारीगर चावल और प्याज से बने पारंपरिक लेप का उपयोग करते हैं।

### 7. जरिया साड़ी को बनाने में कितना समय और कितने कारीगर लगते हैं?
सोने-चांदी के तारों वाली जरिया साड़ी को तैयार करने में लगभग तीन महीने लगते हैं और इस पर तीन से चार बुनकर मिलकर काम करते हैं।

### 8. कैथून और आसपास के कितने लोग इस हथकरघा व्यवसाय से जुड़े हैं?
कैथून और आसपास के 12 गांवों में लगभग 3,000 हथकरघे चलते हैं, जिनसे करीब 6,000 लोग अपनी आजीविका के लिए जुड़े हुए हैं।

## प्रेरणा और सबक
कैथून की महिला बुनकरों की जीवन गाथा यह सिद्ध करती है कि लगन, दीर्घकालिक अभ्यास और पारंपरिक ज्ञान औपचारिक डिग्रियों से कहीं अधिक मूल्यवान हो सकते हैं।

- **अभ्यास ही सर्वोत्तम शिक्षक:** तायरा बानो और अजिजन जैसी महिलाओं ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा, फिर भी 45 और 25 वर्षों के निरंतर अभ्यास से वे विश्वस्तरीय डिजाइनिंग में निपुण बनीं। समर्पण और निरंतर कार्य से किसी भी कौशल में सर्वोच्च महारत हासिल की जा सकती है।
- **पारंपरिक संसाधनों का रचनात्मक उपयोग:** धागों को टूटने से बचाने और मजबूत करने के लिए चावल तथा प्याज के घरेलू लेप का उपयोग यह सिखाता है कि महंगे रासायनिक विकल्पों के बिना भी सरल देशी विधियों से गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सकती है।
- **परिवार और आजीविका का संतुलन:** कैथून की महिलाएं घर-परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने के साथ-साथ प्रतिदिन 12 घंटे करघे पर काम करके परिवार की आय में मजबूत योगदान देती हैं। यह आत्मनिर्भरता और उद्यमशीलता का उत्कृष्ट उदाहरण है।
- **विरासत पर गर्व:** आधुनिक मशीनी होड़ के बीच पीढ़ियों पुरानी हाथ की बुनाई को जीवित रखकर इन कारीगरों ने दर्शाया है कि मौलिकता और सांस्कृतिक धरोहर की कद्र दुनिया भर में हमेशा बनी रहती है।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._