# राजस्थान के पाली में बंद टेक्सटाइल मिलों ने बढ़ाई मुसीबत, अहमदाबाद के खतरनाक सफर पर जाने को मजबूर कारोबारी

> मारवाड़ के प्रसिद्ध कपड़ा केंद्र पाली में फैक्ट्रियों पर लटके तालों की वजह से स्थानीय कारोबार ठप हो गया है, जिसके चलते व्यापारियों को सैकड़ों किलोमीटर दूर गुजरात का रुख करना पड़ रहा है।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-11-02 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/rajasthan-ke-pali-men-bnda-teksataila-milon-ne-barhai-musibata-ahmedabad-ke-khataranaka-saphara-para-jane-ko-majabura-karobari-54701 · **Language:** Hindi
**Tags:** पाली टेक्सटाइल उद्योग, पॉपलीन सिटी संकट, पाली कपड़ा फैक्ट्री, अहमदाबाद हाईवे हादसा, राजस्थान औद्योगिक संकट, मारवाड़ अर्थव्यवस्था

राजस्थान का प्रमुख औद्योगिक शहर पाली कभी समूचे मारवाड़ क्षेत्र में आजीविका, संपन्नता और सुनहरे भविष्य का बड़ा प्रतीक माना जाता था। उस दौर में यहां के कपड़ा कारखानों की बदौलत हजारों कामगारों और व्यापारियों का जीवन संवर रहा था, मगर मौजूदा वक्त में यही इलाका मंदी, रोजी-रोटी के संकट और व्यापक स्तर पर होने वाले पलायन के भंवर में फंस चुका है। शहर भर में कपड़ा प्रोसेस करने वाली सैकड़ों इकाइयों के दरवाजे पूरी तरह बंद हो चुके हैं। इस गंभीर ठहराव का सबसे त्रासद पहलू यह है कि फैक्ट्रियों के बंद होने की यह भारी कीमत अब निर्दोष जिंदगियों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है। स्थानीय स्तर पर रंगाई, छपाई और प्रोसेसिंग की व्यवस्थाएं ध्वस्त होने की वजह से यहां के व्यापारियों और कर्मचारियों को अपने माल का काम करवाने के लिए मजबूरी में दूसरे राज्यों के शहरों का चक्कर काटना पड़ रहा है।

इसी औद्योगिक विवशता के बीच हाल ही में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जिसने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। पाली से तैयार कपड़ा प्रोसेस करवाने के लिए रात के वक्त कार से गुजरात के अहमदाबाद जा रहे मामा और भांजे का वाहन रास्ते में एक खड़े ट्रेलर से टकरा गया। इस भीषण सड़क दुर्घटना में दोनों व्यक्तियों की मौके पर ही जान चली गई। स्थानीय नागरिकों, कारोबारियों और श्रमिक संगठनों का स्पष्ट कहना है कि इस घटना को केवल एक सामान्य सड़क हादसा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह वास्तव में पाली के ठप पड़े कल-कारखानों, लड़खड़ाती औद्योगिक नीतियों और स्थानीय लाचारी का ही एक भयावह नतीजा है, जिसने दो हंसते-खेलते परिवारों का सहारा हमेशा के लिए छीन लिया।

## ‘पॉपलीन सिटी’ के गौरव से अचानक खामोशी के अंधेरे में फिसला शहर
एक जमाना था जब देश के औद्योगिक नक्शे पर पाली को ‘पॉपलीन सिटी’ के सम्मानजनक नाम से जाना और पहचाना जाता था। शहर में आधुनिक कपड़ा उद्योग की नींव 1970 और 1980 के दशक में बेहद छोटे स्तर पर डाली गई थी। इसके बाद स्थानीय उद्यमियों के अथक परिश्रम, हुनर और लगन के बल पर यह इलाका बेहद कम समय में देश के भीतर पॉपलीन और कॉटन फैब्रिक का सबसे बड़ा व विश्वसनीय केंद्र बनकर उभरा। यहां के कारखानों में होने वाली कॉटन प्रोसेसिंग, पॉपलीन की उम्दा रंगाई और आकर्षक छपाई की धाक पूरे भारत के बाजारों में जमी हुई थी।

पाली का यह विशाल औद्योगिक तंत्र केवल राजस्थान तक सीमित नहीं था, बल्कि यह बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और मध्य प्रदेश जैसे दूरदराज के राज्यों से रोजगार की तलाश में पहुंचे लाखों प्रवासी मजदूरों को भी नियमित आजीविका प्रदान करता था। शहर की हर मुख्य सड़क और औद्योगिक गलियारे पर दिन-रात तैयार माल और कच्चे धागे ढोने वाले भारी वाहनों की चहल-पहल बनी रहती थी। यही व्यापारिक गतिविधियां लंबे समय तक समूचे मारवाड़ की आर्थिक रीढ़ की हड्डी मानी जाती रही हैं। लेकिन आज इसी ऐतिहासिक पहचान पर ग्रहण लग चुका है, फैक्ट्रियों की चिमनियां बुझ चुकी हैं और चारों तरफ केवल सन्नाटा पसरा हुआ है।

## सख्त नियमों, प्लांट की तकनीकी दिक्कतों और पानी के संकट ने तोड़ी कमर
पाली के पुराने और वरिष्ठ कारोबारियों का कहना है कि उन्होंने अपने पूरे जीवनकाल और शहर के इतिहास में ऐसा अभूतपूर्व संकट कभी नहीं देखा। जानकारों के अनुसार इस तबाही के पीछे कई बड़े संरचनात्मक कारण मौजूद हैं। सबसे पहले एनजीटी के कड़े पर्यावरणीय नियमों ने इकाइयों के संचालन को बेहद मुश्किल बना दिया। इसके साथ ही कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट में लगातार आ रही गंभीर तकनीकी खामियों ने औद्योगिक कचरे के निपटान को असंभव बना दिया। इसके अलावा इलाके में पानी की भारी किल्लत ने जल-निर्भर टेक्सटाइल प्रोसेसिंग की प्रक्रिया को पूरी तरह रोक दिया।

इन बहुस्तरीय चुनौतियों के कारण पाली का समूचा टेक्सटाइल इंफ्रास्ट्रक्चर ताश के पत्तों की तरह ढह गया। जब स्थानीय स्तर पर कपड़े की धुलाई, ब्लीचिंग, रंगाई और फिनिशिंग का पूरा काम बंद हो गया, तो छोटे और बड़े उद्यमियों के सामने कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा। अपने ग्राहकों के ऑर्डर पूरे करने और पूंजी को डूबने से बचाने के लिए वे तैयार कच्चा माल लेकर सैकड़ों किलोमीटर दूर अहमदाबाद की ओर भागने को मजबूर हो गए। यही कारण है कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को हर दिन करोड़ों रुपये का सीधा नुकसान झेलना पड़ रहा है।

## रात के अंधेरे में हाईवे का सफर और बना रहता है अनहोनी का डर
पाली की इकाइयों के बंद होने का असर अब केवल बही-खातों और बैंक खातों के नुकसान तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह सीधे तौर पर आम नागरिकों की सांसों पर भारी पड़ रहा है। कपड़ा व्यापारियों को दिनभर के काम के बाद अक्सर रात के सन्नाटे में निजी गाड़ियों या टैक्सियों से अहमदाबाद की दूरी तय करनी पड़ती है, ताकि अगले दिन वहां की फैक्ट्रियों में काम शुरू करवाया जा सके। ऐसे ही एक सफर में जान गंवाने वाले मामा-भांजे का उदाहरण देकर शहरवासी यह सवाल उठा रहे हैं कि अगर अपने ही शहर में प्रोसेसिंग यूनिट्स सुचारू रूप से चल रही होतीं, तो किसी को भी अपनी जान जोखिम में डालकर देर रात हाईवे पर दौड़ने की नौबत नहीं आती।

इस दर्दनाक हादसे के बाद से पाली के कपड़ा कारोबारियों, ट्रांसपोर्टरों और वाहन चालकों के घरों में मातम और अनजाना डर फैल गया है। परिवारों के सामने आज एक अत्यंत जटिल संकट खड़ा हो चुका है। एक तरफ अगर वे बाहर नहीं जाते हैं, तो फैक्ट्रियां बंद रहने से भुखमरी, व्यापारिक कर्ज और पूरी तरह बर्बाद होने की आशंका सामने खड़ी है। वहीं दूसरी तरफ, अगर वे माल प्रोसेस कराने के लिए हाईवे का रुख करते हैं, तो दिन-रात दौड़ती तेज रफ्तार गाड़ियों, भारी ट्रकों और अचानक होने वाले जानलेवा हादसों का साया उनका पीछा नहीं छोड़ता। परिवार के लोग अपने सदस्यों को दूर भेजने से डर रहे हैं, मगर पेट पालने और व्यापार को जिंदा रखने की मजबूरी उन्हें इसी जानलेवा रास्ते पर आगे धकेल रही है।

## मशीनों के साथ बुझ रहे हैं हजारों परिवारों के चूल्हे और भविष्य के सपने
जब किसी औद्योगिक शहर में कारखाने बंद होते हैं, तो केवल लोहे की मशीनें या बिजली के पहिए ही नहीं रुकते, बल्कि उनके साथ जुड़े हजारों परिवारों के सपने, बच्चों की बेहतर शिक्षा, रोजमर्रा का घरेलू राशन और जीवन की खुशियां भी एक झटके में बिखर जाती हैं। पाली का मौजूदा औद्योगिक गतिरोध अब केवल सरकारी दफ्तरों या उद्योगपतियों की व्यापारिक बैठकों तक सीमित मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बहुत बड़ी मानवीय त्रासदी का रूप ले चुका है।

हजारों कुशल कारीगर आज पाई-पाई के मोहताज होकर घर बैठने पर मजबूर हैं या फिर मामूली मजदूरी के लिए अन्य राज्यों में पलायन कर रहे हैं। अगर सरकार और स्थानीय प्रशासन ने समय रहते इस संकट की गहराई को नहीं समझा और बंद पड़ी औद्योगिक इकाइयों को पुनर्जीवित करने के लिए तकनीकी, पर्यावरणीय व वित्तीय मोर्चे पर ठोस कदम नहीं उठाए, तो पलायन, बढ़ती बेरोजगारी और हाईवे पर होने वाली सड़क दुर्घटनाओं का यह सिलसिला न जाने कितने और निर्दोष परिवारों के चिराग बुझा देगा।

## इसका आप पर असर
पाली में कपड़ा इकाइयों के बंद होने और बाहरी शहरों पर निर्भरता बढ़ने से स्थानीय रोजगार और व्यापारिक सुरक्षा पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

- **राजस्थान भर में:** राज्य के टेक्सटाइल हब का काम रुकने से आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो रही है और सरकार के औद्योगिक राजस्व में गिरावट दर्ज की जा रही है। इससे कपड़ा व्यापार से जुड़े अन्य जिलों के थोक बाजारों में भी माल की डिलीवरी में देरी और लागत में वृद्धि देखी जा रही है।
- **पाली जिले में:** स्थानीय स्तर पर काम ठप होने से हजारों स्थानीय व प्रवासी कारीगरों की दैनिक मजदूरी बंद हो गई है और परिवारों के सामने भरण-पोषण की चुनौती है। व्यापारियों को कपड़े की फिनिशिंग के लिए मजबूरी में जान जोखिम में डालकर गुजरात जाना पड़ रहा है जिससे उनकी परिवहन लागत और व्यक्तिगत जोखिम अत्यधिक बढ़ गया है।
- **प्रवासी कामगारों पर असर:** उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश से आए लाखों कुशल व अकुशल श्रमिकों के सामने काम का अभाव हो गया है। इसके चलते बड़ी संख्या में कामगार अपने गृह राज्यों में लौटने या अन्य औद्योगिक नगरों में पलायन करने को बाध्य हो रहे हैं।
- **परिवहन और यात्रा जोखिम:** व्यापारियों और ड्राइवरों को रात के समय सैकड़ों किलोमीटर दूर माल लेकर यात्रा करनी पड़ रही है। हाईवे पर लगातार बढ़ रहे सड़क हादसों ने कारोबारियों के परिवारों में भारी मानसिक भय और तनाव पैदा कर दिया है।

## ऐसा क्यों हुआ
पर्यावरणीय नियमों के अनुपालन, बुनियादी संयंत्रों की विफलता और पानी की विकट कमी के एक साथ उभरने से यह औद्योगिक गतिरोध पैदा हुआ है।

- **पर्यावरणीय नियम और कानूनी रोक:** नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी द्वारा प्रदूषण नियंत्रण को लेकर बनाए गए कड़े दिशा-निर्देशों के चलते कई अनियंत्रित इकाइयों पर संचालन संबंधी पाबंदियां लगाई गईं। प्रदूषण मानकों को पूरा न कर पाने के कारण प्रशासन को कई कारखानों में तालाबंदी करनी पड़ी।
- **ट्रीटमेंट प्लांट की तकनीकी विफलता:** औद्योगिक अपशिष्ट के शुद्धिकरण के लिए स्थापित कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट में लगातार तकनीकी खराबियां आती रहीं। शोधन संयंत्र के सही ढंग से काम न करने की वजह से दूषित पानी के निस्तारण की समस्या खड़ी हो गई और पूरी प्रोसेसिंग चेन रुक गई।
- **पानी की भीषण किल्लत:** टेक्सटाइल और पॉपलीन की रंगाई व धुलाई के लिए भारी मात्रा में जल की आवश्यकता होती है, जिसकी कमी क्षेत्र में लगातार बढ़ रही है। पर्याप्त औद्योगिक जल आपूर्ति न होने के कारण इकाइयों को अपना दैनिक संचालन जारी रखना असंभव हो गया।
- **स्थानीय सुविधाओं का अभाव:** शहर में स्थानीय स्तर पर कपड़ा प्रोसेस करने की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं बची, जिससे उत्पादन चक्र टूट गया। परिणाम स्वरूप स्थानीय उद्यमियों को अपनी आजीविका बचाने के लिए गुजरात के अहमदाबाद का रुख करने को विवश होना पड़ा।

## सवाल-जवाब

### 1. पाली को किस औद्योगिक नाम से जाना जाता था?
पाली को देश भर में ‘पॉपलीन सिटी’ के नाम से जाना जाता था, जो कॉटन प्रोसेसिंग, पॉपलीन डाईंग और रंगाई-छपाई का प्रमुख केंद्र था।

### 2. पाली में कपड़ा उद्योग की शुरुआत कब हुई थी?
पाली में आधुनिक स्तर पर कपड़ा उद्योग की शुरुआत 1970 और 1980 के दशक में छोटे स्तर से हुई थी।

### 3. कारखाने बंद होने के मुख्य कारण क्या हैं?
एनजीटी के सख्त नियम, कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट की तकनीकी खराबी और पानी की भारी किल्लत इसके मुख्य कारण हैं।

### 4. स्थानीय व्यापारियों को अहमदाबाद क्यों जाना पड़ रहा है?
पाली में कपड़े की रंगाई, छपाई और प्रोसेसिंग इकाइयां बंद होने की वजह से व्यापारियों को अपने कपड़े प्रोसेस करवाने अहमदाबाद जाना पड़ रहा है।

### 5. हाल ही में हाईवे पर क्या हादसा हुआ था?
पाली से कपड़ा प्रोसेस करवाने रात में अहमदाबाद जा रहे मामा-भांजे की कार खड़े ट्रेलर में घुसने से दोनों की मौके पर मौत हो गई।

### 6. इस संकट से किन राज्यों के कामगार प्रभावित हुए हैं?
इस बंदी से राजस्थान के स्थानीय कामगारों के साथ बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और मध्य प्रदेश के प्रवासी मजदूर गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं।

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