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  "type": "article",
  "title": "राजस्थान के शिक्षक बजरंग लाल जेठू ने 32 साल में संवारे 50 तालाब, किताबों की पुरस्कार राशि भी जल संरक्षण में लगाई",
  "summary": "सीकर निवासी सेवानिवृत्त शिक्षक बजरंग लाल जेठू ने तीन दशकों से अधिक समय में 50 पारंपरिक तालाबों का जीर्णोद्धार किया और 350 जल संचयन ढांचे तैयार किए।",
  "content": "पानी की एक-एक बूंद को सहेजने का संकल्प लेकर निकले राजस्थान के एक शिक्षक ने पर्यावरण संरक्षण की अनूठी मिसाल कायम की है। सीकर जिले की फतेहपुर तहसील स्थित जेठवा का बास गांव के निवासी बजरंग लाल जेठू ने अपने जीवन के 32 साल पारंपरिक जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने में समर्पित कर दिए हैं। एक सरकारी शिक्षक के तौर पर करियर शुरू करने वाले बजरंग लाल ने नौकरी के दौरान जो अभियान शुरू किया था, वह रिटायरमेंट के बाद भी निरंतर चल रहा है। अपनी निजी कमाई, किताबों से मिले सम्मान की राशि और जनसहयोग के बल पर उन्होंने सीकर, नागौर और चूरू जिलों में करीब 50 पुराने और उपेक्षित तालाबों की साफ-सफाई करवाकर उनका कायाकल्प किया है।\n\n1993 की चुनावी ड्यूटी ने बदल दी सोच की दिशा\nजल संरक्षण के इस सफर की शुरुआत साल 1993 में हुई, जब बजरंग लाल की ड्यूटी नागौर जिले में प्रशासनिक कार्यों के तहत लगी थी। जसवंतगढ़ इलाके में चुनावी जिम्मेदारी निभाते हुए उन्होंने देखा कि देखरेख के अभाव में कई पुराने तालाब सूख चुके थे और अपना वजूद खो रहे थे। उसी दौरान उन्हें चुनाव के सिलसिले में मुंडवा गांव जाना पड़ा। वहां उनकी नजर एक ऐसे तालाब पर पड़ी, जिसकी समुचित देखरेख की वजह से उसका पानी आसपास के सभी ग्रामीणों के रोजमर्रा के कामों में बहुत मददगार साबित हो रहा था। मुंडवा के तालाब की स्थिति देखकर उनके मन में यह विचार घर कर गया कि अगर पारंपरिक जलाशयों की गाद निकाली जाए, उनकी मरम्मत की जाए और उन्हें साफ रखा जाए, तो बरसात का कीमती पानी लंबे समय तक सुरक्षित रहेगा। इससे ग्रामीण इलाकों में गंभीर पेयजल संकट से आसानी से निपटा जा सकता है।\n\nसाहित्यिक पुरस्कारों से मिली धनराशि को तालाबों पर लगाया\nइस अनुभव के बाद बजरंग लाल ने अपने कर्तव्य और खाली वक्त को जलस्रोतों के संरक्षण के नाम करने का पक्का इरादा कर लिया। धीरे-धीरे उन्होंने स्थानीय निवासियों को इस मिशन से जोड़ा और जहां भी धन की कमी आई, वहां अपनी जेब से खर्च करने में कोई हिचक नहीं दिखाई। वे एक सक्रिय लेखक और साहित्यकार भी हैं, जिनकी अब तक लगभग 10 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इन किताबों के लिए उन्हें जो भी मानदेय और नकद पुरस्कार मिले, उन्होंने उसे अपने निजी उपयोग में लेने के बजाय तालाबों के जीर्णोद्धार में झोंक दिया। स्थानीय ग्रामीणों और समाज के लोगों के आर्थिक सहयोग को जोड़कर उन्होंने दर्जनों ऐतिहासिक और पारंपरिक तालाबों की मरम्मत करवाई।\n\nशेखावाटी और मारवाड़ में 350 जल संरचनाएं और वाटर हार्वेस्टिंग\nशेखावाटी और मारवाड़ के शुष्क अंचलों में बजरंग लाल जेठू का यह कार्य 50 से अधिक तालाबों के पुनरुद्धार तक ही सीमित नहीं रहा। उन्होंने भूजल स्तर सुधारने के लिए करीब 350 जल संचयन संरचनाओं का निर्माण करवाया। इसके साथ ही 50 से ज्यादा स्थानों पर आधुनिक वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम स्थापित करवाए ताकि बारिश का पानी सीधे जमीन के भीतर जा सके। उनका मानना है कि जल संरक्षण केवल शासन या प्रशासन का दायित्व नहीं है, बल्कि इसमें हर नागरिक की सक्रिय भागीदारी जरूरी है। समाज में चेतना जगाने के लिए उन्होंने छात्र-छात्राओं के बीच करीब 60 आलेख प्रतियोगिताएं कराईं। लोगों को प्रेरित करने के मकसद से उन्होंने छह लघु फिल्में भी तैयार कीं और उन्हें यूट्यूब पर प्रसारित किया ताकि युवा पीढ़ी इस अभियान से जुड़ सके।\n\nराष्ट्रीय जल पुरस्कार और राज्य स्तरीय सम्मान से नवाजे गए\nजल संरक्षण में दशकों के निस्वार्थ और जमीनी योगदान के लिए केंद्र सरकार ने उन्हें साल 2025 में ‘राष्ट्रीय जल पुरस्कार’ प्रदान किया। इससे पहले उन्हें राज्य स्तर पर श्रेष्ठ शिक्षक पुरस्कार के अलावा पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कई प्रतिष्ठित मंचों पर सम्मानित किया जा चुका है। सम्मान मिलने के बाद भी उनका यह जमीनी काम थमा नहीं है। बजरंग लाल का कहना है कि जब तक पुराने तालाब सुरक्षित रहेंगे, तभी तक बरसात का पानी बचेगा, और पानी सुरक्षित रहने पर ही भावी पीढ़ियों का कल सुरक्षित हो सकेगा।\n\nइसका आप पर असर\nयह पहल दर्शाती है कि सामुदायिक प्रयास और पारंपरिक जलस्रोतों का संरक्षण ग्रामीण क्षेत्रों में पानी के संकट को हमेशा के लिए दूर कर सकता है।\n\n• भारत में: देश भर के नागरिकों और स्थानीय निकायों के लिए यह सीख है कि केवल नए निर्माण पर निर्भर रहने के बजाय पुराने पारंपरिक तालाबों का जीर्णोद्धार अधिक टिकाऊ समाधान है। मानसून से पहले ऐसे जलाशयों की गाद निकालने से भूजल पुनर्भरण तेजी से बढ़ता है।\n• राजस्थान में: सीकर, नागौर और चूरू जैसे कम वर्षा वाले जिलों में 50 तालाबों और 350 जल संरचनाओं के पुनर्जीवित होने से कई गांवों को पेयजल और खेती के लिए सहारा मिला है। स्थानीय ग्रामीण अपने क्षेत्रों में इसी मॉडल को अपनाकर वर्षा जल संचयन प्रणाली स्थापित कर सकते हैं।\n• छात्रों और युवाओं पर: स्कूलों में निबंध प्रतियोगिताओं और लघु फिल्मों के माध्यम से युवाओं में जल संरक्षण के प्रति चेतना बढ़ी है। युवा पीढ़ी यूट्यूब और जमीनी अभियानों के जरिए पारंपरिक जलस्रोतों की देखभाल में सक्रिय भागीदार बन सकती है।\n• साहित्यकारों और समाजसेवियों के लिए: पुरस्कार राशि को जनहित के कार्यों में लगाने का यह कदम सामाजिक जिम्मेदारी की मिसाल पेश करता है। लेखक और प्रबुद्ध नागरिक अपनी बौद्धिक उपलब्धियों को जमीनी पर्यावरण सुधार से जोड़ सकते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nराजस्थान के शुष्क इलाकों में पानी की कमी और पुराने तालाबों की उपेक्षा ने इस तीन दशक लंबे संरक्षण अभियान को जन्म दिया।\n\n• मुख्य कारण: नागौर जिले के जसवंतगढ़ में 1993 की चुनावी ड्यूटी के दौरान बजरंग लाल जेठू ने देखा कि सूखे और गाद से भरे तालाब अपना वजूद खो रहे थे, जबकि मुंडवा का एक चालू तालाब पूरे गांव को जीवन दे रहा था। इसी विरोधाभास ने उन्हें पारंपरिक जलस्रोतों को बचाने की प्रेरणा दी।\n• अनदेखी की पृष्ठभूमि: आधुनिक नल-जल व्यवस्था और कंक्रीट निर्माण पर बढ़ती निर्भरता के कारण गांवों के पुराने पारंपरिक तालाबों की नियमित सफाई और मरम्मत बंद हो गई थी। उचित रखरखाव के अभाव में बारिश का पानी सहेजने की क्षमता खत्म हो रही थी।\n• आर्थिक समाधान: सरकारी बजट के इंतजार के बिना उन्होंने अपनी जेब, प्रकाशित 10 पुस्तकों से प्राप्त पुरस्कार राशि और ग्रामीणों के चंदे से तालाबों की खुदाई और जीर्णोद्धार का काम अपने हाथ में लिया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. बजरंग लाल जेठू कौन हैं?\nवे राजस्थान के सीकर जिले में फतेहपुर तहसील के जेठवा का बास गांव के निवासी और सेवानिवृत्त सरकारी शिक्षक हैं, जिन्होंने 32 वर्षों से जल संरक्षण का कार्य किया है।\n\n2. उन्हें तालाबों के संरक्षण की प्रेरणा कब और कैसे मिली?\nसाल 1993 में नागौर जिले में चुनाव ड्यूटी के दौरान मुंडवा गांव के एक उपयोगी तालाब को देखकर उन्हें पारंपरिक जलस्रोतों को सहेजने की प्रेरणा मिली।\n\n3. उन्होंने अब तक कितने तालाबों और जल संरचनाओं पर काम किया है?\nउन्होंने सीकर, नागौर और चूरू में करीब 50 तालाबों का जीर्णोद्धार किया है और लगभग 350 जल संचयन संरचनाएं व 50 से अधिक वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम तैयार करवाए हैं।\n\n4. उन्होंने तालाबों के जीर्णोद्धार के लिए धन की व्यवस्था कैसे की?\nउन्होंने अपनी निजी बचत, अपनी 10 प्रकाशित पुस्तकों से मिली पुरस्कार राशि और स्थानीय ग्रामीणों से जुटाए गए जनसहयोग से यह खर्च उठाया।\n\n5. जागरूकता फैलाने के लिए उन्होंने क्या कदम उठाए?\nउन्होंने स्कूली विद्यार्थियों के लिए 60 आलेख प्रतियोगिताएं आयोजित कीं और यूट्यूब पर छह लघु फिल्में तैयार करके प्रसारित कीं।\n\n6. उन्हें कौन सा राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है?\nजल संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए केंद्र सरकार ने उन्हें वर्ष 2025 में ‘राष्ट्रीय जल पुरस्कार’ से सम्मानित किया।\n\nप्रेरणा और सबक\nएक साधारण शिक्षक ने साबित किया कि व्यक्तिगत निष्ठा और सामाजिक भागीदारी से पर्यावरण के क्षेत्र में ऐतिहासिक बदलाव लाया जा सकता है।\n\n• समस्या को देखने के बजाय हल बनें: जब उन्होंने सूखे तालाब देखे, तो दूसरों को दोष देने के बजाय खुद फावड़ा उठाकर जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया।\n• संसाधनों का निस्वार्थ उपयोग: अपनी 10 पुस्तकों से मिले पुरस्कार और मानदेय को निजी आराम के बजाय तालाबों के सुधार में लगाना सच्ची सेवा भावना को दर्शाता है।\n• सार्थक साझेदारी: उन्होंने जल संरक्षण को केवल सरकारी काम नहीं माना, बल्कि ग्रामीणों, स्कूली छात्रों और युवाओं को जोड़कर इसे एक जनआंदोलन का रूप दिया।\n• निरंतरता की ताकत: 32 वर्षों तक बिना थके काम करते हुए उन्होंने दिखाया कि बड़े बदलाव रातों-रात नहीं आते, बल्कि दशकों के धैर्यपूर्ण प्रयास से संभव होते हैं।",
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  "category": "राजस्थान",
  "publishedAt": "2026-10-07",
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