राजस्थान के सीकर और सलूंबर में प्राकृतिक खेती का नया पायलट प्रोजेक्ट शुरू, नाबार्ड लगाएगा 1.20 करोड़ रुपये रासायनिक खादों के इस्तेमाल से मिट्टी की गिरती सेहत और बढ़ती लागत को रोकने के लिए नाबार्ड ने राजस्थान के सीकर और सलूंबर में प्राकृतिक खेती का नया पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है। इस 1.20 करोड़ रुपये की योजना में किसानों को मुफ्त जैविक घोल, देसी बीजों का बैंक और 120 दिनों का प्रत्यक्ष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के लगातार इस्तेमाल के कारण खेतों की मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है, जबकि फसलों के उत्पादन की लागत में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए राजस्थान में खेती का एक नया मॉडल तैयार किया गया है। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) ने राज्य के सीकर और सलूंबर जिलों को एक विशेष पायलट प्रोजेक्ट के तहत चुना है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य किसानों को कम लागत में पर्यावरण के अनुकूल और लंबे समय तक टिकाऊ रहने वाले प्राकृतिक खेती के विकल्प उपलब्ध कराना है। रसायन मुक्त खेती को बढ़ावा देकर मिट्टी की सेहत सुधारने और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में यह एक बड़ी पहल मानी जा रही है। सीकर के लक्ष्मणगढ़ से हुई प्रोजेक्ट की शुरुआत नाबार्ड के इस पायलट प्रोजेक्ट के तहत सीकर जिले में कुल 200 हेक्टेयर कृषि भूमि को चरणबद्ध तरीके से पूर्णतः प्राकृतिक खेती में बदला जाएगा। योजना के पहले चरण के लिए लक्ष्मणगढ़ क्षेत्र के 30 किसानों का चयन किया गया है। इन सभी चयनित किसानों की एक-एक हेक्टेयर भूमि पर प्राकृतिक तरीकों से फसलों की बुवाई करवाई जा रही है। इस शुरुआती चरण को लागू करने के लिए लगभग 30 लाख रुपये की राशि खर्च की जा रही है, जबकि इस पूरे प्रोजेक्ट का कुल बजट 1.20 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया है। हाल ही में संपन्न हुए खरीफ सीजन के दौरान इन चयनित किसानों ने अपने खेतों में बाजरा, ग्वार और मूंग जैसी प्रमुख फसलों की बुवाई पूरी तरह से प्राकृतिक पद्धति का पालन करते हुए की है। रसायन मुक्त कृषि तकनीकों को अपनाकर किसान कम खर्च में बेहतर उपज प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर से मिलेंगे मुफ्त जैविक घोल प्राकृतिक खेती के इस मॉडल को जमीनी स्तर पर सफल बनाने के लिए नाबार्ड द्वारा एक बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर स्थापित किया जा रहा है। इस केंद्र में देसी गाय के गोबर और गोमूत्र का उपयोग करके विभिन्न जैविक घोल तैयार किए जाएंगे। इनमें मुख्य रूप से जीवामृत, बीजामृत, प्राकृतिक खाद और नीमास्त्र शामिल हैं। ये सभी बायो-इनपुट चयनित किसानों को बिना किसी शुल्क के उपलब्ध कराए जाएंगे। इस व्यवस्था से किसानों को बाजार से मिलने वाले महंगे रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशक खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे उनकी खेती पर होने वाला दैनिक और मौसमी खर्च काफी हद तक कम हो जाएगा, जिससे किसानों की शुद्ध आय में इजाफा होगा। पारंपरिक किस्मों को सहेजने के लिए 5 लाख का बीज बैंक इस प्रोजेक्ट का एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण उद्देश्य हमारी पारंपरिक और पुरानी बीज किस्मों का संरक्षण करना है। इस कार्य के लिए लगभग पांच लाख रुपये की लागत से एक समर्पित बीज बैंक स्थापित किया जा रहा है। इस बैंक में देसी किस्मों के बीजों का संग्रहण, रखरखाव और संवर्धन किया जाएगा, जिन्हें बाद में प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को वितरित किया जाएगा। पारंपरिक देसी किस्मों की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि वे कम पानी में भी बेहतर फसल देती हैं और उनमें बीमारियों तथा कीटों से लड़ने की प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता होती है। इस पहल के माध्यम से इन लुप्तप्राय किस्मों को दोबारा किसानों के खेतों तक पहुंचाया जाएगा। महाराष्ट्र के विशेषज्ञों द्वारा 120 दिनों का प्रत्यक्ष प्रशिक्षण नाबार्ड के जिला विकास प्रबंधक (डीडीएम) एमएल मीणा के अनुसार, इस प्रोजेक्ट के तहत किसानों को केवल संसाधन ही नहीं दिए जा रहे हैं, बल्कि उन्हें आधुनिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण भी प्रदान किया जा रहा है। इस सिलसिले में महाराष्ट्र से आई कृषि विशेषज्ञों की एक टीम लगातार 120 दिनों तक किसानों के साथ खेतों में रहकर प्राकृतिक खेती की बारीकियाँ सिखा रही है। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद, ये प्रशिक्षित किसान अपने-अपने क्षेत्रों में 'कृषि चौपाल' का आयोजन करेंगे। इन चौपालों के जरिए वे आसपास के अन्य किसानों को भी प्राकृतिक खेती के तरीकों और फायदों की जानकारी देंगे, जिससे आने वाले समय में अधिक से अधिक किसान इस अभियान से जुड़ सकें। मिट्टी की उर्वरता और सुरक्षित खाद्य सामग्री का लाभ नाबार्ड डीडीएम एमएल मीणा का मानना है कि प्राकृतिक खेती की इस पद्धति से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता में वृद्धि होगी, उसकी जलधारण क्षमता में सुधार होगा और पर्यावरण संतुलन मजबूत होगा। उपभोक्ताओं को बिना किसी जहरीले रसायन के उगाया गया सुरक्षित और पौष्टिक अनाज और सब्जियां मिल सकेंगी। स्थानीय संसाधनों के उपयोग से खेती की लागत कम होगी और यह अधिक फायदेमंद व्यवसाय बन सकेगा। सरकारी स्तर पर जैविक लक्ष्यों में आए बदलावों के बीच किसान प्राकृतिक खेती को एक नए और भरोसेमंद विकल्प के रूप में देख रहे हैं। यदि सीकर और सलूंबर में यह पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है, तो आगामी वर्ष में इसे राज्य के अन्य जिलों में भी बड़े पैमाने पर लागू किया जाएगा। इसका आप पर असर भारत में: यह पहल देश भर में रसायन मुक्त खेती को बढ़ावा देने और किसानों की लागत कम करने का एक व्यावहारिक मॉडल पेश करती है। सीकर और सलूंबर में: स्थानीय किसानों को मुफ्त बायो-इनपुट, पारंपरिक बीजों का एक्सेस और 120 दिनों का एक्सपर्ट प्रैक्टिकल ट्रेनिंग सपोर्ट मिल रहा है। सवाल-जवाब 1. राजस्थान के किन जिलों में प्राकृतिक खेती का यह नया पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है? यह पायलट प्रोजेक्ट राजस्थान के सीकर और सलूंबर जिलों में शुरू किया गया है। 2. प्रोजेक्ट का कुल बजट कितना है और पहले चरण में कितना खर्च होगा? इस पूरे प्रोजेक्ट की कुल लागत 1.20 करोड़ रुपये है, जिसमें से शुरुआती चरण में करीब 30 लाख रुपये खर्च किए जा रहे हैं। 3. सीकर में कितने किसानों और भूमि को पहले चरण में शामिल किया गया है? पहले चरण में सीकर के लक्ष्मणगढ़ क्षेत्र के 30 किसानों का चयन किया गया है, जिनकी एक-एक हेक्टेयर भूमि पर प्राकृतिक खेती कराई जा रही है। 4. बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर में कौन-कौन से जैविक घोल तैयार किए जाएंगे? इस सेंटर में देसी गाय के गोबर और गोमूत्र से जीवामृत, बीजामृत, प्राकृतिक खाद और नीमास्त्र तैयार कर किसानों को निशुल्क दिए जाएंगे। 5. पारंपरिक बीजों के संरक्षण के लिए कितना बजट तय किया गया है? देसी और पुरानी किस्मों के बीजों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए लगभग 5 लाख रुपये की लागत से बीज बैंक बनाया जा रहा है। 6. किसानों को प्रशिक्षण कौन दे रहा है और इसकी क्या योजना है? महाराष्ट्र से आई विशेषज्ञों की टीम 120 दिनों तक खेतों में रहकर किसानों को ट्रेनिंग दे रही है, जिसके बाद trained किसान कृषि चौपाल आयोजित करेंगे। https://trendkia.com/rajasthan/rajasthan-ke-sikar-aura-salumbar-men-prakritika-kheti-ka-naya-payalata-projekta-shuru-nabard-lagaega-1-20-karora-rupaye-13223 TrendKia — Har trend, sabse pehle.