# राजस्थान के सीकर में शारदीय नवरात्रि पर सजेगा जीण माता का दरबार, 11 अक्टूबर से शुरू होगा वार्षिक लक्खी मेला

> सीकर जिले में अरावली पर्वतमाला के बीच स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ जीण माता का लक्खी मेला 11 अक्टूबर से घट स्थापना के साथ शुरू होगा, जिसमें बत्तीसी संघ के ऊंटों का कारवां मुख्य आकर्षण रहेगा।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-10-07 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/rajasthan-ke-sikar-men-sharadiya-navratri-para-sajega-jeen-mata-ka-darabara-11-aktubara-se-shuru-hoga-varshika-lakkhi-mela-44307 · **Language:** Hindi
**Tags:** जीण माता मेला, सीकर समाचार, शारदीय नवरात्रि, बत्तीसी संघ, राजस्थान शक्तिपीठ, हर्षनाथ भैरव

राजस्थान के सीकर जिले में अरावली की मनोरम वादियों के बीच स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ जीण माता के दरबार में वार्षिक धार्मिक उत्सव का मंच सज चुका है। शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व पर घट स्थापना के साथ 11 अक्टूबर से इस विशाल मेले का औपचारिक शुभारंभ होने जा रहा है। नौ दिनों तक चलने वाले इस आस्था के महापर्व में राजस्थान समेत देश के कई अन्य राज्यों से लाखों की तादाद में श्रद्धालु माता के दर्शन और शीश नवाने पहुंचेंगे। श्रद्धालुओं की भारी आवाजाही और भीड़ के कुशल प्रबंधन को ध्यान में रखते हुए मंदिर प्रबंधन समिति और स्थानीय प्रशासनिक अमले ने व्यवस्थाओं को चाक-चौबंद करना शुरू कर दिया है।

## प्रशासन की कड़ी चौकसी और मेला परिसर में विशेष पाबंदियां
तीर्थयात्रियों की सुविधा और कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए दांतारामगढ़ के उपखंड अधिकारी ने मेला क्षेत्र का निरीक्षण कर जरूरी दिशा-निर्देश जारी किए हैं। उपखंड अधिकारी ने पूरे मेला परिसर में चौबीसों घंटे स्वच्छता बनाए रखने, स्वच्छ व शुद्ध पेयजल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने तथा रात के समय पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था उपलब्ध कराने के कड़े निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं ताकि असामाजिक तत्वों और शांति व्यवस्था में खलल डालने वालों से सख्ती से निपटा जा सके। परिसर की पवित्रता और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए पॉलिथीन के इस्तेमाल, शराब के सेवन व बिक्री तथा पशु बलि पर पूर्ण प्रतिबंध लागू कर दिया गया है। मेले में किसी भी तरह के धारदार हथियारों की बिक्री पर भी पूरी तरह रोक लगाई गई है।

## प्रतिपदा और अष्टमी पर विशेष पूजा, छह प्रमुख शहरों से आएंगी शाही पोशाकें
नवरात्रि के पावन काल में मंदिर में माता रानी के नित्य नए और मनमोहक स्वरूपों का श्रृंगार किया जाएगा। मंदिर कमेटी के मुताबिक नौ दिनों तक चलने वाले इस अनुष्ठान के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों के कुशल कारीगरों द्वारा तैयार की गई पोशाकें मंगवाई जाती हैं। इनमें नवरात्रि की प्रतिपदा यानी पहले दिन और महाअष्टमी का दिन विशेष धार्मिक महत्व रखता है। महाअष्टमी के दिन जीण भवानी का पारंपरिक शाही श्रृंगार किया जाता है। इस अलौकिक अवसर के लिए देश के छह प्रमुख शहरों दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, जयपुर, सूरत और भोपाल से विशेष रूप से तैयार लगभग 20 शाही पोशाकें लाई जाती हैं। माता के विग्रह को इस दिन स्वर्ण निर्मित विशेष बहुमूल्य हार धारण कराया जाता है। गर्भगृह और समूचे मंदिर प्रांगण को महकाने के लिए हवाई मार्ग से ताजे सुगंधित फूल मंगवाकर सजावट की जाती है।

## सजे-धजे ऊंट और सिर पर जलती सिगड़ी, बत्तीसी संघ की अनोखी परंपरा
मेले के दौरान सदियों पुरानी एक अत्यंत कठिन और अनूठी रस्म हर किसी को आकर्षित करती है, जिसे बत्तीसी संघ के नाम से जाना जाता है। इस संघ की भागीदारी मेले का सबसे मुख्य और रोमांचक आकर्षण मानी जाती है। बत्तीसी संघ के श्रद्धालु पारंपरिक रूप से भव्य तरीके से सजाए गए ऊंटों पर सवार होकर माता के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंचते हैं। इस संघ की महिला श्रद्धालु अटूट आस्था का परिचय देते हुए अपने-अपने घरों से सिर पर जलती हुई सिगड़ी रखकर पैदल यात्रा करते हुए शक्तिपीठ पहुंचती हैं। अष्टमी की मध्यरात्रि यानी ठीक 12 बजे इस संघ के सदस्य गर्भगृह में प्रवेश कर पारंपरिक विधि-विधान से माता की विशेष पूजा-अर्चना और गुप्त रस्में संपन्न करते हैं।

## भाई-बहन के अमर स्नेह और काजल शिखर पर तपस्या की गाथा
जीण माता का ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भ चौहान राजवंश से जुड़ा हुआ है। मान्यता के अनुसार, माता का जन्म चौहान कुल में हुआ था और उनका अपने भाई हर्ष से गहरा आत्मीय लगाव था। लोककथा के मुताबिक, एक बार जीण माता और उनकी भाभी गांव के तालाब पर पानी भरने गईं, जहां दोनों के बीच इस बात को लेकर संवाद छिड़ गया कि हर्ष अपनी बहन से ज्यादा स्नेह करता है या पत्नी से। इस बात की परख के लिए उन्होंने तय किया कि घर लौटने पर हर्ष जिसके सिर से पानी का कलश पहले उतारेगा, वही उसकी सबसे प्रिय मानी जाएगी। घर पहुंचने पर हर्ष ने अनजाने में पहले अपनी पत्नी के सिर से पानी का मटका उतार दिया। इस घटना से जीण माता का मन आहत हो गया और वह सांसारिक जीवन त्यागकर अरावली के काजल शिखर पर चली गईं, जहां उन्होंने अत्यंत कठोर तपस्या आरंभ कर दी। जब हर्ष को अपनी भूल का अहसास हुआ, तो वह उन्हें मनाने काजल शिखर पहुंचे, परंतु माता ने घर लौटने से साफ इनकार कर दिया। इसके बाद पश्चाताप में हर्ष ने भी पास की पहाड़ी पर भगवान भैरव की घोर साधना शुरू कर दी। वर्तमान में भी उसी हर्ष पर्वत पर हर्ष भैरव नाथ का भव्य मंदिर स्थित है।

## मुगल आक्रांताओं पर मधुमक्खियों का हमला और अखंड ज्योत की ऐतिहासिक परंपरा
जीण माता शक्तिपीठ से जुड़ा एक और चमत्कारी प्रसंग मुगल शासक औरंगजेब के दौर का माना जाता है। इतिहास और जनश्रुति के अनुसार, जब औरंगजेब की सेना हिंदू मंदिरों को ध्वस्त करते हुए शेखावाटी अंचल में दाखिल हुई, तो आक्रांताओं ने सर्वप्रथम हर्षनाथ भैरव मंदिर पर हमला कर उसे नुकसान पहुंचाया। इसके उपरांत जब मुगल सैन्य टुकड़ी जीण माता के पावन मंदिर की ओर बढ़ी, तो असहाय ग्रामीणों और भक्तों ने माता भवानी से रक्षा की प्रार्थना की। जनविश्वास है कि माता के चमत्कार से अचानक मधुमक्खियों के एक विशाल दल ने मुगल फौज पर भीषण आक्रमण कर दिया। मधुमक्खियों के भयंकर डंक से मुगल सिपाही तितर-बितर होकर भागने लगे और स्वयं औरंगजेब की दशा अत्यंत दयनीय हो गई। विवश होकर औरंगजेब ने माता के चरणों में नतमस्तक होकर क्षमा याचना की और मंदिर में निरंतर अखंड ज्योत प्रज्वलित रखने के लिए तेल उपलब्ध कराने का संकल्प लिया। इसके बाद लंबे समय तक दिल्ली के राजदरबार से अखंड ज्योत हेतु नियमित रूप से तेल भेजा जाता रहा। कालांतर में इस परंपरा का निर्वहन जयपुर राजघराने ने संभाला, जहां से वर्ष में दो बार दोनों नवरात्रों के अवसर पर तेल भेजने की प्रथा जारी रखी गई, और यह अखंड ज्योत आज भी मंदिर के गर्भगृह में निरंतर प्रज्वलित रहती है।

## इसका आप पर असर
राजस्थान के प्रसिद्ध लक्खी मेले के आयोजन से श्रद्धालुओं और स्थानीय नागरिकों के लिए यात्रा एवं सुरक्षा संबंधी नियम लागू किए गए हैं।

- **भारत में:** देश भर से शक्तिपीठ के दर्शन करने आने वाले श्रद्धालुओं को 11 अक्टूबर से शुरू हो रहे मेले में सुगम दर्शन और बुनियादी सुविधाएं मिलेंगी। तीर्थयात्रियों को सलाह दी जाती है कि वे महाअष्टमी की भारी भीड़ को ध्यान में रखकर ही अपनी यात्रा और परिवहन की योजना बनाएं।
- **सीकर में:** स्थानीय प्रशासन ने मेला क्षेत्र में पॉलिथीन, शराब, पशु बलि और धारदार हथियारों की बिक्री पर पूरी तरह रोक लगा दी है। नियम तोड़ने वाले व्यक्तियों और असामाजिक तत्वों के खिलाफ मौके पर ही कठोर दंडात्मक कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
- **श्रद्धालुओं के लिए:** अष्टमी की मध्यरात्रि को बत्तीसी संघ की विशेष पूजा देखने के लिए मंदिर परिसर में व्यापक भीड़ प्रबंधन लागू रहेगा। मंदिर में जाने वाले भक्त माता के शाही श्रृंगार के दर्शन के साथ-साथ गर्भगृह में सदियों पुरानी अखंड ज्योत के दर्शन कर सकते हैं।
- **स्थानीय व्यापारियों के लिए:** स्वच्छता, शुद्ध पेयजल और सुरक्षा नियमों का पालन करते हुए स्थानीय बाजार संचालित होंगे। प्रतिबंधित वस्तुओं का व्यापार करने वाले दुकानदारों पर निगरानी रखने के लिए विशेष जांच दल तैनात रहेंगे।

## ऐसा क्यों हुआ
यह वार्षिक मेला शारदीय नवरात्रि के धार्मिक अनुष्ठान और शक्तिपीठ जीण माता के प्रति सदियों से चली आ रही जनआस्था के कारण आयोजित किया जाता है। स्थानीय प्रशासन ने भारी भीड़ की सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए अग्रिम तैयारियां की हैं।

- **धार्मिक अवसर:** शारदीय नवरात्रि में घट स्थापना के साथ हिंदू पंचांग के अनुसार नौ दिनों का पावन अनुष्ठान आरंभ होता है। इसी उपलक्ष्य में हर वर्ष अश्विन मास में जीण माता का लक्खी मेला आयोजित किया जाता है।
- **बत्तीसी संघ की परंपरा:** पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार बत्तीसी संघ के श्रद्धालु ऊंटों और सिर पर जलती सिगड़ी लेकर महाअष्टमी की रात 12 बजे पारंपरिक पूजा करने पहुंचते हैं। इस प्राचीन रीति को निभाने के लिए हर साल हजारों लोग एकत्रित होते हैं।
- **प्रशासनिक तैयारी:** लाखों श्रद्धालुओं के आगमन पर अव्यवस्था रोकने के लिए दांतारामगढ़ प्रशासन ने पहले से ही बुनियादी सुविधाएं और प्रतिबंध लागू किए हैं। सुरक्षा, स्वच्छता और शांति बनाए रखने के लिए पुलिस बल और प्रशासनिक अधिकारियों को सतर्क किया गया है।

## सवाल-जवाब

### 1. जीण माता का मेला कब से शुरू हो रहा है?
राजस्थान के सीकर जिले में जीण माता का लक्खी मेला 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि की घट स्थापना के साथ शुरू हो रहा है।

### 2. मेले में कौन सी चीजें पूरी तरह प्रतिबंधित की गई हैं?
मेला परिसर में पॉलिथीन, शराब, पशु बलि और धारदार हथियारों की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है।

### 3. माता के शाही श्रृंगार के लिए पोशाकें कहां से मंगवाई जाती हैं?
महाअष्टमी के शाही श्रृंगार के लिए दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, जयपुर, सूरत और भोपाल से करीब 20 विशेष पोशाकें तैयार करवाई जाती हैं।

### 4. बत्तीसी संघ की मुख्य परंपरा क्या है?
बत्तीसी संघ के लोग सजे-धजे ऊंटों पर आते हैं और महिलाएं सिर पर जलती सिगड़ी रखकर पैदल पहुंचती हैं, जो अष्टमी की रात 12 बजे विशेष पूजा करते हैं।

### 5. हर्ष भैरव मंदिर कहां स्थित है?
हर्ष भैरव मंदिर जीण माता धाम के समीप स्थित हर्ष पर्वत पर बना हुआ है, जहां माता के भाई हर्ष ने तपस्या की थी।

### 6. मंदिर की अखंड ज्योत का औरंगजेब से क्या संबंध है?
मुगल शासक औरंगजेब की सेना पर मधुमक्खियों के हमले के बाद उसने माता से क्षमा मांगकर मंदिर में अखंड ज्योत के लिए तेल भेजने का वचन दिया था।

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