# राजस्थान के सिरोही में अरावली पर्वत के बीच 3900 वर्ष पुराना अनोखा मंदिर, एक ही स्थान पर पूजी जाती हैं दो गणेश प्रतिमाएं

> सिरोही की शिवगंज तहसील स्थित राड़बर गांव में अरावली पहाड़ियों पर बने प्राचीन मंदिर में रिद्धि और सिद्धि रूप में दो गणेश प्रतिमाएं स्थापित हैं। पांडव काल से जुड़ा यह धाम राजस्थान और गुजरात के श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र है।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-10-01 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/rajasthan-ke-sirohi-men-aravali-parvata-ke-bicha-3900-varsha-purana-anokha-mndira-eka-hi-sthana-para-puji-jati-hain-do-ganesha-pra-41110 · **Language:** Hindi
**Tags:** सिरोही, गणेश मंदिर, अरावली पर्वत, शिवगंज, राजस्थान पर्यटन, राड़बर, रिद्धि सिद्धि गणेश

राजस्थान का सिरोही जिला अपनी प्राचीन विरासत और आध्यात्मिक स्थलों के कारण देशभर के श्रद्धालुओं के बीच विशेष पहचान रखता है। जिले के शिवगंज तहसील क्षेत्र में पड़ने वाले राड़बर गांव की ऊंची अरावली पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य एक ऐसा ऐतिहासिक मंदिर मौजूद है, जिसकी पूजा परंपरा समूचे भारत में अद्वितीय मानी जाती है। सामान्य तौर पर मंदिरों में भगवान गणेश की एकल प्रतिमा स्थापित होती है, परंतु इस पवित्र स्थल पर प्रथम पूज्य भगवान गणेश अपनी दोनों शक्तियों रिद्धि और सिद्धि के स्वरूप में दो अलग-अलग प्रतिमाओं के रूप में एक ही गर्भगृह में सुशोभित हैं। पर्वत की ऊंचाई पर स्थित इस अलौकिक धाम तक पहुंचने के लिए आने वाले भक्तों को 100 से अधिक सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।

## पांडव काल से जुड़ा 3900 वर्ष पुराना गौरवशाली इतिहास
धार्मिक परंपराओं और स्थानीय निवासियों के अनुसार इस तीर्थ स्थल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि लगभग 3900 वर्ष पुरानी बताई जाती है। क्षेत्र में प्रचलित मान्यताओं के आधार पर इस मंदिर की नींव पांडव काल के समय रखी गई थी। प्राचीन दौर में राड़बर गांव को 'राजगढ़' नाम से पहचाना जाता था। सदियों के अंतराल में समय बीतने के साथ-साथ स्थानीय समुदाय और श्रद्धालुओं द्वारा मंदिर का संरक्षण, जीर्णोद्धार और पुनर्निर्माण कार्य करवाया जाता रहा। यही वजह है कि यह स्थल न केवल सिरोही अंचल बल्कि संपूर्ण राजस्थान के सर्वाधिक प्राचीन गणेश देवालयों की फेहरिस्त में अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

## एक ही गर्भगृह में सिद्धि और रिद्धि गणेश का दुर्लभ स्वरूप
मंदिर के मुख्य गर्भगृह की बनावट और विग्रह स्थापना बेहद अनूठी है। स्थानीय भक्त नरेश राजपुरोहित के अनुसार, गर्भगृह के बाईं ओर काले पाषाण से तराशी गई अत्यंत नयनाभिराम मूर्ति स्थापित है, जिसे सिद्धि गणेश के रूप में पूजा जाता है। दूसरी तरफ दाईं ओर स्थापित प्रतिमा को रिद्धि गणेश का विग्रह माना गया है। पूरे भारतवर्ष में संभवतः यह अकेला ऐसा गणेश मंदिर है जहां एक ही गर्भगृह में दो गणेश विग्रहों की सामूहिक अर्चना की जाती है। मंदिर की मान्यताओं के अनुसार, दोनों प्रतिमाओं में रिद्धि गणेश का विग्रह सबसे पुराना है, जबकि सिद्धि गणेश की प्रतिमा को उसके कुछ समय बाद गर्भगृह में प्रतिष्ठित किया गया था।

## प्राकृतिक छटा, शांत माहौल और सदियों पुरानी जीवंत बावड़ी
अरावली पर्वतमाला के शीर्ष भाग पर अवस्थित होने के कारण यह मंदिर प्राकृतिक सुरम्यता से परिपूर्ण है। मंदिर परिसर के चारों तरफ घने हरे-भरे वृक्ष और एकांत शांत परिवेश बना रहता है, जिससे यहां दर्शन करने आने वाले श्रद्धालुओं को गहन मानसिक और आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है। इस पावन परिसर के भीतर एक अत्यंत प्राचीन एवं ऐतिहासिक बावड़ी भी निर्मित है। सदियां बीत जाने के बाद भी यह पारंपरिक बावड़ी आज तक एक सक्रिय जल स्रोत के रूप में बनी हुई है और इसके शुद्ध जल का उपयोग मंदिर के समस्त धार्मिक अनुष्ठानों व पूजा-विधान में किया जाता है।

## बुधवार की विशेष पूजा और भाद्रपद मेले में उमड़ती भीड़
राड़बर के इस पावन धाम में प्रत्येक बुधवार को विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है, जिसमें आसपास के क्षेत्रों से बड़ी तादाद में लोग पहुंचते हैं। इसके अलावा भाद्रपद मास में पड़ने वाले पावन गणेश चतुर्थी उत्सव के दौरान यहां का वातावरण किसी भव्य मेले जैसा नजर आता है। इस अवसर पर सिरोही जिले के अतिरिक्त संपूर्ण राजस्थान और पड़ोसी राज्य गुजरात से भी भारी संख्या में भक्त अपनी मन्नतें लेकर यहां शीश नवाने आते हैं। क्षेत्र में यह गहरी मान्यता विद्यमान है कि जो भी श्रद्धालु सच्ची निष्ठा से 100 से अधिक सीढ़ियां चढ़कर रिद्धि और सिद्धि गणेश के दर्शन करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं।

## इसका आप पर असर
इस ऐतिहासिक धार्मिक स्थल की जानकारी से राजस्थान और देशभर के तीर्थयात्रियों व पर्यटकों को एक दुर्लभ आध्यात्मिक विरासत से जुड़ने का सीधा अवसर मिलता है।

- **भारत में:** देशभर के आध्यात्मिक पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों को एक ही गर्भगृह में दो गणेश विग्रहों के दर्शन का अनूठा अनुभव प्राप्त होता है। 3900 साल पुराने इस दुर्लभ स्थल की यात्रा कर श्रद्धालु अपनी सांस्कृतिक समझ और धार्मिक ज्ञान को समृद्ध कर सकते हैं।
- **सिरोही में:** सिरोही और शिवगंज क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलने से स्थानीय गाइडों, परिवहन संचालकों और पूजन सामग्री विक्रेताओं को रोजगार के नए अवसर मिलते हैं। भाद्रपद माह के दौरान गुजरात और राजस्थान से आने वाले श्रद्धालुओं की आवाजाही से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है।
- **तीर्थयात्रियों के लिए:** दर्शन के लिए जाने वाले श्रद्धालुओं को 100 से अधिक सीढ़ियां चढ़नी होती हैं, इसलिए बुजुर्ग व अस्वस्थ यात्रियों को पर्याप्त तैयारी के साथ जाना चाहिए। मंदिर परिसर में सदियों पुरानी बावड़ी और शांत प्राकृतिक परिवेश से यात्रियों को शांतिपूर्ण वातावरण मिलता है।
- **सांस्कृतिक संरक्षण:** प्राचीन जल स्रोतों और पांडव युगीन धरोहरों के प्रति जन जागरूकता बढ़ने से पारंपरिक जल संरचनाओं के संरक्षण को प्रोत्साहन मिलता है। ऐतिहासिक बावड़ी का आज भी सक्रिय रहना पारंपरिक जल संचयन के महत्व को रेखांकित करता है।

## ऐसा क्यों हुआ
इस पवित्र स्थल का विशेष महत्व यहां सदियों से संरक्षित अद्वितीय धार्मिक विग्रह परंपरा और इसके समृद्ध ऐतिहासिक संदर्भों से उपजा है।

- **स्थापना की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:** क्षेत्रीय लोक मान्यताओं के अनुसार इस तीर्थ स्थल की स्थापना पांडव काल के दौरान हुई थी, जिसका इतिहास लगभग 3,900 वर्ष पुराना माना जाता है। कालांतर में राजगढ़ से राड़बर बने इस गांव में स्थानीय समुदायों ने समय-समय पर जीर्णोद्धार कराकर मंदिर के अस्तित्व को जीवंत बनाए रखा।
- **गर्भगृह में दो प्रतिमाओं का कारण:** सामान्य परंपरा से अलग यहां भगवान गणेश को रिद्धि और सिद्धि दोनों के स्वरूप में दो स्वतंत्र विग्रहों के रूप में प्रतिष्ठापित किया गया था। इनमें दाईं तरफ स्थापित रिद्धि गणेश की प्रतिमा को सबसे पुराना माना जाता है, जिसके कुछ वर्षों पश्चात बाईं तरफ सिद्धि गणेश की स्थापना की गई थी।
- **स्थिर जल स्रोत की मौजूदगी:** अरावली की दुर्गम पहाड़ी पर स्थित होने के बावजूद मंदिर परिसर में एक प्राचीन बावड़ी बनाई गई थी, जो सदियों से सक्रिय जल स्रोत बनी हुई है। इसी निरंतर जल आपूर्ति के कारण मंदिर के दैनिक पूजा विधान और अनुष्ठान निर्बाध रूप से संपन्न होते रहे हैं।
- **अंतरराज्यीय आस्था का प्रसार:** सिरोही की सीमा गुजरात से सटी होने और बुधवार व गणेश चतुर्थी पर विशेष आयोजनों की परंपरा रहने से यह मंदिर दोनों राज्यों के भक्तों की गहरी श्रद्धा का केंद्र बन गया। 100 सीढ़ियां चढ़कर दर्शन करने पर मनोकामना पूरी होने की दृढ़ जन आस्था ने इस परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी अक्षुण्ण रखा है।

## सवाल-जवाब

### 1. राड़बर का यह प्राचीन गणेश मंदिर कहां स्थित है?
यह मंदिर राजस्थान के सिरोही जिले की शिवगंज तहसील के अंतर्गत आने वाले राड़बर गांव में अरावली की ऊंची पहाड़ियों पर स्थित है।

### 2. इस मंदिर को कितना पुराना माना जाता है?
स्थानीय निवासियों और मान्यताओं के अनुसार इस पावन मंदिर का इतिहास लगभग 3900 वर्ष पुराना है और इसे पांडव काल से जुड़ा माना जाता है।

### 3. मंदिर के गर्भगृह में स्थापित मूर्तियों की क्या विशेषता है?
यहां एक ही गर्भगृह में भगवान गणेश की दो प्रतिमाएं हैं, जिनमें बाईं ओर काले पत्थर की सिद्धि गणेश और दाईं ओर रिद्धि गणेश की मूर्ति पूजी जाती है।

### 4. मंदिर परिसर तक पहुंचने के लिए कितनी सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं?
अरावली पहाड़ी पर स्थित इस पावन मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 100 से अधिक सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।

### 5. राड़बर गांव का प्राचीन नाम क्या था?
प्राचीन काल में राड़बर गांव को 'राजगढ़' के नाम से जाना जाता था।

### 6. मंदिर परिसर में स्थित बावड़ी की क्या उपयोगिता है?
परिसर में स्थित प्राचीन बावड़ी सदियों बाद भी सक्रिय जल स्रोत है, जिसके जल का उपयोग धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा कार्यों में किया जाता है।

### 7. यहां विशेष पूजा और विशाल मेला कब आयोजित होता है?
मंदिर में प्रत्येक बुधवार को विशेष पूजा होती है, जबकि भाद्रपद मास की गणेश चतुर्थी पर विशाल मेले का आयोजन होता है जिसमें राजस्थान और गुजरात से भक्त आते हैं।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._