राजस्थान के टेराकोटा शिल्पकार चंद्रशेखर सैन को मिला ललित कला अकादमी का प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कार जयपुर के मूर्तिकार चंद्रशेखर सैन को उनकी विशेष टेराकोटा कृति 'माय एंटायर वर्ल्ड-I' के लिए 65वीं राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी में राष्ट्रीय अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया है। देश के प्रतिष्ठित कला मंचों पर राजस्थान की पारंपरिक मिट्टी शिल्पकला ने एक बार फिर अपनी गहरी छाप छोड़ी है। जयपुर से ताल्लुक रखने वाले जाने-माने टेराकोटा मूर्तिकार चंद्रशेखर सैन को 65वीं राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी 2026 के दौरान ललित कला अकादमी के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इस वर्ष आयोजित राष्ट्रीय स्तर के इस आयोजन में पूरे जयपुर शहर से यह गौरव हासिल करने वाले वह अकेले कलाकार बने हैं। मिट्टी के माध्यम से जीवन के गूढ़ अनुभवों को तराशने वाले सैन का यह सम्मान राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर और प्राचीन मिट्टी शिल्प परंपरा की एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। कालीबंगा और मोलेला की समृद्ध विरासत का प्रतिबिंब चंद्रशेखर सैन लंबे अरसे से दृश्य कला और टेराकोटा के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय रहकर साधना कर रहे हैं। उनकी शिल्पकला में केवल आधुनिक प्रयोग ही नहीं दिखते, बल्कि राजस्थान के ऐतिहासिक अतीत की गहरी छाप भी महसूस की जा सकती है। उनकी कृतियों में प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़े ऐतिहासिक स्थल कालीबंगा और राजसमंद के विश्वप्रसिद्ध मोलेला गांव की पारंपरिक टेराकोटा शैलियों का सुंदर समन्वय झलकता है। सैन अपने शिल्पों में जैविक संरचनाओं, मानवीय स्मृतियों, पेड़-पौधों, पक्षियों और पशुओं जैसे प्राकृतिक तत्वों को बार-बार प्रमुखता से उभारते हैं, जो प्रकृति और इंसान के सह-अस्तित्व की कहानी बयां करते हैं। 'माय एंटायर वर्ल्ड-I' और इसकी दार्शनिक सोच राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाली चंद्रशेखर सैन की पुरस्कृत कलाकृति का शीर्षक 'माय एंटायर वर्ल्ड-I' है, जिसका अर्थ मेरी पूरी दुनिया या मेरा संपूर्ण ब्रह्मांड होता है। इस खास टेराकोटा शिल्प में कलाकार ने केवल अपनी व्यक्तिगत दुनिया को सीमित दायरे में प्रस्तुत नहीं किया है। इसके बजाय, उन्होंने स्मृतियों, मानवीय अंतर्मन, जीव-जगत, कल्पनाओं और बाहरी प्रकृति के आपस में जुड़े हुए एक विशाल और एकीकृत संसार को मिट्टी के रूपाकारों में पिरोया है। यह रचना यह दर्शाती है कि समूची सृष्टि के सभी तत्व आपस में कैसे एक-दूसरे से गुंथे हुए हैं। राज्य स्तर से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक का सफर टेराकोटा शिल्प में उत्कृष्ट कार्य के लिए सैन को पहले भी कई बड़े सम्मान मिल चुके हैं। उन्हें साल 2014 में राज्य कला पुरस्कार प्रदान किया गया था। इसके साथ ही वह कौसा ट्रस्ट कला अवॉर्ड्स और लोक कला रत्न सम्मान से भी नवाजे जा चुके हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में वह अब तक 10 से अधिक एकल कला प्रदर्शनियां आयोजित कर चुके हैं। वैश्विक मंच पर उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद यानी आईसीसीआर के जरिए स्पेन के शहर वलाडोलिड में स्थित कासा डे ला इंडिया में अपनी कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगाई थी और वहां व्याख्यान भी दिया था। अकादमिक उपलब्धियां और शोध कार्य कला सृजन के साथ-साथ चंद्रशेखर सैन ने कला के शोध और अकादमिक क्षेत्र में भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। उन्हें दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका की ओर से अफ्रीकन मून विश्वविद्यालय द्वारा मानद उपाधि से सम्मानित किया गया था। राजस्थान की मिट्टी और टेराकोटा परंपराओं पर गहन अध्ययन के लिए उन्हें सीसीआरटी जूनियर फेलोशिप और सीएसआईआर-यूजीसी जूनियर रिसर्च फेलोशिप मिली है। इसके अतिरिक्त, वह राजस्थान ललित कला अकादमी में वित्त समिति के सदस्य और कोषाध्यक्ष के रूप में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। कोटा शिविर और कलाकृतियों का सरकारी दान सैन की कला यात्रा का एक उल्लेखनीय पड़ाव साल 2007 में सामने आया था, जब कोटा में एक अंतरराष्ट्रीय कला शिविर का आयोजन हुआ था। इस शिविर में उन्होंने लगभग 5 से 7 करोड़ रुपये के अनुमानित मूल्य वाली कलाकृतियों का निर्माण किया था। इन सभी अमूल्य शिल्पों को बाद में राजस्थान ललित कला अकादमी के माध्यम से सरकार को समर्पित कर दिया गया था। वर्षों की इस निष्ठा और समर्पण के बाद मिला राष्ट्रीय अकादमी पुरस्कार उनके कलात्मक योगदान को नई ऊंचाई प्रदान करता है। इसका आप पर असर पारंपरिक हस्तशिल्प और कला से जुड़े कलाकारों के लिए यह राष्ट्रीय मान्यता नई प्रेरणा और बाजार के अवसर खोलती है। • भारत में: पारंपरिक मिट्टी और टेराकोटा शिल्प को राष्ट्रीय स्तर की दृश्य कला प्रतियोगिताओं में आधुनिक कला के समकक्ष प्रतिष्ठा मिली है। इससे देशभर के पारंपरिक शिल्पकारों और ललित कला के छात्रों को अपनी स्थानीय शैलियों पर शोध करने का प्रोत्साहन मिलेगा। • जयपुर में: जयपुर के स्थानीय टेराकोटा और हस्तशिल्प कलाकारों को राष्ट्रीय पहचान मिलने से शहर की सांस्कृतिक विरासत को नई मजबूती मिली है। इससे राज्य सरकार और कला अकादमियों के जरिए स्थानीय कलाकारों के लिए नई फेलोशिप और प्रदर्शनियों के मार्ग प्रशस्त हो सकते हैं। • कला प्रेमियों के लिए: ललित कला अकादमी की राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी 2026 के माध्यम से दर्शकों को उच्च स्तरीय समकालीन टेराकोटा कृतियां देखने का अवसर मिला है। दर्शक अब आधुनिक गैलरी संदर्भों में मोलेला और प्राचीन शैलियों के समकालीन रूपों को समझ सकते हैं। • हस्तशिल्प उद्योग के लिए: करोड़ों की कलाकृतियों के निर्माण और सरकारी संरक्षण के उदाहरण से हस्तशिल्प संपदा के मूल्यांकन में सुधार होगा। यह पारंपरिक मिट्टी शिल्प को व्यावसायिक रूप से मजबूत और सम्मानजनक पेशा बनाने में मदद करेगा। ऐसा क्यों हुआ यह सम्मान चंद्रशेखर सैन के दशकों के कलात्मक समर्पण और उनकी अनूठी टेराकोटा कृति 'माय एंटायर वर्ल्ड-I' की वैचारिक गहराई के कारण मिला है। 65वीं राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी 2026 में उनकी कृति ने पारंपरिक तकनीक और समकालीन दर्शन के उत्कृष्ट मेल के आधार पर निर्णायक मंडल को प्रभावित किया। • विशिष्ट कलात्मक अभिव्यक्ति: सैन की रचना 'माय एंटायर वर्ल्ड-I' ने प्रकृति, जीव-जगत, मानवीय स्मृति और ब्रह्मांड के आंतरिक संबंधों को मिट्टी के जरिए प्रभावी ढंग से उभारा। इस कृति की दार्शनिक गहराई ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अलग पहचान दिलाई। • ऐतिहासिक और लोक शैलियों का समन्वय: कलाकार ने सिंधु सभ्यता कालीन कालीबंगा और राजस्थान की प्रसिद्ध मोलेला टेराकोटा परंपराओं के तत्वों को आधुनिक दृश्य कला के साथ सफलतापूर्वक जोड़ा। यह अनूठी तकनीकी कुशलता निर्णायक मंडल के चयन का मुख्य आधार बनी। • निरंतर साधना और शोध का इतिहास: सैन को पूर्व में राज्य कला पुरस्कार, सीसीआरटी और सीएसआईआर-यूजीसी फेलोशिप मिल चुकी हैं, जिससे उनके काम की गुणवत्ता पहले से प्रमाणित थी। उनका दीर्घकालिक शोध और समर्पण इस सर्वोच्च राष्ट्रीय अकादमी सम्मान का आधार बना। सवाल-जवाब 1. चंद्रशेखर सैन को कौन सा पुरस्कार मिला है? उन्हें 65वीं राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी 2026 में ललित कला अकादमी का राष्ट्रीय अकादमी पुरस्कार मिला है। 2. चंद्रशेखर सैन की किस कलाकृति को यह सम्मान मिला? उन्हें उनकी टेराकोटा शिल्पकृति 'माय एंटायर वर्ल्ड-I' के लिए यह राष्ट्रीय सम्मान दिया गया है। 3. चंद्रशेखर सैन की कला में किन परंपराओं का प्रभाव दिखाई देता है? उनकी कला में राजस्थान की पुरातात्विक परंपराओं, विशेषकर कालीबंगा और मोलेला की टेराकोटा शैलियों का प्रभाव दिखाई देता है। 4. सैन ने किस अंतरराष्ट्रीय केंद्र में प्रदर्शनी लगाई और व्याख्यान दिया था? उन्होंने स्पेन के वलाडोलिड में स्थित कासा डे ला इंडिया में आईसीसीआर के जरिए प्रदर्शनी लगाई और व्याख्यान दिया था। 5. साल 2007 में कोटा कला शिविर में उन्होंने क्या योगदान दिया था? उन्होंने कोटा शिविर में लगभग 5 से 7 करोड़ रुपये मूल्य की कलाकृतियां तैयार कर राजस्थान ललित कला अकादमी के जरिए सरकार को दान की थीं। प्रेरणा और सबक चंद्रशेखर सैन की यह यात्रा दर्शाती है कि स्थानीय लोक परंपराओं और मिट्टी से जुड़े रहकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर की ख्याति पाई जा सकती है। • अपनी जड़ों और विरासत से जुड़ाव: आधुनिक प्रयोग करते हुए भी कालीबंगा और मोलेला जैसी पारंपरिक जड़ों को नहीं छोड़ना चाहिए। अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाकर ही वैश्विक स्तर पर अनूठी कला बनाई जा सकती है। • लगातार अभ्यास और शोध: कला केवल हुनर नहीं, बल्कि निरंतर अध्ययन और शोध का विषय है। सीसीआरटी और सीएसआईआर जैसी फेलोशिप के जरिए सैन ने अपने शिल्प को मजबूत अकादमिक आधार दिया। • सार्वजनिक हित में योगदान: अपनी 5 से 7 करोड़ रुपये मूल्य की कलाकृतियों को सरकार को दान कर सैन ने दिखाया कि सच्चा कलाकार समाज और संस्कृति को समृद्ध करने के लिए काम करता है। https://trendkia.com/rajasthan/rajasthan-ke-terakota-shilpakara-chandrashekhar-sain-ko-mila-lalit-kala-akademi-ka-pratishthita-rashtriya-puraskara-43735 TrendKia — Har trend, sabse pehle.