राजस्थान की रेगिस्तानी मोठ अब वैश्विक स्तर पर शुष्क इलाकों में खाद्य सुरक्षा मजबूत करेगी, 70 से अधिक जीनोटाइप परीक्षण के लिए विदेश रवाना स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय ने अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान के लिए मोठ के 70 से अधिक जीनोटाइप विदेश भेजे हैं। यह कदम कम बारिश और सूखे से जूझते इलाकों में बेहतर उत्पादन क्षमता परखने के साथ स्थानीय भुजिया उद्योग को भी नई मजबूती देगा। रेगिस्तानी परिस्थितियों में किसानों के लिए सबसे बड़ा सहारा मानी जाने वाली मोठ की फसल अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने की तैयारी कर रही है। पश्चिमी राजस्थान के सूखे इलाकों की खाद्य सुरक्षा में अहम भूमिका निभाने वाले इस दलहन के आनुवंशिक गुणों को वैश्विक स्तर पर परखने की एक बड़ी वैज्ञानिक पहल शुरू हुई है। इसी कड़ी में बीकानेर स्थित स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय ने मोठ के 70 से अधिक जीनोटाइप अनुसंधान और व्यापक क्षेत्रीय परीक्षण के लिए विदेश भेजे हैं। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों, कम वर्षा और सीमित सिंचाई वाले विदेशी इलाकों में मोठ की अनुकूलता और उत्पादन क्षमता का विस्तृत वैज्ञानिक आकलन करना है। यदि इन परीक्षणों से सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं, तो भविष्य में राजस्थान के थार रेगिस्तान की यह पारंपरिक दलहनी फसल दुनिया के कई अन्य शुष्क देशों में भी खेतों की रौनक बढ़ा सकेगी। अंतरराष्ट्रीय सहयोग और जलवायु अनुकूलता का वैज्ञानिक मूल्यांकन विश्वविद्यालय के अनुसंधान अधिकारी डॉ. एन.के. शर्मा के अनुसार, यह महत्वपूर्ण शोध कार्य यूनाइटेड किंगडम के किर्कहाउस ट्रस्ट और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के साझा सहयोग से आगे बढ़ाया जा रहा है। इस संयुक्त अनुसंधान कार्यक्रम के तहत विश्वविद्यालय में संरक्षित मोठ की अलग-अलग आनुवंशिक सामग्रियों को विदेशी अनुसंधान केंद्रों तक पहुंचाया गया है। इन विभिन्न जीनोटाइप का वैज्ञानिक परीक्षण यह स्पष्ट करेगा कि कौन सी आनुवंशिक सामग्री अत्यंत शुष्क मौसम, पानी की भारी कमी और तेजी से बदलते तापमान के बीच भी टिकाऊ और बेहतर उत्पादन देने में सक्षम है। जलवायु परिवर्तन के मौजूदा दौर में कम पानी में पकने वाली ऐसी फसलों की मांग दुनिया भर के रेगिस्तानी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रही है। रेगिस्तानी किसानों के लिए जीवनरेखा समान है यह दलहन राजस्थान के अत्यधिक शुष्क और रेतीले भूभाग में मोठ केवल एक सामान्य फसल नहीं, बल्कि खेती की जीवनरेखा मानी जाती है। मानसूनी बारिश कमजोर रहने या पूरी तरह विफल होने की स्थिति में जब अन्य फसलों के उत्पादन की उम्मीदें खत्म हो जाती हैं, तब किसान मोठ को सबसे मजबूत और भरोसेमंद विकल्प मानकर बुआई करते हैं। न्यूनतम नमी में तैयार होने वाला यह दलहन भीषण गर्मी और प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों को आसानी से सहन कर लेता है। पूरे राजस्थान में वर्तमान में लगभग 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मोठ की खेती की जाती है, जो राज्य के कृषि परिदृश्य में इसके व्यापक महत्व को प्रमाणित करती है। बीज सुरक्षा, कीट रोकथाम और तकनीक का प्रसार विश्वविद्यालय केवल किस्मों के विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि फसल प्रबंधन, पौध संरक्षण के आधुनिक तौर-तरीकों, कीट नियंत्रण और बीमारियों की समय पर रोकथाम पर भी व्यापक अनुसंधान कर रहा है। किसानों को गुणवत्तापूर्ण उपज दिलाने के लिए प्रमाणित बीज और बीज उत्पादक सरकारी व निजी संस्थाओं को प्रजनक बीज उपलब्ध कराने पर भी योजनाबद्ध तरीके से काम चल रहा है। कृषि विश्वविद्यालय का अंतिम लक्ष्य प्रयोगशालाओं में तैयार आधुनिक तकनीकों और उन्नत बीजों को सीधे खेतों तक पहुंचाना है, जिससे प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाकर किसानों की आय में ठोस सुधार किया जा सके। विश्व प्रसिद्ध बीकानेरी भुजिया उद्योग की बुनियाद है मोठ बीकानेर के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने में मोठ का महत्व सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि शहर का विश्वविख्यात नमकीन उद्योग भी पूरी तरह इसी पर टिका हुआ है। बीकानेरी भुजिया तैयार करने में लगभग 80 प्रतिशत मोठ के आटे का इस्तेमाल कच्चे माल के रूप में किया जाता है। स्थानीय स्तर पर मोठ की पैदावार में आने वाली किसी भी तरह की गिरावट का सीधा असर भुजिया के कुल उत्पादन, बाजार भाव और नमकीन निर्माण से जुड़ी दर्जनों इकाइयों पर पड़ता है। बीकानेरी भुजिया आज भारत ही नहीं, बल्कि सात समंदर पार कई देशों में अपनी विशिष्ट पहचान दर्ज करा चुकी है। ऐसे में मोठ की नियमित और बंपर पैदावार सुनिश्चित करना किसानों की आर्थिक मजबूती, स्थानीय उद्योग की स्थिरता और निर्यात के जरिए विदेशी मुद्रा कमाने के लिहाज से बेहद जरूरी है। उत्पादन बेहतर रहने पर स्थानीय भुजिया उद्योग को साल भर गुणवत्तापूर्ण कच्चा माल वाजिब दामों पर मिलता रहेगा। आरएम-2251 और 70 दिन में पकने वाली उन्नत किस्मों का विकास कृषि विश्वविद्यालय में संचालित समर्पित मोठ परियोजना के तहत वैज्ञानिकों ने अब तक आठ से दस उच्च उपज वाली उन्नत किस्में विकसित करने में सफलता पाई है। इनमें आरएम-225, आरएम-257 और आरएम-435 जैसी प्रमुख किस्में शामिल हैं, जो पहले से किसानों के बीच काफी लोकप्रिय रही हैं। हाल ही में विकसित की गई आरएम-2251 किस्म को बीकानेर और राजस्थान के अन्य कम बारिश वाले जिलों के लिए बेहद उपयोगी और अधिक उत्पादन देने वाली किस्म माना गया है। इसके अलावा, वैज्ञानिकों ने म्यूटेशन ब्रीडिंग तकनीक का इस्तेमाल करके एक ऐसी विशेष किस्म तैयार की है जो 70 दिन से भी कम समय में पूरी तरह पककर तैयार हो जाती है। बहुत कम अवधि में तैयार होने वाली यह किस्म उन इलाकों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, जहां मानसूनी बारिश का दौर बेहद छोटा होता है। इससे बीच में ही बारिश रुक जाने की स्थिति में फसल सूखने या खराब होने का जोखिम काफी हद तक खत्म हो जाता है। इसका आप पर असर मोठ की उन्नत किस्मों के विकास और अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान से किसानों की पैदावार बढ़ने के साथ-साथ बीकानेर के प्रसिद्ध नमकीन उद्योग को सस्ता और पर्याप्त कच्चा माल मिल सकेगा। • भारत में: कम पानी में पकने वाले दलहन का उत्पादन बढ़ने से देश के शुष्क इलाकों में दालों की आपूर्ति सुधरेगी। इससे बाजार में दलहन की कीमतों में स्थिरता आएगी और उपभोक्ताओं पर महंगाई का बोझ कम होगा। • राजस्थान में: 10 लाख हेक्टेयर में मोठ बोने वाले स्थानीय किसानों को 70 दिन में पकने वाली किस्में मिलने से फसल बर्बादी का खतरा घटेगा। इसके साथ ही बीकानेरी भुजिया उद्योग को पर्याप्त कच्चा माल मिलने से स्थानीय रोजगार और व्यापार सुरक्षित रहेंगे। • वैश्विक स्तर पर: दुनिया के सूखे और कम वर्षा वाले देशों में मोठ की खेती का विस्तार होने से खाद्य सुरक्षा को नया संबल मिलेगा। जलवायु परिवर्तन के दौर में कम सिंचाई वाली यह फसल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भुखमरी से निपटने में मददगार बनेगी। • बीज उपलब्धता: कृषि विश्वविद्यालय द्वारा प्रमाणित और प्रजनक बीज उपलब्ध कराने से किसानों को नकली बीजों से मुक्ति मिलेगी। समय पर उन्नत बीज मिलने से प्रति हेक्टेयर औसत पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज होगी। ऐसा क्यों हुआ यह पहल जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते सूखे से निपटने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कम पानी में उगने वाली फसलों की पहचान करने के लिए शुरू की गई है। • जलवायु अनुकूलता की खोज: वैश्विक स्तर पर बढ़ते तापमान और अनियमित मानसून के कारण शुष्क क्षेत्रों में पारंपरिक फसलें नष्ट हो रही हैं। वैज्ञानिक यह जांचना चाहते हैं कि मोठ की कौन सी आनुवंशिक किस्में सीमित पानी और विषम मौसम में भी ठोस उपज दे सकती हैं। • द्विपक्षीय अनुसंधान सहयोग: यूनाइटेड किंगडम के किर्कहाउस ट्रस्ट और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के बीच हुए समझौते ने इस शोध को गति दी। इसी साझेदारी के तहत बीकानेर विश्वविद्यालय में उपलब्ध 70 से अधिक आनुवंशिक सामग्रियों को अंतरराष्ट्रीय परीक्षण के लिए भेजा गया। • स्थानीय उद्योग की निर्भरता: बीकानेरी भुजिया में 80 प्रतिशत मोठ का उपयोग होता है, जिसके लिए निरंतर और बेहतर उत्पादन आवश्यक है। स्थानीय भुजिया के वैश्विक निर्यात को बनाए रखने के लिए उन्नत और रोगरोधी किस्मों का विकास अनिवार्य हो गया था। सवाल-जवाब 1. बीकानेर से मोठ के कितने जीनोटाइप विदेश भेजे गए हैं? स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परीक्षण के लिए 70 से अधिक जीनोटाइप विदेश भेजे हैं। 2. इस अनुसंधान में कौन से संस्थान सहयोग कर रहे हैं? यह शोध यूनाइटेड किंगडम के किर्कहाउस ट्रस्ट और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सहयोग से संचालित किया जा रहा है। 3. राजस्थान में कितने क्षेत्रफल पर मोठ की खेती होती है? राजस्थान में वर्तमान में लगभग 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मोठ की खेती की जाती है। 4. बीकानेरी भुजिया उद्योग में मोठ का कितना उपयोग होता है? बीकानेरी भुजिया तैयार करने में लगभग 80 प्रतिशत मोठ का उपयोग कच्चे माल के तौर पर किया जाता है। 5. आरएम-2251 किस्म की क्या खासियत है? आरएम-2251 किस्म को बीकानेर और राजस्थान के अन्य शुष्क इलाकों के लिए अत्यधिक उपयोगी और अधिक उपज देने वाली किस्म माना गया है। 6. म्यूटेशन ब्रीडिंग से तैयार किस्म कितने दिनों में पकती है? म्यूटेशन तकनीक से विकसित विशेष किस्म 70 दिन से भी कम समय में पककर तैयार हो जाती है। https://trendkia.com/rajasthan/rajasthan-ki-registani-motha-aba-vaishvika-stara-para-shushka-ilakon-men-khadya-suraksha-majabuta-karegi-70-se-adhika-jinotaipa-pa-35347 TrendKia — Har trend, sabse pehle.