राजस्थान में बुलडोजर एक्शन पर राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, ध्वस्तीकरण से पहले पक्ष रखने का निर्देश राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर बेंच ने प्रशासन को बिना सुनवाई के बुलडोजर कार्रवाई न करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि नोटिस का जवाब आने और उस पर फैसला होने तक निर्माणों को नहीं गिराया जाएगा। राजस्थान के विभिन्न इलाकों में ढांचों के खिलाफ चल रही कार्रवाई को लेकर जोधपुर उच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा है कि किसी भी प्रकार की ध्वस्तीकरण कार्रवाई से पहले तय कानूनी प्रावधानों का पूरी तरह पालन होना अनिवार्य है। प्रभावित पक्षों को अपना पक्ष अदालत या प्रशासन के सामने रखने का उचित अवसर दिया जाना चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार की एकतरफा कार्रवाई से बचा जा सके। इस बीच, राज्य सरकार ने भी खंडपीठ को आश्वासन दिया है कि कारण बताओ नोटिस पर अंतिम निर्णय आने तक किसी भी संबंधित निर्माण को तोड़ा नहीं जाएगा। गफूर बनाम राजस्थान राज्य मामले में सुनवाई यह महत्वपूर्ण न्यायिक निर्देश 6 नवंबर को न्यायमूर्ति विनीत कुमार माथुर और न्यायमूर्ति चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ द्वारा ‘गफूर बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य’ शीर्षक वाले मामले की सुनवाई के दौरान दिए गए। इस कानूनी लड़ाई में प्रभावितों की तरफ से जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी के मार्गदर्शन में वकीलों की टीम ने पक्ष रखा। इस विधिक दल में वकील हरीश कुमार पुरोहित और वकील इकबाल खान मुख्य रूप से शामिल थे। इसके अतिरिक्त, वकील ताहिर हकीम और लीगल सेल के समन्वयक प्रोफेसर निसार अहमद अंसारी ने भी इस पूरी प्रक्रिया में अपना तकनीकी और विधिक सहयोग प्रदान किया। जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय अदालत में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के पक्षकारों ने यह गंभीर मुद्दा उठाया कि प्रशासन नोटिस का विधिवत जवाब प्राप्त होने और उस पर गौर किए बिना ही सीधे तौर पर बुलडोजर एक्शन ले रहा है। यह आरोप लगाया गया कि जिन लोगों पर कार्रवाई की गाज गिर रही है, उन्हें अपनी बात रखने का पर्याप्त समय और अवसर नहीं दिया जा रहा है। इन दलीलों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने अपीलकर्ताओं को अपना विस्तृत जवाब पेश करने के वास्ते दो हफ्ते की मोहलत दी है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि जब यह जवाब मिल जाए, तो संबंधित सक्षम अधिकारी सभी प्रभावित पक्षों को व्यक्तिगत रूप से या वकीलों के माध्यम से सुनवाई का पूरा मौका दें। इसके पश्चात, सभी दस्तावेजों की समीक्षा करके कानून सम्मत और तार्किक रूप से लिखित आदेश पारित किया जाना चाहिए। अन्य मामलों पर भी स्पष्ट निर्देश इसी विशिष्ट दिन पर खंडपीठ ने चार अन्य अपीलों का भी निपटारा किया। न्यायपीठ ने यह रेखांकित किया कि इन अतिरिक्त मामलों के तथ्य और परिस्थितियां भी ‘गफूर बनाम राजस्थान राज्य’ प्रकरण के अंतर्गत दिए गए आदेशों के दायरे में ही समाहित होते हैं। इन मामलों में बाड़मेर की आदर्श नगरी स्थित मस्जिद जिसकी अपील संख्या 1358/2026 है, मनोहर मस्जिद जिसकी अपील संख्या 1360/2026 है, जैसलमेर के भरीवाला क्षेत्र के निवासी हसन हुसैन जिनकी अपील संख्या 1365/2026 है, तथा बाड़मेर के मलाना गांव के रहने वाले मुस्तफा खान जिनकी अपील संख्या 1368/2026 है, सभी शामिल हैं। इन सभी से जुड़े पक्षों को भी समान कानूनी सुरक्षा का लाभ मिला है। मस्जिदों और मजारों को गिराए जाने के आरोप जमीयत उलमा-ए-राजस्थान के आंकड़ों और बयानों के अनुसार, राज्य के सीमावर्ती क्षेत्रों में विभिन्न मस्जिदों और दरगाहों के खिलाफ विध्वंस की यह मुहिम 18 जून 2026 को शुरू की गई थी। संगठन का गंभीर आरोप है कि इस समयावधि के दौरान कुल 14 मस्जिदों और मजारों को बुलडोजर चलाकर जमींदोज कर दिया गया, जबकि इस पूरी कार्रवाई के दौरान प्रभावित नागरिकों को अपना पक्ष रखने के लिए न्यायसंगत अवसर नहीं प्रदान किया गया। सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था कानूनी विवाद जब जमीयत उलमा-ए-राजस्थान के महासचिव मौलाना अब्दुल वाहिद खत्री को इस प्रशासनिक कार्रवाई की पुख्ता जानकारी मिली, तो उन्होंने प्रभावित और पीड़ित लोगों को हरसंभव कानूनी सहायता मुहैया कराने का सार्वजनिक ऐलान किया। इस घोषणा के बाद राजस्थान उच्च न्यायालय में 40 से अधिक याचिकाएं दायर की गईं, जिन्हें शुरुआती चरण में 13 जुलाई 2026 को अदालत द्वारा खारिज कर दिया गया था। इन शुरुआती झटकों के बाद जमीयत ने देश के सर्वोच्च न्यायालय यानी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। वहां वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इन संवेदनशील मामलों की जोरदार पैरवी की, जिसके परिणामस्वरूप प्रभावितों को 15 दिनों का अंतरिम स्थगन आदेश हासिल हुआ। शीर्ष अदालत के इन्हीं स्पष्ट निर्देशों और मार्गदर्शन के आधार पर बाद में राजस्थान उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष नए सिरे से अपीलें दाखिल की गईं, जिन पर अब सुनवाई और निर्देश आए हैं। इसका आप पर असर यह अदालत का फैसला उन सभी लोगों के लिए एक बड़ी राहत है जिन्हें प्रशासनिक स्तर पर अचानक की जाने वाली ध्वस्तीकरण कार्रवाई का भय रहता है। • भारत में: नागरिकों को किसी भी प्रकार की कार्रवाई से पहले अपना पक्ष रखने का कानूनी अधिकार स्पष्ट रूप से मिल गया है। प्रशासन अब बिना विधिवत सुनवाई और लिखित आदेश के सीधे बुलडोजर नहीं चला सकेगा। • राजस्थान में: राज्य के विभिन्न जिलों और सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को बड़ी सुरक्षा मिली है। कारण बताओ नोटिस के मामलों में अंतिम फैसला होने तक अब निर्माणों को तोड़ा नहीं जाएगा। ऐसा क्यों हुआ यह पूरा न्यायिक घटनाक्रम प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा कथित तौर पर बिना पर्याप्त समय दिए और नोटिसों का जवाब सुने बिना की जा रही तोड़फोड़ की कार्रवाई के विरोध में शुरू हुआ था। • कानूनी प्रक्रिया की अनदेखी: प्रभावित पक्षों और संगठनों द्वारा यह आरोप लगाया गया था कि प्रशासन जवाब मिलने का इंतजार किए बिना ही निर्माणों को ध्वस्त कर रहा है। • सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: हाईकोर्ट से याचिकाएं खारिज होने के बाद मामला शीर्ष अदालत में गया, जहां से अंतरिम राहत मिलने के बाद यह मामला दोबारा हाईकोर्ट की खंडपीठ में सुनवाई के लिए आया। सवाल-जवाब 1. राजस्थान हाईकोर्ट की किस बेंच ने यह आदेश दिया है? यह आदेश राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर बेंच ने दिया है। 2. इस मामले में किन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने सुनवाई की? सुनवाई न्यायमूर्ति विनीत कुमार माथुर और न्यायमूर्ति चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ द्वारा की गई। 3. राज्य सरकार ने अदालत को क्या भरोसा दिलाया है? राज्य सरकार ने भरोसा दिलाया है कि कारण बताओ नोटिस पर फैसला होने तक संबंधित निर्माणों को ध्वस्त नहीं किया जाएगा। 4. सीमावर्ती इलाकों में मस्जिदों और मजारों के खिलाफ कार्रवाई कब शुरू हुई थी? संगठन के अनुसार यह कार्रवाई 18 जून 2026 को शुरू हुई थी। 5. प्रभावित पक्षों की पैरवी किस संगठन के निर्देश पर की गई? यह पैरवी जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी के निर्देश पर की गई। https://trendkia.com/rajasthan/rajasthan-men-bulldozer-action-para-rajasthan-high-court-ka-bara-adesha-dhvastikarana-se-pahale-paksha-rakhane-ka-nirdesha-57605 TrendKia — Har trend, sabse pehle.