राजस्थान में डिजिटल स्क्रीन और उम्मीदों के भारी दबाव से घट रही बच्चों की एकाग्रता, मानसिक तनाव पर विशेषज्ञों की राय शिक्षाविदों और अभिभावकों ने चिंता जताई है कि कोरोना काल के बाद मोबाइल की लत, किताबों से बढ़ती दूरी और पढ़ाई के भारी दबाव के कारण स्कूली बच्चों में एकाग्रता कम हो रही है और मानसिक तनाव बढ़ रहा है। डिजिटल युग के इस दौर में, स्कूली बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य और उनकी पढ़ाई आज एक बेहद जटिल चुनौती बन चुके हैं। जोधपुर के प्रमुख शिक्षाविदों, सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारियों और चिंतित अभिभावकों ने इस क्षेत्र के बच्चों, विशेष रूप से पाली में विद्यार्थियों के सामने आ रही मानसिक और शैक्षणिक चुनौतियों पर अपने महत्वपूर्ण विचार साझा किए हैं। विशेषज्ञों ने इस बात पर चिंता जताई कि कैसे अत्यधिक स्क्रीन टाइम, एकाग्रता में लगातार हो रही कमी, किताबों से बढ़ती दूरी और माता-पिता की उम्मीदों का भारी दबाव बच्चों को गंभीर मानसिक तनाव की ओर धकेल रहा है। शिक्षाविदों के अनुसार, कोरोना काल के दौरान शुरू हुई ऑनलाइन क्लास की मजबूरी ने बच्चों पर एक गहरा और स्थायी प्रभाव छोड़ा है, जिसने उनके पढ़ाई के तौर-तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। अब बच्चे किसी भी विषय की गहराई में जाकर किताबों से अध्ययन करने के बजाय, इंटरनेट और मोबाइल पर तुरंत समाधान खोजने की कोशिश करते हैं। इस आदत ने उनकी रीडिंग हैबिट को भारी नुकसान पहुंचाया है और क्लास में उनका ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को भी कमजोर किया है। आज के शिक्षकों के लिए सबसे बड़ी परीक्षा कमजोर छात्रों को वापस मुख्यधारा में लाने और उनके मन में पढ़ाई के प्रति फिर से रुचि जगाने की है। लक्ष्य का अत्यधिक दबाव और घर में अनुशासन की आवश्यकता सेवानिवृत्त जिला शिक्षा अधिकारी विद्योत्तमा वर्मा ने बच्चों के बदलते व्यवहार पर बात करते हुए कहा कि पहले के समय में शिक्षक का बेहद सम्मान होता था और छात्र उनकी हर बात को पूरी निष्ठा से मानते थे। लेकिन वर्तमान समय में परीक्षाओं को पास करने और मनचाहा लक्ष्य हासिल करने का दबाव बच्चों पर इस कदर हावी हो जाता है कि विपरीत परिस्थितियां सामने आने पर वे पूरी तरह टूट जाते हैं। कई बार बच्चे इस दबाव में आकर खुदकुशी जैसा आत्मघाती कदम भी उठा लेते हैं। वर्मा ने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षकों का कर्तव्य बच्चों को समझना, उन्हें प्रोत्साहित करना और सही राह दिखाना है, लेकिन इससे भी पहले माता-पिता की भूमिका आती है। यदि घर के भीतर शुरुआत से ही अनुशासन रहेगा, तो स्कूल में शिक्षक की सीख भी अधिक प्रभावी होगी। इसके साथ ही, शिक्षकों को भी अपने आचरण से बच्चों के सामने एक बेहतर उदाहरण पेश करना होगा। इंटरनेट की निर्भरता को कम करने के उपाय डिजिटल निर्भरता के इसी मुद्दे पर अपनी राय रखते हुए सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य चंदा मैढ़ ने कहा कि कोविड महामारी के दौरान ऑनलाइन पढ़ाई एक मजबूरी थी, जो अब बच्चों की आदत बन चुकी है। बच्चे स्कूल से घर लौटते ही किताबों को छूने के बजाय तुरंत मोबाइल या लैपटॉप पर जानकारियां खोजने लगते हैं, जबकि वास्तविक और संपूर्ण ज्ञान केवल किताबों में ही संचित होता है। चंदा मैढ़ ने सुझाव दिया कि यदि शिक्षक क्लास के भीतर ही विषय को गहराई से समझाएं और बच्चों की हर शंका व जिज्ञासा का समाधान कर दें, तो बच्चों में यह विश्वास पैदा होगा कि उनके शिक्षक का बताया हुआ ज्ञान ही सर्वश्रेष्ठ है। इससे बच्चों की इंटरनेट पर निर्भरता धीरे-धीरे कम होगी और वे वापस किताबों से जुड़ने लगेंगे। महंगी शिक्षा और बच्चों पर इच्छाएं थोपने का नुकसान अबिभावक और सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी प्रवीण मैढ़ ने शिक्षक, अभिभावक और बच्चों के बीच लगातार कम हो रहे संवाद की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि आज के समय में घर के खर्चे चलाना और बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाना, जैसे कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए 50 लाख रुपये तक की भारी-कर्म फीस चुकाना, एक सामान्य परिवार के लिए बहुत बड़ी चिंता का कारण है। उन्होंने माता-पिता को सलाह दी कि वे अपनी अधूरी इच्छाएं बच्चों पर जबरन न थोपें। उदाहरण के लिए, यदि माता-पिता डॉक्टर हैं, तो यह आवश्यक नहीं है कि उनका बच्चा भी डॉक्टर ही बने; हो सकता है कि बच्चे की रुचि प्रशासनिक सेवा (IAS) में हो। उन्होंने कहा कि बच्चों को उनकी योग्यता और रुचि के अनुसार ही करियर का मार्गदर्शन मिलना चाहिए, और शिक्षकों को भी हर विद्यार्थी को अपने बच्चे की तरह स्नेह और सम्मान देना चाहिए। अपेक्षाओं के भारी बोझ तले दबते बच्चे पारिवारिक दबाव के इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए अभिभावक और सेवानिवृत्त अध्यापिका कमला मोहनोत ने कहा कि आज के दौर में परिवारों ने बच्चों पर अपनी उम्मीदों का बहुत ज्यादा बोझ डाल दिया है। इस बेतहाशा दबाव के कारण बच्चे ऐसी मानसिक स्थिति में पहुंच जाते हैं जहां वे न तो अपने शिक्षकों की सुनते हैं और न ही अपने माता-पिता की। जब पढ़ाई को ज्ञान अर्जन का माध्यम मानने के बजाय केवल एक बोझ समझ लिया जाता है, तो बच्चे हताश और निराश होने लगते हैं। कमला मोहनोत ने निष्कर्ष निकाला कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए इस भारी दबाव को तुरंत कम करना बेहद जरूरी है ताकि वे एक सकारात्मक माहौल में शिक्षा प्राप्त कर सकें। इसका आप पर असर यह चर्चा माता-पिता और शिक्षकों के लिए एक गंभीर चेतावनी है, जो बताती है कि अत्यधिक पढ़ाई का दबाव और डिजिटल निर्भरता बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है। • मानसिक तनाव में कमी: माता-पिता को बच्चों पर डॉक्टर या इंजीनियर बनने का दबाव तुरंत बंद करना चाहिए। ऐसा करने से बच्चे अपनी रुचि के अनुसार आईएएस (IAS) जैसे क्षेत्रों को चुन सकेंगे, जिससे वे मानसिक अवसाद से बचेंगे। • एकाग्रता में सुधार: परिवारों को घर पर मोबाइल या लैपटॉप के उपयोग को सीमित कर किताबों को प्राथमिकता देनी होगी। इस बदलाव से बच्चों की रीडिंग हैबिट सुधरेगी और क्लास में उनका ध्यान केंद्रित करने का स्तर बेहतर होगा। • राजस्थान में बेहतर करियर नियोजन: पाली और जोधपुर के अभिभावकों को महंगी उच्च शिक्षा के खर्चों का व्यावहारिक मूल्यांकन करना चाहिए। बच्चों की बिना रुचि के इंजीनियरिंग में 50 लाख रुपये जैसी भारी फीस लगाने से बचकर परिवार अपने बजट और बच्चे के भविष्य दोनों को सुरक्षित रख सकते हैं। • गंभीर हादसों से बचाव: अभिभावकों और शिक्षकों को बच्चों के साथ संवाद की दूरी को तुरंत पाटना होगा। नियमित बातचीत से बच्चों के तनाव को समय रहते पहचाना जा सकेगा, जिससे उन्हें खुदकुशी जैसे आत्मघाती कदमों से बचाया जा सकता है। ऐसा क्यों हुआ छात्रों की एकाग्रता में कमी और बढ़ते मानसिक तनाव की मुख्य वजह कोरोना महामारी के दौरान आए तकनीकी बदलाव और समाज की पुरानी उम्मीदें हैं। • कोरोना काल का प्रभाव: कोविड-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन कक्षाओं की मजबूरी ने बच्चों को डिजिटल स्क्रीन का आदी बना दिया। यह तात्कालिक समाधान धीरे-धीरे बच्चों की स्थायी आदत में बदल गया, जिसे छोड़ना अब उनके लिए कठिन हो रहा है। • तुरंत समाधान की खोज: इंटरनेट पर हर जानकारी तुरंत उपलब्ध होने के कारण बच्चों में गहराई से पढ़ने की आदत खत्म हो गई है। किताबों में खोजने के बजाय मोबाइल पर तुरंत उत्तर ढूंढने की इस प्रक्रिया ने उनकी सोचने और समझने की क्षमता को सीमित कर दिया है। • महंगी शिक्षा का दबाव: इंजीनियरिंग जैसी पढ़ाई के लिए 50 लाख रुपये तक की भारी-भरकम फीस के कारण माता-पिता में चिंता बढ़ गई है। इस बड़े वित्तीय निवेश के दबाव के चलते अभिभावक अपनी इच्छाएं बच्चों पर थोपने लगते हैं। • आपसी संवाद की कमी: शिक्षक, माता-पिता और छात्रों के बीच बातचीत का कम होना बच्चों को अकेला बना रहा है। बिना किसी भावनात्मक सहारे के, परीक्षाओं में अव्वल आने का दबाव बच्चों के लिए मानसिक रूप से असहनीय हो जाता है। सवाल-जवाब 1. बच्चों का किताबों से रुझान क्यों कम हो रहा है? कोरोना काल में ऑनलाइन क्लास की वजह से बच्चों को स्क्रीन की आदत हो गई। अब वे किताबों के बजाय इंटरनेट और मोबाइल पर तुरंत उत्तर खोजना पसंद करते हैं। 2. बच्चों में खुदकुशी जैसे आत्मघाती कदम उठाने की प्रवृत्ति क्यों बढ़ रही है? परीक्षा पास करने और तय लक्ष्य हासिल करने का भारी दबाव बच्चों पर इस कदर हावी हो जाता है कि विफलता मिलने पर वे पूरी तरह टूट जाते हैं। 3. शिक्षक बच्चों की इंटरनेट पर निर्भरता को कैसे कम कर सकते हैं? शिक्षकों को क्लास में ही विषय को गहराई से समझाकर छात्रों की सभी शंकाओं का समाधान करना चाहिए, जिससे बच्चों का भरोसा स्कूल की पढ़ाई पर बढ़े। 4. महंगे पाठ्यक्रमों को लेकर अभिभावकों को क्या सलाह दी गई है? माता-पिता को बच्चों पर 50 लाख रुपये तक की भारी फीस वाले इंजीनियरिंग जैसे कोर्सेज का दबाव नहीं बनाना चाहिए, बल्कि उनकी रुचि के अनुसार करियर चुनने में मदद करनी चाहिए। https://trendkia.com/rajasthan/rajasthan-men-dijitala-skrina-aura-ummidon-ke-bhari-dabava-se-ghata-rahi-bachchon-ki-ekagrata-manasika-tanava-para-visheshajnon-ki-31607 TrendKia — Har trend, sabse pehle.