# राजस्थान में पंचायती राज चुनाव का बिगुल, ग्रामीण रण में बीजेपी और कांग्रेस के बीच कड़ा इम्तिहान

> राजस्थान चुनाव आयोग ने पंचायत चुनाव की कार्ययोजना जारी कर दी है, जहां निकाय फतह के बाद बीजेपी और मजबूत ग्रामीण आधार वाली कांग्रेस आमने-सामने हैं।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-10-06 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/rajasthan-men-pnchayati-raja-chunava-ka-bigula-gramina-rana-men-bjp-aura-congress-ke-bicha-kara-imtihana-43942 · **Language:** Hindi
**Tags:** राजस्थान पंचायत चुनाव, पंचायती राज, राजस्थान चुनाव आयोग, बीजेपी, कांग्रेस, भजनलाल सरकार, परिसीमन

राजस्थान के सियासी परिदृश्य में एक बार फिर चुनावी हलचल तेज हो गई है। राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से पंचायती राज संस्थाओं से जुड़े मतदान का पूरा कार्यक्रम सामने आने के बाद राजनीतिक दलों ने अपनी कमर कस ली है। इस चुनावी संग्राम में मुख्य भिड़ंत भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच तय मानी जा रही है, हालांकि कई छोटे क्षेत्रीय दल भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए सक्रिय हो चुके हैं। चुनावी व्यवस्था के तहत ग्राम पंचायतों में सरपंच और वार्ड पंच के चुनाव बिना किसी आधिकारिक दलीय चुनाव चिह्न के लड़े जाएंगे। वहीं पंचायत समितियों और जिला परिषदों के रण में उम्मीदवारों को राजनीतिक दलों के सिंबल आवंटित किए जाएंगे। परंपरागत रूप से ग्रामीण अंचलों में कांग्रेस का संगठन और जनाधार मजबूत स्थिति में माना जाता रहा है, इसलिए यह मुकाबला इस बात का फैसला करेगा कि शहरों में दबदबा बनाने वाली बीजेपी क्या गांवों में भी वैसी ही पकड़ साबित कर पाएगी। इन नतीजों को आने वाले विधानसभा चुनावों की संभावित सियासी तस्वीर के तौर पर भी देखा जा रहा है। पर्व और त्योहारों की सुविधा को देखते हुए धनतेरस के मद्देनजर मतदान की तिथियों में कुछ आवश्यक संशोधन भी दर्ज किए गए हैं।

## वन स्टेट-वन इलेक्शन की तर्ज पर निकाय के बाद अब पंचायतों की बारी
प्रदेश में इन दिनों चुनावी प्रक्रियाओं को वन स्टेट-वन इलेक्शन की रूपरेखा पर आगे बढ़ाया जा रहा है। इसी कड़ी में पहले राज्य के सभी 309 नगरीय निकायों में एक साथ चुनाव संपन्न कराए गए थे, और अब उसी क्रम को दोहराते हुए पंचायती राज संस्थाओं का मतदान कराया जा रहा है। निकाय चुनावों के दौरान बीजेपी ने कुल 309 निकायों में से दो तिहाई हिस्सों में अपने बोर्ड गठित करने में कामयाबी हासिल की थी। इस बड़ी बढ़त के बाद सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ताओं और नेताओं का उत्साह काफी ऊंचा है। सत्ताधारी दल की शुरुआती रणनीति यही रही थी कि पहले शहरी निकायों का मोर्चा फतह किया जाए और उसके बाद ही ग्रामीण पंचायतों की ओर कदम बढ़ाया जाए। राजनीतिक समझ रखने वालों का मानना है कि सत्ता पक्ष पहले ग्रामीण चुनाव कराने का कोई सियासी जोखिम उठाने से बच रहा था। उसका मुख्य उद्देश्य शहरी जीत की गति को गांवों तक ले जाना था, ताकि निकाय चुनावों की सफलता का सीधा मनोवैज्ञानिक असर गांव-देहात के मतदाताओं पर पड़ सके।

## परिसीमन में हेरफेर के आरोप और कांग्रेस की सियासी लामबंदी
दूसरी तरफ विपक्षी कांग्रेस ने सत्तापक्ष की रणनीति पर कड़े सवाल उठाए हैं। कांग्रेस नेताओं का सीधा इल्जाम है कि बीजेपी ने दर्जनों निकायों में जनादेश को जबरन अपने पाले में किया है। पार्टी का कहना है कि जिन कई निकायों में बीजेपी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था और वह सीटों के मामले में कांग्रेस से भी पीछे छूट गई थी, वहां प्रशासनिक मशीनरी और सत्ता का अनुचित उपयोग करके बीजेपी के बोर्ड बनाए गए। कांग्रेस का दावा है कि पंचायत स्तर के चुनावों में भी सत्तारूढ़ दल सत्ता के दुरुपयोग की वैसी ही कोशिश कर सकता है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों का मतदाता इस बार सजग है और ऐसा बिल्कुल नहीं होने देगा। कांग्रेस का मानना है कि उसका बुनियादी जनाधार देहात में पहले से मजबूत है और ग्रामीण जनता बीजेपी को सबक सिखाने का मन बना चुकी है। इसके साथ ही कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि सूबे की भजनलाल सरकार ने पंचायतों के परिसीमन की आड़ में मनमाने फेरबदल किए हैं। पार्टी के मुताबिक सीमाओं के इस उलटफेर से स्थानीय ग्रामीणों के बीच गहरा असंतोष है, और पंचायत चुनावों में जनता इस कदम का जवाब वोट के जरिए देगी, जिससे परिसीमन एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन चुका है।

## योजनाओं का सहारा बनाम विपक्षी खेमे की अंदरूनी कलह
विपक्षी हमलों के जवाब में बीजेपी अपनी राज्य सरकार और केंद्र सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं को ढाल बनाकर चुनावी वैतरणी पार करने की तैयारी में है। पार्टी का पूरा ध्यान महिला वर्ग, युवा पीढ़ी और बुजुर्गों के लिए चलाई जा रही योजनाओं के साथ-साथ रोजगार सृजन और ग्रामीण इलाकों में पूरे कराए गए विकास कार्यों पर टिका है। बीजेपी का कहना है कि जिस तरह उसने निकाय चुनावों को पूरी एकजुटता के साथ लड़ा था, उसी तरह उन चुनावों की छोटी-मोटी कमियों को सुधारते हुए वह पंचायत चुनावों को भी बड़े अंतर से जीतेगी। इसके साथ ही बीजेपी कांग्रेस के आंतरिक बिखराव को प्रमुखता से जनता के बीच उठा रही है। बीजेपी का कहना है कि कांग्रेस पूरी तरह से एक जाजम पर नहीं है और उसके पास आम जनजीवन से जुड़ा कोई ठोस एजेंडा नहीं बचा है। बीजेपी प्रचार में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और दिग्गज कांग्रेसी नेता व पूर्व कैबिनेट मंत्री विश्वेन्द्र सिंह द्वारा निकाय चुनाव के दौरान अपनी ही पार्टी के प्रबंधन पर उठाए गए सवालों को भुना रही है। सत्तापक्ष का तर्क है कि जिस पार्टी के अपने कुनबे में खींचतान मची हो, वह भला विकास की क्या गारंटी देगी। हालांकि अभी दोनों दलों में आधिकारिक प्रत्याशियों के टिकट तय होने में समय बाकी है, लेकिन संभावित उम्मीदवार मैदान में उतर चुके हैं और आने वाले दिनों में टिकट वितरण को लेकर होने वाली रस्साकशी से चुनावी माहौल और ज्यादा गर्माने के आसार हैं।

## इसका आप पर असर
राजस्थान के ग्रामीण मतदाताओं और स्थानीय प्रतिनिधियों के लिए पंचायती राज चुनावों का सीधा व्यावहारिक असर शासन और विकास योजनाओं पर पड़ेगा।

- **राजस्थान में:** ग्रामीण अंचलों में नई पंचायतों और समितियों के गठन से विकास कार्यों की गति तय होगी। आचार संहिता और चुनाव प्रक्रिया के चलते स्थानीय प्रशासनिक प्राथमिकताओं में बदलाव आएगा।
- **ग्रामीण मतदाताओं के लिए:** परिसीमन में हुए बदलावों के कारण कई गांवों के वार्ड और मतदान केंद्र बदल सकते हैं। मतदाताओं को अपने नए वार्ड और मतदाता सूची में नाम की पुष्टि करनी होगी।
- **स्थानीय उम्मीदवारों के लिए:** जिला परिषद और पंचायत समिति में दलीय टिकटों के लिए दावेदारी की होड़ शुरू हो चुकी है। सरपंची और वार्ड पंच के उम्मीदवारों को गैर-दलीय आधार पर स्वतंत्र रूप से प्रचार की तैयारी करनी होगी।
- **त्योहारी समय पर असर:** धनतेरस के चलते चुनाव तिथियों में संशोधन होने से स्थानीय स्तर पर मतदान और प्रचार की तारीखें बदलेंगी। ग्रामीण निवासियों को अपनी यात्रा और कार्यक्रमों की योजना नए चुनाव कार्यक्रम के अनुसार बनानी होगी।

## ऐसा क्यों हुआ
राज्य निर्वाचन आयोग ने स्थानीय निकायों के चुनाव संपन्न कराने के बाद पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल पूरा होने पर यह चुनावी कार्यक्रम जारी किया है।

- **संवैधानिक व प्रशासनिक अनिवार्यता:** स्थानीय निकायों और पंचायती राज संस्थाओं का नियमित कार्यकाल समाप्त होने पर समयबद्ध मतदान आवश्यक होता है। वन स्टेट-वन इलेक्शन थीम के तहत सरकार ने पहले शहरी और अब ग्रामीण संस्थाओं के चुनाव कराने की योजना बनाई।
- **शहरी परिणामों की राजनीतिक गति:** सत्तारूढ़ दल ने पहले 309 निकायों के चुनाव कराकर दो तिहाई में जीत दर्ज की। इस जीत से बने अनुकूल माहौल का मनोवैज्ञानिक लाभ ग्रामीण इलाकों में उठाने की रणनीति अपनाई गई।
- **परिसीमन और प्रशासनिक पुनर्गठन:** भजनलाल सरकार द्वारा पंचायतों की सीमाओं में किए गए प्रशासनिक बदलावों ने चुनावी प्रक्रिया की जमीन तैयार की। विपक्ष इस परिसीमन को लेकर लगातार विरोध दर्ज करा रहा है।
- **त्योहारी संशोधन:** चुनाव आयोग ने चुनावी कार्यक्रम तय करते समय धनतेरस के त्योहार को ध्यान में रखते हुए तिथियों में कुछ समायोजन किया। इससे मतदाताओं और मतदान कर्मियों दोनों को पर्व के दौरान असुविधा से बचाया जा सके।

## सवाल-जवाब

### 1. राजस्थान में किन-किन संस्थाओं के लिए चुनाव कार्यक्रम जारी हुआ है?
राजस्थान चुनाव आयोग ने ग्राम पंचायतों, पंचायत समितियों और जिला परिषदों के चुनावों का पूरा प्लान जारी किया है।

### 2. क्या सरपंच और वार्ड पंच के चुनाव पार्टी सिंबल पर लड़े जाएंगे?
नहीं, सरपंचों और वार्ड पंचों के चुनाव पार्टी सिंबल पर नहीं होंगे, जबकि पंचायत समितियों और जिला परिषदों के चुनाव पार्टी सिंबल पर लड़े जाएंगे।

### 3. निकाय चुनावों में बीजेपी का प्रदर्शन कैसा रहा था?
बीजेपी ने प्रदेश के कुल 309 नगरीय निकायों में से दो तिहाई निकायों में अपने बोर्ड गठित किए थे।

### 4. कांग्रेस ने पंचायत चुनाव को लेकर क्या प्रमुख आरोप लगाए हैं?
कांग्रेस का आरोप है कि भजनलाल सरकार ने परिसीमन के नाम पर पंचायतों में हेरफेर किया है और निकाय चुनावों में सत्ता का दुरुपयोग कर बोर्ड बनाए थे।

### 5. बीजेपी किन मुद्दों के आधार पर पंचायत चुनाव जीतने का दावा कर रही है?
बीजेपी केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं, महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों के कल्याण कार्यों, रोजगार और ग्रामीण विकास के दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है।

### 6. चुनाव की तारीखों में संशोधन क्यों किया गया है?
धनतेरस के त्योहार को ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग द्वारा मतदान की तारीखों में आवश्यक संशोधन किया गया है।

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