राजस्थान में तीसरे राउंड के बाद भी निजी मेडिकल कॉलेजों की 61 फीसदी से ज्यादा एमबीबीएस सीटें खाली नीट यूजी काउंसलिंग के तीसरे चरण के बाद राजस्थान के प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में सामान्य कोटे की 61.78 प्रतिशत सीटें खाली रह गई हैं। छात्र भारी फीस के साथ-साथ फैकल्टी, अस्पताल के मरीज और बुनियादी ढांचे को भी प्राथमिकता दे रहे हैं। नीट यूजी काउंसलिंग के तीसरे राउंड की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी राजस्थान के निजी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले की स्थिति काफी चिंताजनक बनी हुई है। सरकारी चिकित्सा संस्थानों में जहां एक-एक एमबीबीएस सीट हासिल करने के लिए छात्रों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिलती है, वहीं राज्य के प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में 61 फीसदी से अधिक सीटें खाली पड़ी हैं। आंकड़ों के मुताबिक, निजी कॉलेजों में सामान्य कोटे के तहत कुल 3336 एमबीबीएस सीटें निर्धारित हैं, जिनमें से केवल 1275 सीटों पर ही दाखिला हो सका है। इसका सीधा मतलब यह है कि 61.78 प्रतिशत सीटें अब भी खाली रह गई हैं। दाखिले के लिए केवल फीस नहीं, सुविधाओं पर भी छात्रों का ध्यान निजी मेडिकल कॉलेजों में खाली पड़ी सीटों की वजह केवल अत्यधिक सालाना फीस ही नहीं है। मेडिकल की पढ़ाई करने वाले छात्र अब संस्थानों का चयन करते समय उनकी साख और गुणवत्ता की भी बारीकी से पड़ताल कर रहे हैं। छात्र यह देख रहे हैं कि कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में आउटडोर और इनडोर मरीजों की दैनिक संख्या कितनी है, ताकि उन्हें पर्याप्त क्लीनिकल अनुभव मिल सके। इसके अलावा परिसर का बुनियादी ढांचा, शिक्षा का समग्र स्तर और वहां उपलब्ध क्लीनिकल तथा नॉन-क्लीनिकल फैकल्टी की योग्यता भी दाखिला लेने में निर्णायक भूमिका निभा रही है। महंगी फीस के बावजूद कुछ कॉलेजों में छात्रों की पहली पसंद दिलचस्प बात यह है कि भारी-भरकम फीस के बावजूद मजबूत साख वाले संस्थानों में सीटें तेजी से भरी हैं। जयपुर स्थित महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में सामान्य कोटे की वार्षिक फीस 24 लाख रुपये है, फिर भी यहां 85.60 प्रतिशत सीटें भर चुकी हैं। इसके विपरीत, उदयपुर के गीतांजलि मेडिकल कॉलेज में 23 लाख रुपये सालाना फीस होने के बावजूद केवल 54.25 प्रतिशत सीटों पर ही प्रवेश हुआ है। वहीं, मैनेजमेंट कोटे की स्थिति और भी खराब है, जहां कुल 464 सीटों में से 435 सीटें यानी 93.75 प्रतिशत सीटें खाली रह गई हैं। अन्य प्रमुख निजी चिकित्सा संस्थानों का हाल उदयपुर के अमेरिकन इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में सालाना फीस 18.90 लाख रुपये है और यहां 77.95 प्रतिशत सीटें भरी हैं। इसी फीस ढांचे पर जयपुर के गीतांजलि इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में 76.89 प्रतिशत और राजसमंद के अनंता इंस्टीट्यूट में 66.47 प्रतिशत सीटें भर सकीं। खराब प्रदर्शन करने वाले संस्थान दूसरी ओर, कुछ निजी संस्थानों में छात्रों का रुझान बेहद कम रहा है। जयपुर के बलवीर सिंह तोमर इंस्टीट्यूट में वार्षिक फीस 23.95 लाख रुपये तय है, लेकिन यहां 250 सीटों में से केवल 5 सीटें ही भर पाई हैं, जो कुल क्षमता का महज 2 प्रतिशत है। उदयपुर के पैसिफिक इंस्टीट्यूट में 22 लाख रुपये सालाना फीस पर सिर्फ 5.19 प्रतिशत सीटें भरी हैं। वहीं व्यास मेडिकल कॉलेज में 18.90 लाख रुपये सालाना फीस के बावजूद केवल 14.96 प्रतिशत सीटों पर ही छात्र पहुंचे हैं। इसका आप पर असर राजस्थान के निजी मेडिकल कॉलेजों में खाली पड़ी सीटों से छात्रों और अभिभावकों के कॉलेज चयन के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव दिखता है। • राजस्थान में: राज्य में सामान्य कोटे की 61.78 प्रतिशत और मैनेजमेंट कोटे की 93.75 प्रतिशत सीटें खाली होने से आगामी राउंड में कटऑफ और पात्रता नियमों में लचीलापन देखने को मिल सकता है। कम नीट स्कोर वाले छात्रों को अब भी निजी कॉलेजों में दाखिले का अवसर मिल सकता है। • भारत में: देश भर के मेडिकल अभ्यर्थी अब केवल डिग्री पाने के बजाय अस्पताल के मरीज, फैकल्टी और बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता दे रहे हैं। मोटी फीस वसूलने वाले लेकिन कमजोर क्लीनिकल सुविधाएं देने वाले संस्थानों को अपनी नीतियां सुधारने पर मजबूर होना पड़ेगा। • अभिभावकों पर वित्तीय असर: सालाना 18.90 लाख से 24 लाख रुपये तक की भारी फीस के कारण परिवार केवल मजबूत साख वाले संस्थानों में ही निवेश करना पसंद कर रहे हैं। कमजोर प्रदर्शन वाले कॉलेजों में लाखों रुपये खर्च करने से छात्र साफ बच रहे हैं। • भविष्य के डॉक्टरों के लिए क्लीनिकल अनुभव: जहां मरीज कम हैं, वहां छात्र दाखिला नहीं ले रहे हैं ताकि उनकी इंटर्नशिप और प्रैक्टिकल ज्ञान प्रभावित न हो। बेहतर ओपीडी और आईपीडी वाले मेडिकल कॉलेज ही छात्रों की शीर्ष वरीयता बने हुए हैं। ऐसा क्यों हुआ राजस्थान के निजी मेडिकल कॉलेजों में तीसरे राउंड के बाद भी 61 प्रतिशत से अधिक सीटें खाली रहने के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण सामने आए हैं। • अत्यधिक सालाना फीस और लागत: इन कॉलेजों में सालाना फीस 18.90 लाख रुपये से लेकर 24 लाख रुपये तक है, जो पांच साल के पाठ्यक्रम में बहुत बड़ा वित्तीय बोझ बन जाती है। मैनेजमेंट कोटे में 93.75 प्रतिशत सीटें खाली रहना इसी भारी भरकम लागत का सीधा नतीजा है। • मरीजों की कमी और कमजोर क्लीनिकल अनुभव: मेडिकल छात्र दाखिला लेने से पहले यह परख रहे हैं कि संबद्ध अस्पताल में इनडोर और आउटडोर मरीज पर्याप्त हैं या नहीं। कम मरीज वाले कॉलेजों में प्रैक्टिकल ट्रेनिंग कमजोर रहने के डर से छात्र वहां जाने से कतरा रहे हैं। • फैकल्टी और बुनियादी ढांचे की जांच: अभ्यर्थी अब संस्थानों की क्लीनिकल और नॉन-क्लीनिकल फैकल्टी की साख की गहन पड़ताल कर रहे हैं। जहां अनुभवी शिक्षक और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है, जैसे जयपुर का बलवीर सिंह तोमर इंस्टीट्यूट, वहां 250 में से सिर्फ 5 सीटें ही भर पाई हैं। सवाल-जवाब 1. राजस्थान के प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में तीसरे राउंड के बाद कितनी सीटें खाली हैं? सामान्य कोटे की 3336 सीटों में से केवल 1275 सीटें भरी हैं, यानी 61.78 प्रतिशत सीटें खाली रह गई हैं। 2. प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों के मैनेजमेंट कोटे में कितनी सीटें खाली हैं? मैनेजमेंट कोटे की 464 सीटों में से 435 सीटें यानी 93.75 प्रतिशत सीटें खाली रह गई हैं। 3. महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज जयपुर में कितनी सीटें भरी हैं? 24 लाख रुपये सालाना फीस होने के बावजूद महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज में 85.60 प्रतिशत सीटें भर चुकी हैं। 4. बलवीर सिंह तोमर इंस्टीट्यूट में कितने छात्रों ने दाखिला लिया? 23.95 लाख रुपये सालाना फीस वाले इस कॉलेज में 250 सीटों में से केवल 5 सीटें यानी 2 प्रतिशत ही भरी हैं। 5. छात्र कॉलेज चुनते समय किन बातों पर ध्यान दे रहे हैं? छात्र कॉलेज की साख, अस्पताल में ओपीडी-आईपीडी मरीजों की संख्या, बुनियादी ढांचा और क्लीनिकल व नॉन-क्लीनिकल फैकल्टी को देख रहे हैं। https://trendkia.com/rajasthan/rajasthan-men-tisare-raunda-ke-bada-bhi-niji-medikala-kolejon-ki-61-phisadi-se-jyada-mbbs-siten-khali-43343 TrendKia — Har trend, sabse pehle.