राजस्थान निकाय चुनावों में यूजीसी मुद्दे की गूंज, करणी सेना के आंदोलन से बीजेपी को हुआ नुकसान राजस्थान के निकाय चुनावों में श्री राजपूत करणी सेना के यूजीसी रोल बैक आंदोलन का असर देखने को मिला है, जिससे कई इलाकों में बीजेपी को झटका लगा है और निर्दलीय उम्मीदवारों ने बड़ी संख्या में जीत दर्ज की है। राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों के परिणामों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। श्री राजपूत करणी सेना और विभिन्न अगड़ी जातियों के संगठनों द्वारा चलाए गए यूजीसी रोल बैक आंदोलन का सीधा असर चुनाव परिणामों पर साफ तौर पर दिखाई दिया है। इस राजनीतिक उठापटक के बीच सत्ताधारी दल बीजेपी को कई प्रमुख क्षेत्रों में उम्मीद के विपरीत प्रदर्शन करना पड़ा है। राजपूत बहुल क्षेत्रों में पार्टी का वोट बैंक खिसक गया और इसका सीधा फायदा निर्दलीय उम्मीदवारों को मिला। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक दलों के अपने-अपने दावे और तर्क सामने आ रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत ने सियासी समीकरणों को जरूर प्रभावित किया है। बीकानेर से जयपुर तक आंदोलन का सफर इस पूरे राजनीतिक बदलाव की शुरुआत कुछ महीने पहले हुई थी जब बीकानेर के देशनोक से जयपुर तक एक लंबी पदयात्रा निकाली गई थी। श्री राजपूत करणी सेना के मुखिया महिपाल सिंह मकराना की अगुवाई में यह 18 दिन की यात्रा निकाली गई थी। इसके बाद तीन अगस्त को जयपुर में श्री राजपूत करणी सेना के नेतृत्व में अगड़ी जातियों ने यूजीसी रोल बैक के मुद्दे पर एक बड़ा विरोध मार्च निकाला था। इस आंदोलन के दौरान करणी सेना की ओर से स्पष्ट ऐलान किया गया था कि राजपूतों समेत सभी अगड़ी जातियों के मतदाता आगामी निकाय चुनावों में बीजेपी के पक्ष में मतदान करने से बचें और इसके बजाय निर्दलीय उम्मीदवारों का समर्थन करें। महिपाल सिंह मकराना का बड़ा दावा चुनाव परिणाम सामने आने के बाद श्री राजपूत करणी सेना के मुखिया महिपाल सिंह मकराना ने एक बड़ा बयान देते हुए कहा कि निकाय चुनाव में उनकी अपील और निर्दलीयों के समर्थन में चलाए गए प्रचार का व्यापक असर रहा है। उन्होंने दावा किया कि इस आंदोलन की वजह से कुल 30 फीसदी निर्दलीय उम्मीदवार जीत हासिल करके आए हैं और पार्टी के कई दिग्गज नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों में बीजेपी बहुमत के आंकड़े से काफी दूर रह गई। मकराना के अनुसार, जिन निर्दलीय उम्मीदवारों ने यूजीसी की मांग के समर्थन में शपथ पत्र भरा था, उन्होंने या तो चुनाव जीता या फिर मुख्य पार्टियों को कड़ी शिकस्त दी। दिग्गज नेताओं के गढ़ में बीजेपी को झटका करणी सेना के इस दावे की पड़ताल करने पर कई चौंकाने वाले आंकड़े सामने आते हैं। इस आंदोलन की शुरुआत बीकानेर से हुई थी और संयोग से केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन मेघवाल के संसदीय क्षेत्र बीकानेर में ही बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा। बीकानेर नगर निगम में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया। इसके अलावा सीकर में भी पार्टी को सफलता नहीं मिली। आंदोलन का मुख्य केंद्र रहे जयपुर जिले की बात करें तो यहां उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी का विधानसभा क्षेत्र विद्याधर नगर और उद्योग मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का विधानसभा क्षेत्र झोटवाड़ा दोनों ही राजपूत बहुल माने जाते हैं। इन दोनों ही क्षेत्रों में पार्टी का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा। विद्याधर नगर और झोटवाड़ा में गिरा वोट शेयर आंकड़ों पर गौर करें तो विद्याधर नगर में बीजेपी के जीतने वाले वार्डों का प्रतिशत पिछले चुनाव के 64.3 फीसदी से लुढ़क कर सीधे 60 फीसदी पर आ गया। इस क्षेत्र में करीब बीस फीसदी वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। दूसरी तरफ झोटवाड़ा विधानसभा क्षेत्र में भी स्थिति कुछ ऐसी ही रही जहां विजयी वार्डों का आंकड़ा पिछले चुनाव के 63 फीसदी से घटकर 53 फीसदी रह गया। झोटवाड़ा में 23 फीसदी निर्दलीय प्रत्याशी विजयी हुए। हालांकि पार्टी को अन्य विधानसभा क्षेत्रों में भी नुकसान उठाना पड़ा, लेकिन इन दोनों सीटों पर इसका असर ज्यादा गहरा था। कांग्रेस का यह भी तर्क है कि जयपुर में यूजीसी के मुद्दे पर हुए पुलिस लाठीचार्ज का भारी राजनीतिक खामियाजा शासन कर रही पार्टी को भुगतना पड़ा है। भरतपुर से जोधपुर तक बदला चुनावी समीकरण नुकसान का यह दायरा केवल जयपुर, बीकानेर और सीकर तक सीमित नहीं रहा। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह जिले भरतपुर में नगर निगम चुनावों के दौरान निर्दलीय उम्मीदवारों ने सबसे अधिक सीटों पर कब्जा जमाया। यहां तक कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही प्रमुख दल संख्या बल के मामले में निर्दलीयों से पीछे छूट गए। जोधपुर में केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत न केवल अपनी पार्टी को नगर निगम में बहुमत नहीं दिला पाए, बल्कि वे अपना खुद का वार्ड और बूथ भी बचाने में नाकाम रहे। इसी तरह अजमेर में भी केंद्रीय मंत्री भागीरथ चौधरी और विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी जैसे दिग्गज नेताओं की मौजूदगी के बावजूद पार्टी नगर निगम चुनाव में कांग्रेस से पीछे रह गई। निर्दलीयों के पक्ष में गया अगड़ी जातियों का वोट इस पूरे चुनाव परिणाम में एक और खास बात यह देखने को मिली कि नाराज अगड़ी जातियों के मतदाताओं ने कांग्रेस पार्टी को चुनने के बजाय निर्दलीय उम्मीदवारों पर अधिक भरोसा जताया। पूरे राज्य में कुल 2273 निर्दलीय पार्षद चुनाव जीतने में सफल रहे हैं, जबकि बीजेपी के 4179 और कांग्रेस के 3613 पार्षद जीतकर आए हैं। यही कारण है कि जिन जगहों पर बीजेपी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, वहां अधिकांश सीटों पर कांग्रेस भी बहुमत से कोसों दूर रही। यदि राजस्थान के 2021 और 2026 के चुनावी नतीजों की आपस में तुलना की जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि सत्ता में होने का कोई विशेष लाभ पार्टी को इन निकाय चुनावों में नहीं मिल सका। हालांकि कांग्रेस का वोट शेयर पिछले चुनाव के मुकाबले जरूर कुछ कम हुआ, लेकिन निर्दलीय उम्मीदवारों के हिस्से में करीब दो फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसका आप पर असर राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनाव परिणामों का असर राज्य की आम जनता और राजनीतिक समीकरणों पर सीधा पड़ा है। • भारत में: राज्य स्तर पर हुए इन राजनीतिक घटनाक्रमों से प्रशासनिक नीतियों और सामाजिक संगठनों के दबाव का असर स्थानीय स्तर की शासन व्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। • राजस्थान में: जयपुर, बीकानेर, जोधपुर और भरतपुर जैसे प्रमुख जिलों के मतदाताओं और स्थानीय नागरिकों को अब नवगठित नगर निकायों में निर्दलीय पार्षदों के साथ संतुलन बनाकर काम करना होगा। • राजनीतिक प्रभाव: चुनाव में बड़ी संख्या में निर्दलीयों की जीत से स्थानीय निकायों में सत्ता का संतुलन बदल गया है, जिससे विकास कार्यों और बोर्ड के गठन पर सीधा असर पड़ेगा। • मतदाता रुख: अगड़ी जातियों के मतदाताओं द्वारा पारंपरिक दलों से इतर निर्दलीय प्रत्याशियों को चुनने से भविष्य के चुनावों में राजनीतिक दलों को अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। • स्थानीय निकाय: कई जिलों में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने के कारण अब स्थानीय स्तर पर जोड़-तोड़ और निर्दलीयों की भूमिका काफी अहम हो गई है। ऐसा क्यों हुआ राजस्थान निकाय चुनावों में बीजेपी के लचर प्रदर्शन और निर्दलीयों की बंपर जीत के पीछे कई अहम सामाजिक और राजनीतिक कारण जुड़े रहे हैं। • यूजीसी रोल बैक आंदोलन: श्री राजपूत करणी सेना और विभिन्न अगड़ी जातियों के संगठनों द्वारा चलाया गया व्यापक विरोध प्रदर्शन इस पूरे राजनीतिक उलटफेर का मुख्य कारण रहा। • पदयात्रा और जनसंपर्क: बीकानेर के देशनोक से जयपुर तक निकाली गई 18 दिन की लंबी पदयात्रा ने समुदाय विशेष के भीतर सरकार के खिलाफ नाराजगी को संगठित करने में बड़ी भूमिका निभाई। • वोटिंग की अपील: आंदोलन के दौरान करणी सेना की ओर से स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि मतदाता बीजेपी के बजाय निर्दलीय उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान करें। • पुलिस कार्रवाई का रोष: जयपुर में यूजीसी के मुद्दे पर प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस लाठीचार्ज की घटना ने मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को सत्ताधारी दल के खिलाफ और अधिक मुखर कर दिया। सवाल-जवाब 1. राजस्थान निकाय चुनावों में किस संगठन के आंदोलन का असर देखने को मिला? श्री राजपूत करणी सेना और अगड़ी जातियों के संगठनों द्वारा चलाए गए यूजीसी रोल बैक आंदोलन का असर चुनावों पर पड़ा। 2. यूजीसी आंदोलन की शुरुआत राजस्थान में कहाँ से हुई थी? यह आंदोलन बीकानेर के देशनोक से शुरू होकर सीकर होते हुए जयपुर तक पहुंचा था। 3. निकाय चुनावों में कुल कितने निर्दलीय पार्षद जीते हैं? राजस्थान में कुल 2273 निर्दलीय पार्षद चुनाव जीतकर आए हैं। 4. करणी सेना के प्रमुख का क्या नाम है? श्री राजपूत करणी सेना के मुखिया महिपाल सिंह मकराना हैं। 5. बीजेपी और कांग्रेस को कितने पार्षद मिले हैं? चुनाव में बीजेपी के 4179 और कांग्रेस के 3613 पार्षद जीते हैं। https://trendkia.com/rajasthan/rajasthan-nikay-chunav-ugc-ke-mudde-ne-bjp-ko-diya-jhatka-agadi-jatiyon-ka-vote-bank-nirdaliyon-ko-hua-shift-32760 TrendKia — Har trend, sabse pehle.