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  "title": "राजस्थान निकाय चुनाव के बीच छुट्टी पर देर रात तक बैठी अदालत, कई पार्षदों और प्रत्याशियों को गिरफ्तारी से राहत",
  "summary": "राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान पुलिस कार्रवाई और गिरफ्तारी के डर से पहुंचे प्रत्याशियों की याचिकाओं पर हाईकोर्ट ने अवकाश के दिन रात 10 बजे तक सुनवाई की। अलग-अलग एकलपीठों ने कुचेरा, बीकानेर, श्रीविजयनगर और हनुमानगढ़ के पार्षदों व सभापति पद के दावेदारों को फौरी कानूनी सुरक्षा दी।",
  "content": "राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनावों के बाद नगर निकायों में बोर्ड गठन को लेकर मचे सियासी घमासान के बीच न्यायिक इतिहास में एक असाधारण नजीर सामने आई। अदालत में अवकाश होने के बावजूद राजस्थान हाईकोर्ट के दरवाजे खोले गए और देर रात 10 बजे तक अलग-अलग याचिकाओं पर लगातार सुनवाई का सिलसिला चला। स्थानीय निकाय चुनाव के मैदान में उतरे उम्मीदवारों और हाल ही में चुनकर आए कई पार्षदों ने पुलिस द्वारा अचानक गिरफ्तार किए जाने और मतदान से रोके जाने की गंभीर आशंका व्यक्त करते हुए अदालत की शरण ली थी। अवकाश के दिन मुख्य न्यायाधीश की विशेष अनुमति से शुरू हुई इस न्यायिक प्रक्रिया में कुल छह अलग-अलग मामलों पर विचार किया गया, जहां कई प्रत्याशियों और पार्षदों को गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण मिला।\n\n \n\nदोपहर से शुरू हुआ अर्जेंट याचिकाओं पर सुनवाई का दौर\n\nछुट्टी के दिन विशेष न्यायिक कार्यवाही की शुरुआत दोपहर के वक्त कुचेरा क्षेत्र से जुड़े एक मामले के साथ हुई। कुचेरा के चुनावी प्रत्याशी तेजपाल मिर्धा ने संभावित पुलिस कार्रवाई से सुरक्षा मांगते हुए याचिका लगाई थी। मुख्य न्यायाधीश की विशेष अनुमति मिलने के बाद दोपहर में एकलपीठ ने उनकी अर्जी स्वीकार करते हुए उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगाने का आदेश पारित कर दिया। यह पहली बड़ी राहत थी, जिसके बाद शाम ढलते-ढलते पांच अन्य महत्वपूर्ण मामलों की अर्जेंट फाइलें अलग-अलग एकलपीठों के समक्ष पेश की गईं।\n\nशाम से लेकर रात 10 बजे तक चली इस मैराथन सुनवाई में कुचेरा के अलावा हनुमानगढ़, बीकानेर और श्रीविजयनगर से आए नवनिर्वाचित पार्षदों और सभापति पद के उम्मीदवारों की अर्जियों को बारी-बारी से सुना गया। इन सभी जनप्रतिनिधियों का मूल तर्क यह था कि चुनाव में मतदान और बोर्ड बनाने की नाजुक घड़ी में उन्हें राजनीतिक दबाव में फंसाया जा रहा है। अलग-अलग पीठों ने स्थिति की तात्कालिकता को परखते हुए कई मामलों में गिरफ्तारी पर सीधा स्थगन दिया, जबकि अन्य मामलों में पुलिस प्रशासन को स्पष्ट आदेश दिया कि किसी भी स्थिति में वैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन कर कोई दंडात्मक कदम न उठाया जाए।\n\n \n\nबीकानेर में नवनिर्वाचित पार्षद मकसूद अहमद को मिली अदालती सुरक्षा\n\nबीकानेर नगर क्षेत्र से जुड़ी याचिका में बीकानेर यूआईटी के पूर्व अध्यक्ष और हाल ही में निर्वाचित हुए पार्षद मकसूद अहमद ने अदालत में अपनी गुहार लगाई। सामने आए विवरण के अनुसार, मकसूद अहमद के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट से जुड़ा एक मामला चल रहा था और उन्हें सोमवार सुबह मतदान वाले दिन ही पूछताछ के नाम पर थाने तलब कर लिया गया था। मतदान के ऐन वक्त पर इस तरह बुलाए जाने के पीछे राजनीतिक साजिश और तुरंत गिरफ्तार किए जाने की आशंका जताते हुए उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।\n\nअदालत में उनकी पैरवी वरिष्ठ अधिवक्ता सचिन आचार्य ने की। उन्होंने बेंच को अवगत कराया कि मतदान के दिन इस प्रकार की कार्रवाई का सीधा उद्देश्य जनप्रतिनिधि को उसके लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित करना है। मामले के विभिन्न पहलुओं पर विचार करने के बाद अदालत ने मकसूद अहमद को राहत प्रदान की। पीठ ने स्पष्ट किया कि मामले में गिरफ्तारी से संबंधित राहत की शर्तें और आगे अपनाई जाने वाली कानूनी प्रक्रिया अदालत के अंतिम लिखित आदेश के अनुरूप ही संचालित होंगी।\n\n \n\nश्रीविजयनगर में सभापति पद के दावेदार सुशील मिड्ढा को 7 अक्टूबर तक संरक्षण\n\nश्रीविजयनगर नगर पालिका में सभापति पद के प्रबल दावेदार सुशील मिड्ढा उर्फ बिट्टू मिड्ढा से जुड़े मामले में भी अदालत ने कड़ा रुख अपनाया। सुशील मिड्ढा के खिलाफ चुनाव की तारीखों का ऐलान होने के ठीक अगले दिन भारतीय न्याय संहिता यानी BNS तथा एससी-एसटी एक्ट की कठोर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया था। इस मामले की सुनवाई न्यायाधीश सुनील बेनीवाल की एकलपीठ में संपन्न हुई।\n\nअदालती कार्यवाही के दौरान राज्य सरकार के प्रतिनिधियों ने दर्ज आरोपों को बेहद संगीन बताते हुए किसी भी प्रकार की न्यायिक राहत दिए जाने का जोरदार विरोध किया। हालांकि, एकलपीठ ने समूचे घटनाक्रम की टाइमिंग और चुनावी पृष्ठभूमि पर बारीकी से गौर किया। अदालत ने पाया कि ठीक चुनावी घोषणा के बाद दर्ज हुई इस प्राथमिकी के चलते प्रत्याशी की स्वतंत्रता बाधित हो सकती है। इन परिस्थितियों को देखते हुए न्यायाधीश सुनील बेनीवाल ने सुशील मिड्ढा की गिरफ्तारी पर 7 अक्टूबर तक की अंतरिम रोक लगा दी, जिससे वे बिना किसी भय के चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बन सकें।\n\n \n\nहनुमानगढ़ की पार्षद मंजू के मामले में प्रशासन को नोटिस\n\nहनुमानगढ़ नगर परिषद से चुनकर आईं पार्षद मंजू ने भी अदालत में याचिका दायर कर अपनी व्यथा रखी। पार्षद मंजू का आरोप था कि स्थानीय राजनीतिक रंजिश और चुनावी खींचतान के चलते प्रशासनिक तंत्र द्वारा उन्हें बेवजह परेशान किया जा सकता है, ताकि वे सभापति चुनाव में मतदान न कर सकें। वरिष्ठ अधिवक्ता रवि भंसाली ने पार्षद की ओर से पैरवी करते हुए अदालत के समक्ष जरूरी दलीलें पेश कीं।\n\nइस मामले की सुनवाई न्यायाधीश कुलदीप माथुर की पीठ ने की। दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने आदेश दिया कि कानून द्वारा निर्धारित विधिक प्रक्रिया का पूरी तरह पालन किए बिना पार्षद मंजू के खिलाफ कोई भी कठोर या दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। इसके अलावा, अदालत ने इस समूचे मामले में राज्य सरकार, स्थानीय पुलिस प्रशासन और जिला निर्वाचन अधिकारी को औपचारिक नोटिस जारी कर दिए हैं। अदालत ने इन सभी प्राधिकारियों को एक सप्ताह की समय सीमा के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।\n\n \n\nहनुमानगढ़ के नौ अन्य पार्षदों की गिरफ्तारी पर भी लगा स्टे\n\nहनुमानगढ़ के घटनाक्रम में एक और बड़ा मोड़ तब आया जब वहां के नौ अन्य नवनिर्वाचित पार्षदों ने भी सामूहिक रूप से सभापति चुनाव के दौरान फर्जी मुकदमों में गिरफ्तारी की आशंका जताते हुए हाईकोर्ट का रुख किया। इन सभी नौ पार्षदों की संयुक्त चिंताओं पर सुनवाई न्यायाधीश नुपूर भाटी की एकलपीठ ने की।\n\nअधिवक्ताओं के तर्कों और चुनाव की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए न्यायाधीश नुपूर भाटी की पीठ ने सभी नौ नवनिर्वाचित पार्षदों की संभावित गिरफ्तारी पर स्थगन आदेश जारी कर दिया। इस आदेश के जारी होने से स्थानीय निकाय चुनाव के अहम मोड़ पर पुलिस कार्रवाई के साए में जी रहे पार्षदों को बड़ी मानसिक व कानूनी राहत मिली, जिससे बोर्ड गठन में मतदान निष्पक्ष रूप से संपन्न हो सके।\n\n \n\nबोर्ड गठन की होड़ में तेज हुई कानूनी रस्साकशी\n\nराजस्थान में स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे आने के बाद अब अध्यक्ष और सभापति के पदों पर काबिज होने के लिए हर खेमे में जोड़-तोड़ का माहौल चरम पर है। बोर्ड बनाने की इसी जोड़-तोड़ के बीच विरोधी गुटों द्वारा पुलिस तंत्र का सहारा लेने और मुकदमों का डर दिखाकर पार्षदों को प्रभावित करने के आरोप आम हो चुके हैं। यही वजह है कि बड़ी तादाद में प्रत्याशी और पार्षद लगातार हाईकोर्ट का रुख कर रहे हैं। अवकाश के दिन रात 10 बजे तक चली इन सुनवाइयों ने यह साफ कर दिया कि चुनाव के दौरान किसी भी जनप्रतिनिधि के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायपालिका हर वक्त तत्पर है।\n\nइसका आप पर असर\nहाईकोर्ट द्वारा छुट्टी के दिन देर रात तक सुनवाई कर पार्षदों को राहत देने से राजस्थान के स्थानीय निकायों में बोर्ड गठन के दौरान निष्पक्ष मतदान का रास्ता साफ हुआ है।\n\n• राजस्थान में: स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित पुलिस कार्रवाई पर न्यायिक अंकुश लगा है। नवनिर्वाचित पार्षदों और प्रत्याशियों को फर्जी या तात्कालिक मुकदमों के डर के बिना अपने मत का प्रयोग करने की स्वतंत्रता सुनिश्चित हुई है।\n• जनप्रतिनिधियों के लिए: चुनावी प्रक्रिया के बीच अचानक दर्ज होने वाली प्राथमिकियों से फौरी अदालती सुरक्षा का मजबूत उदाहरण बना है। पार्षद और प्रत्याशी अब कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना मनमानी गिरफ्तारी से सुरक्षित रहकर बोर्ड गठन में भाग ले सकते हैं।\n• स्थानीय नागरिकों के लिए: शहर के चुने हुए पार्षदों को मतदान से रोके जाने की साजिश विफल होने से जनमत का सम्मान बना रहेगा। नगर निकायों में वास्तविक जनादेश के आधार पर ही नए बोर्ड और सभापति का गठन संभव हो सकेगा।\n• प्रशासनिक जवाबदेही: पुलिस और चुनाव अधिकारियों को स्पष्ट संदेश गया है कि नियमों का उल्लंघन कर की गई किसी भी कार्रवाई पर अदालत तत्काल दखल दे सकती है। अधिकारियों को एक सप्ताह में जवाब दाखिल करने के नोटिस से प्रशासनिक मनमानी पर रोक लगेगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nराजस्थान के विभिन्न नगर निकायों में सभापति चुनाव और बोर्ड गठन के लिए जारी तीखी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के चलते प्रत्याशियों और पार्षदों के खिलाफ अचानक कानूनी मामले दर्ज किए गए थे, जिसके कारण उन्हें आपातकालीन स्थिति में अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।\n\n• चुनावी टाइमिंग पर मुकदमे: कई प्रमुख प्रत्याशियों जैसे सुशील मिड्ढा के खिलाफ चुनाव अधिसूचना जारी होने के ठीक अगले दिन और पार्षद मकसूद अहमद को मतदान के दिन सुबह ही पूछताछ के लिए नोटिस जारी किए गए थे। इस असामान्य टाइमिंग के कारण गिरफ्तारी और मतदान से वंचित होने की वास्तविक आशंका उत्पन्न हुई।\n• बोर्ड गठन का गणित: नगर निकायों में सभापति चुनने के लिए एक-एक पार्षद का मत अत्यंत निर्णायक होता है। किसी भी खेमे द्वारा विरोधी गुट के पार्षदों को पुलिस हिरासत में भेजकर संख्याबल बदलने की आशंकाओं के चलते जनप्रतिनिधि सुरक्षा मांगने पहुंचे।\n• अवकाश पर विशेष अनुमति: मतदान और राजनीतिक प्रक्रियाओं में समय की भारी कमी को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश ने छुट्टी के दिन भी एकलपीठों को सुनवाई की विशेष अनुमति दी। इसके परिणामस्वरूप दोपहर से लेकर रात 10 बजे तक कुल छह अर्जेंट मामलों की सुनवाई संभव हो सकी।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. राजस्थान हाईकोर्ट में छुट्टी के दिन रात 10 बजे तक सुनवाई क्यों चली?\nनिकाय चुनावों में बोर्ड गठन के दौरान कई प्रत्याशियों और नवनिर्वाचित पार्षदों ने राजनीतिक रंजिश में गिरफ्तारी और मतदान से वंचित होने की आशंका जताते हुए अर्जेंट याचिकाएं लगाई थीं।\n\n2. इस विशेष सुनवाई में कुल कितने मामलों पर अदालत ने विचार किया?\nअवकाश के दिन मुख्य न्यायाधीश की अनुमति से अलग-अलग एकलपीठों द्वारा कुल छह अहम मामलों में सुनवाई की गई।\n\n3. कुचेरा के प्रत्याशी तेजपाल मिर्धा को अदालत से क्या राहत मिली?\nदोपहर में सुनवाई के बाद अदालत ने तेजपाल मिर्धा की संभावित गिरफ्तारी पर रोक लगाने का आदेश जारी किया।\n\n4. श्रीविजयनगर के सभापति उम्मीदवार सुशील मिड्ढा के मामले में क्या आदेश हुआ?\nन्यायाधीश सुनील बेनीवाल की अदालत ने चुनाव घोषणा के तुरंत बाद दर्ज मामले की टाइमिंग को देखते हुए सुशील मिड्ढा की गिरफ्तारी पर 7 अक्टूबर तक रोक लगा दी।\n\n5. बीकानेर के पार्षद मकसूद अहमद ने अदालत का रुख क्यों किया था?\nउन्हें एससी-एसटी एक्ट के एक पुराने मामले में सोमवार सुबह मतदान के दिन ही पूछताछ के लिए बुलाया गया था, जिससे गिरफ्तारी की आशंका बन गई थी।\n\n6. हनुमानगढ़ की पार्षद मंजू की याचिका पर हाईकोर्ट ने क्या निर्देश दिए?\nन्यायाधीश कुलदीप माथुर की पीठ ने बिना विधिक प्रक्रिया अपनाए दंडात्मक कार्रवाई न करने का आदेश दिया और राज्य सरकार, पुलिस व जिला निर्वाचन अधिकारी को एक सप्ताह में जवाब दाखिल करने का नोटिस दिया।\n\n7. हनुमानगढ़ के अन्य नौ पार्षदों को किस प्रकार की अदालती राहत मिली?\nन्यायाधीश नुपूर भाटी की पीठ ने सभापति चुनाव के दौरान सभी नौ नवनिर्वाचित पार्षदों की गिरफ्तारी पर स्थगन आदेश जारी कर दिया।",
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  "category": "राजस्थान",
  "publishedAt": "2026-09-21",
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