राजस्थान निकाय चुनाव में भारत आदिवासी पार्टी का बड़ा धमाका, 3 निकायों में जीतीं 8 सीटें राजस्थान के नगर निकाय चुनावों में भारत आदिवासी पार्टी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए डूंगरपुर, सागवाड़ा और सलूंबर में कुल 8 वार्डों पर जीत दर्ज की है। महज तीन साल पहले बनी इस पार्टी ने अब शहरी राजनीति में भी अपना प्रभाव दिखा दिया है। राजस्थान के राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण मोड़ देखने को मिल रहा है, जहां क्षेत्रीय दल भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) ने ग्रामीण और संसदीय क्षेत्रों के बाद अब शहरी निकायों में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा दी है। महज 1,100 दिन पहले यानी 10 सितंबर 2023 को अस्तित्व में आई इस पार्टी ने हाल ही में संपन्न हुए राजस्थान नगर निकाय चुनावों में कुल 8 वार्डों में जीत हासिल की है। यह सफलता दक्षिण राजस्थान के प्रमुख आदिवासी प्रभाव वाले इलाकों में मिली है, जिससे राज्य की परंपरागत द्विध्रुवीय राजनीति में तीसरे विकल्प की जमीन और अधिक मजबूत होती दिख रही है। डूंगरपुर, सागवाड़ा और सलूंबर में बीआरपी का प्रदर्शन राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा जारी अधिकृत आंकड़ों के अनुसार, भारत आदिवासी पार्टी ने दक्षिण राजस्थान के तीन अलग-अलग निकायों में अपने प्रतिनिधि जिताने में सफलता प्राप्त की है। इनमें डूंगरपुर नगर परिषद, सागवाड़ा नगर पालिका और सलूंबर नगर परिषद शामिल हैं। पार्टी ने अपनी सीमित संसाधनों और केंद्रित चुनावी रणनीति के बल पर इन स्थानीय निकायों में अपनी सीट दर्ज कराई है। डूंगरपुर नगर परिषद के कुल 40 वार्डों के लिए हुए चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 24 सीटों पर कब्जा जमाया, जबकि कांग्रेस के खाते में 12 सीटें गईं। भारत आदिवासी पार्टी ने यहाँ 3 वार्डों में जीत हासिल की, जबकि 1 वार्ड निर्दलीय उम्मीदवार के नाम रहा। इसी प्रकार, सागवाड़ा नगर पालिका के 35 वार्डों में से बीजेपी ने 23 और कांग्रेस ने 8 वार्ड जीते, जबकि भारत आदिवासी पार्टी ने 4 वार्डों पर परचम फहराया। सलूंबर नगर परिषद के 25 वार्डों में बीजेपी को 12 और कांग्रेस को 11 सीटें मिलीं, वहीं 1 सीट पर भारत आदिवासी पार्टी और 1 सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी की जीत हुई। सीमित प्रत्याशियों के साथ सटीक चुनावी रणनीति भारत आदिवासी पार्टी ने राष्ट्रीय अथवा बड़े राज्य स्तरीय दलों की भांति पूरे राजस्थान में अपने उम्मीदवार उतारने के बजाय केवल अपने मजबूत प्रभाव वाले क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया। पार्टी का मुख्य चुनावी फोकस दक्षिण राजस्थान के आदिवासी और अल्पसंख्यक बहुल शहरी इलाकों पर रहा। उदाहरण के तौर पर, डूंगरपुर नगर परिषद में पार्टी ने कुल 40 में से केवल 12 वार्डों पर प्रत्याशी खड़े किए थे, जिनमें से 3 में उसे सफलता मिली। इसी तरह सागवाड़ा नगर पालिका में कुल 35 में से केवल 11 वार्डों में पार्टी ने अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे थे और 4 सीटों पर जीत दर्ज की। मुख्य रूप से मुस्लिम और आदिवासी आबादी वाले वार्डों को लक्ष्य बनाकर लड़े गए इस चुनाव में पार्टी ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही मुख्य दलों के वोटों में सेंध लगाई। सीमित सीटों पर चुनाव लड़कर 8 वार्ड जीतना यह दर्शाता है कि पार्टी का अपने समर्थकों के बीच पकड़ बेहद मजबूत है। संसद और विधानसभा के बाद अब निकायों पर नज़र भारत आदिवासी पार्टी का राजनीतिक सफर काफी तेज़ और सफल रहा है। 10 सितंबर 2023 को गठित हुई यह पार्टी भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) से अलग होकर बनी थी। पार्टी के संस्थापक नेताओं में प्रमुख नाम राजकुमार रोत का है। गठन के तुरंत बाद हुए 2023 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया था और मौजूदा समय में राजस्थान विधानसभा में इसके 4 विधायक निर्वाचित हैं। इसके बाद वर्ष 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रमुख नेता राजकुमार रोत ने बांसवाड़ा संसदीय सीट से ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी, जिससे पार्टी का खाता सीधे देश की संसद में खुल गया। विधानसभा और लोकसभा के बाद अब नगर निकाय चुनावों में जीत हासिल कर पार्टी ने यह साबित कर दिया है कि वह केवल ग्रामीण या जनजातीय इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरी राजनीति में भी अपनी गहरी जगह बना रही है। वर्ष 2021 का इतिहास और बीटीपी का जनाधार भारत आदिवासी पार्टी की शहरी निकाय राजनीति की जड़ें वर्ष 2021 के चुनावों से जुड़ी हुई हैं। उस समय भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) ने डूंगरपुर नगर परिषद चुनाव में 40 में से 7 वार्डों पर जीत हासिल की थी। हालांकि, बाद में बीटीपी के भीतर वैचारिक और संगठनात्मक मतभेदों के कारण पूरी प्रदेश इकाई ने पुरानी पार्टी छोड़ दी और भारत आदिवासी पार्टी का गठन कर लिया। वर्ष 2026 के निकाय चुनावों में बीआरपी ने पहली बार अपने अधिकृत चुनाव चिह्न पर डूंगरपुर और सागवाड़ा में प्रत्याशी उतारे। बीटीपी के पुराने जनाधार को सहेजते हुए बीआरपी ने अपने नए सिंबल पर भी मतदाताओं का भरोसा बनाए रखा और डूंगरपुर तथा सागवाड़ा में महत्वपूर्ण जीत हासिल की। राजस्थान की शहरी राजनीति पर प्रभाव राजस्थान के इस व्यापक स्थानीय निकाय चुनाव में कुल 309 नगरीय निकायों के 10,245 पार्षद पदों के लिए वोट डाले गए थे। इतने बड़े स्तर पर हुए चुनावों में भारत आदिवासी पार्टी द्वारा दर्ज की गई यह जीत संख्या बल के हिसाब से भले ही छोटी दिखे, लेकिन इसके राजनीतिक मायने बेहद दूरगामी हैं। दक्षिण राजस्थान के डूंगरपुर, सागवाड़ा और सलूंबर जैसे क्षेत्रों में बीआरपी की इस मौजूदगी ने बीजेपी और कांग्रेस के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत आदिवासी पार्टी आने वाले समय में अपने इस स्थानीय जनाधार को और विस्तारित कर राज्य की मुख्यधारा की शहरी राजनीति में एक स्थायी तीसरे विकल्प के रूप में खुद को स्थापित कर पाएगी। इसका आप पर असर राजस्थान नगर निकाय चुनावों में भारत आदिवासी पार्टी की इस जीत का स्थानीय नागरिकों और क्षेत्र के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य पर सीधा असर देखने को मिलेगा। • भारत में: क्षेत्रीय और आदिवासी समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले स्थानीय राजनीतिक दलों के उभार से देश में बहुदलीय लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हो रही हैं। इससे राष्ट्रीय स्तर पर हाशिए के वर्गों की आवाज़ को प्रमुखता मिलती है। • राजस्थान में: दक्षिणी राजस्थान के डूंगरपुर, सलूंबर और सागवाड़ा जिलों में अब स्थानीय विकास निधि और योजनाओं का वितरण अधिक पारदर्शी और संतुलित होने की उम्मीद है। बीआरपी की मौजूदगी से बीजेपी और कांग्रेस दोनों पर जनता के वादे पूरे करने का दबाव बढ़ेगा। • शहरी नागरिकों के लिए: स्थानीय निकायों में विविध विचारधारा वाले पार्षदों के होने से सफाई, पानी और सड़क निर्माण जैसी बुनियादी समस्याओं की सुनवाई तेजी से होगी। आम नागरिक अब पारंपरिक नेताओं के अलावा नए स्थानीय प्रतिनिधियों से भी मदद मांग सकते हैं। • स्थानीय राजनीति के लिए: दो-दलीय व्यवस्था के विकल्प के रूप में बीआरपी का उभरना स्थानीय युवाओं को राजनीति में आगे आने का नया अवसर प्रदान कर रहा है। इससे स्थानीय निकाय स्तर पर चुनावी प्रतिस्पर्धा और जवाबदेही दोनों बढ़ेगी। ऐसा क्यों हुआ भारत आदिवासी पार्टी का महज 1,100 दिनों के भीतर इतना तेजी से राजनीतिक उभार और निकाय चुनावों में सफलता कई प्रमुख वजहों से संभव हुई है। • बीटीपी का पुराना जनाधार: सितंबर 2023 में भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) से अलग होने के बाद बीआरपी ने बीटीपी की पुरानी कैडर और स्थानीय कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़े रखा। वर्ष 2021 में बीटीपी द्वारा जीती गई सीटों का जनाधार सीधे बीआरपी में स्थानांतरित हो गया। • संसदीय और विधानसभा सफलताओं का असर: राजस्थान विधानसभा में 4 विधायकों और 2024 में बांसवाड़ा से लोकसभा सीट जीतने से बीआरपी की राजनीतिक साख बढ़ी। इस बड़ी सफलता ने शहरी मतदाताओं के बीच भी पार्टी पर विश्वास मजबूत किया। • सटीक और केंद्रित रणनीति: पूरे राजस्थान में संसाधन बर्बाद करने के बजाय बीआरपी ने केवल आदिवासी और अल्पसंख्यक आबादी वाले विशिष्ट वार्डों पर ही ध्यान केंद्रित किया। कम सीटों पर लड़कर अधिक स्ट्राइक रेट हासिल करना इसकी सफलता की कुंजी रहा। • पारंपरिक दलों से असंतोष: दक्षिण राजस्थान के मतदाताओं में लंबे समय से बीजेपी और कांग्रेस दोनों की पारंपरिक कार्यशैली से एक विकल्प की तलाश थी, जिसे बीआरपी ने स्थानीय पहचान और मुद्दों के साथ पूरा किया। सवाल-जवाब 1. राजस्थान निकाय चुनाव में भारत आदिवासी पार्टी (BAP) ने कितनी सीटें जीती हैं? भारत आदिवासी पार्टी (BAP) ने राजस्थान के निकाय चुनाव में तीन अलग-अलग निकायों में कुल 8 वार्डों में जीत दर्ज की है। 2. BAP ने किन-किन नगर निकायों में वार्ड जीते हैं? पार्टी ने डूंगरपुर नगर परिषद में 3 वार्ड, सागवाड़ा नगर पालिका में 4 वार्ड और सलूंबर नगर परिषद में 1 वार्ड जीता है। 3. भारत आदिवासी पार्टी (BAP) की स्थापना कब हुई थी? भारत आदिवासी पार्टी का गठन 10 सितंबर 2023 को भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP) से अलग होकर हुआ था। 4. वर्तमान में BAP के पास राजस्थान में कितने सांसद और विधायक हैं? वर्तमान में BAP के पास राजस्थान विधानसभा में 4 विधायक हैं और लोकसभा में बांसवाड़ा से 1 सांसद (राजकुमार रोत) हैं। 5. डूंगरपुर नगर परिषद चुनाव में किस पार्टी को बहुमत मिला है? डूंगरपुर नगर परिषद के कुल 40 वार्डों में से बीजेपी ने सर्वाधिक 24 सीटें जीती हैं, जबकि कांग्रेस ने 12, BAP ने 3 और निर्दलीय ने 1 सीट जीती है। प्रेरणा और सबक शून्य से शुरुआत करके महज 1,100 दिनों के भीतर नगर निकाय चुनावों तक सफलता हासिल करने का यह राजनीतिक सफर कई महत्वपूर्ण सबक देता है। • स्थानीय मुद्दों पर फोकस: बड़ी राष्ट्रीय लहरों के बजाय जब स्थानीय जनसमस्याओं और प्राथमिकताओं पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, तो जनता का भरोसा हासिल किया जा सकता है। • सटीक संसाधन प्रबंधन: हर जगह चुनाव लड़ने के बजाय अपनी ताकत वाले क्षेत्रों में ध्यान केंद्रित करना सफलता की संभावनाओं को कई गुना बढ़ा देता है। • जमीनी जुड़ाव और कैडर: बड़ा नाम न होने पर भी मजबूत संगठन और समर्पित कार्यकर्ताओं के बल पर स्थापित व्यवस्था को चुनौती दी जा सकती है। • निरंतरता और आत्मविश्वास: नई शुरुआत करने में जोखिम होता है, लेकिन स्पष्ट नीति और निरंतर प्रयास से बहुत कम समय में बड़ी उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं। https://trendkia.com/rajasthan/rajasthan-nikaya-chunava-men-bharat-adivasi-party-ka-bara-dhamaka-3-nikayon-men-jitin-8-siten-32145 TrendKia — Har trend, sabse pehle.