राजस्थान में निकाय प्रमुख की कुर्सी के लिए घमासान, बीजेपी और कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबला राजस्थान के 309 निकायों में चुनाव परिणामों के बाद अब प्रमुख पदों के लिए राजनीतिक दलों के बीच जोड़तोड़ और बाड़ाबंदी तेज हो गई है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां अपने पार्षदों को एकजुट रखने में जुटी हैं। राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे सामने आने के बाद अब अध्यक्ष और महापौर की कुर्सियों को लेकर सियासत गरमा गई है। प्रदेश के कुल 309 निकायों में चुनाव होने हैं, जिनमें 10 नगर निगमों के मेयर, 51 नगर परिषदों के सभापति और 248 नगर पालिकाओं के अध्यक्ष पद शामिल हैं। हालांकि सभी निकायों पर लोगों की नजरें टिकी हुई हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा 10 नगर निगमों के परिणामों को लेकर हो रही है। हर कोई यह जानने को उत्सुक है कि अंततः इन प्रमुख शहरी निकायों की कमान किसके हाथ में जाएगी। निगमों का हाल और स्पष्ट बहुमत राज्य के 10 नगर निगमों में से भारतीय जनता पार्टी को जयपुर, कोटा, भीलवाड़ा और उदयपुर में स्पष्ट बहुमत मिल चुका है। भीलवाड़ा में स्थिति ऐसी रही कि कांग्रेस ने मेयर पद के लिए अपना उम्मीदवार ही नहीं उतारा, जिसके चलते जसवंत कंवर निर्विरोध मेयर चुन ली गईं। इसके अलावा जयपुर, कोटा और उदयपुर में भी पार्टी की स्थिति मजबूत है और वहां बगावत के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं। जिन जगहों पर बीजेपी के पास बहुमत का आंकड़ा नहीं है, वहां पार्टी अपना बोर्ड स्थापित करने के लिए हर संभव राजनीतिक दांव पेंच आजमा रही है। छह निगमों में कड़ा संघर्ष असली मुकाबला शेष बचे 6 नगर निगमों में देखने को मिल रहा है, जिनमें जोधपुर, अजमेर, भरतपुर, पाली, बीकानेर और अलवर शामिल हैं। हालांकि बीकानेर में कांग्रेस के पास स्पष्ट बहुमत है, फिर भी बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने राज्य के सभी 10 नगर निगमों में अपनी पार्टी का बोर्ड बनाने का बड़ा दावा किया है। दूसरी तरफ, जयपुर, जोधपुर, कोटा नगर निगम और कोटा जिले की सुकेत नगर पालिका में पुनर्म मतदान कराए जाने के कारण वहां निकाय प्रमुखों का चुनाव 25 सितंबर को संपन्न होगा। पार्षदों की बाड़ाबंदी और सुरक्षा विभिन्न निकायों में चुनावी तस्वीर साफ होने के बाद बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने ही अपने पाले के पार्षदों को टूटने से बचाने के लिए उनकी बाड़ाबंदी कर दी है। अजमेर नगर निगम चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में सामने आई है और वह वहां अपना बोर्ड बनाने के लिए पूरी ताकत लगा रही है। पार्टी को डर है कि उसके पार्षदों की तोड़फोड़ न हो जाए, इसलिए उन्हें राजस्थान से बहुत दूर कर्नाटक शिफ्ट कर दिया गया है। प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ के दावों के बाद से कांग्रेस खेमा पूरी तरह सतर्क नजर आ रहा है। बीकानेर में अंदरूनी बगावत के आसार बीकानेर में बहुमत होने के बावजूद कांग्रेस ने एहतियात के तौर पर अपने पार्षदों की बाड़ाबंदी राजस्थान के ही जैसलमेर जिले में कर रखी है, जबकि बीजेपी ने अपने पार्षदों को जोधपुर में ठहराया है। बीकानेर में बहुमत न होने के बावजूद बीजेपी की उम्मीदें इसलिए जिंदा हैं क्योंकि कांग्रेस के आधिकारिक प्रत्याशी अनिल कल्ला के अलावा पार्टी के एक अन्य निर्वाचित पार्षद नवरतन डागा ने भी महापौर पद के लिए ताल ठोक दी है। डागा ने दो नामांकन दाखिल किए थे, जिसमें एक कांग्रेस के नाम पर और दूसरा बतौर निर्दलीय था। पार्टी का सिंबल पूर्व मंत्री बीडी कल्ला के भतीजे अनिल कल्ला को मिलने के बाद डागा अब निर्दलीय मैदान में डटे हुए हैं। कुल 80 वार्डों वाले बीकानेर में कांग्रेस के पास 42 और बीजेपी के पास 27 पार्षद हैं, जबकि 11 अन्य में एक आरएलपी और 10 निर्दलीय हैं। इसके बावजूद बीजेपी ने सुरेन्द्र सिंह शेखावत को अपना उम्मीदवार बनाया है, जिससे समीकरण बदल सकते हैं। निर्दलीय निभा रहे हैं किंग मेकर की भूमिका बाकी बचे तीन नगर निगमों यानी भरतपुर, अलवर और पाली में महापौर की कुर्सी के लिए दोनों मुख्य दलों के बीच कांटे की टक्कर चल रही है। इन क्षेत्रों में भी पार्षदों को एकजुट रखने के लिए गुप्त ठिकानों पर बाड़ाबंदी की गई है। इन निगमों में निर्दलीय पार्षद असली किंग मेकर की भूमिका निभा रहे हैं। यही वजह है कि दोनों दल उन्हें अपने पाले में खींचने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब जोड़तोड़ और राजनीतिक समीकरणों को साधने का दौर तेजी से चल रहा है ताकि किसी तरह अपना बोर्ड बनाया जा सके। इसका आप पर असर राजस्थान में निकाय प्रमुखों के चुनाव का असर सीधे तौर पर स्थानीय शहरी विकास और प्रशासनिक कार्यों पर पड़ेगा। • भारत में: स्थानीय स्तर पर राजनीतिक दलों की खींचतान से प्रशासनिक फाइलों के निस्तारण में देरी हो सकती है। आम जनता को अपने छोटे-मोटे municipal कार्यों के लिए नए बोर्डों के गठन का इंतजार करना होगा। • राजस्थान में: राज्य के 309 निकायों से जुड़े शहरी इलाकों में सड़क, पानी और सफाई जैसी बुनियादी नागरिक सेवाएं नई परिषदों और निगमों के गठन तक प्रभावित हो सकती हैं। स्थानीय नागरिकों को अपने प्रमाण पत्र या विकास कार्यों की मंजूरी के लिए थोड़ा और इंतजार करना पड़ सकता है। ऐसा क्यों हुआ स्थानीय निकायों में बोर्ड गठन को लेकर यह घमासान चुनावों में किसी भी एक दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने और राजनीतिक दलों द्वारा सत्ता पर काबिज होने की होड़ के कारण शुरू हुआ है। • संख्या बल का अभाव: कई नगर निगमों और पालिकाओं में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है, जिससे निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका अहम हो गई है। • तोड़फोड़ का डर: राजनीतिक दलों को अपने पार्षदों के पाला बदलने या क्रॉस वोटिंग का डर है, जिसके चलते बड़े पैमाने पर बाड़ाबंदी की गई है। • प्रतिष्ठा की लड़ाई: प्रदेश अध्यक्षों और स्थानीय दिग्गजों द्वारा सभी निकायों में जीत का दावा करने के कारण यह चुनाव राजनीतिक प्रतिष्ठा का विषय बन गया है। सवाल-जवाब 1. राजस्थान में कुल कितने निकायों के लिए चुनाव होने हैं? राजस्थान में कुल 309 निकायों के लिए चुनाव प्रक्रिया चल रही है। 2. कितने नगर निगमों में मेयर का चुनाव होना है? प्रदेश के कुल 10 नगर निगमों में मेयर का चुनाव होना है। 3. बीजेपी को किन निगमों में स्पष्ट बहुमत मिला है? बीजेपी को जयपुर, कोटा, भीलवाड़ा और उदयपुर नगर निगमों में स्पष्ट बहुमत मिला है। 4. बीकानेर में कांग्रेस के पास कितने पार्षद हैं? बीकानेर में कुल 80 वार्डों में से कांग्रेस के पास 42 पार्षद हैं। 5. पुनर्म मतदान के कारण किन क्षेत्रों में चुनाव 25 सितंबर को होंगे? जयपुर, जोधपुर, कोटा नगर निगम और कोटा जिले की सुकेत नगर पालिका में 25 सितंबर को चुनाव होंगे। https://trendkia.com/rajasthan/rajasthan-nikaya-pramukha-chunava-bjp-aura-congress-ke-bicha-kursi-ki-jnga-32999 TrendKia — Har trend, sabse pehle.