# राजस्थान पंचायत चुनाव: चौदह हजार से ज्यादा पंचायतों के लिए बेहतर प्रदर्शन की होड़, बहत्तर हजार से अधिक दावेदार मैदान में

> राजस्थान में पंचायती राज चुनावों के तहत सरपंच पद के लिए भारी उत्साह देखने को मिल रहा है। चौदह हजार से अधिक ग्राम पंचायतों के लिए बेहतर प्रदर्शन और जीत हासिल करने के लिए बहत्तर हजार से ज्यादा दावेदार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-10-20 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/rajasthan-panchayat-elections-fourteen-thousand-panchayats-seventy-thousand-hopefuls-49661 · **Language:** Hindi
**Tags:** राजस्थान पंचायत चुनाव, सरपंच चुनाव, पंचायती राज, ग्राम पंचायत, मनरेगा मजदूरी, राजस्थान राजनीति, सरपंच मानदेय

राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में पंचायती राज चुनाव को लेकर चुनावी सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच गई है। नामांकन प्रक्रिया के दौरान सरपंच पद के लिए सामने आ रहे आंकड़ों से चुनावी मुकाबले की एक दिलचस्प तस्वीर उभरकर सामने आ रही है। अब तक दाखिल किए गए नामांकन पत्रों के विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ है कि प्रत्येक ग्राम पंचायत में औसतन पांच उम्मीदवार मैदान में उतरे हुए हैं। इस हिसाब से अगर प्रदेश की कुल चौदह हजार चार सौ तीन ग्राम पंचायतों का समग्र गणित देखा जाए तो करीब बहत्तर हजार दावेदार सरपंच की कुर्सी हासिल करने की दौड़ में शामिल हैं। सबसे खास बात यह है कि इस पद से जुड़ा आधिकारिक मानदेय महज सात हजार तीन सौ छियालीस रुपये प्रति माह है। इसके बावजूद गांवों की सत्ता में अपनी मजबूत पकड़ बनाने के लिए लोग चुनाव मैदान में उतरने को बेताब हैं।

 

## कम मानदेय और लाखों का भारी भरकम चुनावी खर्च

दूसरी तरफ अगर मनरेगा योजना की वास्तविक स्थिति पर नजर डाली जाए तो तीस दिन लगातार काम करने वाला एक आम मजदूर आठ हजार दो सौ अस्सी रुपये तक की कमाई आसानी से कर सकता है। इस बात को जानते हुए भी ग्रामीण क्षेत्रों के ये दावेदार चुनाव जीतने के लिए लाखों रुपये पानी की तरह बहाने के लिए पूरी तरह तैयार नजर आ रहे हैं। विभिन्न चुनावी प्रबंधों, जनसंपर्क अभियानों और प्रचार-प्रसार के अन्य इंतजामों पर पांच लाख रुपये से लेकर बीस लाख रुपये तक का भारी खर्च होने का पूरा अनुमान लगाया जा रहा है। ऐसे में यह सवाल हर किसी के मन में उठना स्वाभाविक है कि जब एक सरपंच को मिलने वाला मासिक मानदेय मनरेगा के तहत काम करने वाले आम मजदूर की महीनेभर की कमाई से भी कम है, तब आखिर इस पद को पाने के लिए लोगों के भीतर इतना अधिक जुनून और उत्साह क्यों बना हुआ है।

 

## विकास कार्यों और सामाजिक प्रभाव का बड़ा आकर्षण

प्रदेश की चौदह हजार चार सौ तीन ग्राम पंचायतों में सरपंच बनने की यह होड़ वास्तव में ग्रामीण राजनीति के गहरे प्रभाव को दर्शाती है। कई ग्राम पंचायतों में यह चुनावी मुकाबला बेहद रोचक और कड़ा होने की पूरी संभावना जताई जा रही है। चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए हर गांव और हर ढाणी तक पहुंचना, मतदाताओं से सीधा संपर्क साधना और प्रचार की तमाम व्यवस्थाएं संभालना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। इसके बावजूद इसके लिए भारी-भरकम राशि खर्च करने से भी लोग पीछे नहीं हट रहे हैं। सरपंच पद का मुख्य आकर्षण केवल मिलने वाले मानदेय तक बिल्कुल सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रशासनिक ताकत भी बड़ी वजह है। गांव के विकास कार्यों को आगे बढ़ाने, तमाम सरकारी योजनाओं को धरातल पर लागू कराने और स्थानीय स्तर की समस्याओं के त्वरित समाधान में सरपंच की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है। इसके अलावा गांव में होने वाले तमाम सामाजिक और सार्वजनिक मामलों में भी सरपंच की राय और उसका सीधा दखल बहुत महत्वपूर्ण समझा जाता है। यही मुख्य वजह है कि बेहद कम मानदेय मिलने के बावजूद इस पद के लिए उम्मीदवारों की संख्या में लगातार भारी इजाफा देखा जा रहा है।

 

## मानदेय और चुनावी व्यय के बीच का भारी अंतर

नियमों के मुताबिक एक सरपंच को हर महीने सात हजार तीन सौ छियालीस रुपये का मानदेय प्रदान किया जाता है। वहीं दूसरी तरफ मनरेगा मजदूर की दैनिक मजदूरी दो सौ छिहत्तर रुपये के हिसाब से तीस दिनों की कुल कमाई आठ हजार दो सौ अस्सी रुपये बैठती है। सरल शब्दों में कहें तो सरपंच का मासिक मानदेय मनरेगा के एक साधारण मजदूर की तीस दिन की कुल मजदूरी से भी नौ सौ तैंतीस रुपये कम बैठता है। हालांकि पंचायत की आधिकारिक बैठक में हिस्सा लेने पर सरपंच को दो सौ छिहत्तर रुपये प्रति बैठक के हिसाब से भत्ता जरूर दिया जाता है। इसके विपरीत चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को जनसंपर्क और प्रचार अभियानों पर बहुत बड़ी रकम खर्च करनी पड़ रही है। कुछ पूर्व और वर्तमान उम्मीदवारों के अनुसार चुनावी खर्च आसानी से पांच लाख रुपये से बीस लाख रुपये के आंकड़े को छू सकता है। पूर्व सरपंच रामलाल का इस बारे में कहना है कि उन्हें अपने पूरे पांच साल के कार्यकाल में मानदेय के रूप में कुल चार लाख चालीस हजार रुपये के करीब राशि मिली थी, जबकि इस बार के चुनाव में प्रचार पर ही पांच लाख रुपये से अधिक खर्च हो चुके हैं। इस प्रकार का यथार्थ जनप्रतिनिधियों को मिलने वाले मानदेय और चुनावी खर्च के बीच के भारी अंतर को पूरी तरह उजागर कर देता है।

 

## मानदेय बढ़ाने की उठी पुरजोर मांग

इस आर्थिक विसंगति को देखते हुए राजस्थान सरपंच संघ के प्रदेशाध्यक्ष बंशीधर ने मांग उठाई है कि सरपंचों का मासिक मानदेय कम से कम तीस हजार से पैंतीस हजार रुपये तक किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि सरपंच न केवल तमाम ग्रामीण विकास कार्यों को संभालते हैं बल्कि सामाजिक और सार्वजनिक मामलों में भी अपनी पूरी जिम्मेदारी निभाते हैं। मौजूदा मानदेय के जरिए इन सभी बड़ी जिम्मेदारियों के अनुरूप व्यावहारिक आर्थिक जरूरतें पूरी करना पूरी तरह असंभव हो चुका है। संघ ने विधायकों की तर्ज पर सरपंचों के लिए भी एक निश्चित पेंशन का प्रावधान किए जाने की मांग प्रमुखता से उठाई है। दौसा से सांसद मुरारी लाल मीणा ने भी सरपंचों का मानदेय बढ़ाने की सख्त जरूरत पर विशेष जोर दिया है। उनका कहना है कि गांवों के समग्र विकास, जटिल जनसमस्याओं के समाधान और तमाम कल्याणकारी योजनाओं को जरूरतमंदों तक पहुंचाने में सरपंच रीढ़ की हड्डी की तरह काम करते हैं। इसलिए ग्रामीण जनप्रतिनिधियों को उचित आर्थिक संबल प्रदान करने के लिए उनके मानदेय में और अधिक बढ़ोतरी की जानी बेहद जरूरी है।

## इसका आप पर असर
राजस्थान के पंचायती राज चुनावों का सीधा असर ग्रामीण क्षेत्रों के विकास कार्यों, स्थानीय योजनाओं और प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ेगा।

- **राजस्थान में:** चौदह हजार से अधिक ग्राम पंचायतों में नए नेतृत्व के आने से ग्रामीण विकास की प्राथमिकताओं और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की दिशा तय होगी। स्थानीय मतदाताओं को अपने क्षेत्र के विकास के लिए सरपंच चुनने का सीधा अवसर मिल रहा है।

- **आम मतदाताओं पर:** चुनाव के दौरान भारी खर्च और कम मानदेय जैसे मुद्दे ग्रामीण राजनीति की आर्थिक वास्तविकताओं को सामने लाते हैं। इससे स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और उनके अधिकारों को लेकर चल रही बहस पर भी सीधा असर पड़ता है।

## ऐसा क्यों हुआ
राजस्थान में सरपंच पद के लिए भारी संख्या में उम्मीदवारों के उतरने के पीछे प्रशासनिक ताकत और सामाजिक प्रतिष्ठा मुख्य कारण हैं। कम मानदेय के बावजूद लोग इस पद के लिए बड़े पैमाने पर पैसा खर्च करने को तैयार रहते हैं।

- **सामाजिक प्रभाव और अधिकार:** सरपंच गांव के विकास कार्यों को मंजूरी दिलाने और स्थानीय विवादों को सुलझाने में अहम भूमिका निभाते हैं, जिससे उन्हें समाज में बड़ा रुतबा मिलता है।

- **सरकारी योजनाओं का संचालन:** केंद्र और राज्य सरकार की ग्रामीण योजनाओं को धरातल पर लागू कराने में सरपंच की सीधी भागीदारी होती है।

- **मानदेय की सीमाएं:** वर्तमान में मिलने वाला सात हजार तीन सौ छियालीस रुपये का मानदेय मनरेगा मजदूर की कमाई से भी कम है, जिसके चलते सरपंच संघ ने मानदेय बढ़ाने और पेंशन की मांग उठाई है।

## सवाल-जवाब

### 1. राजस्थान में कुल कितनी ग्राम पंचायतों में चुनाव हो रहे हैं?
राजस्थान में चौदह हजार चार सौ तीन ग्राम पंचायतों के लिए चुनाव प्रक्रिया चल रही है।

### 2. सरपंच पद के लिए कुल कितने दावेदार मैदान में हैं?
प्रदेश की सभी ग्राम पंचायतों में कुल मिलाकर करीब बहत्तर हजार दावेदार सरपंच बनने की दौड़ में शामिल हैं।

### 3. सरपंच को हर महीने कितना मानदेय मिलता है?
एक सरपंच को आधिकारिक तौर पर सात हजार तीन सौ छियालीस रुपये प्रति माह मानदेय दिया जाता है।

### 4. मनरेगा मजदूर की तीस दिन की कमाई कितनी बैठती है?
मनरेगा के तहत एक मजदूर की तीस दिन की कुल कमाई आठ हजार दो सौ अस्सी रुपये तक हो सकती है।

### 5. सरपंच संघ ने मानदेय बढ़ाकर कितना करने की मांग की है?
राजस्थान सरपंच संघ ने मानदेय को बढ़ाकर कम से कम तीस हजार से पैंतीस हजार रुपये प्रति माह करने की मांग उठाई है।

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