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  "title": "राजसमंद के केलवा में महिलाओं ने हाथों से गढ़ीं 21 मिट्टी की गणेश प्रतिमाएं, दिया प्रकृति बचाने का संदेश",
  "summary": "राजसमंद के केलवा कस्बे में गणेश उत्सव से पहले महिलाओं ने मिलकर हाथों से 21 मिट्टी की गणेश प्रतिमाएं बनाईं और पर्यावरण बचाने का संदेश दिया.",
  "content": "राजसमंद जिले के केलवा कस्बे में गणेश उत्सव शुरू होने से ठीक पहले पर्यावरण बचाने की एक खास मुहिम देखने को मिली, जहां कस्बे की महिलाओं ने अपने हाथों से शुद्ध प्राकृतिक मिट्टी से गणेश प्रतिमाएं गढ़ीं. यह पूरा आयोजन स्वच्छ केलवा, हरित केलवा मुहिम के तहत स्थानीय नीलकंठ महादेव मंदिर और रामपोल दरवाजा परिसर में हुआ, जहां आओ मिट्टी के गणपति बनाएं नाम से एक विशेष कार्यक्रम रखा गया था. इस आयोजन ने न सिर्फ धार्मिक उत्साह भरा, बल्कि पर्यावरण बचाने का एक मजबूत संदेश भी दिया.\n\nबिना सांचे और केमिकल के गढ़ीं 21 मूर्तियां\nकेलवा की महिलाएं इस कार्यक्रम में बड़ी तादाद में पहुंचीं और पूरे जोश के साथ इसमें शामिल हुईं. पारंपरिक उल्लास के बीच उन्होंने अपने हुनर और कला का इस्तेमाल करते हुए हाथों से करीब 21 मनमोहक गणेश प्रतिमाएं तैयार कीं. खास बात यह रही कि इन मूर्तियों को बनाने में न तो किसी सांचे का इस्तेमाल हुआ और न ही किसी तरह के केमिकल का इस्तेमाल हुआ. हर प्रतिमा को पूरी श्रद्धा और तल्लीनता के साथ गढ़ा गया था, और इसमें महिलाओं की आस्था तथा कलात्मकता दोनों साफ नजर आ रही थीं. इस रचनात्मक गतिविधि ने पूरे मंदिर परिसर का माहौल पूरी तरह भक्तिमय और खुशनुमा बना दिया.\n\nपीओपी और रासायनिक रंगों से पानी को खतरा\nकार्यक्रम की संयोजक मीना रजक ने वहां मौजूद लोगों को इस पहल के मकसद के बारे में विस्तार से बताया. उन्होंने कहा कि बाजार में मिलने वाली प्लास्टर ऑफ पेरिस यानी पीओपी और जहरीले रासायनिक रंगों से बनी गणेश प्रतिमाएं पानी के स्रोतों और पर्यावरण को गहरा नुकसान पहुंचाती हैं. उनके मुताबिक विसर्जन के दौरान ऐसी मूर्तियों में मौजूद तत्व पानी में घुलकर उसे दूषित कर देते हैं, जिसका सीधा असर जलीय जीवों और इंसानों की सेहत पर पड़ता है. इसके उलट, शुद्ध मिट्टी से बनी प्रतिमाएं विसर्जन के बाद पानी में आसानी से घुल जाती हैं और किसी तरह का प्रदूषण नहीं फैलातीं. इसी वजह से मिट्टी के गणपति को पर्यावरण के लिहाज से सबसे सुरक्षित विकल्प बताया गया.\n\nआस्था के साथ प्रकृति बचाने का संदेश\nआयोजकों ने कार्यक्रम के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की कि आस्था के साथ प्रकृति की रक्षा भी की जा सकती है. उनका कहना था कि गणेश उत्सव हमारी संस्कृति का बेहद अहम हिस्सा है, लेकिन इसे धूमधाम से मनाने के लिए प्रकृति को नुकसान पहुंचाना जरूरी नहीं है. मौजूद लोगों को यह भी समझाया गया कि पर्यावरण के प्रति हर किसी की कुछ नैतिक जिम्मेदारियां बनती हैं, और इन जिम्मेदारियों को निभाकर ही आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ और सुरक्षित धरती सौंपी जा सकती है. आयोजकों ने इस बात पर जोर दिया कि छोटे-छोटे कदम उठाकर भी बड़ा बदलाव लाया जा सकता है.\n\nइको-फ्रेंडली गणेश उत्सव मनाने का संकल्प\nकार्यक्रम के आखिर में सभी प्रतिभागियों और वहां मौजूद नागरिकों ने मिलकर एक सामूहिक संकल्प लिया. उन्होंने तय किया कि इस साल पूरी तरह इको-फ्रेंडली तरीके से गणेश उत्सव मनाएंगे. इसके साथ ही उन्होंने आसपास के दूसरे लोगों को भी रासायनिक मूर्तियों को छोड़कर मिट्टी के गणपति अपनाने के लिए प्रेरित करने का प्रण लिया. केलवा कस्बे में हुई इस अनूठी पहल की पूरे क्षेत्र में खूब सराहना हो रही है, और इसे पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाने वाला एक प्रेरक कदम बताया जा रहा है.\n\nइसका आप पर असर\nयह पहल आम लोगों के लिए गणेश उत्सव को थोड़ा और पर्यावरण के अनुकूल बनाने की एक व्यावहारिक राह दिखाती है.\n\n• भारत में: पीओपी और रासायनिक रंगों वाली मूर्तियों की जगह मिट्टी के गणपति चुनने से नदियों, तालाबों और झीलों का पानी दूषित होने से बचाया जा सकता है. हर साल मूर्ति खरीदने वाले परिवार इस साल से मिट्टी और बिना केमिकल रंग वाली प्रतिमा चुनकर सीधे योगदान दे सकते हैं.\n• राजसमंद-केलवा में: केलवा जैसे कस्बों में स्थानीय जल स्रोतों पर विसर्जन का सीधा असर पड़ता है, इसलिए वहां के निवासी इस मुहिम से जुड़कर पानी की गुणवत्ता बेहतर बनाए रख सकते हैं. मूर्ति बनाना सीखने के इच्छुक लोग नीलकंठ महादेव मंदिर परिसर जैसी जगहों पर होने वाले ऐसे कार्यक्रमों से मुफ्त में सीख सकते हैं.\n• बच्चों और परिवारों के लिए: घर पर मिट्टी से गणपति बनाना बच्चों को कला के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी भी सिखा सकता है. यह एक ऐसी आदत बन सकती है जो अगली पीढ़ी तक आसानी से पहुंचाई जा सकती है.\n• सेहत पर असर: रासायनिक रंगों से दूषित पानी के संपर्क में आने से त्वचा और सेहत संबंधी दिक्कतें हो सकती हैं, इसलिए मिट्टी की मूर्ति चुनना परिवार की सेहत बचाने से भी सीधे जुड़ा है.\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह कार्यक्रम इसलिए आयोजित हुआ क्योंकि हर साल गणेश उत्सव के दौरान बाजार में बिकने वाली पीओपी और रासायनिक रंगों से बनी मूर्तियां जल स्रोतों को नुकसान पहुंचाती आई हैं, और आयोजकों ने इसे रोकने के लिए लोगों को सीधे जोड़कर मिट्टी की मूर्तियां बनाना सिखाने का रास्ता चुना.\n\n• सीधा कारण: संयोजक मीना रजक के मुताबिक पीओपी और जहरीले रासायनिक रंगों से बनी प्रतिमाएं विसर्जन के दौरान पानी में घुलकर उसे दूषित करती हैं, जिससे जलीय जीवों और इंसानों की सेहत को खतरा होता है.\n• पृष्ठभूमि: स्वच्छ केलवा, हरित केलवा मुहिम पहले से केलवा में पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर काम करती रही है, और इसी मुहिम के तहत गणेश उत्सव से पहले यह विशेष कार्यक्रम रखा गया.\n• उद्देश्य: आयोजकों का मकसद था कि लोग आस्था और परंपरा बनाए रखते हुए भी प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना उत्सव मनाना सीखें.\n• आगे क्या: कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने इस साल इको-फ्रेंडली गणेश उत्सव मनाने और दूसरों को भी मिट्टी की मूर्तियां अपनाने के लिए प्रेरित करने का संकल्प लिया है.\n\nसवाल-जवाब\n\n1. केलवा में यह कार्यक्रम कब और कहां आयोजित हुआ?\nयह कार्यक्रम गणेश उत्सव से ठीक पहले राजसमंद जिले के केलवा कस्बे के नीलकंठ महादेव मंदिर और रामपोल दरवाजा परिसर में आयोजित हुआ.\n\n2. कार्यक्रम में कितनी गणेश प्रतिमाएं बनाई गईं?\nमहिलाओं ने हाथों से करीब 21 मिट्टी की गणेश प्रतिमाएं तैयार कीं.\n\n3. इस पहल का आयोजन किस मुहिम के तहत हुआ?\nयह स्वच्छ केलवा, हरित केलवा मुहिम के तहत आओ मिट्टी के गणपति बनाएं कार्यक्रम के रूप में हुआ.\n\n4. प्रतिमाएं बनाने में किन चीजों का इस्तेमाल नहीं किया गया?\nप्रतिमाएं बिना किसी सांचे या केमिकल के, सिर्फ शुद्ध प्राकृतिक मिट्टी से हाथों से बनाई गईं.\n\n5. कार्यक्रम की संयोजक कौन थीं?\nकार्यक्रम की संयोजक मीना रजक थीं.\n\n6. पीओपी और रासायनिक रंगों वाली मूर्तियां पर्यावरण को कैसे नुकसान पहुंचाती हैं?\nविसर्जन के दौरान इनमें मौजूद तत्व पानी में घुलकर उसे दूषित कर देते हैं, जिससे जलीय जीवों और इंसानों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है.\n\n7. कार्यक्रम के अंत में लोगों ने क्या संकल्प लिया?\nउन्होंने इस साल पूरी तरह इको-फ्रेंडली गणेश उत्सव मनाने और दूसरों को भी मिट्टी के गणपति अपनाने के लिए प्रेरित करने का संकल्प लिया.\n\nप्रेरणा और सबक\nकेलवा की महिलाओं की यह पहल दिखाती है कि छोटे स्तर पर उठाया गया कदम भी बड़ा बदलाव ला सकता है.\n\n• सामूहिक भागीदारी की ताकत: अकेले शिकायत करने की बजाय महिलाओं ने मिलकर खुद मूर्तियां बनाईं और समाधान पेश किया.\n• हुनर का सही इस्तेमाल: उन्होंने अपनी कला और हाथों के हुनर को पर्यावरण बचाने के मकसद से जोड़ा, जिससे परंपरा और जिम्मेदारी दोनों साथ निभ सकीं.\n• जागरूकता से शुरुआत: मीना रजक ने पहले लोगों को पीओपी के नुकसान समझाए, फिर उन्हें विकल्प खुद आजमाने का मौका दिया, जो असरदार जागरूकता का एक उदाहरण है.\n• संकल्प को कार्रवाई में बदलना: कार्यक्रम सिर्फ चर्चा तक सीमित नहीं रहा, प्रतिभागियों ने आगे भी दूसरों को प्रेरित करने का ठोस संकल्प लिया.",
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  "category": "राजस्थान",
  "publishedAt": "2026-09-08",
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