रेगिस्तान के धोरों पर 12 वर्षों की अटूट प्रतीक्षा, बीकानेर के बालकनाथ धाम की अनूठी गाथा बीकानेर से 15 किलोमीटर दूर 180 फीट ऊंचे रेतीले टीले पर स्थापित बालकनाथ मंदिर में आज भी दही-बाटी का विशेष भोग लगाया जाता है, जो एक बालक की मां के प्रति 12 साल लंबी प्रतीक्षा और आस्था का प्रतीक है। राजस्थान के विशाल थार रेगिस्तान में फैले ऊंचे रेतीले टीले सिर्फ अपने प्राकृतिक आकर्षण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके आंचल में सदियों पुरानी आस्था और लोकगाथाएं समाई हुई हैं। बीकानेर शहर से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर रेत के घने धोरों के बीच स्थित बालकनाथ जी का पवित्र मंदिर ऐसा ही एक अनूठा श्रद्धा केंद्र है। 'बालकियां धोरा' नाम से प्रसिद्ध यह पावन स्थल लगभग 500 वर्ष पुराना इतिहास समेटे हुए है। इस तीर्थ की पृष्ठभूमि में एक मासूम बच्चे का अपनी मां के प्रति अटूट विश्वास, अगाध प्रतीक्षा और कठिन साधना जुड़ी हुई है, जिसका स्मरण करते ही दर्शनार्थियों की आंखें नम हो जाती हैं। अकाल के दौर में एक मां का वचन और मासूम की निष्ठा क्षेत्रीय लोकमान्यताओं और सदियों पुरानी परंपराओं के मुताबिक, कई सौ साल पहले जब इस पूरे मरुस्थलीय इलाके में भयानक सूखा और अकाल पड़ा था, तब जीवनयापन का गहरा संकट खड़ा हो गया था। उसी भीषण विपदा के समय एक बेबस मां ने अपने नन्हे बालक को जंगल के इसी ऊंचे रेतीले टीले पर सुरक्षित बैठा दिया था। वहां से जाते वक्त मां ने अपने बेटे से वादा किया था कि वह उसके लिए भोजन के रूप में दही-बाटी का प्रबंध करके बहुत जल्द लौट आएगी। अपनी मां के वचनों पर पूर्ण विश्वास करते हुए वह मासूम बच्चा उसी धोरे पर बैठ गया और अपनी मां के कदमों की आहट सुनने का इंतजार करने लगा। किसी मजबूरी या विपत्ति के चलते मां समय पर वापस नहीं पहुंच सकी, परंतु बालक अपनी जगह से तनिक भी विचलित नहीं हुआ। वह बिना किसी शिकायत के लगातार 12 वर्षों तक उसी स्थान पर अडिग बैठकर अपनी मां की प्रतीक्षा करता रहा। 12 वर्ष बाद पुनरागमन और तपोभूमि की प्रतिष्ठा करीब 12 वर्षों का लंबा कालखंड बीतने के बाद जब मां उस रेतीले धोरे पर वापस पहुंची, तो यह देखकर स्तब्ध रह गई कि उसका पुत्र आज भी उसी स्थान पर वैसे ही बैठा हुआ है। बालक ने अपनी मां को सामने देखते ही सबसे पहले अपने उसी प्रिय भोजन यानी दही-बाटी के बारे में पूछा, जिसका वादा मां ने जाते समय किया था। इसके बाद मां जब एक बार फिर दही-बाटी की तलाश में वहां से गई और लौटकर नहीं आई, तो बालक ने उसी टीले पर अपने प्राण त्याग दिए। एक बालक द्वारा अपनी मां के वचनों के लिए की गई इस असाधारण तपस्या और प्रतीक्षा के कारण यह पावन टीला बालकनाथ जी की तपोभूमि के रूप में विख्यात हो गया। जन-जन में इस स्थल की पहचान 'बालकियां धोरा' के नाम से स्थापित हो गई। 180 फीट ऊंचे टीले पर दही-बाटी अर्पण की अनूठी परंपरा अम्बासर गांव से पहले और कोटड़ी गांव के समीप जंगल में धरातल से लगभग 180 फीट ऊंचे रेत के धोरे पर अवस्थित इस मंदिर का परिवेश अत्यंत शांत और विहंगम दृश्य प्रस्तुत करता है। मंदिर की देखरेख करने वाले सेवक संत संतोष दास महाराज, जो पिछले सात वर्षों से लगातार इस पावन धाम में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, बताते हैं कि यहां की सर्वप्रमुख धार्मिक परंपरा बालकनाथ जी को दही-बाटी का विशेष नैवेद्य अर्पित करना है। श्रद्धालुओं के बीच यह अटूट विश्वास है कि जो भी भक्त यहां सच्चे हृदय से अपनी अरदास लगाता है और दही-बाटी का भोग चढ़ाता है, उसकी हर मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। विशेष तौर पर संतान सुख की कामना रखने वाले नवदंपती और परिवार दूर-दराज के इलाकों से यहां मत्था टेकने और आशीर्वाद पाने पहुंचते हैं। इसका आप पर असर रेगिस्तानी परंपरा और लोकआस्था में रुचि रखने वाले श्रद्धालुओं और यात्रियों के लिए इस मंदिर की जानकारी विशेष महत्व रखती है। • राजस्थान में: बीकानेर और आसपास के क्षेत्रों के लोग इस पावन स्थल पर अपनी पारिवारिक सुख-समृद्धि की प्रार्थना करने जा सकते हैं। मंदिर बीकानेर शहर से मात्र 15 किलोमीटर दूर अम्बासर और कोटड़ी गांव के पास स्थित होने से स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए आसानी से सुलभ है। • भारत में: देश भर से लोकधार्मिक स्थलों और मरुस्थलीय तीर्थों की यात्रा करने वाले पर्यटक अपनी यात्रा सूची में इस 500 साल पुराने टीले को जोड़ सकते हैं। थार मरुस्थल की अनोखी सांस्कृतिक धरोहर और ग्रामीण परिवेश का अनुभव लेने के इच्छुक लोगों के लिए यह एक शांतिपूर्ण गंतव्य है। • श्रद्धालुओं के लिए: संतान प्राप्ति और मनोकामना पूर्ति की इच्छा रखने वाले दंपतियों के लिए यह आस्था का विशेष केंद्र माना जाता है। यहां पूजा-अर्चना के दौरान परंपरा अनुसार दही-बाटी का विशेष नैवेद्य अर्पित किया जाता है। • यात्रा योजना: 180 फीट ऊंचे टीले पर स्थित होने के कारण प्राकृतिक शांति चाहने वाले यात्रियों को यहां चढ़ाई और मरुस्थलीय वातावरण का ध्यान रखकर योजना बनानी चाहिए। शांत माहौल में ध्यान और दर्शन के लिए यह स्थान उपयुक्त है। ऐसा क्यों हुआ यह पावन स्थल सदियों पहले भीषण प्राकृतिक आपदा के दौरान उपजी एक मानवीय परिस्थिति और अटूट भक्ति के चलते अस्तित्व में आया। • भीषण सूखा और अकाल: सैकड़ों वर्ष पूर्व इस इलाके में पड़े भयंकर अकाल के कारण भुखमरी की स्थिति बनी थी, जिससे विवश होकर मां को बालक को टीले पर छोड़ना पड़ा था। भोजन की तलाश में मां द्वारा दही-बाटी लाने का वादा इस पूरी गाथा की शुरुआत बना। • बालक का अडिग विश्वास: मां के वचनों को अंतिम सत्य मानकर बालक ने किसी भी परिस्थिति में उस स्थान को नहीं छोड़ा। लगातार 12 वर्षों तक एक ही स्थान पर भूखे-प्यासे बैठे रहना उसकी अद्वितीय तपस्या बन गया। • पुनरागमन और देहत्याग: वर्षों बाद जब मां वापस लौटी और दोबारा भोजन लाने जाकर फिर नहीं आ सकी, तो बालक ने उसी टीले पर प्राण त्याग दिए। इस घटना ने उस साधारण रेतीले टीले को लोकआस्था की तपोभूमि में परिवर्तित कर दिया। सवाल-जवाब 1. बालकनाथ जी का यह मंदिर कहां स्थित है? यह मंदिर राजस्थान के बीकानेर शहर से लगभग 15 किलोमीटर दूर, अम्बासर गांव से पहले और कोटड़ी गांव के पास रेतीले धोरे पर स्थित है। 2. इस रेतीले टीले का नाम 'बालकियां धोरा' कैसे पड़ा? एक बालक द्वारा अपनी मां के वादे पर लगातार 12 वर्षों तक इसी धोरे पर बैठकर तपस्या करने और प्राण त्यागने के कारण इसका नाम बालकियां धोरा पड़ा। 3. मंदिर कितना पुराना है और यह धोरा जमीन से कितना ऊंचा है? यह पावन मंदिर करीब 500 साल पुराना है और यह जमीन से लगभग 180 फीट ऊंचे रेत के धोरे पर बना हुआ है। 4. बालकनाथ जी के मंदिर में किस विशेष वस्तु का भोग लगाया जाता है? मंदिर में मुख्य रूप से दही-बाटी का भोग लगाया जाता है, क्योंकि मां ने बालक से दही-बाटी लाने का वादा किया था। 5. श्रद्धालु यहां मुख्य रूप से किस मनोकामना के लिए आते हैं? मान्यता है कि यहां अर्जी लगाने से हर मनोकामना पूरी होती है, विशेषकर संतान प्राप्ति की कामना लेकर दूर-दूर से दंपती यहां शीश झुकाने पहुंचते हैं। 6. वर्तमान में मंदिर की सेवा का दायित्व कौन संभाल रहे हैं? संत संतोष दास महाराज पिछले सात वर्षों से इस मंदिर के सेवक के रूप में निरंतर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। https://trendkia.com/rajasthan/registana-ke-dhoron-para-12-varshon-ki-atuta-pratiksha-bikaner-ke-balaknath-dhama-ki-anuthi-gatha-54800 TrendKia — Har trend, sabse pehle.