रियासती दौर का अखाड़ा आज भी गुलजार, जसवंत मेले में ब्रज केसरी बनने को जोर आजमाइश राजस्थान के भरतपुर में शाही दौर से चली आ रही पारंपरिक दंगल और कुश्ती की रवायत आज भी जसवंत मेले में पूरी भव्यता के साथ जिंदा है, जहां देश भर के पहलवान जुटते हैं। राजस्थान के ऐतिहासिक जिले भरतपुर में राजा-महाराजाओं के दौर से शुरू हुई देसी कुश्ती और पारंपरिक दंगल की अनूठी विरासत आज भी पूरी शान के साथ जिंदा है। बदलते जमाने के साथ आधुनिक खेलों की चमक-दमक भले ही बढ़ गई हो, लेकिन भरतपुर की मिट्टी में रची-बसी अखाड़ा संस्कृति का रोमांच आज भी कम नहीं हुआ है। हर साल आयोजित होने वाले प्रसिद्ध जसवंत प्रदर्शनी एवं पशु मेले के दौरान सजने वाला अखाड़ा इस प्राचीन परंपरा को नई ऊर्जा देता है। इस ऐतिहासिक मेले में देश के अलग-अलग हिस्सों से नामी और दिग्गज पहलवान पहुंचते हैं, जो मिट्टी के अखाड़े में अपनी ताकत, दांव-पेच, फुर्ती और अद्वितीय तकनीक का शानदार मुजाहिरा पेश करते हैं। प्रतिष्ठित खिताबों के लिए पहलवानों में जोरदार भिड़ंत जसवंत मेले के दंगल का मुख्य आकर्षण वे प्रतिष्ठित खिताब हैं, जिन्हें जीतने का सपना हर पहलवान देखता है। अखाड़े में उतरने वाले पहलवानों के बीच मुख्य रूप से जसवंत केसरी, ब्रज केसरी और भरतपुर केसरी जैसे सम्मानित खिताबों को अपने नाम करने के लिए कड़ा मुकाबला होता है। इन गौरवशाली टाइटल्स को हासिल करने के लिए नामी मल्ल आमने-सामने होते हैं और एक-दूसरे को पटखनी देने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक देते हैं। जैसे-जैसे कुश्ती के मुकाबले आगे बढ़ते हैं और पहलवान दांव-पेच की कलाबाजियां दिखाते हैं, दर्शकों का रोमांच भी चरम पर पहुंच जाता है। अखाड़े में गूंजती तालियां और दर्शकों का जोश इस दंगल का मुकाबला केवल शारीरिक बल की आजमाइश तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह सदियों पुरानी खेल परंपरा और समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का सजीव रूप है। अखाड़े के चारों ओर हजारों की तादाद में खेल प्रेमी और स्थानीय नागरिक जुटते हैं। हर सफल दांव और रोमांचक दांव-पेच पर दर्शकों की तालियां और सीटियां पहलवानों का हौसला कई गुना बढ़ा देती हैं। मिट्टी की सौंधी खुशबू के बीच पहलवान अपनी वर्षों की कड़ी मेहनत, कठोर अनुशासन और नियमित अभ्यास का निचोड़ मैदान में उड़ेल देते हैं, जिससे पूरा वातावरण खेल के उत्सव में तब्दील हो जाता है। नई पीढ़ी को मिट्टी से जोड़ रही है यह शाही परंपरा भरतपुर की यह कुश्ती परंपरा नई पीढ़ी के युवाओं को पारंपरिक और देसी खेलों की ओर आकर्षित करने में बेहद अहम भूमिका निभा रही है। स्थानीय स्तर पर चलने वाले अखाड़ों में घंटों पसीना बहाने वाले युवा पहलवान अपने पूर्वजों की इस विरासत को आगे बढ़ाने के लिए दिन-रात अभ्यास कर रहे हैं। अनुशासन, लगन और कठोर दिनचर्या के बल पर युवा मल्ल इस क्षेत्र में अपनी अलग पहचान गढ़ने में लगे हैं। इस तरह के बड़े आयोजनों से स्थानीय और उभरती खेल प्रतिभाओं को अपनी क्षमता साबित करने और राष्ट्रीय पटल पर चमकने का बेहतरीन मंच मिलता है। राजशाही के जमाने से लगातार चली आ रही यह रवायत आज भी भरतपुर के सांस्कृतिक गौरव को बनाए रखे हुए है। इसका आप पर असर यह पारंपरिक आयोजन स्थानीय खेल संस्कृति को जीवित रखने और नई पीढ़ी को देसी खेलों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। • राजस्थान में: राज्य के पारंपरिक खेलों और मेलों को देखने आने वाले पर्यटकों तथा दर्शकों के लिए यह सांस्कृतिक आकर्षण का बड़ा केंद्र है। इससे स्थानीय लोक परंपराओं और क्षेत्रीय मेलों की ऐतिहासिक पहचान मजबूत होती है। • भरतपुर में: स्थानीय अखाड़ों में अभ्यास करने वाले युवा पहलवानों को अपनी प्रतिभा दिखाने और पहचान बनाने का मंच मिलता है। इससे शहर की पहचान पारंपरिक कुश्ती के प्रमुख केंद्र के रूप में और पुख्ता होती है। • खेल प्रेमियों के लिए: दर्शकों को बिना किसी आधुनिक औपचारिकता के सीधे मिट्टी के अखाड़े में उच्च स्तरीय कुश्ती का रोमांच देखने को मिलता है। इससे पारंपरिक खेलों के प्रति समाज में सम्मान और रुचि बढ़ती है। • पहलवानों के लिए: जसवंत केसरी और ब्रज केसरी जैसे प्रतिष्ठित खिताब जीतने से पहलवानों का मान-सम्मान बढ़ता है। यह उपलब्धि उनके खेल करियर को आगे बढ़ाने में मदद करती है। ऐसा क्यों हुआ भरतपुर में यह कुश्ती परंपरा सदियों पुराने राजसी संरक्षण और स्थानीय संस्कृति की निरंतरता के कारण आज भी जीवंत बनी हुई है। • राजसी विरासत: भरतपुर के पूर्व राजा-महाराजाओं ने शारीरिक सौष्ठव और कुश्ती को विशेष संरक्षण दिया था। उनके शासनकाल में अखाड़ों की स्थापना हुई और यह खेल क्षेत्रीय पहचान का अभिन्न हिस्सा बन गया। • मेले की ऐतिहासिकता: वार्षिक जसवंत प्रदर्शनी एवं पशु मेले के साथ दंगल को जोड़कर इसे एक औपचारिक उत्सव का रूप दिया गया। इस साझेदारी ने प्रतियोगिता को हर साल निरंतर आयोजित होने वाला मंच प्रदान किया। • अखाड़ों की सक्रियता: क्षेत्र के अखाड़ों में पीढ़ियों से चली आ रही गुरु-शिष्य परंपरा ने युवाओं को खेल से जोड़े रखा। नियमित अभ्यास और अनुशासन ने इस कला को आधुनिक दौर में भी लुप्त होने से बचाए रखा। सवाल-जवाब 1. भरतपुर में कुश्ती दंगल किस मेले के दौरान आयोजित होता है? यह पारंपरिक कुश्ती दंगल भरतपुर के प्रसिद्ध जसवंत प्रदर्शनी एवं पशु मेले के दौरान आयोजित किया जाता है। 2. इस दंगल में पहलवान किन प्रमुख खिताबों के लिए मुकाबला करते हैं? पहलवान मुख्य रूप से जसवंत केसरी, ब्रज केसरी और भरतपुर केसरी जैसे सम्मानित खिताबों के लिए जोर आजमाइश करते हैं। 3. इस कुश्ती प्रतियोगिता में कहां-कहां से पहलवान हिस्सा लेने आते हैं? इस आयोजन में स्थानीय मल्ल के अलावा देश के विभिन्न राज्यों और कोनों से जाने-माने पहलवान हिस्सा लेते हैं। 4. भरतपुर की इस कुश्ती परंपरा की शुरुआत कब हुई थी? इस परंपरा की शुरुआत भरतपुर के राजा-महाराजाओं के दौर में शाही संरक्षण के तहत हुई थी। https://trendkia.com/rajasthan/riyasati-daura-ka-akhara-aja-bhi-gulajara-jaswant-mele-men-braj-kesari-banane-ko-jora-ajamaisha-50832 TrendKia — Har trend, sabse pehle.