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  "type": "article",
  "title": "सीकर के डॉ. सुरेश कुमार वर्मा ने 51वीं बार पास की NET परीक्षा, बेटी प्रियांशी ने भी केमिस्ट्री में हासिल किए 100 फीसदी अंक",
  "summary": "राजस्थान के सीकर जिले के डॉ. सुरेश कुमार वर्मा ने 100 परसेंटाइल के साथ 51वीं बार NET परीक्षा पास कर देशभर में पहला स्थान हासिल किया है, वहीं उनकी बेटी प्रियांशी ने 12वीं बोर्ड परीक्षा में केमिस्ट्री में 100% अंक प्राप्त किए हैं।",
  "content": "राजस्थान के सीकर जिले के रूपपुरा गांव से एक बेहद असाधारण और प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जहां एक ही परिवार के पिता और बेटी ने रसायन विज्ञान (केमिस्ट्री) विषय में असाधारण अकादमिक रिकॉर्ड स्थापित किया है। जयपुर के चौमूं में स्थित राजकीय कन्या महाविद्यालय में रसायन विज्ञान के प्रोफेसर के रूप में कार्यरत डॉ. सुरेश कुमार वर्मा ने राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (NET) में 100 परसेंटाइल अंक हासिल कर पूरे देश में पहला स्थान प्राप्त किया है। यह परीक्षा NTA की ओर से आयोजित की गई थी। इसी दौरान उनकी पुत्री प्रियांशी वर्मा ने माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा आयोजित 12वीं कक्षा की परीक्षा में रसायन विज्ञान विषय के भीतर पूरे 100 प्रतिशत अंक अर्जित किए हैं। एक ही घर में रसायन विज्ञान के क्षेत्र में आई इस दोहरी और अनूठी सफलता ने पूरे क्षेत्र को गौरवान्वित कर दिया है और यह उपलब्धि इस समय चर्चा का केंद्र बनी हुई है।\n\n \n\nNET परीक्षा में 51 बार सफलता और राष्ट्रीय स्तर पर पहला स्थान\n\nडॉ. सुरेश कुमार वर्मा की यह नवीनतम सफलता जून 2026 में आयोजित हुई NET परीक्षा के परिणाम जारी होने के बाद सामने आई है। विज्ञान विषयों के इस परिणाम में उन्होंने केमिस्ट्री में 100 परसेंटाइल प्राप्त किए और राष्ट्रीय स्तर पर शीर्ष स्थान पर काबिज हुए। डॉ. वर्मा के इस शैक्षणिक सफर की सबसे खास बात यह है कि वे कोई पहली बार इस परीक्षा में सफल नहीं हुए हैं। उनका इस परीक्षा को पास करने का एक लंबा और ऐतिहासिक सिलसिला रहा है। उनके व्यक्तिगत दावों और रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 1999 से लेकर वर्ष 2026 तक की अवधि में वे कुल 51 बार NET परीक्षा पास कर चुके हैं। इस अविश्वसनीय सफर के दौरान उन्होंने कुल 18 बार अखिल भारतीय (ऑल इंडिया) स्तर पर पहला स्थान हासिल किया है।\n\nयदि हम उनके इस सफर के आंकड़ों को थोड़ा और विस्तार से देखें, तो वर्ष 2025 तक वे 48 बार CSIR NET परीक्षा क्वालिफाई कर चुके थे। उस समय तक के उनके रिकॉर्ड में 15 बार ऑल इंडिया प्रथम स्थान, 2 बार द्वितीय स्थान और 4 बार तृतीय स्थान प्राप्त करने का गौरवशाली इतिहास दर्ज था। इसके बाद उन्होंने फरवरी 2025 में आयोजित हुई NET परीक्षा में भी सफलता का परचम लहराया था। अब जून 2026 की परीक्षा में मिली शानदार कामयाबी के बाद उनके नाम कुल 51 सफलताओं का महा-रिकॉर्ड दर्ज हो चुका है, जिसमें से 18 बार वे देश में पहले स्थान पर रहे हैं। शैक्षणिक क्षेत्र में लगातार मिलने वाली इन अद्वितीय और ऐतिहासिक उपलब्धियों के चलते उनका नाम वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स और लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स जैसी प्रतिष्ठित संदर्भ पुस्तकों में भी दर्ज किया जा चुका है।\n\n \n\nGATE परीक्षा में भी लहराया सफलता का परचम\n\nडॉ. सुरेश वर्मा की प्रतिभा केवल NET परीक्षा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने देश की एक और अत्यंत कठिन और प्रतिष्ठित परीक्षा GATE में भी लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। दी गई जानकारी के अनुसार, वे अब तक कुल 25 बार GATE परीक्षा उत्तीर्ण करने का गौरव हासिल कर चुके हैं। इस परीक्षा में भी उन्होंने अपनी विषय विशेषज्ञता को साबित करते हुए तीन बार अखिल भारतीय स्तर पर पहला स्थान हासिल किया है। इससे पहले के उपलब्ध सरकारी और शैक्षणिक विवरणों में उनके द्वारा 18 बार GATE क्वालिफाई करने की बात दर्ज थी, जो अब वर्ष 2026 तक के अद्यतन (अपडेटेड) आंकड़ों के अनुसार बढ़कर कुल 25 बार हो चुकी है। लगातार इतनी कठिन परीक्षाओं में बैठना और हर बार शीर्ष पायदान पर बने रहना उनकी अद्वितीय विषयगत पकड़ को दर्शाता है।\n\n \n\nपिता की राह पर चलती बेटी प्रियांशी\n\nजहां एक तरफ पिता राष्ट्रीय स्तर पर इतिहास रच रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी बेटी प्रियांशी वर्मा भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। प्रियांशी ने राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा आयोजित की गई 12वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। उन्होंने रसायन विज्ञान (केमिस्ट्री) विषय में पूरे 100 फीसदी अंक हासिल किए हैं। यह बेहद सुखद और विस्मयकारी संयोग है कि जिस विषय को पिता ने अपने जीवन के ढाई से तीन दशक दिए और जिसके जरिए देश भर में अपनी अनूठी पहचान बनाई, उसी कठिन विज्ञान विषय में उनकी बेटी ने भी अपनी स्कूली शिक्षा के सर्वोच्च पड़ाव पर शत-प्रतिशत अंक लाकर अपनी प्रतिभा का प्रमाण दिया है। परिवार और समाज के लिए यह एक बेहद गर्व का क्षण है, जहां ज्ञान की विरासत एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में बेहद मजबूती के साथ हस्तांतरित हो रही है।\n\n \n\nपारिवारिक संघर्ष और डीआरडीओ का पद छोड़ने की कहानी\n\nडॉ. सुरेश कुमार वर्मा के इस गौरवशाली सफर के पीछे कड़ा संघर्ष और आत्मोत्सर्ग की कहानी छिपी हुई है। उनका जीवन केवल परीक्षाओं में अंक लाने और रिकॉर्ड बनाने तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि उन्होंने जीवन के बेहद कठिन दौर का डटकर मुकाबला किया है। जब वे अपनी उच्च शिक्षा यानी MSc की पढ़ाई कर रहे थे, उसी दौरान उनके पिता प्रभुदयाल वर्मा का असामयिक निधन हो गया था। इस पारिवारिक वज्रपात के बाद उनके सामने अपनी पढ़ाई जारी रखने के साथ-साथ परिवार को संभालने की एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी हो गई थी। उनके कंधों पर न केवल खुद का भविष्य बनाने की जिम्मेदारी थी, बल्कि अपने सात छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई-लिखाई और पूरे परिवार के भरण-पोषण का जिम्मा भी था।\n\nऐसी विषम परिस्थितियों में भी डॉ. वर्मा ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी पढ़ाई को बीच में नहीं छोड़ा। उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाते हुए भाई-बहनों को पढ़ाया और स्वयं भी सफलता के नए आयाम स्थापित किए। अपनी योग्यता के दम पर उनका चयन देश के बेहद प्रतिष्ठित रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी DRDO में एक वैज्ञानिक (साइंटिस्ट) के पद पर हुआ था। इसके साथ ही, उन्होंने राजस्थान प्रशासनिक सेवा (RAS) के अंतर्गत आने वाली अधीनस्थ सेवाओं में भी चयन प्राप्त किया था। इन अत्यंत आकर्षक और रसूखदार सरकारी नौकरियों के प्रस्ताव सामने होने के बावजूद डॉ. सुरेश वर्मा ने देश के भविष्य को संवारने की राह चुनी। उन्होंने शिक्षण कार्य को अपना करियर बनाया क्योंकि उनका दृढ़ विश्वास है कि एक शिक्षक के रूप में वे देश की आने वाली युवा पीढ़ी को न केवल सही दिशा दे सकते हैं बल्कि उन्हें राष्ट्र निर्माण के लिए एक बेहतर नागरिक भी बना सकते हैं।\n\n \n\nशॉर्टकट के खिलाफ युवाओं को संदेश और सीकर की शैक्षणिक विरासत\n\nडॉ. सुरेश कुमार वर्मा द्वारा लगातार NET जैसी कठिन परीक्षाएं देने और बार-बार सफलता हासिल करने के पीछे का उद्देश्य केवल अपना निजी रिकॉर्ड बनाना या प्रसिद्धि पाना नहीं है। उनका मूल उद्देश्य देश के युवाओं और छात्रों को एक बेहद गहरा और व्यावहारिक संदेश देना है। वे युवाओं से पुरजोर अपील करते हैं कि जीवन और शिक्षा में कभी भी शॉर्टकट का रास्ता नहीं चुनना चाहिए, बल्कि सही दिशा में निरंतर और सच्ची मेहनत करनी चाहिए। उनका मानना है कि शिक्षा हो या शिक्षक, दोनों के लिए निरंतर अभ्यास और कड़ा परिश्रम सबसे अनिवार्य तत्व हैं और पढ़ाई की इस प्रक्रिया को कभी भी बीच में नहीं रोकना चाहिए।\n\nडॉ. वर्मा का कहना है कि आज के तेजी से बदलते दौर में, खासकर जब देश में राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू हो चुकी है और AI जैसी आधुनिक तकनीकों का प्रसार हो रहा है, युवाओं के लिए समय-समय पर स्वयं का मूल्यांकन करते रहना बेहद आवश्यक है। उन्हें लगातार यह देखते रहना चाहिए कि वे समय की रफ्तार और आधुनिक बदलावों के साथ खुद को कहां खड़ा पाते हैं। इसके अतिरिक्त, सीकर जिले की शैक्षणिक ताकत पर बात करते हुए डॉ. वर्मा ने बताया कि राजस्थान के सरकारी महाविद्यालयों और राजकीय विद्यालयों में सीकर जिले से आने वाले सरकारी सहायक प्रोफेसर और स्कूल प्राध्यापकों की एक बहुत बड़ी तादाद कार्यरत है। शिक्षा के क्षेत्र में सीकर के युवाओं की यह निरंतर उपस्थिति और उनकी कड़ी मेहनत साफ तौर पर दिखाई देती है। रूपपुरा जैसे छोटे से गांव से निकलकर देश स्तर पर रसायन विज्ञान में सर्वोच्च मुकाम हासिल करने वाले डॉ. सुरेश वर्मा का यह सफर आने वाली कई पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।\n\nइसका आप पर असर\nइस समाचार का सामान्य पाठकों, विशेषकर छात्रों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह कहानी साबित करती है कि दृढ़ संकल्प और बिना शॉर्टकट के की गई निरंतर मेहनत से किसी भी विषय में सर्वोच्च मुकाम हासिल किया जा सकता है।\n\n• भारत भर में: देश भर के प्रतियोगी छात्रों को यह सीख मिलती है कि सफलता के लिए उम्र या अवसरों की कोई सीमा नहीं होती। निरंतर स्व-मूल्यांकन और लगातार अभ्यास ही राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में निरंतर शीर्ष पर बने रहने का एकमात्र मार्ग है।\n• राजस्थान और सीकर में: यह उपलब्धि सीकर जिले और पूरे राजस्थान के सरकारी स्कूल-कॉलेजों की शैक्षणिक गुणवत्ता को रेखांकित करती है। स्थानीय छात्रों के लिए यह एक बड़ा प्रोत्साहन है कि एक छोटे गांव के साधारण परिवेश से निकलकर भी देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं में बार-बार इतिहास रचा जा सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह असाधारण सफलता डॉ. सुरेश वर्मा की विषय के प्रति गहरी निष्ठा, उनके पारिवारिक संघर्षों से उपजी जिम्मेदारी की भावना और शैक्षणिक मूल्यांकन के प्रति उनके विशेष दृष्टिकोण के कारण संभव हो पाई है। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों को अपनी कमजोरी बनाने के बजाय अपनी ताकत बनाया।\n\n• कड़ा पारिवारिक संघर्ष: MSc की पढ़ाई के दौरान पिता के निधन के बाद डॉ. वर्मा ने न केवल अपनी शिक्षा जारी रखी, बल्कि सात छोटे भाई-बहनों की शिक्षा की जिम्मेदारी भी उठाई, जिसने उन्हें मानसिक रूप से बेहद मजबूत और अनुशासित बनाया।\n• शिक्षण के प्रति अटूट लगाव: DRDO में वैज्ञानिक और RAS अधीनस्थ सेवाओं जैसे उच्च पदों पर चयन होने के बावजूद उन्होंने अध्यापन को चुना, क्योंकि वे अगली पीढ़ी को शिक्षित कर राष्ट्र निर्माण में योगदान देना चाहते थे।\n• निरंतर स्व-मूल्यांकन की आदत: वे केवल छात्रों को पढ़ाने तक सीमित नहीं रहे, बल्कि खुद को लगातार अपडेट रखने और बदलते समय (जैसे AI और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के दौर) में अपनी योग्यता परखने के लिए हर साल परीक्षाओं में बैठते रहे।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. डॉ. सुरेश कुमार वर्मा ने NET परीक्षा कितनी बार पास की है?\nडॉ. सुरेश कुमार वर्मा ने वर्ष 1999 से 2026 तक कुल 51 बार NET परीक्षा पास की है, जिसमें उन्होंने 18 बार अखिल भारतीय स्तर पर पहला स्थान हासिल किया है।\n\n2. डॉ. सुरेश वर्मा की बेटी प्रियांशी ने क्या उपलब्धि हासिल की है?\nउनकी बेटी प्रियांशी वर्मा ने माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की 12वीं कक्षा की परीक्षा में रसायन विज्ञान (केमिस्ट्री) विषय में पूरे 100 प्रतिशत अंक हासिल किए हैं।\n\n3. डॉ. सुरेश वर्मा ने GATE परीक्षा में क्या रिकॉर्ड बनाया है?\nडॉ. सुरेश वर्मा ने अब तक कुल 25 बार GATE परीक्षा उत्तीर्ण की है, जिसमें उन्होंने तीन बार देश भर में पहला स्थान (ऑल इंडिया रैंक 1) प्राप्त किया है।\n\n4. डॉ. सुरेश वर्मा ने पूर्व में किन बड़े सरकारी पदों के प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया था?\nउनका चयन रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) में वैज्ञानिक के रूप में और राजस्थान प्रशासनिक सेवा (RAS) के अधीनस्थ पदों पर हुआ था, लेकिन उन्होंने शिक्षण को अपना करियर चुना।\n\n5. डॉ. सुरेश वर्मा वर्तमान में किस पद पर कार्यरत हैं और वे कहां के निवासी हैं?\nवे राजस्थान के सीकर जिले के रूपपुरा गांव के मूल निवासी हैं और वर्तमान में राजकीय कन्या महाविद्यालय, चौमूं, जयपुर में रसायन विज्ञान के प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं।\n\nप्रेरणा और सबक\nडॉ. सुरेश कुमार वर्मा और उनकी बेटी प्रियांशी का शैक्षणिक सफर हर उस छात्र के लिए एक मार्गदर्शक है जो जीवन में बड़ी सफलता की उम्मीद रखता है। उनके जीवन से हमें कई महत्वपूर्ण और व्यावहारिक सीख मिलती हैं।\n\n• शॉर्टकट से दूरी बनाएं: शिक्षा और करियर में सफलता का कोई बाईपास नहीं होता; सही दिशा में की गई निरंतर और कठोर मेहनत ही लंबे समय तक परिणाम देती है।\n• विषम परिस्थितियों में भी कदम न रोकें: पिता के असामयिक निधन और सात भाई-बहनों की जिम्मेदारी जैसी बड़ी पारिवारिक चुनौतियों के बावजूद डॉ. वर्मा ने पढ़ाई नहीं छोड़ी, जो विपरीत समय में धैर्य रखने की सीख देता है।\n• पदों से ऊपर अपने पैशन को चुनें: उच्च प्रशासनिक सेवा या वैज्ञानिक की नौकरी छोड़कर शिक्षण का रास्ता चुनना यह सिखाता है कि मानसिक संतुष्टि और समाज कल्याण के लिए अपने जुनून को प्राथमिकता देना कितना जरूरी है।\n• बदलाव के साथ खुद को ढालें: राष्ट्रीय शिक्षा नीति और AI के आधुनिक दौर में खुद को अपडेट रखना और लगातार खुद का मूल्यांकन करना ही प्रासंगिक बने रहने की कुंजी है।",
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  "category": "राजस्थान",
  "publishedAt": "2026-09-16",
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