सीकर में 10 साल बाद गहराया मानसून संकट, 140 एमएम कम बारिश से खरीफ फसलों पर बढ़ा खतरा राजस्थान के सीकर जिले में सावन सूखा बीतने और 22 दिनों से जारी शुष्क मौसम के कारण खरीफ फसलों पर संकट छा गया है। 15 जून से 2 सितंबर के दौरान सामान्य से 140 एमएम कम वर्षा दर्ज की गई है, जिससे भूजल स्तर के गिरने की आशंका बढ़ गई है। राजस्थान के सीकर जिले में खेती-किसानी पर मानसून की बेरुखी का भारी असर देखने को मिल रहा है। इस वर्ष मानसून सत्र का मुख्य पड़ाव माना जाने वाला सावन का महीना लगभग सूखा गुजर गया, जिससे कृषि क्षेत्र को गहरा झटका लगा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 15 जून से 2 सितंबर तक जिले में मात्र 300 एमएम बारिश दर्ज की गई है, जबकि इस समय अवधि में औसतन 440 एमएम वर्षा होनी चाहिए थी। इस प्रकार जिले को 140 एमएम की भारी बारिश की कमी का सामना करना पड़ रहा है। 10 अगस्त के बाद से ही मानसूनी गतिविधियां बहुत सुस्त पड़ गई थीं और पिछले 22 दिनों से जिले के अधिकांश हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति बनी हुई है। सावन में सूखे की मार से घटती नमी और बढ़ती लागत राजस्थान की पारंपरिक खेती में सावन की बारिश को खरीफ की फसलों के लिए संजीवनी माना जाता है। इसी दौरान होने वाली तेज बारिश से खेतों की मिट्टी में पर्याप्त नमी जमा होती है, जिससे फसलें तेजी से पनपती हैं। हालांकि, इस बार समय पर वर्षा न होने से खेतों की नमी तेजी से खत्म हो रही है। समय से पहले बोई गई अगेती फसलों की सेहत पर पानी की किल्लत का असर साफ दिखने लगा है। अपनी फसलों को सूखने से बचाने के लिए किसान अब पूरी तरह ट्यूबवेल और जल पंपों पर निर्भर हो गए हैं। सिंचाई के लिए लगातार पंप चलाने से एक तरफ किसानों की खेती पर आने वाली लागत बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ भूजल संचित भंडारों पर भी दबाव कई गुना बढ़ गया है। 10 साल के इतिहास में सबसे कमजोर मानसूनी स्थिति सिंचाई विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि वर्ष 2017 के बाद 2026 का मानसून सीजन जिले के लिए सबसे चिंताजनक साबित हो रहा है। इससे पहले 2017 में सीकर जिले में सामान्य बारिश से करीब 107 एमएम कम पानी बरसा था। हालांकि, उस दौर के बाद अगले कई सालों तक मानसून मेहरबान रहा और सामान्य से अधिक बारिश दर्ज की गई। वर्ष 2024 और 2025 के दौरान सीकर में लगभग 630 एमएम वर्षा हुई थी, जिससे जिले के गिरते भूजल स्तर में औसतन 3 मीटर तक का उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया था। परंतु 2026 में बने इन विपरीत मानसूनी हालात ने पिछले दो वर्षों में हुए भूजल सुधार पर फिर से संकट के बादल मंडरा दिए हैं। खरीफ उत्पादन और रबी सीजन की बुवाई पर मंडराता खतरा बारिश की इस भारी किल्लत का प्रतिकूल प्रभाव सिर्फ खरीफ फसलों तक ही सीमित नहीं रहने वाला है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सितंबर के महीने में पर्याप्त बारिश नहीं होती है, तो बाजरा, मूंग, ग्वार और मूंगफली जैसी प्रमुख फसलों के पैदावार आंकड़े बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं। इसके अलावा, आगामी रबी सीजन की बुवाई के समय भी खेतों में आवश्यक नमी की भारी कमी महसूस होगी। नमी न होने के कारण किसानों को बुवाई से पहले और बाद में अतिरिक्त सिंचाई करनी पड़ेगी। अतिरिक्त सिंचाई का सीधा मतलब है कि किसानों पर डीजल, बिजली और मजदूरी का आर्थिक बोझ काफी बढ़ जाएगा। भूजल दोहन बढ़ने से गहरा सकता है जल संकट कमजोर मानसूनी बारिश के कारण भूजल का कुदरती रिचार्ज नहीं हो पा रहा है। भूजल विभाग के सेवानिवृत्त वरिष्ठ वैज्ञानिक ओमप्रकाश ज्याणी का कहना है कि जब तक पर्याप्त बारिश नहीं होती, तब तक धरातल के नीचे पानी का प्राकृतिक रीचार्ज संभव नहीं है। वर्तमान में किसान अपनी फसलों को बचाने के लिए दिन-रात ट्यूबवेल चला रहे हैं। यदि सितंबर में भी मानसून कमजोर रहा, तो रबी फसलों की सिंचाई और पीने के पानी की दैनिक आपूर्ति के लिए भूजल का दोहन और अधिक बढ़ जाएगा। ऐसी परिस्थिति में पिछले दो सालों में सुधरा हुआ 3 मीटर भूजल स्तर एक बार फिर तेजी से नीचे खिसक सकता है। 37 डिग्री का पारा और 4 सितंबर की नई मानसूनी आस बारिश न होने के साथ-साथ सीकर में बढ़ता तापमान भी किसानों की परेशानियों को बढ़ा रहा है। जिले में पारा 37 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है, जिससे धूप की तपिश के कारण फसलों का झुलसना तेज हो गया है। इन विपरीत परिस्थितियों के बीच अब किसानों की आखिरी उम्मीद सितंबर की शुरुआत में सक्रिय होने वाले मानसूनी तंत्र पर टिकी है। मौसम विज्ञान केंद्र के पूर्वानुमान के मुताबिक, 4 सितंबर के आसपास राज्य में एक नया मानसूनी सिस्टम सक्रिय होने की संभावना है। इस सिस्टम के प्रभाव से शेखावाटी क्षेत्र सहित प्रदेश के अनेक इलाकों में मध्यम से भारी वर्षा हो सकती है। यदि यह प्रणाली सीकर में अच्छी वर्षा कराती है, तो खरीफ की खड़ी फसलों को नया जीवन मिल सकेगा और रबी सीजन के लिए खेतों की मिट्टी में नमी व भूजल रीचार्ज की उम्मीदें फिर जीवित हो उठेंगी। इसका आप पर असर सीकर जिले में मानसून की कमी का सीधा असर किसानों के बजट और पेयजल आपूर्ति पर पड़ने वाला है। • भारत में: कम वर्षा से देश के कुल तिलहन और मोटे अनाज उत्पादन पर असर पड़ सकता है। इससे आने वाले समय में बाजरा और मूंगफली के बाजार भाव बढ़ सकते हैं। • सीकर व राजस्थान में: बारिश न होने से किसानों को ट्यूबवेल चलाने के लिए अतिरिक्त बिजली और डीजल खर्च करना पड़ रहा है। इससे खेती की लागत 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ जाएगी। • भूजल और पेयजल संकट: बारिश न होने से भूजल रीचार्ज रुक गया है। अगर सितंबर में बारिश नहीं हुई तो ग्रामीण इलाकों में ट्यूबवेल सूख सकते हैं और पीने के पानी की समस्या गहरा सकती है। • रबी फसल पर असर: खेतों में नमी की कमी के कारण गेहूं और सरसों की रबी बोआई में देरी होगी या अतिरिक्त सिंचाई का खर्च बढ़ेगा। सवाल-जवाब 1. 15 जून से 2 सितंबर तक सीकर में कितनी बारिश हुई है? इस अवधि में सीकर में 300 एमएम बारिश दर्ज की गई है, जो सामान्य 440 एमएम की तुलना में 140 एमएम कम है। 2. सीकर में 10 सालों में मानसूनी स्थिति कैसी रही है? 2026 का मानसून 2017 के बाद सबसे कमजोर रहा है। 2017 में 107 एमएम कम बारिश हुई थी, जबकि 2024 और 2025 में करीब 630 एमएम बारिश दर्ज की गई थी। 3. कम बारिश से किन फसलों के उत्पादन पर संकट मंडरा रहा है? सितंबर में बारिश न होने पर बाजरा, मूंग, ग्वार और मूंगफली जैसी खरीफ फसलों का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। 4. मौसम विभाग ने अगली बारिश की क्या संभावना जताई है? मौसम विभाग के अनुसार 4 सितंबर के आसपास नया मानसूनी सिस्टम सक्रिय होने की संभावना है, जिससे शेखावाटी में बारिश हो सकती है। https://trendkia.com/rajasthan/sikar-men-10-sala-bada-gaharaya-manasuna-snkata-140-emaema-kama-barisha-se-kharipha-phasalon-para-barha-khatara-26569 TrendKia — Har trend, sabse pehle.