सीकर में बीमारी ने छीने माता-पिता, बुजुर्ग दादी के सहारे छूटा पांच मासूमों का बचपन सीकर जिले के कोटड़ी लुहारवास में माता-पिता की मौत के बाद पांच मासूम बच्चों के लालन-पालन का जिम्मा अब उनकी बुजुर्ग दादी के कंधों पर आ गया है। राजस्थान के सीकर जिले में खंडेला इलाके के कोटड़ी लुहारवास गांव से एक बेहद हृदयविदारक स्थिति सामने आई है। जिस आंगन में कभी माता-पिता का साया बच्चों को हर मुश्किल से महफूज रखता था, वहां आज गहरा सन्नाटा और अनिश्चितता पसरी है। इस परिवार के पांच मासूम बच्चे, जिनमें चार बेटियां और एक छोटा बेटा शामिल हैं, एक ही साल के भीतर अनाथ हो चुके हैं। जिस नन्हीं उम्र में बच्चों को माता-पिता के स्नेह, दुलार और उंगली पकड़कर चलने के सहारे की दरकार होती है, उस नाजुक मोड़ पर नियति ने उनके सिर से दोनों ही साये छीन लिए हैं। अब इन बेसहारा बच्चों के जीवन का एकमात्र संबल उनकी लाचार बुजुर्ग दादी बची हैं। साल भर के भीतर दोहरे सदमे से टूटा परिवार कोटड़ी लुहारवास का यह परिवार पिछले बारह महीनों के दौरान दो ऐसे भारी आघात सह चुका है, जिनसे संभल पाना किसी भी इंसान के लिए मुमकिन नहीं होता। करीब एक वर्ष पहले गंभीर बीमारी के चलते बच्चों के पिता शैतान सिंह का निधन हो गया था। पिता की असमय मौत के गम से यह घर अभी उबरने की कोशिश ही कर रहा था कि महज पांच दिन पहले बच्चों की मां विला देवी भी गंभीर बीमारी के कारण दुनिया छोड़ गईं। एक-एक करके दोनों अभिभावकों के चले जाने से पूरा परिवार बिखर गया है। जीवन के जिस पड़ाव में दादी को खुद देखभाल, अपनों के सहारे और विश्राम की जरूरत थी, उसी उम्र में उनके कमजोर कंधों पर पांच-पांच बच्चों की परवरिश और भविष्य को संवारने का अत्यंत कठिन दायित्व आ पड़ा है। उपचार में खत्म हुई जीवन भर की बचत दोनों अभिभावकों की जानलेवा बीमारी के लंबे दौर ने परिवार को आर्थिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया है। इलाज की जद्दोजहद में परिवार की जमा पूंजी धीरे-धीरे पूरी तरह समाप्त हो गई। हालात इस कदर बदतर हो गए कि दवाइयों और अस्पताल के खर्च जुटाने के चक्कर में घर के जरूरी सामान तक बेचने पड़ गए। अब इस बेबस परिवार के सामने सबसे गंभीर चुनौती रोजाना दो वक्त के भोजन का इंतजाम करने की बन गई है। बच्चों के लिए राशन जुटाना, कपड़े उपलब्ध कराना, स्कूल की पढ़ाई जारी रखना और किसी के अस्वस्थ होने पर प्राथमिक चिकित्सा का प्रबंध करना बुजुर्ग दादी के बस से बाहर होता दिख रहा है। घर में कमाई का कोई भी नियमित या पुख्ता जरिया नहीं बचा है, जिससे इन दैनिक जरूरतों की पूर्ति हो सके। जर्जर कमरे की चारदीवारी में कटती जिंदगी यह पूरा परिवार एक जर्जर और पुराने कमरे के भीतर दिन गुजारने को मजबूर है। बदलते मौसम की मार, ठंड, गर्मी या बरसात से सुरक्षित रहने के भी वहां कोई माकूल बंदोबस्त मौजूद नहीं हैं। इसी तंग और असुरक्षित स्थान में इन पांचों भाई-बहनों का बचपन सिमट कर रह गया है। दादी स्वयं बढ़ती उम्र के कारण पैरों के दर्द और अन्य शारीरिक व्याधियों से लगातार जूझ रही हैं। फिर भी, इन छोटे बच्चों के मासूम चेहरों को देखकर वह अपनी तमाम पीड़ाओं को भुलाने की कोशिश करती हैं। उनके जेहन में हर वक्त यही एक खौफनाक सवाल कौंधता रहता है कि उनके बाद इन अनाथ संतानों की देखभाल कौन करेगा और इनके भविष्य की राह कैसे तय होगी। प्रशासनिक सहयोग और सामाजिक मदद की दरकार मां-पिता दोनों को खो चुके इन बच्चों के सामने जिंदगी जीने के बुनियादी साधन जुटाना सबसे बड़ी परीक्षा बन गया है। घर में रोज खाना कौन बनाएगा, इन्हें विद्यालय तक कौन पहुंचाएगा और अचानक बीमार पड़ने पर उपचार का सहारा कौन बनेगा, ऐसे अनगिनत सवाल खड़े हैं। इस कठिन घड़ी में परिवार को सामाजिक संस्थाओं, भामाशाहों और सरकारी प्रशासन से तत्काल संबल की सख्त जरूरत है। बच्चों को एक सुरक्षित पक्का आवास, नियमित पौष्टिक भोजन, निर्बाध शिक्षा, कपड़े और स्वास्थ्य सुविधाएं सुनिश्चित कराना जरूरी है। इसके साथ ही विभिन्न सरकारी योजनाओं से जोड़कर बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए दीर्घकालिक और स्थायी कदम उठाए जाने की तत्काल आवश्यकता है। इसका आप पर असर माता-पिता को खो चुके इन पांच मासूमों के सामने तत्काल आवास, भोजन और शिक्षा की गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है। • सीकर और खंडेला में: स्थानीय प्रशासन और समाजसेवियों के लिए जरूरी है कि वे तुरंत इस परिवार तक पहुंचकर राशन और बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराएं। साथ ही सरकारी अनाथ कल्याण योजनाओं से बच्चों को जोड़कर उनकी नियमित देखभाल सुनिश्चित की जानी चाहिए। • पूरे राजस्थान में: ऐसे संकटग्रस्त परिवारों की पहचान के लिए ग्राम स्तर पर निगरानी तंत्र का सक्रिय होना बेहद जरूरी है। इससे यह सुनिश्चित हो सकेगा कि माता-पिता के गुजर जाने पर बच्चों की पढ़ाई और पोषण बीच में न छूटे। • नागरिकों और भामाशाहों के लिए: सक्षम लोग और स्थानीय संगठन इस परिवार को वित्तीय संबल या बच्चों की शिक्षा का जिम्मा उठाने में सीधे आगे आ सकते हैं। इससे इन पांचों भाई-बहनों का भविष्य अंधकारमय होने से बच सकेगा। • कानूनी और सामाजिक सुरक्षा: बच्चों के संरक्षण और उनकी बुजुर्ग दादी के स्वास्थ्य परीक्षण के लिए बाल कल्याण समिति को समय रहते कदम उठाने होंगे। ऐसा करने से बच्चों का सुरक्षित पुनर्वास और नियमित पालन-पोषण संभव हो सकेगा। ऐसा क्यों हुआ लगातार गंभीर बीमारियों और उसके भारी आर्थिक बोझ ने इस परिवार के दोनों कमाने वाले अभिभावकों को छीन लिया और घर को आर्थिक कंगाली में धकेल दिया। • गंभीर बीमारियों का आघात: करीब एक साल पहले पिता शैतान सिंह और पांच दिन पहले मां विला देवी दोनों की जानलेवा बीमारी के कारण असमय मृत्यु हो गई। दोनों अभिभावकों के लगातार बीमार पड़ने से घर की सामाजिक और शारीरिक नींव पूरी तरह ढह गई। • इलाज का भारी आर्थिक दबाव: दोनों के लंबे उपचार के दौरान परिवार की जीवन भर की जमा पूंजी धीरे-धीरे खत्म हो गई और घरेलू सामान तक बेचना पड़ा। बचत खत्म होने और आमदनी का कोई जरिया न बचने के कारण परिवार अब बुनियादी राशन के लिए भी मोहताज हो गया। • आर्थिक सुरक्षा तंत्र का अभाव: घर में कोई दूसरा कमाने वाला सदस्य या स्थायी संपत्ति नहीं थी जो इस दोहरे सदमे को संभाल पाती। नतीजतन, शारीरिक रूप से अशक्त और बुजुर्ग दादी पर अचानक पांच बच्चों के लालन-पालन का पूरा भार आ गया। सवाल-जवाब 1. यह मामला किस जगह का है और परिवार में कौन-कौन है? यह घटना राजस्थान के सीकर जिले में खंडेला के कोटड़ी लुहारवास की है, जहां चार बेटियों और एक बेटे समेत पांच मासूम बच्चे अपनी बुजुर्ग दादी के साथ रहते हैं। 2. बच्चों के माता-पिता की मौत कब और किस वजह से हुई? बच्चों के पिता शैतान सिंह की मौत करीब एक साल पहले बीमारी के चलते हुई थी, जबकि उनकी मां विला देवी का निधन भी बीमारी के कारण पांच दिन पहले हुआ। 3. परिवार के सामने इस समय सबसे बड़ा संकट क्या है? उपचार में सारी जमा पूंजी खत्म हो जाने और घर का सामान बिक जाने के कारण परिवार के सामने दो वक्त के राशन, पढ़ाई और दैनिक जरूरतों का गंभीर संकट है। 4. बच्चों की देखभाल वर्तमान में कौन कर रहा है? पांचों बच्चों की देखभाल उनकी बुजुर्ग दादी कर रही हैं, जो खुद बढ़ती उम्र और पैरों के दर्द से परेशान हैं। 5. परिवार किस प्रकार के मकान में रह रहा है? परिवार एक जर्जर कमरे में दिन गुजार रहा है, जहां बदलते मौसम की मार से बचने के भी पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। 6. परिवार को किस तरह की मदद की आवश्यकता है? बच्चों के लिए सुरक्षित आवास, नियमित पौष्टिक भोजन, निर्बाध शिक्षा, कपड़े, स्वास्थ्य सुविधाएं और सरकारी योजनाओं से स्थायी सहायता की दरकार है। https://trendkia.com/rajasthan/sikar-men-bimari-ne-chhine-mata-pita-bujurga-dadi-ke-sahare-chhuta-pancha-masumon-ka-bachapana-44448 TrendKia — Har trend, sabse pehle.