सिरोही के तपोवन में प्राकृतिक तरीकों से खिली फूलों की बहार, जैविक खेती से बंपर पैदावार सिरोही के आमथला गांव में रसायनों के बिना देसी-विदेशी गुलाब और टेनिस बॉल गेंदे की सफल बागवानी की जा रही है, जिससे रोजाना सैकड़ों गुलाब और टनों गेंदा पैदा हो रहा है। खेती-किसानी के मौजूदा दौर में अधिक मुनाफे और भारी उपज की होड़ में रासायनिक उर्वरकों व विषैले कीटनाशकों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है, लेकिन राजस्थान में सिरोही जिले का आमथला गांव एक बिल्कुल अलग राह दिखा रहा है। आमथला स्थित ब्रह्माकुमारी संस्थान के तपोवन परिसर में पिछले करीब 8 सालों से पूरी तरह प्राकृतिक और जैविक पद्धति से फूलों की व्यावसायिक खेती की जा रही है। यहां आधुनिक कृषि तकनीकों और पारंपरिक जैविक घटकों का अनूठा संगम देखने को मिलता है, जहां बिना किसी सिंथेटिक केमिकल के गुलाब और गेंदे के फूलों का रिकॉर्ड उत्पादन लिया जा रहा है। कैलिफोर्निया के विशेषज्ञों की देखरेख में बना विशेष रोज गार्डन मॉडल तपोवन में जैविक बागवानी को बढ़ावा देने के लिए एक खास किस्म का ऑर्गेनिक रोज गार्डन तैयार किया गया है। इस पूरे फार्म मॉडल की रूपरेखा और डिजाइन कैलिफोर्निया के अनुभवी कृषि विशेषज्ञों द्वारा विशेष रूप से तैयार की गई थी। तपोवन परिसर में स्थापित इस रोज गार्डन में करीब 1 से 1.5 बीघा भूमि पर गुलाब की खेती की जाती है। यहां देसी और विदेशी दोनों श्रेणियों की कुल 13 अलग-अलग प्रजातियों के गुलाब उगाए जा रहे हैं। इन सभी पौधों का विकास पूरी तरह प्राकृतिक पोषण और पर्यावरण-अनुकूल जैविक नियमों के तहत किया जाता है। रसायनों की जगह जीवामृत, नीम और गोमूत्र का कारगर सुरक्षा चक्र तपोवन प्रबंधन से जुड़े बीके शरत भाई ने बताया कि खेतों में किसी भी प्रकार की रासायनिक खाद या जहरीले कीटनाशकों को बिल्कुल प्रवेश नहीं दिया जाता। कीट नियंत्रण और बीमारियों से पौधों के बचाव के लिए परिसर में ही तैयार किए जाने वाले जीवामृत, नीम की खली और नीम के तेल से बने जैविक घोल का छिड़काव किया जाता है। इसके अलावा जमीन की प्राकृतिक उर्वरक क्षमता को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए गाय के ताजे गोबर और गोमूत्र से निर्मित देशी जैविक खाद खेतों में डाली जाती है। यह खाद पौधों को आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व उपलब्ध कराती है, जिससे फूलों का आकार बड़ा, रंग गहरा और सुगंध प्राकृतिक बनी रहती है। जल संरक्षण और पोषक तत्वों की सही आपूर्ति के लिए मल्चिंग तथा ड्रिप सिंचाई की वैज्ञानिक तकनीक अपनाई गई है। टेनिस बॉल गेंदे के साथ मिश्रित खेती का सफल प्रयोग गुलाब के अलावा तपोवन में लगभग 2 बीघा रकबे में गेंदे के फूलों की सघन जैविक खेती की जा रही है। यहां फूलों को मौसमी सब्जियों के साथ सह-फसल के तौर पर उगाया जाता है, जिसे मिक्स फार्मिंग या हाइब्रिड खेती तकनीक कहा जाता है। इस मिश्रित पद्धति का लाभ यह है कि एक ही खेत से एक साथ फल, फूल और हरी सब्जियां ली जा सकती हैं, जिससे जमीन की उपयोगिता और उत्पादकता दोनों बढ़ जाती हैं। बीके शरत भाई के अनुसार, यहां मुख्य रूप से पीले रंग के टेनिस बॉल किस्म के गेंदे और चटक नारंगी रंग की किस्म के फूलों की बुवाई की गई है। टेनिस बॉल किस्म के गेंदे के फूल आकार में सामान्य गेंदे से काफी बड़े और गठीले होते हैं। इस किस्म का सबसे बड़ा गुण इनकी लंबी शेल्फ लाइफ है। पौधे से तोड़े जाने के बाद भी ये फूल लगभग 1 सप्ताह तक बिल्कुल ताजा बने रहते हैं और मुरझाते नहीं हैं। किसानों को केवल इस बात का ध्यान रखना होता है कि तुड़ाई के बाद इन फूलों को सीधी तेज धूप से बचाकर ठंडी व छायादार जगह पर रखा जाए। सिंचाई के मामले में गेंदे को संतुलित पानी की जरूरत होती है, जिसके लिए ड्रिप इरिगेशन प्रणाली को सबसे कारगर माना गया है। प्रतिदिन 1000 गुलाब और दो बीघा में 3 टन गेंदे का भारी उत्पादन जैविक प्रबंधन के सटीक नतीजों के चलते उत्पादन के आंकड़े काफी उत्साहजनक हैं। लगभग दो बीघा के रकबे से एक बार के चक्र में करीब 3 टन गेंदे के फूल प्राप्त हो जाते हैं। वहीं 1 से 1.5 बीघा में फैले रोज गार्डन से रोजाना 800 से 1000 ताजा गुलाब तोड़े जा रहे हैं। स्थानीय और नजदीकी मंडियों में फूलों की निरंतर खपत बनी रहती है, क्योंकि मंदिर-दरगाहों में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ विवाह समारोहों, स्वागत कार्यक्रमों और मंच सजावट में इनकी भारी आवक होती है। बाजार में मिल रहे शानदार दाम गुणवत्ता बेहतर होने के कारण बाजार में इन जैविक फूलों को बेहतरीन भाव मिल रहे हैं। वर्तमान समय में मंडियों में गेंदे के फूलों का थोक भाव करीब 3000 से 3500 रुपए प्रति क्विंटल चल रहा है। वहीं उच्च गुणवत्ता वाले ताजे गुलाब के फूलों की कीमत 12 हजार से 14 हजार रुपये प्रति क्विंटल तक आसानी से मिल जाती है। रासायनिक खादों के भारी खर्च से मुक्ति और बाजार में ऊंचे दामों के चलते यह मॉडल किसानों के लिए कम लागत में टिकाऊ और बंपर मुनाफे का मजबूत विकल्प साबित हो रहा है। इसका आप पर असर रासायनिक खाद छोडकर जैविक पुष्प उत्पादन अपनाने से किसानों की इनपुट लागत घटती है और मंडियों में टिकाऊ फूलों के बेहतर दाम मिलते हैं। • भारत में किसानों के लिए: रासायनिक खादों की तुलना में गाय के गोबर, गोमूत्र और नीम आधारित जैविक खाद से मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक सुरक्षित रहती है। इससे उर्वरक खरीद पर होने वाला भारी खर्च शून्य हो जाता है और खेती ज्यादा किफायती बनती है। • सिरोही और राजस्थान में: शुष्क और सीमित पानी वाले क्षेत्रों में ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग तकनीक अपनाकर फूलों की खेती से किसान कम पानी में भी रोजाना नकद आमदनी हासिल कर सकते हैं। स्थानीय मंडियों में ताजा गुलाब और गेंदे की मांग वर्षभर बनी रहती है। • मंडियों और व्यापारियों के लिए: टेनिस बॉल किस्म के गेंदे तोड़ने के बाद पूरे एक सप्ताह तक सुरक्षित रहते हैं, जिससे तुड़ाई के बाद होने वाले नुकसान में भारी कमी आती है। व्यापारियों को लंबी दूरी के परिवहन में माल खराब होने का जोखिम नहीं उठाना पड़ता। • फूलों के खरीदारों और उपभोक्ताओं के लिए: रासायनिक दवाओं के छिड़काव से मुक्त ऑर्गेनिक फूलों का इस्तेमाल धार्मिक आयोजनों और सजावट में सुरक्षित रहता है। साथ ही प्राकृतिक पोषक तत्वों की वजह से फूलों का रंग गहरा और महक अधिक समय तक टिकती है। ऐसा क्यों हुआ सिरोही के तपोवन में यह जैविक मॉडल बढ़ते रासायनिक दुष्प्रभावों से बचने और टिकाऊ कृषि को व्यावहारिक रूप से सिद्ध करने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। • रासायनिक खादों के दुष्परिणाम: पारंपरिक खेती में अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता लगातार नष्ट हो रही थी और लागत बढ़ रही थी। इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए संस्थान ने पूरी तरह प्राकृतिक विकल्पों को अपनाने का निर्णय लिया। • विशेषज्ञ डिजाइन का संयोजन: खुले खेत में व्यवस्थित बागवानी के लिए कैलिफोर्निया के कृषि विशेषज्ञों की सहायता से वैज्ञानिक रोज गार्डन तैयार किया गया। इस मॉडल ने स्थानीय जलवायु में विदेशी व देशी दोनों तरह की 13 किस्मों को सफलतापूर्वक ढलने में मदद की। • मिश्रित खेती और जल संरक्षण: पानी की बचत के लिए ड्रिप इरिगेशन और मल्चिंग के साथ-साथ गेंदे को सब्जियों के साथ सह-फसल के तौर पर रोपा गया। इससे जमीन के प्रत्येक हिस्से का पूरा सदुपयोग हुआ और मिट्टी में कीट-व्याधियों का फैलाव प्राकृतिक रूप से रुक गया। सवाल-जवाब 1. सिरोही के तपोवन में गुलाब की कितनी किस्में उगाई जा रही हैं? तपोवन के रोज गार्डन में करीब 1 से 1.5 बीघा भूमि पर देसी और विदेशी प्रजातियों के कुल 13 प्रकार के गुलाब उगाए जा रहे हैं। 2. तपोवन के रोज गार्डन का डिजाइन किसने तैयार किया था? इस ऑर्गेनिक रोज गार्डन मॉडल की रूपरेखा और डिजाइन कैलिफोर्निया के विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई थी। 3. कीटों से बचाव के लिए यहां किन जैविक उपायों का उपयोग होता है? फसलों की सुरक्षा के लिए परिसर में ही तैयार किए गए जीवामृत, नीम की खली और नीम के तेल से बने घोल का इस्तेमाल किया जाता है। 4. टेनिस बॉल गेंदे की क्या खासियत है? यह गेंदा सामान्य फूलों से आकार में बड़ा होता है और तोड़ने के बाद लगभग 1 सप्ताह तक खराब नहीं होता है। 5. तपोवन में गुलाब और गेंदे का कुल कितना उत्पादन हो रहा है? रोज गार्डन से रोजाना 800 से 1000 गुलाब तोड़े जाते हैं, जबकि दो बीघा में गेंदे का उत्पादन एक बार में करीब 3 टन होता है। 6. वर्तमान में बाजार में गेंदे और गुलाब के क्या थोक भाव मिल रहे हैं? मंडियों में गेंदे का भाव 3000 से 3500 रुपए प्रति क्विंटल और गुलाब का भाव 12 हजार से 14 हजार रुपये प्रति क्विंटल तक मिल रहा है। प्रेरणा और सबक सिरोही के तपोवन ने यह सिद्ध कर दिया है कि आधुनिक तकनीक और पारंपरिक जैविक उपायों के मेल से बिना किसी रसायन के भी बंपर पैदावार और शानदार मुनाफा कमाया जा सकता है। • स्थानीय संसाधनों का सदुपयोग: महंगे रसायनों के पीछे भागने के बजाय गाय के गोबर, गोमूत्र और नीम जैसे घरेलू संसाधनों से खेती की लागत न्यूनतम रखी जा सकती है। • सटीक किस्म का चुनाव: सामान्य किस्मों के स्थान पर टेनिस बॉल गेंदे जैसी लंबी शेल्फ लाइफ वाली प्रजातियां चुनना बाजार में नुकसान को रोककर अधिक मुनाफा सुनिश्चित करता है। • वैज्ञानिक तकनीकों का समन्वय: ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग जैसी तकनीकों को प्राकृतिक खेती से जोड़कर पानी की हर बूंद का अधिकतम उत्पादन हासिल किया जा सकता है। • मिश्रित खेती से आय की सुरक्षा: एक ही खेत में फूलों और सब्जियों की एक साथ बुवाई करने से बाजार के उतार-चढ़ाव में भी किसानों की आय सुरक्षित बनी रहती है। https://trendkia.com/rajasthan/sirohi-ke-tapovana-men-prakritika-tarikon-se-khili-phulon-ki-bahara-jaivika-kheti-se-bnpara-paidavara-47655 TrendKia — Har trend, sabse pehle.