{
  "type": "article",
  "title": "स्मार्टफोन छोड़ गीता के श्लोक सीख रहे सिरोही के बच्चे, गोयली में दो दिवसीय बाल पाठ का आयोजन",
  "summary": "सिरोही के गोयली गांव में आठ से पंद्रह साल के बच्चों ने डिजिटल स्क्रीन से दूरी बनाकर श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों का पाठ और कुरुक्षेत्र की झांकियों का मंचन किया।",
  "content": "डिजिटल स्क्रीन, मोबाइल गेमिंग और सोशल मीडिया के दौर में जब कम उम्र के बच्चे घंटों फोन पर बिता रहे हैं, राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित गोयली गांव से एक बिल्कुल अलग तस्वीर सामने आई है। यहां आठ से पंद्रह साल की उम्र के बच्चे स्मार्टफोन से दूरी बनाकर श्रीमद्भगवद्गीता के पवित्र श्लोकों का सस्वर पाठ कर रहे हैं। स्वामीनारायण की बीएपीएस संस्था की तरफ से गोयली गांव में दो दिवसीय बाल गीता पारायण का आयोजन किया गया है, जिसमें ग्रामीण बच्चे उत्साह के साथ हिस्सा ले रहे हैं।\n\nकुरुक्षेत्र संवाद का जीवंत मंचन\nइस दो दिवसीय कार्यक्रम की विशेषता यह रही कि गीता के उपदेश और दार्शनिक संदेश खुद नन्हे बच्चों की जुबान से गूंज रहे हैं। मंच पर बच्चे केवल संस्कृत श्लोकों के गायन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण और धनुर्धर अर्जुन के बीच हुए ऐतिहासिक संवाद को सुंदर झांकियों के जरिए प्रस्तुत किया। किसी बच्चे ने भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप धरा तो कोई बालक अर्जुन की भूमिका में मंच पर उतरा। कुछ प्रतिभागी रथ संभालते दिखे तो कुछ ने पारंपरिक तरीके से शंखनाद कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इन कलात्मक प्रस्तुतियों के माध्यम से बच्चों को श्रीमद्भगवद्गीता के अमर कर्मयोग दर्शन और कर्तव्यनिष्ठा के पाठ से जोड़ा जा रहा है।\n\nगोयली में बाल गीता पारायण के दौरान तैयार किए गए विभिन्न दृश्यों ने महाभारत कालीन कुरुक्षेत्र के माहौल को साकार कर दिया। इस भावनात्मक और सांस्कृतिक प्रस्तुति को देखने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण और बच्चों के परिजन कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे। आयोजन से जुड़े प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि इस पहल का मुख्य ध्येय नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक बोध और मानवीय जीवन मूल्यों की गहरी समझ देना है। कठिन और तनावपूर्ण पलों में हताश होने के स्थान पर सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाकर जीवन में आगे बढ़ने का मार्ग बच्चों को सिखाया जा रहा है। साथ ही असफलता का सामना होने पर विचलित न होकर केवल अपने कर्म पर केंद्रित रहने और आत्मबल बनाए रखने की प्रेरणा दी जा रही है।\n\nसंस्कृत श्लोकों पर नन्हे बच्चों की मजबूत पकड़\nउपस्थित जनसमूह के लिए सबसे विस्मयकारी क्षण बच्चों का अत्यंत सहजता और शुद्ध उच्चारण के साथ जटिल संस्कृत श्लोकों का वाचन करना रहा। आठ से लेकर पंद्रह वर्ष तक के बाल साधक पूरे आत्मविश्वास के साथ आध्यात्मिक वाणियों का उच्चारण करते दिखे। कार्यक्रम के दौरान एक दस वर्षीय बालक ने प्रसिद्ध श्लोक कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन का निर्भीकता के साथ पाठ किया, जिसकी स्पष्टता ने वहां मौजूद सभी ग्रामीणों को गहराई से प्रभावित किया।\n\nबीएपीएस संस्था से जुड़े हीरालाल ने इस अवसर पर बताया कि इस पूरे आयोजन की मूल सोच बच्चों को उनकी जड़ों और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं से मजबूती से जोड़ना है। संस्था केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित न रहकर बालकों में चरित्र निर्माण और नैतिक संस्कार रोपने पर विशेष ध्यान दे रही है, जिससे वे एक जिम्मेदार नागरिक बन सकें।\n\nचरित्र निर्माण और सकारात्मक जीवनशैली की नई दिशा\nआयोजन समिति का मानना है कि नई पीढ़ी के स्वभाव में सकारात्मक दृष्टिकोण और मर्यादित आचरण ढालने के लिए बचपन से ही उन्हें प्राचीन भारतीय ग्रंथों के गंभीर दर्शन से परिचित कराना आवश्यक है। श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से बच्चों को निष्काम कर्म, अडिग आत्मविश्वास, व्यक्तिगत अनुशासन और प्रतिकूल परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने के अमूल्य गुण सिखाए जा रहे हैं।\n\nगोयली का यह समागम मात्र एक औपचारिक धार्मिक अनुष्ठान बनकर नहीं रहा, बल्कि इसने बच्चों के दैनिक जीवन और सोच को रचनात्मक दिशा देने वाली सामाजिक पहल का रूप ले लिया। गेमिंग और स्क्रीन पर निर्भरता के बढ़ते माहौल में बच्चों का यह अनुशासन पूरे इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है। इस आयोजन ने साफ सिद्ध किया है कि यदि बाल मन को सही मार्गदर्शन, अनुकूल माहौल और प्रोत्साहन मिले, तो वे आधुनिक तकनीक के साथ तालमेल बिठाते हुए अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत से भी पूरी निष्ठा से जुड़ सकते हैं।\n\nइसका आप पर असर\nयह पहल दिखाती है कि बच्चों के अत्यधिक स्क्रीन टाइम को कम करने के लिए सांस्कृतिक और मूल्य-आधारित गतिविधियां एक प्रभावी समाधान बन सकती हैं।\n\n• भारत में: नई पीढ़ी में बढ़ते डिजिटल स्क्रीन समय और मोबाइल गेमिंग की आदत को नियंत्रित करने के लिए माता-पिता ऐसी सह-पाठ्यचर्या पहलों को अपना सकते हैं। बच्चों को सांस्कृतिक ग्रंथों और सार्वजनिक मंचन से जोड़ने से उनका आत्मविश्वास और भाषाई कौशल सुधरता है।\n• सिरोही में: गोयली और आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों के परिवारों को अपने बच्चों के बौद्धिक और नैतिक विकास के लिए एक सशक्त सामुदायिक मंच मिला है। स्थानीय स्तर पर ऐसे आयोजनों से बच्चों में अनुशासन, स्मरण शक्ति और अपनी जड़ों के प्रति जुड़ाव मजबूत होता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह कार्यक्रम बच्चों में बढ़ते स्क्रीन समय को कम करने और उन्हें प्रारंभिक उम्र में ही नैतिक मूल्यों से जोड़ने के उद्देश्य से आयोजित किया गया।\n\n• डिजिटल निर्भरता की चुनौती: आज के समय में आठ से पंद्रह वर्ष के बच्चे पढ़ाई के अलावा अपना अधिकांश समय स्मार्टफोन, गेमिंग और सोशल मीडिया पर बिता रहे हैं। इसी असंतुलन को दूर करने के लिए संस्था ने उन्हें रचनात्मक और मानसिक रूप से समृद्ध गतिविधियों की ओर मोड़ने का निर्णय लिया।\n• संस्थागत पहल और संस्कार: स्वामीनारायण की बीएपीएस संस्था की ओर से बच्चों में आत्मविश्वास, धैर्य और निष्काम कर्म के सिद्धांत विकसित करने के लिए दो दिवसीय बाल गीता पारायण तैयार किया गया। इसके तहत संस्कृत श्लोकों के कंठस्थीकरण और नाट्य प्रस्तुतियों के जरिए जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण सिखाया जा रहा है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. गोयली गांव में किस कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है?\nगोयली गांव में बच्चों के लिए दो दिवसीय बाल गीता पारायण का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें श्लोक पाठ और झांकियां शामिल हैं।\n\n2. इस आयोजन में किस आयु वर्ग के बच्चे हिस्सा ले रहे हैं?\nकार्यक्रम में आठ से पंद्रह वर्ष की उम्र के बच्चे सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं।\n\n3. यह बाल गीता पारायण किस संस्था द्वारा आयोजित किया गया है?\nइस कार्यक्रम का आयोजन स्वामीनारायण की बीएपीएस संस्था द्वारा किया जा रहा है।\n\n4. बच्चों ने मंच पर कौन से मुख्य प्रसंग प्रस्तुत किए?\nबच्चों ने भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हुए कुरुक्षेत्र संवाद को सजीव झांकियों के माध्यम से प्रस्तुत किया।\n\n5. आयोजन के पीछे संस्था का मुख्य उद्देश्य क्या है?\nसंस्था का उद्देश्य बच्चों को मोबाइल से दूर कर भारतीय संस्कृति, कर्मयोग और सकारात्मक जीवन मूल्यों से जोड़ना है।\n\nप्रेरणा और सबक\nगोयली के बच्चों की यह पहल दर्शाती है कि सही मार्गदर्शन से बच्चे आधुनिक डिजिटल आकर्षणों के बीच भी गहरी एकाग्रता और सांस्कृतिक समझ विकसित कर सकते हैं।\n\n• एकाग्रता और अनुशासन: कम उम्र में संस्कृत श्लोकों का कठिन उच्चारण सीखकर बच्चों ने साबित किया कि लगन से किसी भी जटिल विषय में महारत पाई जा सकती है।\n• डिजिटल संतुलन: स्मार्टफोन और ऑनलाइन गेमिंग से समय बचाकर रचनात्मक और ज्ञानवर्धक गतिविधियों में लगाना मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी है।\n• संकट में सकारात्मकता: श्रीमद्भगवद्गीता के कर्मयोग दर्शन को समझकर बच्चे असफलताओं से निराश हुए बिना निरंतर प्रयास करने की सीख ले रहे हैं।",
  "url": "https://trendkia.com/rajasthan/sirohi-men-smartaphona-chhora-gita-ke-shloka-sikha-rahe-bachche-goyali-men-do-divasiya-bala-patha-ka-ayojana-42968",
  "category": "राजस्थान",
  "publishedAt": "2026-10-05",
  "tags": [
    "सिरोही",
    "गोयली",
    "श्रीमद्भगवद्गीता",
    "बीएपीएस",
    "बाल संस्कार",
    "संस्कृत श्लोक"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}