# दीपावली पर घरों में गूंजने वाले पारंपरिक लक्ष्मीजी के पाने की अनोखी कहानी, बीकानेर के कलाकारों की कला

> बीकानेर में दीपावली के पावन अवसर पर मशीन या केमिकल रंगों के बिना, प्राकृतिक खनिजों और 22 कैरेट सोने के इस्तेमाल से पारंपरिक लक्ष्मीजी के पाने तैयार किए जाते हैं, जिन्हें तैयार करने की शुरुआत पुष्य नक्षत्र से होती है।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-11-08 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/the-hidden-ancient-craft-behind-traditional-lakshmi-paana-ahead-of-diwali-57936 · **Language:** Hindi
**Tags:** लक्ष्मीजी पाना, बीकानेर कला, मथेरण चित्रकला, दीपावली परंपरा, हस्तशिल्प कला, प्राकृतिक रंग

रोशनी के महापर्व दीपावली पर देश भर के अनगिनत घरों में मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना के लिए पारंपरिक पाना खरीदने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। आधुनिक बाजार में आज रंग-बिरंगे और आकर्षक डिजाइनों से सजे हुए अनगिनत पाना आसानी से मिल जाते हैं, जिन्हें आमतौर पर आधुनिक प्रिंटिंग मशीनों की मदद से थोक में तैयार किया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी इस बात पर विचार किया है कि इन मशीनी उत्पादों से बिल्कुल अलग, एक बेहद खास पारंपरिक तरीके से भी लक्ष्मीजी का पाना तैयार होता है? इस पारंपरिक कला में किन अनोखी सामग्रियों का उपयोग किया जाता है और मां लक्ष्मी के स्वरूप को इतना जीवंत व आकर्षक कैसे बनाया जाता है, इसके पीछे एक दिलचस्प और प्राचीन संस्कृति छिपी है।

 

## बीकानेर की मथेरण चित्रकला का अनूठा संसार
 राजस्थान के बीकानेर शहर में आज भी इस जिज्ञासा का उत्तर सदियों पुरानी मथेरण चित्रकला की प्राचीन परंपरा में सुरक्षित है। आधुनिक मशीनों का उपयोग करने के बजाय यहां के कुशल कलाकार अपने हाथों की बेहद बारीक कारीगरी से मां लक्ष्मी का पाना तैयार करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया की सबसे खास बात यह है कि इसमें किसी भी प्रकार के केमिकल या कृत्रिम रंगों का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं किया जाता है। इसके विपरीत, जमीन से मिलने वाले प्राकृतिक खनिजों और पारंपरिक सामग्रियों से ही तमाम रंग तैयार किए जाते हैं। यहां तक कि मां लक्ष्मी के आभूषणों और श्रृंगार का कार्य भी सीधे 22 कैरेट शुद्ध सोने के माध्यम से संपन्न किया जाता है।

 

## पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत
 शाही रियासत के काल से ही मंदिरों, ऐतिहासिक महलों, प्राचीन हवेलियों और आम नागरिकों के घरों की दीवारों को अपनी कला से सजाती आ रही मथेरण चित्रकला बीकानेर की बेहद समृद्ध सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा रही है। मथेरण या महात्मा समुदाय के पारंपरिक चित्रकार अपनी आने वाली पीढ़ियों के साथ मिलकर इस नायाब कला को लगातार आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। दीपावली के पर्व पर विशेष रूप से तैयार किए जाने वाले लक्ष्मीजी के ये पाना इसी गौरवशाली परंपरा की एक अनूठी और जीवित मिसाल हैं।

 

## आस्था के साथ जुड़ी है शहर की पहचान
 आज के दौर में जहां बाजारों में मिलने वाले अधिकांश पाना प्रिंटिंग मशीनों से बनते हैं और उनमें रासायनिक रंगों का खुलकर प्रयोग होता है, वहीं बीकानेर के कलाकार आज भी प्राकृतिक तत्वों, पारंपरिक विधियों और हाथों की नक्काशी पर भरोसा करते हैं। यह केवल एक तस्वीर को रंगने या उकेरने की कला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों से चली आ रही उस अमूल्य विरासत को संजोए रखने का गंभीर प्रयास है जिसमें गहरी आस्था के साथ-साथ बीकानेर की सांस्कृतिक अस्मिता भी पूरी तरह समाहित है.

 

## गंगाजल और गुलाबजल का पवित्र उपयोग
 जाने-माने चित्रकार रामकुमार भादाणी ने जानकारी देते हुए बताया कि लक्ष्मीजी का पाना बनाने का पवित्र कार्य हर साल पुष्य नक्षत्र के शुभ दिन से आरंभ किया जाता है। हाल ही में आए पुष्य नक्षत्र के अवसर पर इस वर्ष के नए पाने बनाने का कार्य शुरू कर दिया गया है। इसे तैयार करने के दौरान शुद्धता का बहुत अधिक ध्यान रखा जाता है। सामान्य पानी के स्थान पर इन रंगों को तैयार करने और घोलने के लिए पूरी तरह शुद्ध गंगाजल तथा गुलाबजल का ही प्रयोग किया जाता है।

 

## प्राकृतिक खनिजों से बनते हैं पारंपरिक रंग
 रामकुमार भादाणी ने आगे बताया कि इस पारंपरिक पाना की सबसे बड़ी और अनोखी विशेषता इसके प्राकृतिक रंग हैं। चित्रकारी में सफेद रंग की आवश्यकता पूरी करने के लिए कली का उपयोग किया जाता है, जबकि पीले रंग के लिए पेवड़ी काम में लाई जाती है। इसके अलावा, गहरा काला रंग प्राप्त करने के लिए शुद्ध देसी घी का दीपक जलाया जाता है और उससे निकलने वाले धुएं को विशेष रूप से एकत्र किया जाता है। इस एकत्रित धुएं में गुड़ का पानी मिलाकर एक खास मिश्रण तैयार किया जाता है, और इन्हीं पारंपरिक रंगों से मां लक्ष्मी के स्वरूप में बारीक चित्रकारी की जाती है।

 

## 22 कैरेट सोने से होता है माता का श्रृंगार
 चित्रकार रामकुमार बताते हैं कि इन पानों में मां लक्ष्मी का श्रृंगार बेहद खास और पारंपरिक विधि से किया जाता है। इसके लिए अंबोजेरी की पुरानी तकनीक को अपनाया जाता है, जिसमें घड़े की मिट्टी को बारीक पीसकर उसमें गुड़ और गोंद मिलाया जाता है ताकि एक विशेष घोल तैयार किया जा सके। इस घोल के ऊपर सुनहरी मनोत का कार्य किया जाता है और अंत में सोने की परत चढ़ाई जाती है। इसके पश्चात, पूरे 22 कैरेट सोने का उपयोग करके मां लक्ष्मी का संपूर्ण श्रृंगार किया जाता है। माता को उनके पारंपरिक सोलह श्रृंगार से सुसज्जित किया जाता है, जिसमें सुंदर मुकुट, मोतियों का हार, भुजबंद, कंदोला, नथ, कड़े और पाजेब जैसी मनमोहक आकृतियां शामिल होती हैं।

 

## चतुर्भुजी स्वरूप और जलते हुए अमृत कलश
 कारीगर ने विस्तार से बताया कि इस पारंपरिक पाने में मां लक्ष्मी का अलौकिक चतुर्भुजी स्वरूप उकेरा जाता है। माता के नेत्र कमल के फूल के समान विशाल, भौहें धनुषाकार और मस्तक पर स्वर्ण मुकुट सुशोभित होता है। चित्र के दोनों तरफ दो सफेद हाथियों को दर्शाया जाता है, जिन्हें भारतीय संस्कृति में ऐश्वर्य और अपार समृद्धि का प्रतीक माना गया है। इन दोनों हाथियों की सूंड में अमृत कलश होता है और वे लगातार मां लक्ष्मी का जलाभिषेक करते हुए प्रतीत होते हैं। इतना ही नहीं, हाथियों के शरीर पर नीले रंग की चुंदड़ी और उनके मस्तक पर हरे रंग का ओढ़ना भी बहुत खूबसूरती से दर्शाया जाता है।

 

## पूरे साल बनी रहती है कलाकृति की मांग
 रामकुमार भादाणी बताते हैं कि इस अनूठी कला की मांग केवल दीपावली के त्योहार तक ही सीमित नहीं रहती है, बल्कि उनके पास पूरे सालभर ऑर्डर आते रहते हैं। सामान्यतः एक वर्ष के दौरान लगभग 108 लक्ष्मीजी के पाना तैयार किए जाते हैं। पुष्य नक्षत्र के अलावा महानिशा यानी महारात्रि के विशेष अवसर पर भी इन कलाकृतियों पर विशेष कार्य किया जाता है। धनतेरस से लेकर दीपावली के मुख्य पर्व तक ग्राहक स्वयं आकर अपने पाना प्राप्त करते हैं। इन कलाकृतियों का कोई भी निश्चित या निर्धारित मूल्य नहीं होता है, बल्कि कलाप्रेमी लोग अपनी स्वेच्छा और अगाध श्रद्धा के अनुसार कलाकारों को कीमत अर्पित करते हैं।

## इसका आप पर असर
यह पारंपरिक कला और संस्कृति से जुड़ी खबर है, जिसका पाठकों के दैनिक जीवन पर कोई सीधा वित्तीय या प्रशासनिक असर नहीं पड़ता है।

- **सांस्कृतिक महत्व:** पारंपरिक हस्तशिल्प और प्राचीन कलाओं के प्रति लोगों की रुचि बढ़ती है, जिससे स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहन मिलता है।
- **त्योहारी खरीदारी:** दीपावली के अवसर पर लोग मशीनी उत्पादों के बजाय पारंपरिक और सांस्कृतिक वस्तुओं की ओर आकर्षित होते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
यह पारंपरिक प्रक्रिया सदियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत और प्राचीन तकनीकों को जीवित रखने के उद्देश्य से अपनाई जाती है।

- **पारंपरिक विरासत:** मथेरण चित्रकला रियासतकाल से चली आ रही है और कलाकार पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस कला को आगे बढ़ा रहे हैं।
- **शुद्धता की मान्यता:** धार्मिक आयोजनों में रासायनिक रंगों के स्थान पर प्राकृतिक खनिजों और शुद्ध तत्वों के उपयोग की परंपरा है।
- **विशेष मुहूर्त:** इस कलाकृति को बनाने की शुरुआत पुष्य नक्षत्र जैसे शुभ दिन से की जाती है ताकि इसकी पवित्रता बनी रहे।

## सवाल-जवाब

### 1. लक्ष्मीजी का पाना बनाने का काम किस दिन शुरू होता है?
लक्ष्मीजी का पाना बनाने का कार्य हर वर्ष पुष्य नक्षत्र के शुभ दिन से शुरू किया जाता है।

### 2. इस पाना को बनाने में किन रंगों का उपयोग किया जाता है?
इसे बनाने में केमिकल रंगों के बजाय प्राकृतिक खनिजों, कली, पेवड़ी और दीये के धुएं से बने पारंपरिक रंगों का इस्तेमाल होता है।

### 3. माता लक्ष्मी के श्रृंगार में किस धातु का प्रयोग किया जाता है?
मां लक्ष्मी का श्रृंगार और आभूषणों का कार्य 22 कैरेट शुद्ध सोने से किया जाता है।

### 4. इस पारंपरिक कला का संबंध किस शहर से है?
यह पारंपरिक मथेरण चित्रकला राजस्थान के बीकानेर शहर से जुड़ी हुई है।

## प्रेरणा और सबक
पारंपरिक कलाकारों की यह यात्रा कला और समर्पण का बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करती है।

- **कला के प्रति निष्ठा:** आधुनिक मशीनों के दौर में भी अपनी प्राचीन शैली और विरासत को सहेजे रखना बड़ी उपलब्धि है।
- **प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग:** पर्यावरण के अनुकूल खनिजों और प्राकृतिक तत्वों से उच्च गुणवत्ता की कलाकृति तैयार की जा सकती है।
- **पीढ़ीगत ज्ञान का प्रसार:** पुश्तैनी हुनर को जीवित रखकर नई पीढ़ी को सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ा जा सकता है।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._