टोंक के सरकारी अस्पताल में अव्यवस्थाओं का अंबार, चैम्बर से डॉक्टर नदारद और गलियारों में घूम रहे कुत्ते टोंक के मुख्य सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों के चैम्बर खाली मिलने और गलियारों में आवारा कुत्तों के घूमने से मरीजों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली के कारण आमजन को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। टोंक के प्रमुख सरकारी अस्पताल की कार्यप्रणाली एक बार फिर गंभीर चर्चा का विषय बन गई है। चिकित्सा संस्थान में इससे पहले प्रतिबंधित दवाओं के चोरी होने का मामला प्रकाश में आया था और इसके तुरंत बाद दवा भंडार कक्ष में बरती गई लापरवाही को लेकर भी तीखे सवाल खड़े हुए थे। इन तमाम घटनाओं के बावजूद स्वास्थ्य संस्थान के अंदरूनी हालातों में किसी भी तरह का सकारात्मक बदलाव देखने को नहीं मिल रहा है। इस चिकित्सालय में चिकित्सकों की अनुपस्थिति, साफ-सफाई की बदतर हालत और परिसरों में घूमते आवारा पशुओं जैसी गंभीर दिक्कतें लगातार इलाज कराने आने वाले रोगियों तथा उनके साथ आए तीमारदारों के लिए मुसीबत का सबब बनी हुई हैं। स्वास्थ्य केंद्र के वर्तमान परिदृश्य का जायजा लिया जाए तो प्रशासन की तरफ से व्यवस्थाएं दुरुस्त करने के तमाम दावों के विपरीत धरातल पर स्थितियां बिलकुल उलट नजर आती हैं। हाल ही में अस्पताल का निरीक्षण करने पर कई चिकित्सक अपने निर्धारित चैम्बर से पूरी तरह गायब मिले, जिसकी वजह से दूर-दराज से उपचार पाने की आस में आए बीमार लोगों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इस तरह के सरकारी संस्थानों में रोगियों को नियत समय पर चिकित्सकीय परामर्श न मिल पाना यहां की पूरी चिकित्सा प्रणाली की कार्यकुशलता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। अस्पताल के गलियारों में आवारा कुत्तों का कब्जा चिकित्सालय परिसर में घूमते आवारा जानवर भी यहां की एक बहुत बड़ी और स्थाई समस्या बन चुके हैं, जिसके तहत अस्पताल के मुख्य गलियारों और बरामदों में कुत्ते बेखौफ सोते हुए दिखाई दिए। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस पूरे परिसर में अक्सर लावारिस पशुओं का जमावड़ा लगा रहता है। अस्पताल जैसे अतिसंवेदनशील और साफ-सुथरे स्थान पर इस तरह की अस्वास्थ्यकर स्थिति रोगियों की व्यक्तिगत सुरक्षा, स्वच्छता के मानकों और संक्रमण को रोकने के उपायों के लिहाज से बेहद चिंताजनक है। विशेष रूप से वृद्धजनों, छोटे बच्चों और पहले से ही गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए इस प्रकार का वातावरण स्वास्थ्य के लिए और अधिक खतरनाक साबित हो सकता है। अधिकारियों की व्यस्तता और प्रशासनिक सुस्ती इस पूरी व्यवस्था को लेकर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी शैलेन्द्र चौधरी और अस्पताल के प्रमुख चिकित्सा अधिकारी प्रतीक सालोदिया की कार्यशैली पर भी सवालिया निशान लग रहे हैं। जानकारों का आरोप है कि ये सभी अधिकारी विभागीय बैठकों में बहुत ज्यादा व्यस्त रहते हैं, लेकिन अस्पताल के भीतर की जमीनी व्यवस्थाओं और बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने की दिशा में कोई ठोस ध्यान नहीं दिया जा रहा है। हालांकि इस पूरे मामले को लेकर संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों का पक्ष सामने आना अभी बाकी है, जिससे पूरी स्थिति साफ हो सकेगी। महंगे निजी अस्पतालों का रुख करने को विवश मरीज सरकारी स्वास्थ्य केंद्र के भीतर उपचार और मुफ्त दवाओं की उपलब्धता को लेकर मरीजों की परेशानी का सीधा असर उनकी जेब पर पड़ रहा है। अस्पताल में डॉक्टरों के समय पर न मिलने और दवाइयों का अभाव होने की वजह से आम नागरिकों को मजबूरी में महंगे निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। इस मजबूरी के कारण आर्थिक रूप से कमजोर और गरीब परिवारों के ऊपर अतिरिक्त वित्तीय बोझ बढ़ जाता है। सरकारी अस्पताल हमेशा से ही आम जनता को सुलभ और किफायती चिकित्सा सेवाएं मुहैया कराने के उद्देश्य से संचालित किए जाते हैं। ऐसे में टोंक के इस सरकारी अस्पताल में चिकित्सकों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करने, दवा वितरण व्यवस्था को पटरी पर लाने और आवारा जानवरों के खतरे को पूरी तरह नियंत्रित करने के लिए कड़े और प्रभावी कदम उठाए जाने की तत्काल आवश्यकता है। इसका आप पर असर टोंक के सरकारी अस्पताल की बदहाल व्यवस्थाओं का सीधा असर स्थानीय गरीब मरीजों और उनके परिवारों पर पड़ रहा है, जिन्हें इलाज के लिए निजी अस्पतालों में अधिक पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं। • राजस्थान में: सरकारी चिकित्सा संस्थानों में डॉक्टरों की अनुपस्थिति और आवारा जानवरों के घूमने से स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठते हैं। आम मरीजों को समय पर इलाज न मिलने से उनकी बीमारियां और अधिक बढ़ सकती हैं। • टोंक में: स्थानीय निवासियों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को मामूली जांच और परामर्श के लिए भी भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। मजबूरी में निजी क्लीनिकों का रुख करने से इन परिवारों का घरेलू बजट पूरी तरह चरमरा जाता है। ऐसा क्यों हुआ अस्पताल की व्यवस्थाएं बिगड़ने के पीछे मुख्य वजह प्रशासनिक लापरवाही और उच्च अधिकारियों का जमीनी निरीक्षण से दूरी बनाना है। बैठकों में अत्यधिक व्यस्तता और सुस्त कार्यशैली के कारण स्वास्थ्य सेवाओं का प्रबंधन पूरी तरह पटरी से उतर गया है। • प्रशासनिक सुस्ती: मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी शैलेन्द्र चौधरी और प्रमुख चिकित्सा अधिकारी प्रतीक सालोदिया के बैठकों में व्यस्त रहने से जमीनी स्तर पर निगरानी का अभाव है। • सुरक्षा और स्वच्छता की अनदेखी: अस्पताल परिसरों में उचित चारदीवारी या गार्डों की सख्ती न होने के कारण आवारा कुत्तों का गलियारों तक आसानी से पहुंच जाना संभव हुआ है। • जवाबदेही की कमी: पिछली घटनाओं जैसे प्रतिबंधित दवाओं की चोरी पर ठोस कार्रवाई न होने से निचले स्तर के कर्मचारियों में भी लापरवाही की प्रवृत्ति बढ़ गई है। सवाल-जवाब 1. टोंक के सरकारी अस्पताल में मुख्य समस्या क्या है? अस्पताल में डॉक्टरों के चैम्बर से गायब रहने और गलियारों में आवारा कुत्तों के घूमने से मरीजों को भारी परेशानी हो रही है। 2. इस अस्पताल के प्रमुख अधिकारी कौन हैं? अस्पताल के प्रबंधन से जुड़े प्रमुख अधिकारियों में सीएमएचओ शैलेन्द्र चौधरी और पीएमओ प्रतीक सालोदिया शामिल हैं। 3. मरीजों को निजी अस्पतालों का रुख क्यों करना पड़ रहा है? सरकारी अस्पताल में समय पर डॉक्टर और दवाएं न मिलने के कारण मरीजों को मजबूरी में निजी अस्पतालों में जाना पड़ रहा है। 4. अस्पताल की व्यवस्थाओं को लेकर पहले क्या विवाद हुआ था? इससे पहले अस्पताल में प्रतिबंधित दवाओं की चोरी और स्टोर में लापरवाही का मामला सामने आ चुका है। https://trendkia.com/rajasthan/tonk-ke-sarkari-aspatal-me-awyawasthaon-ka-ambar-47007 TrendKia — Har trend, sabse pehle.